कहानी: ममता महा ठगिनी

चित्रा गुप्ता

- चित्रा गुप्ता


सीता का नन्हा दिमाग सदा इसी बात में लगा रहता था कि कब वह घर पहुँचे और सहपाठियों या अध्यापिका की कोई गलती बताकर माँ को उकसाए। सीता अपनी माँ की इकलौती सन्तान है। कमला के विवाह के पांच वर्ष बाद उसका जन्म हुआ। माता-पिता के लिए तो वह ईश्वर का दिया अनमोल उपहार थी। उसे थोड़ी भी तकलीफ होती तो माता-पिता दोनों बेचैन हो जाते। खासकर कमला तो उसकी ज़रा सी तकलीफ देखकर स्वयं भी रोने लगती। अड़ोस-पड़ोस के किसी बच्चे से खेलते समय होने वाली छोटी-मोटी बातों पर वह रो-रोकर आसमान सर पर उठा लेती। कमला बात की तह तक पहुँचे बिना लड़ने के लिए उतारू हो जाती। सीता का बाल मन समझ गया था कि वह चाहे कुछ भी गलत काम करे उसकी माँ उसका पक्ष लेकर किसी से भी मोर्चा ले सकती है। घर के बाहर पार्क में बच्चों के साथ खेलते समय वह किसी बच्चे को धक्का देती तो वह भी पलट कर मारता तो सीता रोती हुई घर आती। माँ पूरी बात की गहराई तक पहुँचे बिना लड़ने पहुँच जाती। कमला को उसके पति मोहित ने इस बात को समझाने की कोशिश भी की पर कमला कहाँ सुनने वाली थी......। मातृत्व के सामने सब कुछ धुंधला हो चुका था।

सीता जब पाँच वर्ष की हो गई तो कमला ने उसका दाखिला प्रतिष्ठित स्कूल में करवाया। पहले दिन कमला सीता को तैयार करके स्कूल ले गई। कक्षा में मिठाई बांटी गई। पहली बार माँ से लम्बे समय तक अलग होने के कारण सीता माँ का कुर्ता ही नहीं छोड़ रही थी। वह बिलख-बिलखकर रो रही थी। प्रधानाचार्य से विनती कर कमला कक्षा में अपनी नन्ही परी के साथ बैठी। वहाँ भी कमला रानी ने इस बात का ध्यान रखा कि उसकी लाडली को कोई बच्चा कुछ कह न दे उसे छू न दे।

तीन दिन से अधिक कोई माँ कक्षा में नहीं बैठ सकती थी। कमला को भी मन मसोस कर इस नियम का पालन करना पड़ा। धीरे-धीरे सीता माँ के बिना स्कूल में टिकना तो सीख गई पर वही ढाक के तीन पात। वह छोटी-छोटी बातों पर रोती। दूसरे बच्चों की पेंसिल या पुस्तक अच्छी लगने पर वह छीना-झपटी करती। न मिलने पर अध्यापिका जी से शिकायत करती। अध्यापिका भी उसे पुचकार के समझाने की नाकाम कोशिश करतीं। सीता उदास होकर बैठ जाती पर माँ से क्या कहेगी मन ही मन कहानियाँ बुनने लगती।

माँ की शह पाकर सीता दिन-ब-दिन झगड़ालू होती जा रही थी। स्कूल से आते ही लगभग प्रतिदिन उसकी शिकायतों का पिटारा खुल जाता। माँ हर बात ध्यान से सुनती और विस्तार से बताने को भी कहती। सीता को अब इन बातों में बहुत आनन्द आने लगा था। पिता यदि सख्ती बरतते तो माँ-बेटी दोनों का मिजाज बिगड़ जाता। हमारी इतनी मन्नतों के बाद यह पैदा हुई है, मैं इसे कोई दुःख नहीं होने दूंगी... यह हमारे घर का उजाला है।" कमला के इन तर्कों के सामने मोहित हथियार डाल देते। यह सिलसिला चलता रहा। सीता जब-तब सहपाठियों, या अध्यापिका की शिकायतें लेकर घर आती। सीता यदि कक्षा कार्य या गृहकार्य नहीं करती तो उसमें भी अध्यापिकाओं की गलती ढूंढी जाती। स्कूल की ओर से उसे कई दफ़ा समझाने की कोशिश की गई पर कहीं पके घड़े पर मिट्टी चढ़ती है ? कमला की अंधी ममता ने अनजाने में अपनी राजदुलारी को एक कमजोर, जिद्दी लड़की बना दिया था। सीता पढ़ाई में पिछड़ रही थी, उसकी सहेलियां भी नहीं बन पाई थीं, वह दिन प्रतिदिन चिड़चिड़ी होती जा रही थी। खाने-पीने के नखरे बहुत हो गये थे। सीता की दुनिया माँ तक सीमित रह गई थी। वह अक्सर माँ-पिताजी की बातें सुनती जिनसे सीता को समझ आता कि उसकी माँ तो सबके साथ अच्छा करती है किन्तु दूसरे ही उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते। सीता को अपनी माँ दुनिया में सबसे प्यारी लगती थी।

कमला दस वर्ष पूर्व अपने पति के साथ कनाडा आई थी। मोहित ने यहाँ आकर पढ़ाई की। दोनों पार्ट टाइम काम करके घर चला रहे थे। उस आर्थिक तंगी में कमला ने अपनी पति का साथ दिया। एक सुघड़ गृहणी की भांति वह बजट में रहना सीख गई थी। दस वर्ष में वे एक बार भी भारत नहीं जा सके। घर की यादें कमला और मोहित को तड़पाती थीं। उधार लेकर मोहित यहाँ पढ़ाई करने आये थे। पैसों की तंगी थी। वे चाहते हुए भी नहीं जा सकते थे। कनाडा में बहुत हिन्दुस्तानी हैं, उनसे इनकी दोस्ती हो गई। उनके साथ मिलकर त्योहार,जन्मदिन मनाते थे,मिलकर पिकनिक पर भी जाते थे। इतने पर भी घर की याद उनकी आँखें नम कर देती थी। फोन पर बात करते थे पर उससे दिल नहीं भरता था। पढ़ाई पूरी होने पर मोहित को प्राइवेट कम्पनी में नौकरी मिल गई, सीता के रूप में खुशियाँ भी आ गई थीं। दोनों संतुष्ट थे।

भारत में कमला की भांजी का विवाह था। यह ऐसा अवसर था जब वे सब रिश्तेदारों से मिल सकते थे। उनका मन इंडिया जाने को तड़प रहा था। नौकरी के कारण टिकट के पैसों का भी जुगाड़ हो गया था। दस साल बाद वे एक महीने के लिए भारत जा रहे थे। हर काम में खुशी छलक रही थी। कमला की अटैची उपहारों से भरी थी । मायके और ससुराल दोनों में वे अपनों से इतने दिन बाद जो मिलने वाले थे। सीता को भी वह अक्सर सबके बारे में बताती रहती थी। व्हाट्सएप से चित्रों का आदान-प्रदान और स्काइप से आमना-सामना होने से सीता अपने दादा-दादी, नाना-नानी बुआ,मौसी और उनके बच्चों को पहचानती थी।

आखिर में वह दिन आ गया जब वह अपने परिवार के साथ भारत-भूमि पर उतरी। हवाई अड्डे पर ही उसकी आँखें भर आईं। इन दस वर्षों में उसके पिताजी का स्वर्गवास हो चुका था। चाहकर भी वह नहीं आ सकी। माँ कैसी होंगी? सोचते-सोचते उसे पता ही नहीं चला कि उसकी आँखों से आँसुओं की बरसात हो रही थी। हवाई अड्डे से बाहर आते ही अपने प्यारों को देखते ही वह दौड़ती चली गई। दस वर्ष के वनवास के बाद मिलने पर उसके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। माँ वहाँ नहीं थी। घर पहुँचकर वह माँ से मिली। सीता अवाक् माँ को देख रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आया माँ को रोते देख वह भी सुबकने लगी। मोहित सब समझ रहे थे उन्होंने कमला का कंधा पकड़कर जैसे सांत्वना दी।

माँ के गले लगकर कमला के आंसुओं की बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। सब बहुत भावुक हो गये थे। शादी के कारण मोहित के माता-पिता भी वही थे। कमला ने उनके चरण स्पर्श किये। सास-ससुर ने कमला को जैसे आशीर्वादों से नहला दिया। मोहित भी बहुत खुश थे। दस वर्ष बाद वे भी अपने माँ-बाऊजी से मिले थे। माँ-बाऊजी आँसू छिपाने के लिए इधर-उधर देख रहे थे। मोहित पैर छूकर उनके गले लग गये। माँ-बाऊजी को जैसे जागीर मिल गई थी। उम्र के इस पड़ाव में माता-पिता केवल और केवल स्नेह के भूखे होते हैं।

कमला ने अपना सूटकेस खोलकर सबको उपहार दिए। सब अपने उपहारों को देखकर बहुत प्रसन्न थे। खुशी का माहौल और अपनों से मिलने का आनन्द शब्दों से बयाँ नहीं किया जा सकता था। दस वर्ष के बाद का मिलन,मोहित को सीता-राम और लक्ष्मण के अयोध्या लौट आने के प्रसंग की याद दिला रहा था। सीता की माँ जो हरदम उसका ध्यान रखती थी वह अब वह अपने भाई-बहनों में व्यस्त हो गई। शादी का माहौल और हर तरफ गहमागहमी... सीता पहली बार इतने रिश्तेदारों से मिल रही थी। सब उसे बहुत प्यार कर रहे थे। इतने सारे लोगों का ढेर सारा प्यार पाकर उसकी खुशी का ठिकाना न था।  अभी आये एक ही दिन हुआ था अचानक सीता का रोना सुन कमला सारे काम छोड़ दौड़ती हुई आई। हम उम्र बच्चे उसके साथ चुहलबाजी और हंसी-मज़ाक कर रहे थे। सीता को हँसी-मज़ाक और चुहलबाजी की आदत ही नहीं थी। उसे यह सब खिल्ली उडाने जैसा लग रहा था। माँ को देखते ही हमेशा की तरह सीता ने अपनी शिकायतों का टोकरा खोल दिया। वह रोती जा रही थी और बोलती भी जा रही थी। कमला अब क्या करे क्या न करे... दुविधा में पड़ गई। वह सोचने लगी कि अगर मैं बच्चों को डाटूंगी या जोर से बोलूंगी तो सबको बुरा लग सकता है। बच्चे सहम गये थे। उसने सीता को समझाया कि वे सब उसके कजिन्स हैं, उससे दोस्ती करना चाहते हैं, कोई भी उसे नहीं चिढ़ा रहा है। उसे उनके साथ खेलना चाहिए रोने की तो कोई बात नहीं है। आप मेरी मम्मी नहीं हो, कनाडा में तो कोई भी मुझे कुछ कहता था तो आप उससे झगड़ा करती थीं। मुझे नहीं रहना यहाँ" सीता बिफर गई... फर्श पर फ़ैल गई। सीता का चिल्लाना सुनकर उसकी नानी-दादी, मौसी सब भागी-भागी आयीं। सब सीता को मनाने में लगीं थीं। बेकसूर बच्चे अपनी सफाई देने में लगे थे। अभी यह तुम सबसे पहली बार मिल रही है इसलिए इसे तुम्हारे खेल शायद थोड़े अजीब से लग रहे होंगे।" कमला ने यह कहकर उनके मन का भय दूर किया। सीता को जबरदस्ती गोद में उठाकर कमरे में ले गई। उसने विनम्रता से सबको साथ आने से मना कर दिया। बच्चे अब भी उसके रोने से बहुत हैरान थे। यह तो होना ही था, मोहित मन ही मन बुदबुदा रहा था।

सीता माँ की गोद में सो गई थी। कमला को अपने बचपन के वे दिन याद आ रहे थे जब संयुक्त परिवार में चाचा-ताऊ के बच्चे वह और उसके चार भाई-बहन मिलजुल कर खेलते थे। खेल-खेल में सबने सीना -पिरोना,बुनना ,कढाई करना यहाँ तक कि खाना बनाना भी सीख लिया था। अपने-पराये का कोई भाव मन में था ही नहीं। सब अपने लगते थे। रिश्तेदारों की तो छोड़ो पड़ोसी भी अपने लगते थे। माँ सबको एक सा खाना देती थी। गलती करने पर चाची, ताई या दादी कोई भी डाँट सकती थी। परिवार की परिभाषा ही बदल दी मैंने... कमला को स्वयं पर ग्लानि हो रही थी। वह कितनी बदल गई है? ह्रदय की पीड़ा आँखों के कोरों को भिगो रही थी।

शादी के गीतों की आवाज उसके कानों तक आ रही थी। मोहित उसे बुलाने आये। तभी कमला की छोटी बहन रति भी चाय लेकर आ गई। कमला को रोता देख वह घबरा गई।  क्या हुआ दीदी ? जीजाजी क्या हो गया ?" उसने घबराकर पूछा। तू सोच रही है न तेरे जीजाजी से झगडा हुआ है ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। इस देवता से झगडा करके क्या नर्क में जाना है? "मन में और माहौल में हल्केपन की गंध आ रही थी। कमला ने स्नेह से सीता को पलंग पर लिटाया और मुस्करा के उठ गई। भारत की मिटटी ने दिल के बंद तालों को खोल दिया था। रिश्तों की गंध से उसका मन सुवासित हो गया। वह सीता की गुनहगार थी। उसे अपनी लाड़ली का ब्रेन वाश करना था। कई सालों की गलती एक दिन में नहीं सुधारी जा सकती थी। यहाँ रहकर हम दोनों को सुधरना होगा। कमला ने मोहित की तरफ क्षमा-याचना की नजरों से देखा। मोहित हमेशा की तरह मुस्करा रहे थे।

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