व्यंग्य: तेल का अर्थशास्त्र

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


मैं समंदर किनारे बैठा लहरें नहीं गिन रहा, कुछ बड़ा सोच रहा हूँ। उफनती हुई लहरें आती हैं और मेरे पाँव छू कर शांत हो जाती हैं। वरिष्ठ नागरिकों को इससे ज़्यादा क्या चाहिए, लोग इज्जत दे दें तो मन मयूर हो जाता है। सच कहूँ तो समंदर किनारे बैठने पर मुझे अल्प-वस्त्रा फ़ैशन शैलियों को देखने का अकथनीय सुख मिलता है। विधाता किस तरह के नए मॉडल घड़ रहा है यह जानकारी वहाँ मूँगफली खाते हुए मिल जाती है। हो सकता है ऐसी बातें करने वाले आपको निठल्ले लगें, पर आपको समझना चाहिए कि निठल्ले लगने वाले लोग ही महत्वपूर्ण होते हैं। जी हाँ, मैं शेख अब्दुल अल रशीद अल बाशिद की अरेबियन फ़िल्म का डायरेक्टर हूँ। यह बात अभी गोपनीय है, बस सबसे पहले आपको ही बता रहा हूँ।

कुछ देर पहले मैंने यहाँ स्टीमर वाले छोकरों को पकड़ा और उन टपोरियों से लॉस ऐंजिल्स की बात करने लगा। ऐसे वाचाल लोगों से साहित्यिक विमर्श की बात करो तो चर्चा में जान आ जाती है। वे हॉलीवुड फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में कुछ नहीं जानते थे, इसलिए मेरी हर बात पर सिर हिला देते थे। स्थापित बुद्धिजीवी बनना हो तो अल्पबुद्धियों से बात करने में समझदारी है। मैं वही कर रहा हूँ।

शेख रशीद अपनी अपार दौलत को अपरम्पार करने के लिए बॉलीवुड फॉर्मूला फ़िल्म बनाना चाहते थे। इन दिनों अमेरिका और ओपेक देशों के संबंध साँप नेवले जैसे हो गए हैं। अमेरिका उनका तेल नहीं लेता, वे उनके हथियार नहीं लेते। अमेरिकनों के पास इतने हथियार हो गए हैं कि अमेरिकन बच्चे स्कूलों में भी हथियार चलाने लग गए हैं। इसलिए शेख की हॉलिवुड में भी रूचि नहीं रही। शेख कहने लगे कि दुनिया को प्यार चाहिए। प्यार के मामले में भारत गुरू है, जगतगुरू है, इसलिए उन्हें गल्फ के लिए रोमांस से भरी भारतीय टेकनीक पर बनी फ़िल्म चाहिए। मैंने कहा ठीक है, तीन घंटे की बीस-बाइस रील की फ़िल्म बना लेते हैं। वे चौंक कर बोले - खाड़ी में आठ- दस रील की फ़िल्म बहुत है। मैंने कहा - आपके यहाँ सेंसर बोर्ड वाले क्या करते हैं? वे फिर चौंक गए तो मैंने उन्हें बीस रील को काट-काट कर दस रील में बदलने का सेंसर बोर्ड का रोल समझाया। मैंने कहा फ़िल्म बनाने के साथ एक-दो अरबी-खाड़ी सेनाएँ खड़ी करनी होंगी। सेना माँग करेगी तो सेंसर बोर्ड ज़्यादा कैंची चलाएगा, इससे फ़िल्म की न्यूज़- वैल्यू बढ़ेगी। विवाद हो तो संवाद होता है, तब बॉक्स ऑफिस पर सम्मान होता है। बात आगे बढ़ी, डांस पर आई। मैंने उन्हें नए-पुराने, फॉक, कैबरे, डिस्को, खिसको सब तरह के डांस समझाए। शेख ने खिसको डांस नहीं देखा था। मैं उन्हें नृत्य-कला अकादमी के एक शो में ले गया, वे दस मिनट में बाहर निकल आए। मैंने पूछा, खिसको का मतलब समझे या दूसरे थियेटर में चलें। वे डरे-डरे लगे तो मैंने विषय बदल दिया, हम फाइट पर बात करने लगे। ओपेक देशों में तेल के खाली ड्रमों की कमी नहीं थी, हीरो की एक किक में अरब मुल्कों के सब पीपे गुड़क सकते थे। शेख को यह विचार बहुत भाया।

अब शेख स्टोरी की रट लगाने लगे। जिन लोगों के पास किताबी ज्ञान होता है, वे पालतू तोते की तरह अपना ज्ञान बघारने लगते हैं। मैंने पूछा -शेखचिल्ली, क्या आपने अरेबियन नाइट्स इन मुम्बई फ़िल्म देखी है! वे नकारात्मक मुंडी हिलाने लगे। जब ऐसी कोई फ़िल्म बनी ही नहीं थी तो वे क्या देखते। जो विदेशी भारतीयों के सामने

स्मार्ट बनने की कोशिश करे तो उसे ऐसे ही उल्लू बना-बना कर ठीक किया जाता है। मैंने गंभीर हो कर कहा, बॉलीवुड ने कई फ़िल्में बिना स्टोरी के बनायी हैं और वे डंके की चोट बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा हिट रही हैं, हम ऐसा ही करेंगे। हॉलीवुड फ़िल्मों को गोली मारो, अब स्पेस और साइंस फिक्शन में क्या धरा है, वे तो बच्चों के काम की हैं। और कथा फ़िल्में, वे तो कला फ़िल्में होती हैं। कला को अरबी की तरह दाँये से बाँये उल्टा पढ़ो, तो होता है लाक। कला फ़िल्में लॉक हो जाती हैं डिब्बों में, डिस्ट्रीब्यूटर खोल ही नहीं पाते। कथा के चक्कर में पड़े तो संपत्ति अपरम्पार होने की बजाय आरपार हो जाएगी।

शेख घाट-घाट से तेल निकाल चुके थे, उन्होंने मुझे भाव नहीं दिया। कलाकार को औकात बता दो तो वह बिफर जाता है, इसलिए मैं भी आक्रामक हो गया। मैंने कहा शेखजादे, बॉलीवुड में ढंग की फ़िल्म बनाना हो तो पचास करोड़ रुपये, मतलब फाइव हंड्रेड मिलियन का मिनिमम बजट रखना। जितना तेल डालोगे उतनी गाड़ी चलेगी। फ़िल्म में आइटम सांग ज़्यादा ज़रूरी है, विदेश में फ़िल्मांकन ज़रुरी है। स्टोरी का चक्कर छोड़ो, हम दर्शकों पर कहानी थोपते नहीं, कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद आगे बढ़ती है। डांस और फाइट जैसे बॉक्स ऑफिस आइटम फ़िल्म में नहीं जाएँ तो प्रोड्युसर सड़क छाप हो जाए, हीरो-हीरोइन की आने वाली फ़िल्में भी पेटी-पैक रह जाएँ। कहानी हो तो डायरेक्टर, फोटोग्राफर, गीतकार, संगीतकार, संवाद-लेखक सबका स्कोप ख़त्म हो जाता है। एक कहानी के चक्कर में हम इतने सारे कलाकारों की भ्रूण हत्या का पाप नहीं कर सकते, छी छी।

अब शेख को मेरे टेलेंट का पता चला। आप अपना टेलेंट खोल कर नहीं बताओ तो लोग अनभिज्ञ रह जाते हैं। शेख मुझसे सहमत हो गए तो मैंने गारंटी देते हुए कहा - हम पुख़्ता काम करते हैं। माँग और पूर्ति का नियम पढ़ा होगा आपने। हम दर्शकों की माँग के हिसाब से फ़िल्मों की पूर्ति करते हैं। आप जैसे तेल की माँग देखते हैं और तेल के भाव बढ़ा देते हैं, वैसा ही हमारा फ़िल्मों का मार्केट है।

तेल के अर्थशास्त्र से शेख को ज़ल्दी से समझ में आ गया। भाषा अपने श्रोता को समझ में आ जाए तो वे खुश हो कर तालियाँ बजाते हैं। शेख साहब खुश हो गए। उन्होंने फ़िल्म बनाने का अनुबंध हमारे साथ कर लिया इसलिए मैं समंदर किनारे बैठ नई फ़िल्म के बारे सोच रहा हूँ।
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