काव्य: सुप्रभा गुप्ता

सुप्रभा गुप्ता

धरती और आकाश

-----------------
धरती से आकाश का मिलन
सदा अधूरा ही रहा
युगों युगों से साथ साथ
चलते रहे निरंतर पाथ पाथ
पर आलिंगन कर न सके
इक दूजे के हो न सके
फिर भी अवनि का
अटल, अटूट समर्पण
डिगा नहीं अपने निश्चय से
बढ़ती रही इस आशा से
नहीं मिल सकी यदि क्षितिज पर
निश्चय ही छू लेगी
अपने प्रिय अम्बर को
उस पार क्षितिज के
पृथ्वी और क्षिति का प्यार एवं सम्मोहन
निस्वार्थ, निर्विकल्प ,निर्विकार
प्रस्तुत करता उस मर्यादा को
जिसके लिए आज धरती रही पुकार
जिसके लिए आज धरती रही पुकार।


दृढ़ निश्चय

--------------
दृढ़ निश्चय कर उठे कदम
मंज़िल को पा लोगे तुम

कौन कभी जीवन से हारा नही
कौन कभी ग़म का मारा नही
कल क्या होगा क्यों सोचो
पथिक तुझे तो चलते जाना है
झंझावत से क्या डरना
तुझे किनारा पाना है,
दृढ़ निश्चय कर उठे कदम
मंज़िल को पा लोगे तुम।

ऊपर बैठा तोल रहा है
कितने पानी में हैं हम
क्या गहराई से डरते है
या तैर पार कर जायेंगे हम
दुविधा छोड़ विश्वास स्वयं पर
यहाँ तभी तेरा ठिकाना है,
दृढ़ निश्चय कर उठे कदम
मंज़िल को पा लोगे तुम।

जीवन के संघर्षों से नही
कभी घबराना तुम
मुश्किलें ही राह दिखायेंगी
अँधियारे में दीपक बन
निराशा के लिये जगह नही है
आशा की लाठी थाम
आगे बढ़ते जाना तुम।
दृढ़ निश्चय कर उठे कदम
मंज़िल को पा लोगे तुम।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।