कहानी: क्योंकि प्रेम प्रतिदान नहीं

कुमार सौरभ
शोधार्थी, तेजपुर विश्वविद्याल, तेजपुर, असम
चलभाष: +91 801 181 0461
ईमेल: saurabhpoet@gmail.com

यह कहानी है एंडी और ज़ीना की। जिस समुद्र के तट पर  ये दोनों पहली बार मिले थे वहाँ दूर-दूर से पक्षियों का झुंड अपनी भूख मिटाने आता था। पूरे इलाके में यह अकेला ऐसा तट था जहाँ से कोई पक्षी कभी निराश होकर न लौटा, मछली की कई प्रजातियों से भरा यह समुद्र हर दिन न जाने कितने शरणार्थियों के दावत का माध्यम बनता। कभी-कभी तो समुद्र  के किनारे मरी मछलियाँ  इतनी ज्यादा तादाद में जमा हो जाती थी कि भूख मिटाने के लिए पक्षियों को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही कारण है कि आंधी के बाद की सुबह नवजात पक्षियों की माँएँ अपने बच्चों को साथ लेकर इस तट पर  पहुँच जाती... और यहाँ से शुरू होता था मछली पकड़ने का उनका प्रशिक्षण।

अपने परिवार का सबसे छोटा सदस्य एंडी किसी सुदूर क्षेत्र से उड़ान भरता हुआ एक सुबह इस तट पर पहुँच गया। उसके लिए यह दुनिया नायाब थी। हजारों की संख्या में पक्षियों की चहचहाहट, दूर-दूर तक बहती- लहरें, और इन लहरों के साथ बहती लाखों मछलियों का झुंड, सब कुछ पहली बार देख रहा था वह। यही वह जगह थी जब एंडी ने पहली बार ज़ीना को देखा था... सफ़ेद घने पंखों को फड़फड़ाती छोटी-सी ज़ीना आज कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिख रही थी। समुद्र की एक धारा अगर एंडी के दायीं ओर बह रही थी तो दूसरी धारा ज़ीना की मोती जैसी बड़ी-बड़ी आँखों में प्रवाहमान थी। सभी पक्षी जहाँ अपने शिकार में ध्यान-मग्न थे वहीं एंडी एकटक से ज़ीना को देखे जा रहा था। “कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है?” एंडी ने खुद से कहा। एंडी की नज़र को ज़ीना की ख़ूबसूरती ने कैद कर लिया था। हजारों पक्षियों के बीच एंडी की नज़र ज़ीना पर जाकर थम चुकी थी। वहीं दूसरी ओर एंडी की नज़रों से बेपरवाह ज़ीना समुद्र की बहती धार पे अपनी नजरें टिकाए हुई थी। मछली पकड़ने में वह बार-बार असफल हो रही थी परन्तु उसकी तन्मयता में जरा भी कमी न आयी। यही कोई दो घंटे की तपस्या के बाद एक छोटी सी मछली ज़ीना के चोंच में आकर फँस गयी... अपनी चोंच खुशी से हिलाती, रेत पे उछलती कूदती ज़ीना को मानो कोई खज़ाना हाथ लग गया हो। जाहिर है कि ज़ीना शिकार करने में पारंगत नहीं थी परन्तु उसमें लगन की कोई कमी न थी, अपनी सफलता के लिए इतना लम्बा इंतजार इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था। कम ख़ुराक वाली छोटी-सी ज़ीना रेत पर एक कोने में जाकर अपनी घंटों की मेहनत का स्वाद चखने लगी... और फिर सफलता का जश्न मनाती हुई अपने नीड़ की ओर चल पड़ी।

                          ज़ीना समुद्र तट से जा चुकी थी परन्तु उसकी जश्न मनाती आँखें एंडी की नज़रों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रही थी। उस दिन एंडी ने खुद से एक वादा किया कि, “अब ये जश्न के पल ज़ीना की जिंदगी में बार-बार आएंगे, अब उसकी ज़ीना घंटों लहरों पे टकटकी नहीं लगाएगी...” अबतक एंडी, ज़ीना का नाम भी नहीं जानता था परन्तु कोई जबरदस्त ताकत थी जो उसे ज़ीना की ओर खींच रही थी। हालाँकि एंडी उम्र में ज़ीना से यही कोई 15-20 दिन बड़ा होगा परन्तु उड़ान के नए-नए तरीकों से लेकर मछली पकड़ने की बारीकियाँ तक, कई ऐसे हुनर थे जिसमे एंडी को महारत हासिल थी। अगली सुबह के इंतजार में वो रात भर करवटें बदलता रहा।

सुबह सूरज की लालिमा आकाश पर छाई ही थी कि कुदरत का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा एंडी के सामने था। एंडी खुशी से अपने पंखों को फड़फड़ाने लगा... उसे ऐसा लग रहा था मानो इस जहाँ की सारी खुशियाँ उसके दो पंखों में समा चुकी है। सफ़ेद पंखों वाली ज़ीना अपने छोटे-छोटे क़दमों से समुद्र तट की ओर बढती चली आ रही थी और मूलतः शर्मीले स्वभाव का एंडी किसी मनचले आशिक़ सा उसे टकटकी लगाए देखे जा रहा था। देखते ही देखते ज़ीना, एंडी के सामने से हवा के झोंके की तरह गुजर गयी... और फिर समुद्र की लहरों पे नजरें टिकाकर बैठ गयी। एंडी उसके पास जाकर बैठा ही था कि एक तेज लहर उनकी ओर आई। ज़ीना लहरों से खुद को बचाने के लिए पल भर को आसमान की ओर उड़ गयी। परन्तु एंडी के लिए यह पल मछली पकड़ने का एक बेहतरीन मौका था उसने लहरों से थोडा ऊपर जाकर तेज़ी से पानी में गोता लगाया और पलक झपकते ही एक बड़ी सी चमकीली मछली उसके चोंच में थी। दूर आसमान से देख रही ज़ीना के लिए यह अचरज भरा पल था, “कोई इतना हुनरमंद कैसे हो सकता है” उसने मन ही मन सोचा। लहरों के शांत होते ही ज़ीना जमीन पर आ गयी और उसने एंडी से कहा, “ मेरा नाम ज़ीना है मैं आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ” एंडी कुछ कहे बिना उसकी आँखों में देखता रहा। “मछलियाँ समुद्र में है मेरी आँखों में नहीं” ज़ीना ने जोर से आवाज लगाई। “और समुद्र तुम्हारी आँखों में है” एंडी ने ऐसा मन में सोचा, पर कहा नहीं। “तुमने यह सब कैसे किया? मुझे दोबारा उसी तरह से मछली पकड़कर दिखाओगे?” ज़ीना प्रश्न पे प्रश्न किये जा रही थी। “हाँ-हाँ क्यों नहीं! ये देखो” इतना कहकर एंडी थोड़ी दूर आसमान में उड़ गया और फिर अचानक गोते लगाता हुआ समुद्र की लहरों की ओर बढ़ गया पल भर के लिए वो लहरों के बीच ओझल हो गया फिर अचानक एक मछली लिए पानी से बाहर आया। ज़ीना ख़ुशी से उछल पड़ी, “वाह मेरे दोस्त तुममें कमाल की प्रतिभा है... मैंने आज तक तुम सा प्रतिभावान नहीं देखा... कैसे करते हो ये सब? मुझे भी सीखना है ... देखो ज़ीना कितनी छोटी है, फिर भी इतना मेहनत करती है! तुम अगर सिखाओगे तो यह सबकुछ सीख जाएगी! सिखाओगे न?” एंडी की ओर से ना का सवाल ही नहीं था। उस पल, उस क्षण एंडी को ऐसा लगा जैसे बचपन का सारा अभ्यास आज जाकर सफल हुआ हो। इस पल पूरी कायनात एंडी के साथ थी। इस तरह ज़ीना को एंडी के रूप में एक साथी मिला और एंडी को जीने की एक खूबसूरत वजह।

दोनों रोज सुबह जमकर अभ्यास करते, हवा में कलाबाजियाँ दिखाते... यह दौर उड़ान के नए-नए तरीकों को आजमाने का था। इन दिनों ज़ीना ने जमकर मेहनत की और जल्द ही वो हर विधा में पारंगत हो गई। “एक बात बताऊँ ज़ीना, तुमने जितनी जल्दी यह सब कुछ सीखा वह आश्चर्यचकित करने वाला है” एंडी ने ज़ीना की सराहना करते हुए कहा। “मैं ये सब कर पायी क्योंकि तुम मेरे साथ थे... तुम्हारे जैसा साथी मुझे नहीं मिल सकता एंडी” इतना कहते हुए ज़ीना ने एंडी को अपने पंखों से छेड़ना शुरू कर दिया। फिर अचानक गंभीर होते हुए ज़ीना ने कहा, “सच में एंडी तुम बहुत अच्छे हो... हमेशा ऐसे ही रहना” भावुक एंडी ने अपनी छोटी सी ज़ीना को पंखों में समेटकर कहा, “आई ऍम प्राउड ऑफ़ यू।” फिर दोनों पल भर के लिए मौन हो गए। एंडी इस दो पल की ख़ामोशी में डूबता जा रहा था तभी ज़ीना ने धीमे स्वर में कहा, “जानते हो एंडी तुम्हारे साथ रहना मुझे क्यों अच्छा लगता है? क्योंकि यही वो पल होता है जब मैं खुश होती हूँ। वरना, बचपन से घर में सबकी खुशी का खयाल रखते-रखते मैं ही खुश रहना भूल गई थी... तुम मेरे लिए बहुत मायने रखते हो एंडी” यह कहते हुए ज़ीना की आँखों के कोने से आँसू छलक आए थे। इस समय एंडी की भी आँखें भीग गई थी और वह कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं था। फिर भी उसने भर्राए गले से कहा, “अब तुम्हारे जीवन में केवल खुशियाँ ही आएगी ज़ीना, इसलिए इन आंसुओं को पोंछो और जिंदगी की उड़ान का उत्सव मनाओ” दोनों शाम होने तक हवा में कलाबाजियाँ करते रहे। फिर ज़ीना अपनी नीर को लौट गयी और एंडी समुद्र किनारे पेड़ पर बने घोसले में जिसे उसने तकरीबन एक महीने पहले बनाया था।  अब हर दिन सूरज की रोशनी अपने खूबसूरत तोहफ़े, “ज़ीना” को संग लिए आती। जो ज़ीना कभी तेज़  लहरों से डरकर पीछे हट जाती थी आज उसके अभ्यास और एंडी के साथ ने एक महीने में ही उसे इतना परिपक्व बना दिया था की तेज आँधियाँ भी उसे डरा पाने में स्वयं को अक्षम महसूस कर रही थी। तेज हवाओं के विरूद्ध कलाबाजियाँ दिखाना, समुद्र के गहरे पानी में उतरकर मछलियों का शिकार करना ज़ीना सब कुछ कर पाने में सक्षम थी। शरारती आँधियों को अपनी प्रतिभा से मुँह चिढ़ाती ज़ीना को देखना एंडी के लिए सुकून भरा पल था, यही तो वो सपना था जिसे एंडी ने महीनों पहले देखा था। इसी तरह हर छोटी-छोटी सफलता पर जश्न मनाते हुए दो महीने गुजर गए।

       एक सुबह जब आसमान काले बादलों से घिरा था, समुद्र तट पर बहती हवाएं रेत को अपने संग उड़ा ले जाना चाह रही थी परन्तु बारिश की बूँदें रेत और धरती के मिलन को स्थायित्व प्रदान कर रही थी। तट पर पहुँचने वाले चिड़ियों की संख्या औसतन कम थी, लेकिन एंडी और ज़ीना का आगमन आज भी  रोज की तरह आसमान में सूरज की लालिमा के साथ ही हो चुका था। जहाँ सभी पक्षी खुद को बारिश से बचाने की जुगत में लगे थे वहीं ये जोड़ा बारिश की प्रत्येक बूँद को खुद में समा लेना चाह रहा था। “जब तुम साथ नहीं होगे... तो ये बारिश की बूँदें बहुत सताएगी एंडी” मन ही मन यह सोचकर ज़ीना ने अपने पंखों को सिकोड़ लिया, और किसी छोटे बच्चे सा उसकी पंखों में सिमटकर एंडी ने बिन कहे उसे यह भरोसा दिलाया कि, “अपने जीवन के आखिरी पल तक मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” इस पल एंडी को न कुदरत की नियत का पता था न आने वाले कल का।

              एंडी भले ही जीवन के आखिरी पल तक ज़ीना के साथ रहने की बात सोच रहा था पर ज़ीना को इस बात का इल्म था की उसे एक दिन एंडी को छोड़कर जाना पड़ेगा। ज़ीना इस बात को अच्छी तरह से जानती थी की उसके परिवार वाले कभी सुदूर क्षेत्र से आए एक अनजान पक्षी संग उसे जीवन बिताने की इजाज़त नहीं देंगे। परन्तु इस पल को ज़ीना खोना नहीं चाहती थी। वो जबतक एंडी के साथ थी हर पल में एक जिंदगी जी लेना चाहती थी। एंडी भी इस पल को खुद में समा लेने को आतुर था। दोनों एक दूसरे की आगोश में एक हुए जा रहे थे। इसी क्षण अचानक ज़ीना की आँखों से छलकते आँसू की बूंदों पर एंडी की नज़र गयी, “तुम रो रही हो ज़ीना?” एंडी ने उन आंसुओं को पोंछते हुए कहा। ज़ीना ने खुद को एंडी से दूर हटाते हुए कहा, “मुझसे इतना प्यार मत करो एंडी... आखिर मुझे एक दिन तुम्हें छोड़कर जाना है।” “कहाँ जाना है ज़ीना?” एंडी ने ज़ीना की आँखों में देखते हुए पूछा। “ तुमसे दूर...बहुत दूर! तुम देखते रह जाओगे मैं फुर्र से उड़ जाऊँगी” यह  कहते हुए ज़ीना की आँखें रहस्यमयी हुई जा रही थी। इस पल ज़ीना की कही बातें एंडी की समझ से परे थीं। ज़ीना से दूर होने की बात को एंडी समझना चाह भी नहीं रहा था। उसने फिर से ज़ीना के करीब आना चाहा, “मुझसे दूर हटो एंडी” यह कहते हुए ज़ीना का स्वर कठोर हो चला था, वह नाराज थी कि उसके मना करने के बावजूद एंडी उसके करीब क्यों आया? एंडी भी खुद से नाराज था कि वो ज़ीना के इनकार को क्यों नहीं मान पा रहा ... दोनों तरफ की नाराज़गी में एंडी ज़ीना को यह बताना भूल गया कि ज़ीना से प्यार करना, उसके करीब आना, उसके पंखों में खुद को छिपा लेना एंडी को स्वयं के होने का वजूद देती है। इस पल एंडी की नम आँखें ज़ीना से बहुत कुछ कहना चाहती थी पर शायद ज़ीना इतनी दूर निकल आई थी की आंसुओं की भाषा समझने में असहाय थी।

धीरे-धीरे कब निकटता का स्थान दूरियों ने ले लिया पता ही नहीं चला। दोनों अब भी साथ अभ्यास करते पर अब पहले सी उमंग नहीं रह गयी थी। “तुम अभी अपने अभ्यास के शिखर पर हो ज़ीना... तुम्हारी मेहनत ने यह सिद्ध कर दिया है कि तुम सर्वश्रेष्ठ हो, पर मैं नहीं चाहता हूँ कि तुम अभ्यास में किसी भी किस्म की ढील बरतो।” एंडी ने फ़िक्र जताई। “मेरा मन अभ्यास में नहीं लग पा रहा एंडी, मुझे हमेशा तुम्हारी चिंता सताती है” ज़ीना ने एंडी की आँखों में देखते हुए कहा। “अगर तुम्हारे अभ्यास में मैं बाधक हूँ तो तुम मुझसे मिलना छोड़ दो” एंडी ने आवाज़ में परिपक्वता लाते हुए कहा। “वह भी नहीं कर पा रही हूँ” ज़ीना को लड़ना मंजूर था, रोना मंजूर था पर एंडी का साथ खोना नहीं। वक्त गुजरता जा रहा था स्थितियाँ बदतर होती जा रही थी। इसी तरह से करीब एक माह और गुजर गया। ज़ीना अब भी रोज़ सुबह एंडी के पास एक बार ज़रूर आती थी पर अब दोनों के मिलन में उत्सुकता का स्थान औपचारिकता ने ले लिया था। हालाँकि अब भी ज़ीना पर नज़र पड़ते ही एंडी चहक उठता था पर उसकी आँखों में देखते ही वो उतना ही निराश होता। कई बार एंडी को ज़ीना का रोज़ मिलने आना एक प्रतिदान नज़र आता था, अबतक के साथ का प्रतिदान। जिस एंडी और ज़ीना के मिलन में कभी खुशियों के फव्वारे फूटते थे अब वहाँ मन की खीज गुस्से का रूप लेकर निकला करती थी। एंडी गुस्साता, ज़ीना रोती ... ज़ीना को रोता देख एंडी उससे भी ज्यादा रोता। दोनों के मिलन में हँसी की जगह आँसुओं ने ले ली थी। हालाँकि आज भी वह अपनी छोटी सी ज़ीना से उतनी ही मुहब्बत करता था पर न चाहते हुए भी ज़ीना के रोज़  की उदासी का कारण किसी न किसी रूप में एंडी ही बनता। वो एंडी जिसकी ज़िन्दगी से बस एक ही ख्वाहिश थी की वो ज़ीना की आँखों में हर रोज़ सफलता का जश्न देखे वो दिन-प्रतिदिन ज़ीना के आँसुओं की वजह बनता जा रहा था।  जबतक ज़ीना पास होती वो उसकी आँखों में ताकता रहता, शायद किसी कोने में खुद को ढूंढता था। ज़ीना उसे दिलासा देती की, “तुम अब भी इन आँखों में बसते हो एंडी” और एंडी मुस्कुरा देता। ज़ीना अपने दिलासे से  एंडी को बहलाने की कोशिश करती थी और एंडी अपनी मुस्कुराहट से ज़ीना को... पर दोनों की आत्मा एक-दूसरे की रूह में कुछ इस तरह शामिल थे कि हर बार दोनों की चोरी पकड़ी जाती।

आसमान पर अँधेरा छा चुका था, ज़ीना समुद्र तट से दूर अपने नीर की ओर जा चुकी थी, बादलों का गर्जन अँधेरी रात के अँधेरे को और गहरा रहा था। एंडी रोज़-रोज़ ज़ीना के आँसुओं की वजह बन-बन कर थक गया था क्योंकि ज़ीना को खुश रखने के उसके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए थे। “मैं अब और तुम्हारी उदासी का कारण नहीं बन सकता ज़ीना” खुद से यह कहते हुए एंडी की आँखें भर आई थी... एंडी खुद नहीं समझ पा रहा था की अगले पल वो क्या करने वाला है... अचानक एंडी के पंखों ने जोर से फड़फड़ा कर उड़ान भर दी। मासूम चेहरा, निर्दोष आँखें, छोटे-छोटे कदम, सफ़ेद पंख और उन पंखों में लिपटी ज़ीना सबको अपनी आँखों में भर एंडी अपने घर को चल पड़ा। अभी यही कोई आधा सफ़र ही तय किया था की एंडी के पंखों ने जवाब दे दिया...वो अपनी पूरी ताक़त के साथ खुद के ही हारे हुए शरीर से लड़ाई लड़ रहा था... एंडी जानता था कि अगर बीच रास्ते में उसने अपनी उड़ान रोकी तो वो जिंदा नहीं बचेगा... मीलों तक फैला समुद्र क्रूर यम बन उसे अपने संग बहा ले जाने को आतुर नज़र आ रहा था। एंडी मरना नहीं चाहता था। “जोर लगाओ एंडी” उसने खुद से खुद को प्रोत्साहित किया। आज जिंदगी के सबसे कठिन वक्त में उसे प्रोत्साहित करने के लिए उसकी साथी पास नहीं थी। दूर तक पसरा अँधेरा एंडी की हिम्मत तोड़ रहा था। इन प्रतिकूल परिस्थितियों में जब एक-एक मीटर का सफ़र तय करना भी मुश्किल हो रहा था, एंडी की नज़रें बार-बार पीछे मुड़कर ज़ीना को ढूंढ रही थी। थकान एंडी पर हावी हो रही थी, फलतः उसकी उड़ान की ऊँचाई निरंतर कम होती जा रही थी ... इस घड़ी वह समुद्र से कुछ ही ऊँचाई पर उड़ रहा था। अचानक एंडी को लगा जैसे किसी ने उसके पंखों को जकड़ लिया है एंडी ने और जोर लगाया... पर वह असफल रहा। तभी समुद्र की एक उफान मारती लहर एंडी के शरीर से आकर टकराई... इस बार एंडी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया... उसे ऐसा लग रहा था मानो ज़ीना के समुद्र सी गहरी आँखों में वो डूबता जा रहा है। पल भर में एंडी के आँखों में भरे आँसू, समुद्र के खारे जल में विलीन हो गये।

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