व्यंग्य: जन-जन की है मधुशाला

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


मौजूदा कॉपीराइट एक्ट के चलते बाबूजी हरिवंशराय बच्चन के अवसान के साठ साल बाद मधुशाला हर किसी की हो जाएगी, कॉपीराइट एक्ट लागू नहीं होगा। हमारे महानायक अमिताभ जी अपने बाबूजी की कविताओं को लेकर चिंतित हैं। विश्व साहित्य के इतिहास में यह पहला मौका है कि कोई पुत्र इतना सुपुत्र निकला। वरना आज तक किसी साहित्यकार की संतान ने अपने पिता की रचनाओं की इतनी परवाह नहीं की। परवाह तो छोड़िए, कभी ठीक से पढ़ा ही नहीं। आम भारतीयों के बाबूजी क्या छोड़ कर जाते हैं? एक पुश्तैनी किराये का घर, दो-चार भाई-बहन, और बैंक का कर्जा। कौन कविताएँ छोड़ कर जाता हैं भला? कवियों के जीते जी ही कविताएँ उन्हें छोड़ जाती हैं, ताकि कवि चैन से अपना परलोक सुधार सके। पर बाबूजी की कविताओं ने बाबूजी का साथ नहीं छोड़ा, वे ख़ानदान का साथ अब कैसे छोड़ सकती हैं?

कुमार विश्वास ने बाबूजी की कविताओं से यूट्यूब पर बत्तीस रुपये क्या कमा लिए, कविताएँ विरासत बन गईं। लाखों कवि हैं यूट्यूब पर जिन्होंने एक धेला नहीं कमाया, अपने दर्जनों वीडियो पोस्ट कर दिए, पर किसी ने नहीं देखे। खुद कवि ने ही अपने वीडियो देखना बंद कर दिए। कविता है ही ऐसी नामुराद; हर कोई मधुशाला जैसी सुमधुर कविता थोड़े ही लिख सकता है। अमित जी मानते हैं कि ऐसी कविताएँ परिवार की कालजयी विरासत हैं, वे बकवास कॉपीराइट एक्ट से ऊपर हैं। बाबूजी के अवसान के साठ साल बाद मधुशाला हर किसी की हो जाएगी, उफ़! वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अमित जी का हक़ है, अमित जी की विरासत है। महानायक को डर है कि उनके पिताजी की रचनाएँ पब्लिक कर दी गई तो लोग कविताओं को खरोंच सकते हैं, छेड़छाड़ कर सकते हैं, नुकसान पहुँचा सकते हैं। जो उनका नहीं था उन्हें मिला, सारे असम्मान के साथ मिला; बोफोर्स। जो उनका अपना है, वह इन्कम टैक्स विभाग वाले छीन रहे हैं। महानायक के विरोध के बावजूद छीन रहे हैं। पर ये कविताएँ तो उनका मालिकाना हक़ है, बाबूजी ने उन्हें विरासत में दी हैं। वे कह रहे हैं - ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर ये विरासत न लो।

मैं अमित जी से दो सौ प्रतिशत सहमत हूँ। अभी तक लोग इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे, अब एक्ट से सीमातीत हो गये असंरक्षित साहित्य के साथ छेड़छाड़ करने लग जाएँगे, तौबा! लोगों की हिम्मत देखिए, भारत की राजधानी में सरे आम कई मधुबालाओं के साथ गैंगरेप होता है, तब क़ानूनी एक्ट आँखों पर पट्टी बाँध खामोश हो जाते हैं। जीती-जागती मधुबालाओं के साथ ऐसी जानलेवा छेड़छाड़ होती है तो बेचारी काग़ज़ी मधुबाला के साथ क्या होगा? मेरा कलेजा गले में अटक जाता है जब मैं हमारे सड़कछाप दीवानों के बारे में सोचता हूँ। वे मधुशाला को निचोड़ डालेंगे और जब एक बूंद भी नहीं टपकेगी तो वे कैसा हाल करेंगे मधुशाला का, क्या करेगा तब कॉपीराइट एक्ट। देश में सैकड़ों एक्ट हैं, आपका 'पैक्ट' है तो 'एक्ट' है अन्यथा रिश्वत के अभाव में सब रिजेक्ट है। हमारे यहाँ सारे एक्ट पाठ्य पुस्तकों में अच्छे और सुरक्षित लगते हैं। पाठ्य पुस्तकों के बाहर एक्ट की सबसे ज़्यादा मिट्टी-पलीद वकील लोग ही करते हैं। उन्होंने अपनी लघु शंका निवारण से ले कर सुदीर्ध शंका निवारण के लिए कोर्ट बना रखे हैं। बीच में जिला और उच्च न्यायालय तो हैं ही। जितने ज़्यादा न्यायालय हैं, न्याय के आकाँक्षियों की उतनी ज़्यादा दुर्दशा है। कॉपीराइट एक्ट के होते हुए भी, कितने ही प्रकाशक और नकलधर्मी साहित्यकार, पसंदीदा रचना पर अपने नाम का मुलम्मा चढ़ा देते हैं। वे साहित्यिक चोरी के साथ-साथ सीनाजोरी भी करते हैं, कुछ बिगड़ पाया क्या उनका! जो एक्ट है, वह 'एक्ट' नहीं करता।

‘एंग्री यंग मैन’ अब यंग नहीं रहे, पर एंग्री तो हैं। गुस्से में पूछ रहे हैं, किसने लिखा ऐसा बकवास एक्ट! भारत के हज़ारों साहित्यकारों और कलाकारों के वंशज इस कॉपीराइट एक्ट का सम्मान करते हैं। वे अपने माता-पिता की रचना को तय समय के बाद अपनी निजी विरासत नहीं मानते, जन- जन की धरोहर मानते हैं। माता-पिता चले गए, अब उनकी कविता का क्या मोह! कविता कोई वसीयतनामा तो है नहीं कि उसकी चिंता करें। पर महानायक फ़िल्मी हो गए हैं। वे अपने बाबूजी की रचनाओं की चौकीदारी करना चाहते हैं, और अल्प-रोज़गारी बच्चन तृतीय के लिए यह चौकीदारी छोड़ कर जाना चाहते हैं।

विश्व विख्यात लेखकों की रचनाएँ छोड़िए, सौ से ज़्यादा नोबेल पुरस्कार विजेताओं की रचनाएँ इंटरनेट पर मुफ़्त में उपलब्ध हैं। शोधकर्ता, शोध पत्र लिख रहे हैं, और शौचकर्ता नकली साहित्य गढ़ रहे हैं। रसिक जानते हैं, शुद्ध दूध कहाँ मिलता है और पानी मिला दूध कहाँ। महानायक को शिकायत है कि सोशल मीडिया ने साहित्य का अवमूल्यन कर दिया है। जब बॉलीवुड और भोजपूरी फ़िल्में, साहित्य को असाहित्य नहीं कर पाईं तो सोशल मीडिया क्या कर लेगा! अश्लील कला और अश्लील साहित्य हर युग में रहा है। ब्लू फ़िल्मों के कलाकार मुख्यधारा की फ़िल्मों में समादृत हो सकते हैं, पर साहित्य में ऐसी बाजारू घुसपैठ नहीं है।

लोगों को मुफ़्त में पढ़ने के लिए श्रेष्ठ साहित्य विपुल में उपलब्ध है तो दीर्घकालीन या कालजयी कॉपीराइट एक्ट बनाने का क्या औचित्य? यह तो उस लेखक के साथ अन्याय होगा जिसके पैर में सदा- सर्वदा घुँघरू बंधे होंगे और वह सिर्फ़ फ़ीस देने वालों के लिए ही छम-छम कर पायेगा। महानायक ने बाबूजी की कविताओं को उनकी महत्ता से ज़्यादा प्रतिष्ठित किया है। प्रमुख मंचों पर उन्होंने बाबूजी की कविताओं को श्रोताओं पर थोपा है, और उनकी आभा के सामने आयोजक मुँह बंद किए हँसते रहे हैं। अन्यथा बाबूजी के समकालीन और उनसे बेहतर लिखने वाले दर्जनों रचनाकारों को कभी ऐसे प्रतिष्ठित मंच और ऐसे अति प्रतिष्ठित बेटे नहीं मिले। मैं तो सभी रचनाकारों को सुझाव दूँगा कि यदि वे अपनी रचनाओं को कालजयी बनाना चाहते हों तो बाबूजी से सीखें। अपने बेटे (या बेटी) को ऐसा महान और हर प्रतिष्ठित मंच पर कविता पाठ के लिए प्रतिबद्ध बनाएँ, जैसे अमित जी हैं। अमित जी ने कहा है ज़रूरत पड़ी तो वे अपनी विरासत के लिए लड़ेंगे। लड़ें, पर उससे पहले महानायक बाबूजी के इतर सोचें। बौद्धिक सम्पदा हमेशा के लिए विरासतों के बंधन में जकड़ गई होती तो क्या आज मानव सभ्यता इतनी समृद्ध और सर्वजन हिताय होती? कला और साहित्य महानायकों के कोठों पर विरासत बन अपनी चारदीवारी में इठला रहे होते। अच्छा हुआ तुलसी के वक़्त कॉपीराइट एक्ट नहीं था, अन्यथा राम घर-घर तक शायद ही इतने पहुँच पाते। भूत-पिशाच और प्रेत जो हनुमान चालीसा के कारण हमारे निकट नहीं आ पाते हैं, लोकसभा और विधानसभाओं से बाहर आ जाते।
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