लघुकथा: समय पर ताला

राजेंद्र ओझा

पहाड़ी तालाब के सामने, बंजारी मंदिर के पास
कुशालपुर, रायपुर (छत्तीसगढ़)



चूंकि दोनों नौकरी पेशा थे, कुछ अपनी बचत और कुछ बैंक से लिए लोन के आधार पर उन्होंने, तो शादी के बाद अपना खुद का एक आशियाना बना लिया था और हर दिन शुभ दिन होता है मानते हुए एक दिन वे दोनों 'अपने घर' में रहने भी आ गये और साथ ही आया राकेट ताला।

श्रीमती सुबह के स्कूल में थी तो श्रीमान का ऑफिस साढ़े दस का था। उन दिनों उनके पास राकेट ताले की एक ही चाबी थी। श्रीमान ताला लगाकर जाते तो आधी ईंट के टुकड़े, पुराने जूते जैसी दो-चार तय की गयी जगहों पर चाबी छिपा देते। जब कभी श्रीमती को बाद में जाना होता तो वह भी इसी तरह चाबी छिपाकर ही जाती।

गफलत तब होती जब हड़बड़ी में चाबी छिपाना छूट जाता, तब दोनों में से एक, दूसरे के आने के इंतजार में भटकता रहता। ऐसा जब दो-चार बार हो गया, तब राकेट की एक डुप्लीकेट चाबी का घर में प्रवेश हुआ। यह सहूलियत की चाबी थी। अब दोनों अपने-अपने समय पर जाते और आते। गुच्छे में चाबी के साथ निश्चिंतता भी लटक रही थी। आधी ईंट के टुकड़े पर अब दिया रखा जाने लगा था और पुराने जूते ठीक करवा कर महरी के आदमी को दे दिये गये थे। चीजें मूल रूप में हो या टूटी-फूटी, काम की बनी ही रहती हैं।

टी वी के ऊपर दीवार पर उन दोनों का शादी के समय का एक फोटो लगा हुआ था। चिड़िया उस फोटो के पीछे ही घोंसला बना रही थी। अंडे दे दिये जाने का अनुमान, मादा चिड़िया के वहीं बने रहने से लगा। यह संयोग ही था कि उन्हीं दिनों इनका घर भी किलकारियों से गूंजने लगा।

दिन तो उड़ रहे थे। बिटिया अब स्कूल जाने लगी थी। शुरूआती दिनों में कभी श्रीमती तो कभी श्रीमान बिटिया को स्कूल छोड़ आते और ले आते। बढ़ती भागम-भाग और स्कूल-ऑफिस में बनती असहज स्थिति से राकेट की एक और डुप्लीकेट चाबी ने छुटकारा दिलाया।

अब तीनों के पास अपना-अपना समय था और थी अपनी-अपनी चाबी।

श्रीमती और श्रीमान अब रिटायर हो गये हैं। चाबी के गुच्छे में राकेट की चाबी हालांकि अभी भी लगी हुई है, पर अब उसका 'पहली नजर में दिख जाने वाली जरूरत' वाला महत्व नहीं रहा।

समंदर किनारे रेत के टीले के भीतर पैर दबाए वे आराम से बैठे थे। समंदर का पानी जब टीलों को भीगा कर ढहा देता, तो वे फिर से टीला बना लेते। इस खुले समय में न कहीं जाने की जल्दी थी और न ही उठने की।

वे सोच रहे थे, ताला घर पर लगाते थे या समय पर।

1 comment :

  1. यह लघुकथा के परम्‍परागत खांचे में तो फिट नहीं बैठती। और फिर यह किसी कहानी के नोटस ज्‍यादा लग रहे हैं।

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