काव्य: चंद्र मोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

1. कायनात

यह काया धूप में नहीं
अंगारों में पकी है
एक-एक परमाणु
जन्मा है नक्षत्रीय गर्भ में
और जला है अंगारे सा
तब जाकर ढली है
ये कायनात!
विद्युत-चुम्बीय बलों से उभरा है
अणुवों का जटिल जैविक विन्यास
और किन्ही प्रोटीनी विन्यासों में
उभर कर आया है जीवन।

यों बडी लम्बी है दास्तान
कहीं की ईट, कहीं का रोडा
भानमती ने कहाँ-कहाँ से जोडा
तपा कैसे कैसे तापमानों में
फौलाद भी क्या तपा होगा
जैसे तपकर ढला है जीवन।
रह रह कर सारी बात
रग-रग में घूम जाती है

कायनात अपनी ही करनी पर
रोती है कभी, तो कभी
झूम-झूम गाती है।

2. रास्ते

सैकडों बार
गया इन रास्तों पर
और लौटा भी
दोनों दिशाओं में बिम्बित मेरे पदचिन्ह
मुझे भटका गये हैं
मंजिल पर पहुंच जाने की
बलवती आशा का दामन थामे
मुझे मेरे ही विचार
त्रिशंकु की तरह
हर बार कहीं बीच में
लटका गये हैं।

अब जब कई मंजिल भटक चुका हूँ
अपनी ही दुर्दमनीय
इच्छांओं की सूली पर
सौ-सौ बार

लटक चुका हूँ
इतना तो समझ पाया हूँ
यह रास्ता ही मंजिल है मेरी
दोनों दिशाओं में जाते पदचिन्ह
कहीं नहीं ले जाते
कभी लगता है
मंजिल कोई नहीं, कहीं नहीं
सिर्फ रास्ते ही रास्ते हैं
चारों ओर
बडे रास्ते, छोटे रास्ते,
संकरे और चौड़े रास्ते
रास्ते, रास्ते
थोक के भाव रास्ते।

सोचता हूँ एक ही है विकल्प
रास्तों की इस भीड में
एक और रास्ता गढना होगा
मंजिल पर पहुँचने की
दुविधा से बचने को
खुद ही एक रास्ता
बनना होगा।

3. लेवल-क्रासिंग

समान्तर रेखाओं पर
दौडती रेलगाड़ी, जोडती
गाँव को शहर, शहर को गाँव से
हर अन्तर को कुछ पल के लिये
धूमिल कर देती
समेटती है सारा देश
अपने ही ताने-बाने में
पर स्वयं कैद
कभी न मिलने वाली
समान्तर रेखाओं के बीच।

लेवल-क्रासिग पर खडे
रिक्शे,आटो, ट्रक, कारें,
पदयात्री और बैलगाडियाँ,
वीरान खेतों में चरतीं बकरियाँ
गड्ढों में जलविहार-रत भेंसें,
टोकरियों में फल-सब्जियाँ लिये
नगरोन्मुख ग्रामवासी,
दूर झाडियों में बैठीं
सकुचातीं सी मानव आकृतियाँ।

कितना है विराट, विस्तृत वर्णपट
समान्तर रेखाओं पर साथ चलती
समान्तर जिन्दगानियाँ
मानवीय अनुभव को आकार देतीं
जीवन की इन्द्रधनुषी कहानियाँ
इक्कीसवीं सदी मे लगभग प्रविष्ट
आधुनिक से चार सौ साल पहले के
परिधान तक
साक्षर, निरक्षर, अमीर, भिखारी
एक साथ एक दिशा एक गंतव्य
सन्यासी हो या संसारी
यही वह जगह है
जहां देश की धड़कन
लय पकडती है
समान्तर चलतीं जिन्दगानियाँ
कुछ देर ही
एक लेवल पर ठहरतीं हैं।

लेवल अलग-अलग, फिर भी
लेवल पर क्रास कर जाना
एक चमत्कार ही है
इस धरती के वैविध्य का
और जीवन के हर अन्तर को
पल भर के लिये धूमिल करती
भारतीय रेल का।

4. घर वापसी

शरद की एक सुहानी शाम
सुदूर अंचल का एक गाँव
छोटा स्टेशन, छोटा सा प्लेटफार्म
गाड़ी रुकती है उतरते हैं तीन चार
मैं भी हूँ उनमें एक
करीब इतने ही होते हैं सवार
गाडी सरकती बढती है
अगले पडाव की ओर।

पहाडी के पीछे क्रमश उतर रहा
दिनभर का थका सूरज
गुलाबी आभा लिये आसमान
एक सुहाना सूर्यास्त।

अपना झोला लिये
घर की ओर अग्रसर मैं
मेरे इर्द -गिर्द
अपने ठिकानों की ओर जा रही
गाय, बकरियो के झुंड
साथ में चरवाहों की टोली

कुछ बातों में मशगूल,
कोई अपनी धुन में मस्त
तभी उनमें कोई गीत गुनगुनाता है
वही परिचित लय, वही मधुरिम तान
देह-मन के पोर पोर में गूंज उठता
घर वापसी का
अनुपम गान।

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