डायरी: विद्यारम्भ

आर बी भण्डारकर

आर बी भण्डारकर


5 अप्रैल 1977

झाबुआ जिले के रायपुरिया ग्राम में हूँ। किराये का मकान है। यद्यपि गर्मियाँ प्रारम्भ हो गईं हैं पर मकान कच्चा है, सो गर्मी का प्रभाव काफी कम है; फिर मालवा का मौसम तो वैसे ही सुहाना होता है।
रात्रि का प्रथम प्रहर। अभी 9 ही बजे हैं।

सूरसागर भाग-1, पढ़ने की लाख कोशिश करता हूँ पर मन नहीं लग रहा है; नींद-सी आ रही है।
सोने का उपक्रम करता हूँ पर नींद नहीं आती है।
यह कैसा विरोधाभास है। क्यों है?
अन्यमनस्कता-सी हो आई है।
मन अतीत की गहराइयों में डूबने उतराने लगता है।

मेरा जन्म तो ननिहाल में हुआ पर प्रारंभिक पालन-पोषण पैतृक गाँव के पितृ गृह में।
वर्षों पूर्व का एक दृश्य आँखों में कौंधता है।

मैं कुछ कुछ बड़ा हो गया हूँ। मेरे परिवार के ही एक सम उम्र भाई को उनके दाऊ (वे अपने पिता को दाऊ ही कहते  थे) स्कूल ले जा रहे हैं। उनकी अम्मा द्वार पर खड़ी हैं। भाई स्कूल जाने को उत्सुक नहीं, अम्मा की तरफ देख रहे हैं इस उम्मीद में कि अम्मा अभी कह देंगी दाऊ से कि "अब वह नहीं जा रहा है तो न ले जाओ; कल ले जाना।"

पर दाऊ (मेरे कक्का) कहाँ मानने वाले? अम्मा भी (मेरी काकी) सहम गईं दाऊ की एक ही टेढ़ी निगाह से।
मेरे लिए यह कौतुक। दौड़ कर जाता हूँ और अपनी अम्मा को सम्पूर्ण आँखों देखा हाल सुनाता हूँ।

इल्ले! ज का भओ।
अम्मा के मन में प्रतिद्वंद्विता जागी। झटपट मेरे चेहरे पर तेल चुपड़ा, आँखों में काजल लगाया। कपड़े के झोरा में खड़िया डाली; झोले को पट्टी के हत्थे में लटकाया; मेरे एक हाथ मे पट्टी पकड़ाई, दूसरा हाथ उन्होंने खुद पकड़ा, खींच के ले गईं कक्का के पास, "लला जउए लिबायँ जउ स्कूल। जउको नाउ लिखाय दिइयो स्कूल में।"
कक्का ने मेरा एक हाथ अपने एक हाथ में पकड़ा तथा भाई का एक हाथ अपने दूसरे हाथ में पकड़ा और खींच कर ले गए स्कूल।

 "महाराज, इन दोऊ मोड़न को नाउ लिख ले। अब जे रोज पढ़न आइबे करहें।"
"तुम्हायेई हैं दोउ मोड़ा?"
"नइयाँ महाराज। ज हमाओ है उर ज छोटे भैया कौ।" (परिवार के मेरे सभी चाचा अपने से बड़ा होने के बावजूद मेरे दद्दा को छोटे भैया कहते थे, क्योंकि परिवार में मेरे दद्दा से भी बड़े एक भाई थे, मेरे दद्दा सहित सभी चाचा उनको बड़े भैया कहते थे। )
"कित्ती उमर होय है, इनकी?" पण्डित जी ने पूछा।
"पाँच-पाँच साल के होयँ हैं, दोउअन में नेंकईं जिठाई-बड़ाई है।"
पण्डित जी ने हम दोनों के नाम लिख लिए। आश्चर्य यह कि दोनों की जन्म तिथि एक जनवरी उन्नीस सौ बावन लिख ली।

यह, ऐसे हुई मेरी औपचारिक शिक्षा की शुरुआत।

एकाकीपन जनित अन्यमनस्कता है, नींद भी नहीं आई सो थोड़ी उद्विग्नता भी है पर अपने विद्यारंभ का यह स्मरण एक गुदगुदी-सी कर रहा है।

विगत जीवन एक चलचित्र की भांति दृश्यमान है। ... मेरे उन भाई साहब के पास बाजार से खरीदी हुई पट्टी थी; मेरे एक और चचेरे भाई, जिनका विद्यारम्भ हम दोनों से एक दिन पहले हुआ था, उनके पास भी बाजार से लाई हुई पट्टी थी पर मेरे पास घर पर बनी हुई पट्टी थी। पट्टियाँ तो सब लकड़ी  की ही बनी थीं पर बाजार वालीं मशीन से निर्मित होने के कारण कृशकाय और सुंदर थीं। मेरी पट्टी हस्त निर्मित होने के कारण किंचित स्थूल और खुरदुरी थीं। पर ऐसा होने से बाजार की पट्टियाँ रखने वालों में भले ही श्रेष्ठता का बोध हो पर मुझमें हीनता का भाव कतई न था क्योंकि पुत्ता और घुट्टा के माध्यम से मैं अपनी पट्टी को उनसे अच्छी चमका लेता था।
  पट्टी के अलावा हम विद्यार्थियों का एक और शिक्षा उपकरण होता था-"बोरका"; कुछ लोग इसे "बुद्धका" भी कहते थे। यह मिट्टी का बनाया जाकर भट्टी में पकाया हुआ होता था, कुछ ऐसा कि मानो दो छोटे कुल्हड़ों को जोड़कर बनाया गया हो। एक तरफ काली स्याही भरी उसमें पुत्ता डाला; पट्टी पोतने के लिए; दूसरी तरफ घुली हुई खड़िया। काँच का एक घुट्टा या फिर पट्टी घोटने के लिए अच्छे पैंदे वाली कोई शीशी, सरकंडे की एक दो क़लम;  ये भी हमारे अनिवार्य शिक्षा उपकरण थे।
पट्टी पुत्तने के लिए काली स्याही। स्व निर्मित।

गांवों में रात्रिकाल में घरों में उजाले के लिए मिट्टी के तेल का दीपक जलाया जाता है। यह प्रायः दीवालों में पहले से ही बने आलों में रखा जाता है। दीपक की लौ से आले के ऊपरी भाग में कालिख जमती है। हमारी काली स्याही का मूल कच्चा माल होती है यह कालिख। आलों से कालिख निकालो, पानी में घोलो और भर लो अपने अपने बोरका में। यदि अपने घर में यह कालिख पर्याफ्त मात्रा में न मिले तो बेखटके चले जाओ पड़ोस की काकी या भौजी के घर; वहाँ से निकाल लाओ।

पहले मैं सोचता था कि जिस तबे पर रोटी बनती है, उसमें भी तो नीचे कालिख जम जाती है; उससे भी तो पट्टी पुत्तने की काली स्याही बन सकती है; हम लोग उसका उपयोग क्यों नहीं करते हैं। ....एक दिन स्कूल में एक सहपाठी की पट्टी सब साथियों को खूब काली पुती हुई नहीं दिखी तो सब उससे कहने लगे कि तूने तवे की कालिख से स्याही बनाई होगी। (तवे की कालिख दीपक की लौ से बनी कालिख से कम काली होती है।) वह बेचारा खूब इनकार करता रहा लेकिन सब चिल्लाने लगे-
"मुट्ठी कलम तबा की स्याही;
ताकों विद्या कबहुँ न आई।"

मैं अब जाकर समझा कि कोई तवे की कालिख से स्याही क्यों नहीं बनाता।
उन दिनों पट्टी पुत्तने के लिए रोज दीपक निर्मित कालिख इकट्ठी कर लेना, किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं लगता था।
पट्टी को पुत्ता से पुत्तने के बाद बड़े श्रद्धाभाव से सुखाया जाता था; पट्टी को हवा में लहराते हुए बोलते थे, "सूख सूख पट्टी, चंदन घुट्टी।" मन में यह विश्वास
दृढ़ था कि ऐसा कहने से पट्टी जल्दी सूख जाती है।

अब लिखाई शुरू। सूखी खड़िया से भी लिखते थे, कभी कभी बोरका में रखी घुली खड़िया से भी लिखते थे। क्या लिखते थे- ओलम (हिंदी वर्ण माला) बारह खड़ी, गिनती, पहाड़े; कभी कभी छोटी मोटी इबारत। सभी विद्यार्थी प्रायः दोपहर पश्चात यही सब घुटी हुई पट्टी पर लिखते थे। अच्छी घुटी पट्टी शान और गौरव का पर्याय होती थी; सो सभी बड़े ही मनोयोग से अपनी अपनी पट्टी घुट्टते थे कि पूरी कालिख छूट जाती थी और पट्टी चमचमाने लगती थी। यह काम भी ऐसे लगता था कि मानो एवरेस्ट फतह कर ली हो।

हम लोग एक ही परिवार के पाँच भाई पाँचवी कक्षा तक साथ साथ ही पढ़े।

उल्लेखनीय है कि मेरे उन भैया जिनके साथ मेरा विद्यारम्भ हुआ था, उनके और मेरे बीच आज तक तय नहीं हो सका है कि हम में से कौन बड़ा है। हम दोनों एक दूसरे को भाई साहब कहते हैं और उनकी पत्नी मुझे बड़ा मानकर परदा करती हैं जबकि मेरी पत्नी उन्हें बड़ा मानकर उनसे परदा करती हैं। हम दोनों की पत्नियाँ परस्पर देवरानी-जेठानी का भाव न रखकर मित्र-भाव रखती हैं। सोच रहा हूँ कि क्या यह कम आश्चर्य की बात है।

मेरे सामने मेरे ही अतीत का चलचित्र चल रहा है।
कितना सुखद कि इस चल चित्र में केवल मैं नहीं हूँ; मेरा परिवार है, मेरे मित्र हैं सहपाठी हैं, मेरे शिक्षक हैं, गाँव है, मेरी पाठशाला है मेरा पूरा परिवेश है; यही है समष्टि का भाव; इसी में है, ॐ सहनाववतु, सहनौ भुनुक्तु सहवीर्यम करवावहै। और इसी में अनुस्यूत है-सत्यम, शिवम सुंदरम।

बाल सभा का दृश्य सामने है।

मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सामने शाला-प्रांगण है; बांयी ओर यानी पूर्व की तरफ एक बड़ा बरामदा दिख रहा है और उसके पीछे उतना ही बड़ा कमरा;  दोनों खाली हैं। प्रांगण में ठीक सामने दक्षिण की ओर एक छोटा उद्यान(पुष्प वाटिका) है जिसमें कुछ गुलाब, कुछ वेला और अधिकतर गेंदे की विभिन्न किस्मों के सुंदर पुष्प खिले हुए हैं। उद्यान के ठीक नीचे उत्तराभिमुख दो कुर्सियाँ दिख रहीं हैं जिन पर शिक्षक द्वय पंडित जी और मुंशी जी बैठे दिख रहे हैं। फिर ठीक सामने जमीन पर बिछी हुई टाट पट्टियों पर दक्षिणाभिमुख छात्र कतार बद्ध होकर बैठे हैं। सूचना पट्टिकाओं से स्पष्ट हो रहा है कि पूर्व से पश्चिम की ओर को क्रमशः 5 से पहली कक्षा तक के छात्र बैठे हैं।

पंडित जी की आवाज सुनाई देती है। अब आज की बाल-सभा प्रारम्भ होती है। सर्व प्रथम कौन क्या सुनाएगा। कई छात्र हाथ ऊंचा करते हैं। पण्डित जी के निर्देशानुसार एक छात्र कविता सुनाता है। फिर ... यह कहानी सुनाता है। यह गीत सुना रहा है। यह दूसरी कक्षा का छात्र एक पहेली सुनाता है। मुंशी जी कहते है सभी को कुछ न कुछ सुनाना जरूरी है। कविता, कहानी, गीत, भजन, कीर्तन, पहेलियाँ, चुटुकुले सुनाने का क्रम जारी है। पण्डित जी की आवाज सुनाई पड़ती है। तो सब सुन चुके, अब एक घण्टे की अंताक्षरी प्रतियोगिता होगी। एक तरफ 5 वीं के छात्र तो दूसरी ओर चौथी और तीसरी के छात्र रहेंगे। दूसरी और पहली के छात्र ध्यान पूर्वक सुनेगे; शोर नहीं करेंगे। अंताक्षरी में राम चरित मानस के साथ साथ कबीर और रहीम के दोहे भी सुनाये जा सकते हैं।

"...तो शुरू करें?" पंडित जी का स्वर फूटता है -
समय विताने के लिए, करना है कुछ काम।
शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम।

अब म पर तीसरी चौथी का कोई छात्र कुछ सुनाये। यह कामताप्रसाद हैं -
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहुँ सो दशरथ अजिर विहारी।
पंडित जी पाँचवीं वाले र पर सुनाएँ।
प्रह्लाद सिंह -
राम राज्य बैठे त्रैलोका।
हर्षित भये गए सब सोका।

तीसरी-चौथी वाले क पर।

अरे वाह एक के बाद एक; उत्तर में तुरन्त ही चौपाई, दोहा या सोरठा प्रस्तुत हो जाता है।
अब पंडित जी की निर्णायक आवाज। आज का मुकाबला बराबरी पर रहा। आज की बाल-सभा समाप्त। छुट्टी।
कहावत है कि अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता। इसका कुछ इस अर्थ में कि जीवन में जो कुछ प्रत्यक्ष होता रहता है, आगे बढ़ते ही वह अवचेतन में चला जाता रहता है फिर सुख के, दुख के नैराश्य के अवसाद के क्षणों में सायास चेतन में आ जाता है।
अपनी प्राथमिक शिक्षा की दृश्यानुदृश्य प्रत्यक्ष पाकर सुखानुभूति ही रही है। किंचित लंबा जागरण हो जाये तो प्रायः नींद भी अच्छी आती है।

अब सोना चाहता हूँ।

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