फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में ग्रामीण समाज का यथार्थ

प्रकाश चंद बैरवा

प्रकाश चंद बैरवा

शोधार्थी: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
ईमेल- Prakash.n.4193@gmail.com

फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी कथा साहित्य के ऐसे अमर शिल्पी कथाकार हैं, जिन्होंने अपने कथा साहित्य में ग्रामीण समाज के यथार्थ को उद्घाटित किया। रेणु की कहानियाँ अपनी संरचना, स्वभाव या प्रकृति शिल्प और स्वाद में हिंदी कहानी की परंपरा में एक अलग और नयी पहचान लेकर उपस्थित होती हैं। अंततः एक नयी कथा-धारा का प्रारंभ इनसे होता है। ये कहानियाँ प्रेमचंद की जमीन पर होते हुए भी, जितनी प्रेमचंद की कहानियों से भिन्न हैं उतनी ही अपने समकालीन कथाकारों की कहानियों से। फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी कहानियों के द्वारा प्रेमचंद की विरासत को पहली बार एक नयी पहचान दी। प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में जिस ग्रामीण जीवन का परिचय दिया है उसे रेणु ने समग्रता प्रदान करते हुए विस्तृत फलक प्रदान किया है। इस संबंध में आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र अपने प्रसिद्ध निबंध प्रेमचंद की परंपरा और फणीश्वरनाथ रेणु में लिखते हैं- “रेणु हिंदी के उन कथाकारों में हैं, जिन्होंने आधुनिकतावादी फैशन की परवाह न करते हुए, कथा-साहित्य को एक लंबे अर्से के बाद प्रेमचंद की उस परंपरा से फिर जोड़ा जो बीच में मध्यवर्गीय नागरिक जीवन की केंद्रीयता के कारण भारत की आत्मा से कट गयी थी।” (भूमिका, फनीश्वरनाथ रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ)

रेणु ग्रामीण जनजीवन के यथार्थ के कथाकार है। रेणु की आत्मा गाँवों में बसती है। वास्तव में यह बात उनके संदर्भ में सच भी है, क्योंकि वे गाँव के हर एक पक्ष को चाहे वह गरीब किसान हो मजदूर हो या फिर कोई राजनीतिक भूमिका निभाने वाला पात्र अथवा जमींदार हो उसके हाव-भाव या उसके अन्दर की भावनाएँ कि वह दूसरे के प्रति क्या दृश्टिकोण रखता है, सबका पूर्ण रूप प्रस्तुत करते हुए ग्रामीण समाज के यथार्थ की ओर संकेत करते है। रेणु ने ग्रामीण समाज के कोने-कोने में झाँककर वहाँ के यथार्थोन्मुख दशा व दिशा को अपनी लेखनी के माध्यम से प्रकट करने का प्रयास किया है। इस संदर्भ में डॉ. सुवास कुमार का कथन हैं कि “रेणु की छाती में हर वक्त गाँव धड़कता था और उसकी धड़कन को उन्होंने अपनी रचनाओं में कागजों पर उतार दिया है।” (पृष्ठ-27 आँचलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु)

रेणु का कथा साहित्य स्वतंत्रता के पहले, व स्वतंत्रता के बाद दोनों ही स्थितियों में ग्रामीण समाज का यथार्थ प्रस्तुत करता है। अगर स्वतंत्रता के पहले देश की आजादी की छटपटाहट है तो स्वतंत्रता के बाद देश के प्रति मोह भंग की स्थिति भी उनके कथा साहित्य में मिलती है। डॉ. सुवास कुमार के शब्दों में “रेणु संपूर्ण स्वातंत्र्योत्तर ग्रामीण समाज (परिवेश) के सुख-दुःख, उल्लास और मोहभंग की महागाथा प्रस्तुत करते हैं” (पृष्ठ-17 आँचलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु) रेणु मनुष्य के राग-विराग और प्रेम को, दुख और करुणा को, हास उल्लास और पीड़ा को अपनी कहानियों में एक साथ लेकर चलते हैं। इसके अलावा रेणु ने अपने कथा साहित्य में मिथक, लोकविश्वास, अन्धविश्वास, किंवदंतियां और लोकगीत आदि को भी जगह दी हैं। ये सभी ग्रामीण जीवन की अंतरात्मा हैं। इन सबके बिना ग्रामीण जीवन का यथार्थ रूप दिखा पाना संभव ही नहीं है।

रेणु की कहानियों में ग्रामीण यथार्थ की झाँकी को देखा जा सकता है, वे ग्रामीण जीवन के ऐसे सजग कलाकार थे जिन्होंने उसमें निहित मानवीय संघर्ष उसकी वैचारगी को बहुत ही आत्मीय ढ़ग से देखने का प्रयास किया है, जिसका साक्ष्य हमें उनके कथा-साहित्य में देखने को मिलता है। वे गाँवों के दर्द, बेचैनी और संघर्ष के साक्षी रहे है। अतः रेणु की कहानियों में ग्रामीण समाज का यथार्थ हम इस रूप में देख सकते हैं-
‘रसप्रिया’ कहानी में रेणु ग्रामीण समाज से ओझल होती लोक संस्कृति की परंपरा का चित्रण करते है। वह कहानी में मिरदंगिया के माध्यम से चिंता व्यक्त करते हुए कहते है कि- “जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करने वाले भी अब गीत नहीं गाते हैं।... कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जायेगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है। पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था।...” (पृष्ठ-12, कहानी संग्रह: ठुमरी) इस प्रकार स्पष्ट हैं कि लोक संस्कृति की मिटती हुई परपंरा के साथ रेणु का समाजबोध कितना गहरा है। जिस ग्रामीण समाज में लोक संस्कृति का अपना एक अलग ही महत्त्व था। आज वह लोक संस्कृति एवं लोकगीत ग्रामीण समाज से धीरे-धीरे ओझल होते जा रहे है। साथ ही साथ रेणु कहानी में कोयल का कूकना और जेठ की दोपहरी के माध्यम से ग्रामीण परिवेश का चित्रण करते है।

‘तीर्थोदक’ एक ऐसी कहानी है जो ग्रामीण परिवेश में स्त्री जीवन के यथार्थ रूप को प्रकट करती है। कहानी में एक ग्रामीण स्त्री के तीर्थ जाने के प्रति उत्कृष्ट इच्छा को दबाया जा रहा है परन्तु फिर भी वह जाती है। जब बोध बाबू बजरंगी चौधरी की पत्नी को समझाते हैं तो वह उसका उत्तर देती हुई कहती है कि “राखिये अपना पुरूख वचन खूब सुन चुकी हूँ पुरूख वचन! चालीस साल से और किसका बचन सुन रही हूँ।” (पृष्ठ-28 कहानी संग्रह: ठुमरी) किन्तु ज्यों ही उसकी ट्रेन उसके स्टेशन से छूटने को होती है वह अपने गाँव की एक-एक वस्तु को निहारती है। रेणु ने इस कहानी के माध्यम से तीर्थ यात्रा की लालसा और दूसरी तरफ ग्रामीण समाज से कटती हुई दूरावस्था को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है और वह इस बात की तरफ भी इशारा करते है कि ग्रामीण समाज में आपसी रिश्ते कितने मजबूत होते है। इस संदर्भ में डॉ. सुवास कुमार का कथन है कि “रेणु का ग्राम प्रेम गाँव की मिट्टी की आत्मीयता से उपजा है, मिटटी की गंध से सराबोर है और इसीलिए कहीं भी वह तथाकथित आंचलिक रचनाकारों की भांति ओढ़ा हुआ नहीं है।” (पृष्ठ-99 आंचलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वर नाथ रेणु)

‘पंचलाइट’ कहानी में रेणु ग्रामीण समाज में निहित अज्ञानता पर सवाल उठाते है। जिस प्रकार किसी गाँव में पंचायत का अपना दल होता है उसी प्रकार इस कहानी में भी अनेक दलों का जिक्र किया गया है जैसे बामन टोली, राजपूत टोली इत्यादि। गाँव में अलग टोले बने हैं एक टोले में पंचलाइट आ जाने से दूसरे टोले के लोगों में भी पंचलाइट लाने की होड़ लग जाती है। क्योंकि यह अब उस टोले की इज्जत का सवाल है। एक दिन गाँव के लोग मेले से सार्वजानिक उपयोग के लिए पंचलाइट ले आते है, लेकिन तभी पता चलता है कि इसे जलाना तो किसी को नहीं आता। जब यह बात दूसरे टोले के लोगों को पता चलती है तो वे ऐसे में गाँव वालों के भोलेपन और पंचलाइट जलाना न आने की स्थिति पर हँसते हैं। तभी एक नौजवान ने आकर सूचना दी कि- “राजपूत टोली के लोग हँसते-हँसते पागल हो रहे हैं। कहते है, कान पकड़कर पंचलेट के सामने पाँच बार उठो बैठो, तुरन्त जलने लगेगा।” (पृष्ठ-79 कहानी संग्रह: ठुमरी) इस प्रकार कहानी में विभिन्न जाति और वर्गों में विभाजित गाँव का चित्रण बखूबी किया है। एक टोले का दूसरे टोले के प्रति बिलगाव, गाँव के टोले की पंचायत, आपसी राग-द्वेष आदि ग्रामीण समाज का यथार्थ रूप हमारे सामने लाते है। इस कहानी में प्रेम प्रसंग भी देखने को मिलता है जिसमें गाँव के एक युवक गोधन को मुनरी नामक लड़की से प्रेम है परन्तु ग्रामीण समाज में यह उचित नही समझा जाता जिस कारण ही पंचायत द्वारा ही गोधन का गाँव से बहिष्कार कर दिया जाता है। जब गाँव वालों से पंचलाइट नहीं जल पाती तब मुनरी अपनी सहेली के माध्यम से पंचों से कहलवाती है कि गोधन को पंचलाइट जलाना आता है। पंच लोग दूसरे गाँव से पंचलाइट जलाने के लिये किसी को बुलाने की बेइज्ज़ती से बचने के लिये अंततः गोधन को माफ कर देते हैं और उसका हुक्का-पानी बहाल कर दिया जाता है और गोधन के माध्यम से यह पंचलाइट जल जाती है।

‘सिरपंचमी का सगुन’ कहानी में रेणु ग्रामीण समाज में निहित व्यक्तियों का चित्रण करते है साथ ही वहाँ से जुड़ी लोक परंपराओं का भी चित्रण करते हैं। प्रस्तुत कहानी के माध्यम से रेणु ग्रामीण समाज के भविष्य के प्रति चिंता व्यक्त करते है। इस कहानी में रेणु ने एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति अथवा किसान की समस्या को रेखांकित करके यह दिखाया है कि कालू कमार जैसे व्यक्ति को गृहस्थी न दे पाने के कारण खेती से विमुखता की भयावाह स्थिति से गुजरना पड़ता है क्योंकि ग्रामीण समाज में बैल और खेती किसान के मरजाद की बात होती है ठीक यही स्थिति हम प्रेमचंद के गोदान में भी देखते है कि होरी जैसे किसान अपनी मरजाद के खातिर अपना खेत नहीं छोड़ना चाहता। कहानी में लोक परम्परा के रूप में हम देखते हैं कि- “लुहर सार से लौटकर बैलों को नहलाकर सींग में तेल लगाया जाता है। हल के हरेस पर चावल के आटे की सफेदी की जाती है, औरतें उस पर सिन्दूर से माँ लक्ष्मी के दानों पैरों की ऊँगलियां अंकित करती है। गाँव से बाहर परती जमीन पर गाँव भर के किसान अपने हल बैल और बाल बच्चों के साथ जमा होते हैं। नई खुरफी से सवा हाथ जमीन छीलकर केले के पत्ते पर अक्षत-दूध और केले का मोती प्रसाद चढ़ाया जाता है धूप-दीप देने के बाद हल में बैलों को जोतकर पूजा के स्थान से जुताई का श्रीगणेश किया जाता है।” (पृष्ठ-84, कहानी संग्रह: ठुमरी)

‘तीसरी कसम’ उर्फ ‘मारे गये गुलफाम’ रेणु की बहुचर्चित कहानी है। इस कहानी के माध्यम से रेणु ने ग्रामीण व शहरी समाज की आत्मीयता को जोड़ने का प्रयास किया है। कहानी के केन्द्रीय पात्र हिरामन और हिराबाई हैं। वस्तुतः यह कहानी गाड़ीवान हिरामन और नर्तकी हिराबाई की प्रेम कथा पर आधारित है। हिरामन अशिक्षित है किन्तु उसके आचरण और व्यवहार में हिराबाई के लिए सम्मान है। ये दोनों पात्र अलग-अलग परिवेश में जीवन व्यतीत करने वाले पात्र है किन्तु कुछ घंटों की यात्रा में दोनों के बीच प्रेम पनप जाता है। इस स्थिति में आ जाने के पश्चात् दोनों ‘स्वीकार की मनः स्थिति और अस्वीकार की नियति के द्वंद्व से गुजरते हैं।’ यहाँ लेखक ने ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े हिरामन जैसे पात्र की सृष्टि की है जो की अत्यंत साधारण होते हुए भी बहुत विशिष्ट बन जाता है। यात्रा के दौरान रेणु हिरामन और हिराबाई के बीच हुई बातचीत के माध्यम से एक नया परिवेश गढ़ते है। रेणु इस बातचीत के माध्यम से रास्ते में विघटित होने वाली सभी घटनाओं का भी वर्णन अपने पात्र से करवाते हैं जैसे- महुआ घटवारिन, फारबिंसगंज में मेला लगने का कारण इत्यादि। साथ ही साथ वे ग्रामीण अंचल का वर्णन भी यहाँ करते नजर आते है। हिरामन जब हिराबाई को अपनी बैलगाड़ी के जरिये फारबिसगंज ले जा रहा होता है तो रास्ते में पड़ने वाले खेतों की भव्य छटा को निहारते हुए कहता हैं- “नदी के किनारे धन-खेतो से फूले हुए धान के पौधों की पवनियां गन्ध आती है। पर्वपावन के दिन गाँव में ऐसी ही सुगन्ध फैली रहती है। उसकी गाड़ी में फिर चम्पा का फूल खिला। उस फूल में एक परी बैठी है जैसे भगवती।” (पृष्ठ-108, कहानी संग्रह: ठुमरी) हिरामन गीतों के माध्यम से भी गांवों की अंचल विशेष की खूबसूरती को प्रकट करता हैं-
        “जै मैया सरोसती, अरजी करत बानी
        हमारा पर होखू सहाय है मैया हमारा पर होखू सहाई।” (पृष्ठ- 131, दस प्रतिनिधि कहानियाँ)

‘लाल पान की बेगम’ कहानी में रेणु ने ग्रामीण समाज में आत्मीयता का चित्रण किया है। इस कहानी की मुख्य पात्र बिरजू की माँ है। वह अभाव में भी स्वाभिमान के साथ जीने की इच्छा रखती है। इस कहानी के माध्यम से रेणु ने ग्रामीण समाज में नाच देखने जैसी स्वाभाविक इच्छाओं को केन्द्रित किया है किन्तु बैलगाडी की व्यवस्था न हो पाने के कारण उसके प्रति खीझ भी व्यक्त करवाया है जिसको रेणु ग्रामीण समाज के सन्दर्भ में एक व्यंग्य की तरह उभारते है। जैसे मखनी फुआ की ये आवाज- “अरे विरज्जू की माँ नाच देखने नही जायेगी क्या।” (पृष्ठ-138, कहानी संग्रह: ठुमरी) दूसरी ओर कहानी में विरजू की माँ के प्रति ईर्ष्या भाव भी व्यक्त करवाया गया है। लेकिन इन सबको नजर अंदाज करते हुए बिरजू की माँ अपनी बैलगाड़ी में काफी जगह देखकर गाँव की अन्य औरतों को जैसे- जंगी की पतोहू, लरैन की बीवी इत्यादि को भी नाच देखने के लिए निमंत्रित करती है। इस प्रकार रेणु ने इस कहानी में ग्रामीण समाज के रिश्तों को बखूबी निभाया है। इस कहानी में बिरजू की माँ के द्वारा अन्य औरतों को बुलाकर गाड़ी के द्वारा मेला अथवा नाच दिखाना ग्रामीण समाज में एक आत्मीयता का रिश्ता कायम करता है।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि प्रेमचंद के बाद हिन्दी कथा-साहित्य में रेणु उन थोड़े से कथाकारों में अग्रणी है जिन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन का उसके संपूर्ण आन्तरिक यथार्थ के साथ चित्रित किया है। वस्तुतः ग्रामीण जन जीवन के संदर्भ में उनका कथा साहित्य अंकुठ मानवीयता, गहन रागात्मकता और अनोखी रसमयता से परिपूर्ण है। रेणु ऐसे रचनाकार है जिन्होंने अपनी कहानियों में सम्पूर्ण ग्रामीण समाज का यथार्थ रूप चित्रित किया है। अतः रेणु ने अपनी कहानियों में ग्रामीण समाज के हर पहलू को उजागर किया है जिसमें- ग्रामीण समाज में लोक संस्कृति एवं लोकगीतों का धीरे-धीरे ओझल होते जाना, ग्रामीण समाज के भविष्य के प्रति चिंता, ग्रामीण समाज में जीवित आत्मीयता, स्त्री जीवन, रिश्तों में एकता का भाव, आपसी द्वेष, प्रेम प्रसंग, लोक परम्परा का महत्त्व, अंचल विशेष का वर्णन आदि सभी को देखा जा सकता हैं। इस प्रकार रेणु अपनी कहानियों में ग्रामीण समाज में मनुष्य के राग-विराग और प्रेम को, दुख और करुणा को, हास उल्लास और पीड़ा को अपनी एक साथ लेकर चलते नजर आते हैं। इसलिए यह कहना गलत न होगा कि फणीश्वरनाथ रेणु ग्रामीण समाज के टूटते-बिखरते और जीवित मानवीय संबंधों के कथाकार है।

सहायक ग्रन्थ
1.   यायावर, भारत. 2004. फनीश्वरनाथ रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ. इंडिया: नेशनल बुक ट्रस्ट
2.   कुमार, डॉ. सुवास. 1992. आंचलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु. दिल्ली: साहित्य सहकर प्रकाशन. प्रथम संस्करण
3. रेणु, फणीश्वरनाथ. 2000. ठुमरी (कहानी संग्रह). दिल्ली: राजकमल प्रकाशन. प्रथम संस्करण
4.  रेणु, फनीश्वरनाथ. दस प्रतिनिधि कहानियाँ. दिल्ली: किताब घर प्रकाशन. प्रथम संस्करण

5. राय, विवेकी. 1974. स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा-साहित्य और ग्राम जीवन. इलाहबाद: लोकभारती प्रकाशन. प्रथम संस्करण

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।