हिंदी नवजागरण की जनोन्मुखता और शिवपूजन सहाय का निबंध साहित्य

भावना मासीवाल

- भावना मासीवाल

पीएचडी हिंदी (तु.सा.), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
ईमेल: bhawnasakura@gmail.com;  चलभाष: +91 844 710 5405

शिवपूजन सहाय के लेखन की शुरूआत गुलाम भारत में होती है। भारत उस समय बाह्य और भीतरी गुलामी से घिरा था। बाह्य गुलामी थी औपनिवेशिक शासन यानी अंग्रेज़ों की, और भीतरी थी परम्परा, जातीयता और वर्गभेद  की। भारतीय नवजागरण में गुलामी की इसी मानसिकता से बाहर लाने का काम अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नए शिक्षित मध्य वर्ग द्वारा किया गया। इस वर्ग भारत की गुलामी के सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को पहचानकर सुधार की प्रक्रिया को अपनाया। राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचंद सेन से लेकर ऐनी बेसेंट, पंडिता रमाबाई, सावित्रीबाई फुले, रमाबाई रानाडे, आनंदीबाई जोशी, एनी जगंन्नाथन और रूक्माबाई आदि जिनमें प्रमुख स्त्री सुधारक मौजूद रहे। भारत में नवजागरण कालीन चेतना की यह लहर केवल सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक स्तर पर ही नहीं थी बल्कि साहित्य में भी इसकी गूंज सुनाई देती है। शिवपूजन सहाय का निबंध साहित्य इसी चेतना का संवाहक था। इनके निबंधों में ‘स्त्री शिक्षा एवं  स्वास्थ्य’, ‘हिंदी भाषा’ और  ग्राम्य जीवन में सुधार’ ये तीन हिंदी नवजागरणकालीन मुद्दे मुख्य रूप से उभरते हैं।
हिंदी नवजागरण में स्त्री सुधार एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरता है। स्त्री सुधार का यह संदर्भ महिलाओं को पश्चिमी सभ्यता से दूर रखना और उन्हें भारतीय परम्परावादी स्त्री के मूल्यों से गढ़ना रहा। शिवपूजन सहाय हिंदू स्त्री के आदर्श रूप की स्थापना करते हैं। यह उनका स्त्री के प्रति वैचारिक आग्रह था। क्योंकि नवजागरण कालीन अधिकांश लेखकों ने स्त्री की आदर्श छवि को ही अपने लेखन में गढ़ा। इसका एक कारण भारतीय परिवार व्यवस्था को बचाए रखना था। आधुनिकता के आगमन के साथ ही पश्चिम का प्रभाव महिलाओं पर होने से परिवार संस्था के टूटने का डर था। पश्चिम में उस समय तक उदार नारीवादी विचारधारा आ चुकी थी और महिलाएँ शिक्षित होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही थी। इसी कारण वह अपने साहित्यिक लेखन के माध्यम से पुरातन मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास करते देखे जाते हैं ‘हिन्दू परिवार की महिला’ शीर्षक निबंध में शिवपूजन सहाय लिखते हैं “हिन्दू परिवार की महिला कहते हो आँखों में एक लज्जावती, प्रसन्न-वदना, वात्सल्य-परायणा, पति प्राण, करूणामयी, मधुरभाषिणी, कोमल हृदया, प्रेम प्रवीणा, कुलीना नारी के दिव्य रूप की ज्योति झलक उठती है”[i]। आदर्श स्त्री की झलक उनके लेखन में मिलती है। यह दौर भले ही नवजागरण का था परंतु इसके लेखक परम्परावादी ही थे।
शिवपूजन सहाय भारतीय संस्कृति के पोषक थे इसलिए उनकी स्त्री परम्परावादी और भारतीय धार्मिक मूल्यों की पोषक थी। इनका समय सामाजिक पुनरुत्थान और सुधार का था। इस कारण इनके लेखन में बदलाव की अपेक्षा  सुधार की प्रवृति ही देखी जाती है। स्त्री शिक्षा के प्रति शिवपूजन सहाय का परम्परागत दृष्टिकोण ही उनके निबन्ध ‘विद्या पढ़ना सीखो’ में देखा जाता है। “यदि तुम सच्ची विधा पढ़ना चाहती हो तो सीता के प्रति अनुसूया देवी के उपदेशों को पढ़ो। सीता और सावित्री के निष्कलंक चरित्र से शिक्षा ग्रहण करो। उर्मिला, शकुन्तला, दमयंती, पार्वती और रूक्मिणी की पतिभक्ति की ओर ध्यान दो। विदाई के समय शकुन्तला के प्रति कण्व ऋषि के कर्तव्योपदेश पर विचार करो”[ii]। भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा का पहला पाठ सीता और सावित्री का आदर्श व्यक्तित्व है। क्योंकि उनमें सेवा व समर्पण का भाव प्रधान था। और यही समर्पण भाव परिवार संस्था को बचाए रखने की धुरी भी थी। इसी कारण समाज में स्त्रियों के लिए आदर्श उदाहरण सीता और सावित्री हैं, द्रौपदी नहीं*। जबकि राममनोहर लोहिया द्रौपदी को आख्यान परम्परा में स्त्री का सबसे सशक्त पात्र मानते हैं। वह कहते हैं कि ‘भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने कि कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खाई. नारी को गठरी के समान नहीं बल्कि इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरुष को गठरी बना अपने साथ ले चले’। शिवपूजन सहाय स्त्रियों की शिक्षा के संदर्भ में आगे लिखते हैं कि “जहाँ तक हो सके, मन को बिगाड़ने वाली पुस्तकों से बची रहो। अच्छी पुस्तकों का चुनाव करने में अपने भाई और पति से ही सहायता लो। तुम्हारी पढ़ाई का प्रभाव तुम्हारी संतान पर भी पड़ेगा। तुम्हारे ऊपर सारे समाज को सूधारने का भार है, इस बात को कभी अपनी आँखों से ओझल न होने दो”[iii]। अतीत का गौरव व उसके प्रति आत्मिक जुड़ाव इनके लेखन में सहज देखा जाता है। इसी कारण इनके निबंधों के उदाहरण भी उसी से संबंधित देखे गए। परम्परा और आधुनिकता का द्वंद्व नवजागरण के सुधार आंदोलन में यहाँ देखा जा सकता है। स्त्री शिक्षा के प्रति नवजागरण के दौरान की यह संकीर्ण मानसिकता केवल शिवपूजन सहाय में ही नहीं मिलती बल्कि भारतेन्दु में देखी जाती है। इस दौर के लेखक स्त्री शिक्षा के हिमायती तो ज़रूर रहे परंतु शिक्षा का उद्देश्य आदर्श स्त्री की निर्मिती ही रही। जिसके उदाहरण भारतीय परम्परा के चर्चित आदर्श सीता और सावित्री से लिए गए।  मैत्रेयी, जबाला, द्रौपदी जैसी महिलाएँ इनके उदाहरण बनकर नहीं आती।
शिव पूजन सहाय के लेखन में अतीत की ओर उन्मुखता देखी जा सकती है। इसे इनकी पुनरुत्थानवादी मानसिकता व वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। स्त्री शिक्षा कैसी दी जानी चाहिए, किसके द्वारा और किन विषयों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन विषयों के संदर्भ में भी शिवपूजन सहाय लिखते हैं, “पाकशास्त्र, संगीत शास्त्र, गृह-प्रबंध शास्त्र आदि में तुम्हारी गति तभी  हो सकती जब तुम विद्या पढ़कर शिक्षित बनोगी। यदि तुम अपने घरेलू राज्य की बागडोर छोड़कर अधिकार के लोभ से इधर-उधर भटकती फिरोगी तो बाहरी-संसार के प्रपंच में में फँसने से तुम्हारा असली राज्य चौपट हो जायेगा, फिर बाहर का अधिकार-क्षेत्र चाहे जितना कितना भी सुंदर हो, तुम्हारे लिये या तुम्हारे अपनों के लिए सुख-शान्तिपूर्ण न होगा”[iv]। शिवपूजन सहाय का स्त्री विषयक दृष्टिकोण श्रद्धाराम फिलौरी के उपन्यास भाग्यवती की याद दिलाता है जिसे उस समय का स्त्री शिक्षा का अनिवार्य ग्रन्थ माना गया। स्त्री शिक्षा का यह आंदोलन आज के स्त्री आंदोलन सरीखी नहीं था। बल्कि यह अपनी विचारधारा में पूरी तरह पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रस्त था। इस कारण यहाँ स्त्री शिक्षा पर तो बात की गई  मगर उस शिक्षा का दायरा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के भीतर ही सीमित किया गया था।
वीर भारत तलवार के शब्दों में कहें तो उस समय की स्त्री शिक्षा की गूंज उदारवादी चेतना का परिणाम नहीं थी बल्कि नवजागरण के दौरान शिक्षा के प्रचार-प्रसार से उपजा नए शिक्षित मध्यवर्ग की मानसिकता का प्रभाव था। “जिसकी जरूरतों से पुरानी सयुंक्त परिवार वाली सामन्ती व्यवस्था और संस्कृति मेल नहीं खाती थी। नये शिक्षित मध्यवर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के मुताबिक घरेलू स्त्रियों के पिछड़ेपन और शोषण के कुछ भद्दे और भयानक रूपों को धो-पोंछ डालने की जरूरत थी। ... पश्चिमी शिक्षा और मूल्यों के सम्पर्क में आए इस वर्ग के शिक्षित सदस्यों के लिए अब परिवार एक भावनात्मक ज़रूरत बनने लगा जिसमें स्त्री से कुछ मानसिक आदान-प्रदान की भी गुंजाइश बनी ”[v]।  नवजागरण के समय स्त्री शिक्षा के इस सुधारवादी नजरिये को शिवपूजन सहाय के स्त्री संबंधित विचारों के परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है। जहाँ स्त्री शिक्षा का उद्देश्य आदर्श स्त्री की छवियों पत्नी, बेटी और माँ की भूमिकाओं का बचाये रखना था। ताकि पश्चिमी प्रभाव वह ग्रहण न कर सके और परिवार संरचना को टूटने से बचाया जा सके। उनकी स्त्री शिक्षा संबंधित यही मानसिकता ग्रामीण स्त्री के संदर्भ में भी देखी जाती है। जहाँ आधुनिक शिक्षा ग्रामीण स्त्री को बिगाड़ सकती है इसलिए ग्रामीण महिलाओं के लिए ऐसी शिक्षा की व्यवस्था की बात करते हैं जो “उन्हें सच्ची आर्य महिला बना सके”[vi]
शिवपूजन सहाय का नगरीय स्त्री संबंधित दृष्टिकोण नवजागरण के परिपेक्ष्य में स्त्री शिक्षा और स्त्री के आदर्श रूप की निर्मिती तक केंद्रित देखा गया परंतु ग्रामीण स्त्री के संदर्भ में यह दृष्टिकोण उसकी शिक्षा से अधिक स्वास्थ्य पर केंद्रित था। शिक्षा के संदर्भ में तो वह ग्रामीण स्त्री का ‘तुलसीकृत रामायण[vii] पढ़ना जानना ही काफ़ी समझते थे। परंतु स्त्री स्वास्थ्य और उनकी जरूरतों की गाँवों में की जाती अनदेखी को वह अधिक महत्व देते हैं और  लिखते हैं कि “स्त्रियों के खान-पान की चिन्ता पुरुष बहुत कम करते हैं। जिन घरानों की स्त्रियाँ बाहर नहीं निकलतीं, उन घरानों के पुरुष कभी स्त्रियों के दाँतों  की सफाई के लिए घर में दतून लाकर रखने की परवाह भी नहीं  करते। स्त्रियों की तन्दुरुस्ती कायम रखने के लिए  पूरुष कभी सपने में भी नहीं सोचते। स्त्रियों को जिस घर में दिन-रात बन्द रहना पड़ता है, उसमें हवा और रोशनी की गुंजाइश है या नहीं, इस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। उनके बीमार होने पर दवा-दारू का ठीक इन्तजाम नहीं होता। उनके सौर-घर की सफ़ाई पर कोई ख्याल नहीं रखता। गर्भवती होने पर उनकी देखभाल अच्छी तरह नहीं की जाती, बच्चा पैदा करने के बाद सेवा-सुश्रूषा  के बिना वे रोगों की खान बन जाती हैं, उनकी दुर्दशा का कहीं अन्त नहीं! माता की कमज़ोरी दूध के साथ सन्तान में उतरती है ”[viii]। शिवपूजन सहाय स्त्री स्वास्थ्य संबंधित सवालों को अपने निबंध का विषय बनाते हैं। ग्रामीण  स्त्री के स्वास्थ्य पर बात करने वाले वह हिंदी नवजागरण के पहले लेखक हैं। जो यह मानते थे कि जब तक “मातृ-जाति अधोगति में पड़ी रहेगी, पुरुष-समाज सजग होकर भी उठने का बल न पा सकेगा! केवल नगरों की स्त्रियों में ही जागृति फ़ैलाने से देशोन्नति की समस्या हल न होगी”[ix]। शिवपूजन सहाय का हिंदी नवजागरण का क्षेत्र गाँवों की महिलाओं को भी अपने लेखन का केंद्र बनाता है।
शिवपूजन सहाय के निबन्धों में नवजागरण के दौरान दूसरा मुद्दा हिंदी भाषा का था। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के दौर में उर्दू  सरकारी भाषा थी और हिंदी अपने खड़ी बोली रूप में आम जनता की भाषा बनकर उभर रही थी। इस कारण हिंदी नवजागरण में सबसे बड़ी बहस का केंद्र हिंदी-उर्दू का रहा। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार “हिंदी प्रदेश के नवजागरण के सम्मुख यह बहुत गंभीर प्रश्न है कि यहाँ का नवजागरण हिन्दू और मुस्लिम दो धाराओं में क्यों विभक्त हो गया है ? यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है कि बंगाल और महाराष्ट्र का नवजागरण इस प्रकार विभक्त नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि हिंदी प्रदेश का नवजागरण धर्म, इतिहास भाषा सभी स्तरों पर दो टुकड़े हो गया ”[x]। भाषाई विभाजन का मुख्य कारण हिंदी-हिन्दू और उर्दू-मुस्लिम का विचार था। जिसके संबंध में शिवपूजन सहाय ‘राष्ट्र भाषा और उर्दू’ निबंध में लिखते हैं कि “खड़ी बोली के क्षेत्र में ही उर्दू पैदा हुई थी। वास्तव में वह खड़ी बोली (हिंदी) का ही मुसलमानी रूप है। इस तरह उर्दू तो हिन्दी की मुसलमानी शैली का ही पुराना नाम है। उसके क्रिया-पद, अव्यव, मुहावरे, तद्वित, कृदन्त आदि हिंदी-व्याकरण के अत्यन्त निकट हैं। दुर्गम लिपि और अरबी-फारसी की बाहरी पोशाक उतार देने पर उसकी गठन बस हिंदी की ही है”[xi]। शिवपूजन सहाय हिंदी और उर्दू की दो अलग भाषा और अस्मिता होने के संदर्भों को ख़ारिज करते हैं और स्पष्ट तौर पर उन्हें एक मानते हैं। केवल उसके शैलीगत अंतर को स्वीकार करते देखे जाते हैं।
हिंदी और उर्दू के भाषाई वर्चस्व के संघर्ष में 1837 में उर्दू के साथ प्रांत की क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल की स्वीकृति मिलती है परंतु अदालती कामकाज और शिक्षा में उर्दू ही प्रधान भाषा के रूप में कायम रहती है। भारतेंदु और उस दौर के अधिकांश लेखकों ने हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में ‘लेखन’ के माध्यम से कार्य किया। हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता में नवजागरण कालीन लेखकों में एक नाम शिवपूजन सहाय का भी था। मैनेजर पाण्डेय नवजागरण में हिंदी भाषा के संदर्भ में शिवपूजन सहाय के मत के संदर्भ में लिखते हैं कि “हिंदी भाषा के प्रश्न पर आपस में विचारधारात्मक मतभेदों के बावजूद राहुलजी और शिवपूजन सहाय एकमत थे और सहमत भी और ऐसी मानसिकता में ही इन दोनों ने भी हिंदी के विकास के लिए प्रयत्न किया”[xii]। हिंदी-उर्दू की इस बहस में हिंदी नवजागरण के लेखकों द्वारा 1893 में काशी नागरी-प्रचारिणी सभा की स्थापना की और हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित करने का काम किया। 1900 में हिंदी को राजकाज एवं शिक्षा की भाषा के रूप में स्वीकृति मिल जाती हैं।  
हिंदी और उर्दू के इस विवाद में हिन्दुस्तानी का एक नया रूप हिंदी-उर्दू मिश्रित रूप उभरता है। गाँधी जी द्वारा जिसका समर्थन किया जाता है। परंतु शिवपूजन सहाय हिंदी के हिन्दुस्तानी रूप से सहमत नहीं देखे जाते हैं।  वह हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने के पक्षधर देखें जाते हैं। वह उर्दू और हिंदी को एक ही मानते हैं और हिन्दी भाषा के संबंध में अपनी स्पष्ट पक्षधरता सुनिश्चित करते हैं। ‘हिंदी और हिन्दुस्तानी’ निबंध में वह लिखते हैं कि “हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा है-यह बात जिन महानुभावों के लिए असह्य हो उठी, उन्हीं सज्जनों ने हिंदीवालों को चिढ़ाने के लिए ‘हिदुस्तानी’ शब्द की सृष्टि की। जो महाशय हिन्दी को राष्ट्रभाषा के गौरव-मंडित सिंहासन पर आसीन देखकर भीतर-ही भीतर कट रहे हैं, वे ही चाहते हैं कि हिंदी का मुकुट उतारकर हिन्दुस्तानी से सिर सजा दें। पर यह काम तब तक होने का नहीं जब तक हिन्दी के करोड़ों पृष्ठ-पोषकों के कानों में ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ सब मिलि बोलो एक जबान’ के समान प्राचीन प्रतापी पद की ध्वनि गूंजती रहेगी”[xiii]। हिंदी नवजागरण में शिवपूजन सहाय का विशेष योगदान हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्थापित करने का रहा। उनके लेखन व वैचारिकी में हिंदी ही वह भाषा थी जो साहित्य,. लोक और राष्ट्र से जुड़ी है। “हिन्दी के जीते जी  वे हिन्दुस्तानी को या और किसी भी भारतीय भाषा को लोकभाषा या राष्ट्रभाषा के उपर्युक्त नहीं मानते”[xiv]। शिवपूजन सहाय तत्कालीन कांग्रेस की हिन्दुस्तानी भाषा की नीति का विरोध करते हैं और भविष्य में उसे पानी नीतियों पर पछताना पड़ेगा इसके लिए भी आगाह करते हैं। हिंदी और उर्दू के हिंदी नवजागरण के सबसे विवाद को वह हिंदी और उर्दू दोनों को बहने मानकर ख़ारिज करते देखे जाते हैं। वह एक राष्ट्र, एक भाषा वह भी हिंदी को स्थापित करने के प्रयास में  अपने लेखन में प्रयासरत देखे गए। राष्ट्रभाषा और हिंदी-उर्दू-हिन्दुस्तानी संबंधित नवजागरण कालीन बहस में उनके यह निबन्ध आज़ादी से पूर्व 1942 से 1954 तक के दौरान लिखे गए। यह समय आजादी के साथ–साथ भाषाई आजादी और राष्ट्र और राज्य भाषा के द्वंद्व से जूझ रहा था। 
भारतीय नवजागरण का संबंध राष्ट्रीय आंदोलन से रहा। अभयकुमार दुबे के शब्दों में “भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन सांस्कृतिक नवजागरण के मर्म से निकला है ”[xv]। इस कारण राष्ट्रीय आंदोलन और उसमें उठी भाषाई बहस भी शिवपूजन सहाय के निबन्ध लेखन का हिस्सा रहा। विभाजन से पूर्व तक साम्प्रदायिक सौहाद्र को बनाए रखने के लिए हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने की मानसिकता उस दौर में “नया हिन्द, हरिजन सेवक...मद्रास- सरकार का मासिक मुखपत्र दक्खिनी हिन्द भी अपनी सुबोध हिंदी को जबरदस्ती हिन्दुस्तानी कहता चला आ रहा है... बंगाल और महाराष्ट्र तथा गुजरात का भी यही हाल है”[xvi]। भारत के भीतर हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने का यह संघर्ष शिवपूजन सहाय के निबन्धों में देखा जा सकता है। हिंदी और हिन्दुस्तानी के मत-मतान्तरों को समझा जा सकता है। साथ ही हिन्दुस्तानी को भारत विभाजन के बाद दोनों राष्ट्रों की राष्ट्र भाषा के रूप स्वीकृति मिले इसकी आशा की जाती है। विभाजन के बाद जो संभव नहीं हो पाता और उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा बनती है। यहीं से भारत में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जाए का संघर्ष आरंभ हो जाता है और “राष्ट्रभाषा का नाम तो हिन्दी ही रहेगा, चाहे जब हो, जैसे हो”[xvii] का आंदोलन मुखर होता है। राष्ट्र भाषा का स्वरूप, राष्ट्रभाषा और हिन्दी साहित्य, राष्ट्रभाषा-साहित्य की एक योजना, राष्ट्र भाषा का विरोध, राष्ट्रभाषा और उर्दू, हिन्दी और हिन्दुस्तानी, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की भाषा आदि उनके हिंदी भाषा और नवजागरण से जुड़े निबंध हैं। यह सभी निबंध हिंदी नवजागरण में भाषा चिंतन के सवालों पर केंद्रित हैं। शिवपूजन सहाय न केवल हिंदी भाषा को प्रतिष्ठित करते हैं बल्कि भाषा की शुद्धता के पक्ष को भी उजागर करते हैं। हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान करने में महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ-साथ शिवपूजन सहाय का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
भारत का गौरवशाली अतीत आज भी गाँवों में मौजूद है। शिव पूजन सहाय देशज संस्कृति से जुड़े व्यक्ति रहे। उनके लेखन में नवजागरण की तीसरी गूंज ग्रामीण अंचल विशेष के संदर्भ में मिलती है। गाँवों के सुधार व उनके पुनर्गठन का उनका प्रयास उन्हें हिंदी नवजागरण में लोक के जागरण से जोड़ता है। हिंदी नवजागरण के लेखकों का एक उद्देश्य लोक में  सामाजिक, सांस्कृतिक बदलाव के प्रति जागृति लाना भी रहा। क्योंकि भारत गाँवों का देश है और यहाँ अधिकतर जनता गाँवों में गुजर बसर करती है। नवजागरण के दौर में भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी और प्रेमचन्द के लेखन में साहित्य का उद्देश्य आम-जन पहुँचना रहा। इसी सिलसिलेवार क्रम में शिवपूजन सहाय भी आते हैं जिनका लेखन ग्राम्य जीवन का लेखन बनकर उभरता है। जिनके लेखन का केंद्र केवल महानगर नहीं था बल्कि गाँव का अशिक्षित, बेरोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसों दूर, पानी की समस्या और रोगों से जूझता ग्रामीण आदमी था। सामाजिक विषमता के साथ-साथ आर्थिक विषमता भी सामंती परिवेश के कारण जहाँ मौजूद थी। आजादी की आंदोलन के दौरान भी गाँव इसी सामन्तवाद से जूझ रहे थे। फिर कैसे वह राष्ट्रव्यापी आंदोलन का हिस्सा बनते। ‘गाँव की दीवाली’ निबंध में वह लिखते हैं कि “गाँव में दीवाली के समय कितने ही गरीबों की विवशता देखकर कलेजा दहल जाता है। जब पड़ोस के सुखी गृहस्थ के घर दीपमाला शोभित होती है और पकवान मिठाई का सौरभ उड़ने लगता है तब बेचारे गरीब पड़ोसी किस तरह कौड़ी भर तेल से संझवाती दिखाकर मनमारे तन-हारे चुप सो रहते हैं – कोई भूखा रह जाता है, कोई अधपेटा ... सच तो यह है कि शोषित भारत के गरीबी का सच्चा खाका खींचना असंभव है”[xviii]
शिवपूजन सहाय की रचनाधर्मिता व जन-पक्षधरता ग्रामीण अंचल के प्रति भी विशेष रूप से देखी जाती है। नवजागरण की स्थितियों को अधिक बेहतर बनाने के लिए वह गाँव का चयन करते हैं। उनका अपना परिवेश भी गाँवों से उनके जुड़ाव का कारण रहा। “मैं ठेठ देहात का रहने वाला हूँ, जहाँ नयी रोशनी की सभ्यता का उजाला नहीं पहुँचा है। अँधेरे में पड़े हुए गाँव बहुत से हैं; जहाँ न अच्छी सड़क है, न स्कूल है, न पुस्तकालय है, न अस्पताल है”[xix]। भारत गाँवों का देश है बिना ग्रामीण समाज में चेतना के राष्ट्रीय स्तर पर चेतना लाना और लोगों को जागृत करना असंभव है। इसी कारण ग्रामीण जीवन से जुड़ा उनका स्वयं का व्यक्तित्व भी निबंधों के माध्यम से ग्राम सुधार की चेतना की बात करता है। वह सामाजिक विषमता छूआछूत और जाति व्यवस्था से उत्पन्न असमानता का जिक्र अवश्य करते हैं परन्तु उसका विरोध उनके निबंधों में नहीं देखा जाता। शिवपूजन सहाय ग्रामीण परिवेश में व्याप्त आर्थिक असमानता, सुविधाओं के अभाव और महानगरों से गाँवों के कटे होने के कारण रोजगार का अभाव आर्थिक असमानता से जूझते ग्राम्य समाज के जीवन को ‘गाँवों का महत्व’, ‘आजकल के गाँव’, ‘कवि और लेखकों के गाँव’, ‘गाँवों के मकानों का सुधार’, ‘गाँवों में पशु-पालन’, ‘गाँवों में स्कूल’, ‘गाँव में दीवाली’, ‘ग्राम सुधार’, ‘ग्राम-पंचायत का नाटक’, ‘हमारे उपेक्षित गाँव’ आदि में ग्रामीण समाज के जीवन उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, गंदगी, बीमारी, अस्पताल, पलायन, पंचायत की राजनीति आदि समस्याओं को उठाया। साथ ही ‘आजकल के गाँव’ निबंध में यह भी लिखते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन व हिंदी नवजागरण में उनकी सहभागिता तभी सुनिश्चित हो सकती है “जब उनके सब अभाव शीघ्र दूर कर दिए जाएँ”[xx]
हिंदी नवजागरण और शिवपूजन सहाय के जनोन्मुखी पक्षधरता की बात की जाए तो इनका नजरिया सुधारवादी रहा। स्त्री शिक्षा और ग्रामीण जीवन संबंधित निबंध हिंदी नवजागरण की सुधारवादी प्रवृत्ति के अंतर्गत देखे जा सकते हैं। वहीं हिंदी भाषा संबंधी निबंधों में हिंदी के प्रति इनकी पक्षधरता स्पष्ट देखी जाती है और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का इनका संकल्प भी। इस प्रकार शिवपूजन सहाय का निबंध साहित्य हिंदी नवजागरण के तीन मुद्दों स्त्री शिक्षा, ग्राम्य जन-जीवन और हिंदी भाषा को अपने लेखन में प्रमुखता से उठाता है। धर्म और जाति के संदर्भ में इनका स्पष्ट कोई मत नहीं उभरता। यह भारतीय परम्परा को ही आदर्श रूप में स्वीकारे जाने के हिमायती देखे गए। फिर वह स्त्री शिक्षा के प्रति परम्परावादी दृष्टिकोण हो या गाँवों में सुधार के माध्यम से उन्हें बेहतर बनाने की मानसिकता या हिंदी भाषा की स्थापना में हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना की मानसिकता। यह सभी शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व के भारतीय मूल्यों से पोषित होने के संदर्भों को उजागर करता है।  

*सम्पादकीय नोट: ज्ञातव्य है कि भारतीय परम्परा में द्रौपदी ही नहीं, अहल्या, तारा, तथा मंदोदरी को भी सीता की तरह ही आदर्श और प्रातःस्मरणीय माना गया है।  एक परम्परागत प्रातःस्मरणीय मंत्र -   
अहल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा । पंचकन्या स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्
                                                                                                




[i] हिन्दू परिवार की महिला, (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, पृ.-250
[ii] विद्या पढ़ना सीखो, (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, पृ.-272
[iii] विद्या पढ़ना सीखो, (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, पृ.-272
[iv] विद्या पढ़ना सीखो, (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, पृ.-213
[v] तलवार वीरभारत राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य, पृ.-120
[vi] ग्रामीण स्त्रियों की दशा, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.-47
[vii] ग्रामीण स्त्रियों की दशा, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.-48
[viii] आजकल के गाँव, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.23
[ix] ग्रामीण स्त्रियों की दशा, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.-49
[x] आलोचना-अक्टूबर-दिसम्बर-86 पृ.-6  
[xi]  राष्ट्र भाषा और उर्दू, , (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.186
[xii] आजकल पत्रिका, मई 2017, पृ.-26
[xiii] हिंदी और हिन्दुस्तानी, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.188
[xiv] हिंदी और हिन्दुस्तानी, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.190
[xv] आजकल पत्रिका, मई 2017, पृ.-26
[xvi] हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की भाषा, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.193
[xvii] हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की भाषा, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.194
[xviii]  गाँव की दीवाली’, (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, पृ.-221
[xix] ग्राम सुधार, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय पृ.7
[xx] आजकल के गाँव, (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, पृ.27

संदर्भ सूची:
·       (सं.) मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय रचनावली खण्ड-2, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्युटर्स(प्रा.) लिमिटेड, प्रथम संस्करण-2011, दिल्ली
·       (सं.) निर्मला जैन, निबन्धों की दुनिया: शिवपूजन सहाय, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2012, दिल्ली
·       तलवार वीरभारत,  राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य कुछ प्रसंग: कुछ प्रवृत्तियाँ, हिमालय पुस्तक भण्डार, द्वितीय संस्करण-1993, दिल्ली
·       कुमार विमल, नवजागरण, राहुल सांकृत्यायन और शिवपूजन सहाय(आलेख) आजकल पत्रिका, मई 2017
·       नया ज्ञानोदय (अनूप स्मृति) आचार्य शिवपूजन सहाय महापंडित राहुल सांकृत्यायन, सितम्बर 2017
·       आलोचना-अक्टूबर-दिसम्बर-86   

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