काव्य: रोहित ठाकुर

रोहित ठाकुर

____  नदी  - 4  ____

वह नदी चाँद पर बहती है
किसी खाई में 
वह नदी
धरती पर बहने वाली
किसी पठारी नदी की जुड़वाँ है
वह पठारी नदी जब गर्मियों में हाँफती है
वह नदी जो चाँद पर बहती है
उसकी आँखों से झड़ते है आँसू
और तारे टूटते हैं
मैं तारों को टूटते देखता हूँ
तारों का टूटना
दो नदी का मिलना है
मेरी कविता में
नदी ऐसे ही मिलती है
जब नदी मिलती है
उसकी वनस्पतियों का रंग अधिक
हरा हो जाता है
यहीं से लेता हूँ मैं हरापन
उन लोगों के लिये
उस पेड़ के लिये
जहाँ फैल रहा है पीलापन।

_______     नदी  -  3    _______

 पिता ने कहा था
अपने कठिन दिनों में
 कुछ मांगना नहीं
बिलकुल नदी की तरह

नदी और तुम दोनों
एक ही गोत्र के हो
तब से मैंने शामिल किया
नदी को अपने जीवन में

और बाँटता रहा
उसके साथ अपना लेमनचूस
पर नदी के स्वाद को नहीं जान सका
मैं जी लूंगा ऐसे संशय के साथ

नदी ने मेरे अंदर नहीं भरी रेत
इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ
रेत न होना नदी होना है
पिता ने कहा एक दिन।

_____  नदी  - 2   _____

नदी सो रही है
रेत पर
भीगती हुई
खाली पाँव
वह मजदूर लड़की
भी एक नदी है
खेत में खोई है
भीग रही है ओस से
एक भीगती हुई नदी
एक भीगती हुई लड़की
हमशक्ल हैं
हँसती हुई वह लड़की
इस समय
एक बहती हुई नदी है ।

______   नदी -  1    ______

नदी को देखना
नदी को जानना नहीं है
नदी को छूना
नदी को पाना नहीं है
नदी के साथ संवाद
नदी की तरह भीगना नहीं है
नदी की तरह होने के लिये
नदी के उद्गम स्थल तक पहुंचना नहीं है
सड़क पर और किसी गली में
नदी की तरह बहा जा सकता है
नदी की जिजीविषा लेकर।

_________   आखिरी दिन    _________

आखिरी दिन
आखिरी दिन नहीं होता
जैसे किसी टहनी के आखिरी
छोर पर उगता है हरापन
दिन की आखिरी छोर पर
उगता है दूसरा दिन
आज व्यस्त है शहर
शहर की रोशनी जहाँ
खत्म हो जाती है
वहाँ जंगल शुरू होता है
आज व्यस्त है जंगल भी
किसी जंगली फूल का
नामकरण है आज
जंगल से रात को लौट कर
कल सुबह शहर के
जलसे में शामिल होना है
दिन की व्यस्तता ही
एक पुल है जो जोड़ती है
एक वर्ष को दूसरे वर्ष से।

______   जीवन   ______ 

एक साइकिल पर सवार आदमी का सिर
आकाश से टकराता है
और बारिश होती है
उसकी बेटी ऐसा ही सोचती है

वह आदमी सोचता है की उसकी बेटी के
नीले रंग की स्कूल-ड्रेस की
परछाई से
आकाश नीला दिखता है

बरतन मांजती औरत सोचती है
मजे हुए बरतन की तरह
साफ हो हर
मनुष्य का हृदय

एक चिड़िया पेड़ को अपना मानकर
सुनाती है दुख
एक सूखा पत्ता हवा में चक्कर लगाता है
इसी तरह चलता है जीवन का व्यापार।

__ कविता __

गोली चलाने से पलाश के फूल नहीं खिलते
बस सन्नाटा टूटता है
या कोई मरता है

तुम पतंग क्यों नहीं उड़ाते
आकाश का मन कब से उचटा हुआ-सा है
तुम मेरे लिए ऐसा घर क्यों नहीं ढूंढ देते
जिसके आंगन में सांझ घिरती हो
बरामदे पर मार्च में पेड़ का पीला पत्ता गिरता हो

तुम नदियों के नाम याद करो
फिर हम अपनी बेटियों के नाम किसी अनजान नदी के नाम पर रखेंगे
तुम कभी धोती-कुर्ता पहनकर तेज कदमों से चलो
अनायास ही भ्रम होगा दादाजी के लौटने का

तुम बाजार से चने लाना और
ठोंगे पर लिखी कोई कविता सुनाना   ।।

_____  बसें   ____

कितनी बसें हैं जो छूटती है
इस देश में
कितने लोग इन बसों में चढ़ कर
अपने स्थान को छोड़ जाते हैं
हवा भी इन बसों के अंदर पसीने में बदल जाती है
इन बसों में चढ़ कर जाते लोग
जेल से रिहा हुए लोगों की तरह भाग्यशाली नहीं होते
ये लोग मनुष्य की तरह नहीं सामान की तरह यात्रा में हैं
ये लोग एक जैसे होते हैं
मामूली से चेहरे / कपड़े / उम्मीद के साथ
जिस शहर में ये लोग जाते हैं
वह शहर इनका नाम नहीं पुकारता
भरी हुई बसों में सफर करता सर्वहारा
नाम के लिए नहीं मामूली सी नौकरी के लिए शहर आता है
ये बसें यंत्रवत चलती है
जिसके अंदर बैठे हुए लोगों के भीतर कुछ भींगता रहता है
कुछ दरकता सा रहता है।

____ गुरुत्वाकर्षण ____

चाँद पर गुरुत्वाकर्षण बल कम है
इस धरती पर देखो
कितना गुरुत्वाकर्षण बल है
इसे तुम विज्ञान की भाषा में
नहीं समझ सकते
कितने लोग हैं जिनकी चप्पलें
इस धरती पर घिसती है
कितने लोग हैं जो पछाड़ खा कर
इसी घरती पर गिरते हैं
कितने लोग हैं जिनके बदन से छीजता
पसीना इस धरती का नमक है
कितने लोग हैं जो थक कर चूर हैं
और इस धरती पर लेटे हुए हैं
कितने लोग हैं जो इस धरती
पर गहरी चिंता में डूबे हैं
वे जो प्रेम में हैं
और वे जो घृणा में हैं
इसी धरती पर हैं
कितने लोग हैं जो
आशाओं से बंधे हैं
कितने लोग हैं जो
किसी की प्रतीक्षा में हैं
इस धरती का जो
गुरुत्वाकर्षण बल है
यह इन सबका ही
सम्मिलित प्रभाव है।

________     धूप में औरत     ________

धूप सबकी होती है
धूप में खड़ी औरत
बस यही सोचती है
पर उसे तो जीवन-काल में
संतुलन बनाए रखना है
अपनी इच्छाओं और वृहत्तर संसार के बीच
इस लिये औरत धूप में
बिल्कुल सीधी खड़ी होती है
मार्क्स की व्याख्या में
औरत सर्वहारा होती है
इस युग की धूप औरत के लिये नहीं है
पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है
वह तो सीधी खड़ी होकर
किसी और के हिस्से की
धूप को बचाना चाहती है
किसी और के हिस्से की धूप को बचाती औरत
की परछाई  दिवार पर सीधी पड़ती है
दिवार पर औरत की सीधी पड़ती परछाई
दूर से घंटाघर की घड़ी की सुई की तरह लगती है
और पास से सारस की गर्दन की तरह
पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है ।

____________    धुंध    _____________

धुंध में तैर रहे हैं चेहरे
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध में हिल रहे हैं हाथ
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध में खो रही है रोशनी
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध में कोई दिवार खड़ी है
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध में खो गयी है रेलगाड़ी
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध खेल रही है आँख मिचौली
धुंध एक समुद्र की तरह है
धुंध लौट रही है
धुंध एक समुद्र की तरह है
वह हर कुछ जो लौटता है
समुद्र की तरह नहीं होता
खाली हाथ घर लौटता आदमी
लौट कर भी नहीं लौटता
उसकी आँखों में धुंध लौटती है
धुंध का घर एक खाली होता आदमी है
एक खाली होते आदमी के आँख की चमक
धुंध ही बहा कर ले जाती है
धुंध एक समुद्र की तरह है।

 _______    इस समय वह शहर उदास है    ______

शहर अपने गर्दन तक धुंध में लिपटी है
और उसका मफलर
जिस पर बहुत से फूल काढ़े गये थे
ओस की नदी में बह गयी है

शहर के कोतवाल ने
चिड़ियों को तड़ीपार कर दिया है
आसमान में जैसे कर्फ्यू लगा है
न पड़ोस से कोई आदमी आता-जाता है
न पड़ोस की छत से कोई चिड़िया

आधा शहर खाली है
इस शहर का मरद लोग
 फिर मिलेंगे कह कर
किसी दूसरे शहर में मजूरी करने गया है

शहर के घरों की किवाड़
जो अक्सर बंद रहती है
किसी के आने की अटकलें लगाता है
खाली आंगन और खाली घर के बीच
बंद किवाड़ हवा में महसूस करता है
सूली पर चढ़ा होना

घर की दीवार पर
किसी औरत ने बनाया है
एक चिड़िया का चित्र
यह दुख में सुख का आविष्कार है

औरत किसी उदास शहर को
ऐसे ही बचा लेती है।

______  आदमी के अंदर बसता है शहर   ______

शहर के अंदर बसता है आदमी
आदमी के अंदर बसता है शहर
आदमी घेरता है एक जगह
शहर के अंदर
शहर भी घेरता है एक जगह
आदमी के अंदर
जब शहर भींगता है
भींगता है आदमी
एक शहर से दूसरे - तीसरे
शहर जाता आदमी
कई शहर को एक साथ जोड़ देता है
अपने दिमाग की नसों में
जब एक शहर उखड़ता है
तो उखड़ जाता है आदमी
एक छोटा सा आदमी
बिलकुल मेरे जैसा
अपनी स्मृतियों में
रोज - रोज उस शहर को लौटता है
जहाँ उसने किसी को अपना कहा
उसका कोई अपना जहाँ रहता है
उस शहर में जहाँ लिखी प्रेम कविताऐं
जहाँ  किसी को उसकी आँखों की रंग से पहचानता हूं
उस शहर में जहाँ मैं किसी को उसकी आवाज़ से जानता हूँ
उस जैसे कई शहर का रास्ता
मुझसे हो कर जाता है
हर शहर एक खूबसूरत शहर है
जिसकी स्मृतियों का मैंने व्यापार नहीं किया ।
(आधी रात को लौट कर बनारस से आते हुये)

______________       बनारस     ______________

समय का कुछ हिस्सा
मेरे शहर में रह जायेगा
 इस तरफ
नदी के
जब मेरी रेलगाड़ी
लाँघती रहेगी गंगा को
और हम लाँघते रहेंगे
समय की चौखट को
अपनी जीवन यात्रा के दौरान
अपनी जेब में
धूप के टुकड़े को रख कर
शहर-दर-शहर
बनारस
यह शहर ही मेरा खेमा है अगले कुछ दिनों के लिये
इस शहर को जिसे कोई  समेट नहीं सका
इस शहर के समानांतर
कोई कविता ही गुजर सकती है
बशर्ते उस कविता को  कोई  मल्लाह अपनी नाव पर
ढ़ोता रहे घाटों के किनारे
मनुष्य की तरह कविता भी यात्रा में होती है।

_____ मेरा शहर जैसे की एक विस्तृत युद्ध क्षेत्र है ____

सामान्य से असामान्य होना
अनायास होता है
मेरे शहर में
हम सब साधारण लोग हैं
ऐसा ही सोचते हैं
उन लोगों पर विश्वास करते हैं
जो यह बयान देते हैं कि
हमें बचाने के लिये शांति के प्रयास जारी हैं
मेरा शहर भय की एक  सभ्यता का विकास है
जहां चांद किसी  पुराने दीवार के प्लास्टर की तरह झड़ता है
एक मुस्कुराता चेहरा इस युग का विषय वस्तु नहीं है
हमारे लिए इन दिनों यह महत्त्वपूर्ण नहीं है
कि धरती अपने अक्ष पर घूम रही है
और हवा रेत में बदल गयी है
एक शरणार्थी शब्द तकनीकी रूप से हमें
बेदखल करता है इस धरती से।

____  दीवारों पर लिखा इंक़लाब अब ज़िंदाबाद नहीं है   _____

वह दिशा जिसे पूरब
कहते हो
वह दिशा पूरब
आरक्षित है सूरज के लिए
तुम जिसे धूप
कहते हो
वह तुम्हारे अस्तित्व को
छाया में बदल देती है
तुम जिसे बारिश
कहते हो
वह तुम्हारे शरीर का पानी है
तुम जिसे अपने रगों में दौड़ता खून
कहते हो
देखो वह सदियों से जमा है
हुकूमत की प्रयोगशाला में
जिसे तुम डर
कहते हो
वह तुम्हारी आँखों में उतना ही है
जितना उनकी आँखों में
इस डर को कम करने के लिए
तुम अपने विकल्प को
कहते हो
प्रार्थना
वे अपने विकल्प को
कहते हैं
आत्ममुग्धता
तुम जिसे लोकतंत्र
कहते हो
उसे वे
कहते हैं
सर्कस
तुम जिसे स्वतंत्रता
कहते हो
उसे वे सर्वाधिकारवाद
कहते हैं ।

____ प्रार्थना और प्रेम के बीच औरतें ____

प्रार्थना करती औरतें
एकाग्र नहीं होती
वे लौटती है बार-बार
अपने संसार में
जहाँ वे प्रेम करती हैं
प्रार्थना में वे बहुत कुछ कहती है
उन सबके लिए
जिनके लिए बहती है
वह हवा बन कर
रसोईघर में भात की तरह
उबलते हैं उसके सपने
वह थाली में
चांद की तरह रोटी परोसती है
औरतें व्यापार करती हैं तितलियों के साथ
अपने हाथों से
रंगती है पर्यावरण
फिर औरतें झड़ती है आँसुओं की तरह
 कुछ कहती नहीं
इस विश्वास में है कि
जब हम तपते रहेंगे वह झड़ेगी बारिश की तरह
एक दिन।

 __  एक चुप रहने वाली लड़की __

साइकिल चलाती एक लड़की
झूला झूलती हुई एक लकड़ी
खिलखिला कर हँसने  वाली एक लड़की
के बीच एक चुप रहने वाली लड़की होती है
जो कॅालेज जाती है
अशोक राज पथ पर सड़क किनारे की पटरियों पर कोर्स की पुरानी किताब खरीदती है
उसके चुप रहने से जन्म लेती है कहानी
उसके असफल प्रेम की
उसे उतावला कहा गया उन दिनों
वह अपने बारे में  कुछ नहीं कहती
चुप रहने वाली वह लड़की
एक दिन बन जाती है पेड़
पेड़ बनना चुप रहने वाली लड़की के हिस्से में ही होता है
एक दिन पेड़ बनी हुई लड़की पर दौड़ती है गिलहरी
हँसता है पेड़ और हँसती है लड़की
टूटता है भ्रम आदमी दर आदमी
मुहल्ला दर मुहल्ला
एक चुप रहने वाली लड़की भी
जानती है हँसना।

 ______      प्रेम का आविष्कार करती औरतें     ______

प्रेम का आविष्कार करती औरतों
ने ही कहा होगा
फूल को फूल  और
चांद को चांद
हवा में महसूस की होगी
बेली के फूल की महक
उन औरतों ने ही
पहाड़ को कहा होगा पहाड़
नदी को कभी सूखने नहीं दिया होगा
उनकी सांसों से ही
पिघलता होगा ग्लेशियर
उन्होंने ही बहिष्कार किया होगा
ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों का
चुना होगा इस धरती को
वे जानती होगी इसी ग्रह पर
पीले सरसों के फूल खिलते हैं।

 _______     चलता हुआ आदमी      _______

एक चलता हुआ आदमी
रेलगाड़ी की तरह नहीं रुकता
वह तो बस थक कर रुक जाता है
सड़क पर और शून्य को ताकता है
सड़क पर थक कर रुका हुआ आदमी
महसूस कर रहा होता है प्यास
वह नाप रहा होता है दूरी
अपने घर का
वह इस संकोच में रुक जाता है
किस से पूछा जा सके
सस्ते दाम वाले होटल का पता
एक चलता हुआ आदमी
इस लिये भी रूकता है
कि चलते हुए उसका
उखाड़ जाता है दम
एक चलता हुआ आदमी
अपने चलने का हिसाब
लगाने के लिए रुकता है
कभी एक चलता हुआ आदमी
रूकता है
एक हाथ के निढाल हो जाने पर
सामान को
दूसरे हाथ से पकड़ने के लिए
एक थक कर रुके हुए
आदमी के पक्ष में
कोई नहीं रुकता
न तो इस गोलार्द्ध पर
न उस गोलार्द्ध पर।

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