निराला के छायावादी काव्य में समय से संघर्ष तथा स्वाधीनता की भावना

- इस्लाम बाबू

शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
चलभाष: +91 892 309 1212


हिंदी साहित्य आदिकाल से ही किसी न किसी काव्य-धारा को लेकर अपने मार्ग पर आगे बढ़ता रहा है। आदिकाल में वीरगाथात्मक प्रवृत्ति काव्य का मुख्य आधार रही। भक्ति काल में इसका स्थान ‘भक्ति’ ने ले लिया; तो रीति काल में भक्ति के स्थान पर रीति (लक्षण ग्रंथ परम्परा) की प्रवृत्ति प्रधान हो गयी। काव्य के इसी विकास-क्रम में आधुनिक काल में अनेक काव्य-धाराएँ उभरकर सामने आयीं। जिन्हें विद्वानों ने अपने-अपने मतानुसार परिभाषित किया। आधुनिक काल को भी भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छाया-प्रयोग-प्रगति आदि विभिन्न काल खंडों में विभाजित किया गया है। इस में छायावादी काव्य वस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट है। वस्तुतः आधुनिक युग की विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, दार्शनिक विचारधाराओं, धार्मिक मतों एवं स्वाधीनतावादी राष्ट्रीय आंदोलन के बीच सन् 1918 से 1936 ई॰ के मध्य ‘छायावाद’ जन्म हुआ। जिसे विद्वानों ने स्वच्छंदतावाद, रहस्यवाद, अभिव्यंजनावाद आदि विभिन्न नामों से अभिहित किया। प्रसाद, पंत, निराला एवं महादेवी वर्मा ‘छायावाद’ के चार स्तंभों के रूप में उभरकर सामने आए। जिन्होंने ‘छायावाद’ की नींव रखी तथा उसे एक प्रमुख काव्यांदोलन के रूप में स्थापित भी किया।

छायावाद के अर्थ, परिभाषा एवं नामांकरण को लेकर विद्वानों में एक लंबी बहस हुई। आचार्य शुक्ल ने छायावाद को रहस्यवाद तथा काव्य-शैली विशेष के अर्थ में परिभाषित किया, तो बच्चन सिंह ने इसे ‘स्वच्छंदतवाद’ के व्यापक अर्थ में रेखांकित किया। अतः छायावाद के नामांकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। इस संबंध में नामवर सिंह का मत निष्कर्षतः सही ही ठहरता है- "छायावाद नाम सबसे पुराना होने के साथ-साथ प्रसाद, निराला, पंत एवं महादेवी की कविताओं के लिए रूढ़ हो गया। ऐसी हालत में छायावाद का अर्थ चाहे जो भी हो, परंतु व्यवहारिक दृष्टि से प्रसाद, निराला, पंत एवं महादेवी की उन समस्त कविताओं का द्योतक है, जो 1918 से’36 ई॰ के बीच लिखी गईं।"¹ इस प्रकार ‘छायावाद’ की समय-सीमा दो-चार वर्ष इधर-उधर करके सन् 1916 से 1936 ई॰ के मध्य स्थिर की सकती है।

छायावाद के चार स्तंभों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने छायावादी काव्यांदोलन को सफलता की असीम ऊंचाइयों तक पहुँचाया तथा उसे प्रत्यक्षतः समाज से जोड़े रखा। इस युग में निराला ने एक तरफ ‘संध्या-सुंदरी’ ‘जूही की कली’ ‘नर्गिस’, ‘तुम और मैं’, ‘चुम्बन’, ‘शृंगारमयी’ जैसी प्राकृतिक सौंदर्य से ओत-प्रेत कविताएं रचीं तो दूसरी ओर ‘विधवा’ ‘भिक्षुक’, ‘दान’, ‘बादल-राग’ जैसी यथार्थपरक कविताओं का सृजन भी किया। छायावादी युग में उनके तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए 1.‘अनामिका’ (प्रथम 1923 ई॰) 2.’परिमल’ (1930 ई॰) तथा 3. ‘गीतिका’ (1936 ई॰)। इन संग्रहों में स्वाधीनता की भावना सर्वत्र विद्यमान है। इनके अलावा सन् 1938 ई॰ में प्रकाशित ‘तुलसीदास’ नामक कविता में भी छायावादी काव्यांदोलन का स्वर साफ सुनाई देता है। निराला अपने रचनाकाल के प्रारम्भ से ही प्रगतिशील रहे हैं। उनके काव्य में वस्तु एवं शिल्प दोनों ही स्तर पर प्रगतिशीलता का परिचय मिलता। ‘जूही की कली’ में परंपरवादी काव्य शिल्प को तोड़कर हिंदी कविता को स्वच्छंद भाव-भूमि प्रदान की। उन्होंने शिल्पगत नवीन प्रयोग तो किये ही, इसके साथ-साथ परम्परागत प्रबंधों का आधुनिक युग की परिस्थितियों में जीर्णोद्धार भी किया। वस्तुतः निराला का काव्य परंपरा एवं आधुनिकता बोध का अद्भुत समन्वय है। उसमें रूढ़िवादी परंपराओं से घिरे समाज को बदलने की प्रबल आकांक्षा है। समाज में व्याप्त शोषण, अत्याचार, जातिवाद आदि सामाजिक विद्रूपताओं के प्रति गहरा आक्रोश भी विद्यमान है।

छायावादी कवियों ने परतंत्र युग में आँखे खोली थीं। उस समय भारत में स्वाधीनतावादी आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर थे। वस्तुतः छायावाद का जन्म ही स्वाधीनता की चेतना से हुआ। ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलनों को कुचलने के लिए रोलेट ऐक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड, साइमन कमीशन, भगत सिंह को फाँसी जैसे वीभत्स कार्यों को अंजाम दिया। परिणामस्वरूप भारतीय जनता में अंग्रेज़ सरकार के प्रति आक्रोश और बढ़ता गया। समाज का प्रत्येक वर्ग आज़ादी के लिए बेचैन हो उठा। यह बेचैनी छायावादी काव्य में भी सर्वत्र देखी जा सकती है। छायावादी कवियों पर अपने वर्तमान से पलायन का आरोप भी लगाया जाता है जो कदापि उचित नहीं है। प्रसाद, पंत, निराला आदि ने भारतीय जनमानस में देश-प्रेम, राष्ट्रीयता, आत्म-गौरव, बलिदान एवं स्वाधीनता की भावना को जगाने का साहसी कार्य किया। इन कवियों में निराला के काव्य में स्वाधीनता का स्वर अद्योपरांत सर्वत्र देखा जा जकता है। निराला ने अपने वर्तमान से आँखे मूँदकर अतीत के स्वर्णिम आलोक में ऊर्ध्वगमन नहीं किया। उनके ऐतिहासिक तथा पौराणिक प्रबंध काव्यों का भाव-बोध भी तदयुगीन समाज की यथार्थपरक भूमि पर आधारित है। वस्तुतः निराला ने परंपरागत काव्य प्रबंधों का आधुनिक युग के आलोक में पुनरोद्धर किया। ‘राम की शक्ति पूजा’ एवं ‘तुलसीदास’ नामक लम्बी कविताओं में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की अद्भुत झलक है। शक्ति पूजा में राम-रावण का युद्ध प्रकारांतर में भारतीय जनमानस का ब्रिटिश सरकार के प्रति स्वाधीनता का युद्ध है। ‘तुलसीदास’ में तुलसी का आत्म संघर्ष मात्र तुलसी का आत्म संघर्ष न रहकर सामान्य मनुष्य का आत्म संघर्ष बन जाता है। इस प्रकार इनके काव्य में अपने वर्तमान को बदलने की प्रबल आकांक्षा भी विद्यमान है। बच्चन सिंह ‘क्रांतिकारी कवि निराला’ में लिखते हैं- "निराला की विचारधारा मूलतः क्रांतिकारी है। साहित्यिक, दार्शनिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक सभी क्षेत्रों में इनके विचार एक नवीन उन्मेष, नई उत्तेजना लेकर आते हैं। किसी भी स्थान पर उनके विचारों को देखकर उनकी क्रांतिकारिता का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। समाज की जर्जर व्यवस्थाओं, राजनीतिक गुटबंदियों, धार्मिक रूढ़ियों पर इन्होंने कड़े प्रहार किए हैं"² निराला न केवल साहित्यिक जीवन में, अपितु व्यक्तिगत जीवन में भी क्रांतिकारी रहे हैं। जिसके कारण उन्हें अपने ब्राह्मण समाज में अनेक उपेक्षाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। इसलिए रामविलास शर्मा ने उनके विषय में लिखा-
"यह कवि अपराजेय निराला,
जिसको मिला गरल का प्याला;
ढहा और तन टूट चुका है,
पर जिसका माथा ना झुका है;
शिथिल त्वचा, ढलढल है छाती,
और उठाये विजय पताका -
यह कवि है अपनी जनता का।"³

निराला ने काव्य में ही नहीं, समाज में भी अनेक क्रांतिकारी कार्य किए। समाज में व्याप्त जातिवाद, ब्राह्मणवाद, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार आदि सामाजिक बुराइयों की इन्होंने कटु आलोचना की। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य बराबर थे। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों के मिथ्या दंभ से निराश हो चुके थे। विवेकानंद की तरह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि अब शुद्ध और अंत्यज ही जाग्रत होकर देश को पुनर्जीवन प्रदान कर सकते हैं। पुनः उन्होंने कहा कि वर्ण का निर्धारण कर्म से होना चाहिए, जन्म से नहीं तथा वर्णों के चलते समाज में भेदभाव नहीं होना चाहिए। अतः निराला मूलतः साम्यवादी विचारधारा के कवि हैं। वे समाज में समानता स्थापित करना चाहते हैं। विभिन्न मानवतावादी, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्रगतिवादी विचारधाराओं ने निराला के काव्य को आधार प्रदान किया है। सन् 1924 ई॰ में ‘मतबाला’ पत्रिका में प्रकाशित ‘बादल राग’ कविता में बादल को क्रांति का प्रतीक मानकर लघु मानव के दु:ख को अपने काव्य की विषय-वस्तु बनाया। "छायावादी कवियों में निराला व्यक्तित्व सर्वाधिक क्रांतिकारी है, इसके परिणामस्वरूप वे क्रांति का स्वागत करने में भी संकोच नहीं करते। बल्कि वे उसका आह्वान करते है, उसे आमंत्रण देते हैं। वह ‘पूर्णमनोरथ’ है, उसे सूर्य भी शीश झुकाते हैं। वह निर्दयी है, पर उसकी तरी आकांक्षाओं से भरी है।"⁴ उन्होंने बादल के माध्यम से विप्लव कर आह्वान कर दीन-हीन शोषित जनता में क्रांति की भावना का संचार किया -
"जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझको बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर !
चूस लिया है उसका सार,
हा‌‌‌‌‌ड़-मात्र ही है आधार है,
ऐ जीवन के पारावार!"

मुख्यतः निराला के क्रांतिकारी काव्य की विषय-वस्तु सर्वहारा वर्ग के दलित, ग़रीब, मज़दूर, किसान रहे हैं। छायावादी युग में रचित ‘वह तोड़ती पत्थर’, ‘दीन’, ‘ग़रीबों की पुकार’, ‘भिक्षुक’, ‘दीन’, ‘विधवा’ आदि कविताएँ इसका ज्वलंत प्रमाण हैं। ‘जन्मभूमि’ ‘स्वाधीनता पर’[1,2], ‘बादल-राग’[4,5,6], ‘महाराज शिवाजी का पत्र’, ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘तुलसीदास’, ‘दिल्ली’ ‘जागो फिर एक बार’, ‘आवाहन’ आदि कविताएं भारतीय स्वाधीनतावादी आंदोलन से अनुप्रेरित हैं। निराला की भाँति अन्य छायावादी कवियों ने भी अपने काव्य के माध्यम से स्वाधीनतावादी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इनमें प्रसाद, पंत, रामकुमार वर्मा आदि ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम वृतांतों के माध्यम से संस्कृति की अभूतपूर्व झाँकी प्रस्तुत की तथा जनता में स्वाधीनता की भावना को जाग्रत किया। "इस तरह छायावाद ने प्रत्यक्ष रूप से भी समकालीन राष्ट्रीय आंदोलन को प्रतिबिम्बित और प्रभावित करने में महत्वपूर्ण कार्य किया। यह ज़रूर है कि सभी कवियों ने समान रूप से इस भाव की कविताएँ नहीं लिखीं, लेकिन यह सच है कि सभी कवियों ने राष्ट्रीय आंदोलन के किसी किसी पहलू को यथाशक्ति चित्रित करने की कोशिश की। इन सबमें निराला सबसे आगे रहे।"

निराला की कविता में प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के साथ तदयुगीन समाज, संस्कृति तथा स्वाधीनतावादी आंदोलन की झलक को भी साफ देखा जा सकता है। ‘राम की शक्ति पूजा’ ‘महाराज शिवाजी का पत्र’, ‘दिल्ली’ जैसी कविताओं में स्वाधीनतावादी आंदोलन की झलक साफ नजर आती है। निराला ने भारतीय जनमानस में आत्म गौरव, स्वाभिमान और स्वाधीनता की भावना का संचार किया। "स्वतंत्रता की ऊष्मा से अभिमण्डित निराला देशी-विदेशी दासता के विरुद्ध आज तक लड़ता रहा है। अतः छायावादी कल्पनाओं की रंगीनी के साथ निराला में स्वतंत्रता की भावना का नवोन्मेष ओत-प्रेत है। अदम्य साहस, अपराजित स्वाभिमान उनकी कविता कामनी को रणचंडी बनाने के लिए पर्याप्त है।"⁷ ‘दिल्ली’ कविता में इतिहास पर दृष्टि डालते हुए वह भारतीय जनमानस में आत्म गौरव, देश प्रेम एवं स्वाभिमान की भावना का संचार करते हैं -
"क्या यह वही देश है-
भीमार्जुन आदि का कीर्तिक्षेत्र,
चिरकुमार भीष्म की पताका ब्रह्मचर्य दीप्त
उड़ती है आज भी जहाँ वायुमंडल में
उज्जवल, अधीर और चिरनवीन?”

प्रत्येक कवि अपने समाज के वर्तमान, अतीत और भविष्य में ऊर्ध्वगमन करता है। निराला ने भी परम्परागत काव्य प्रबंधों की आधुनिक जीवन में पुनर्व्याख्या की है। ‘महाराज शिवाजी का पत्र’ ‘तुलसीदास’, ‘राम की शक्ति पूजा’ आदि कविताएँ इसका अद्भुत प्रमाण हैं। ‘तुलसीदास’ आधुनिक भारतीय समाज, संस्कृति, एवं परम्परा निर्वाह की अद्भुत गाथा है। इसमें अतीत की स्वर्णिम स्मृतियों में वर्तमान की छाया साफ नज़र आती है। इसमें कवि ने मध्यकालीन कथा प्रसंगों को आधुनिक संदर्भों में इस प्रकार फेंट दिया है कि तुलसीदास का अंतर्द्वंद मात्र तुलसीदास का न रहकर, आधुनिक मनुष्य का अंतर्द्वंद बन जाता है। कविता का आरम्भ भारतीय संस्कृति के ह्रास की ओर संकेत करता है। इसमें प्राचीन भारतीय संस्कृति की स्वर्णिम आभा को भारतीयों के आत्म-गौरव के रूप में दिखाया है। भारतीय संस्कृति के ह्रास से कवि का मन दु:खी हो उठता है। मुग़लक़ालीन वातावरण के माध्यम से कवि ने प्रकारांतर में आधुनिक युग की परिस्थितियों का चित्रण किया है। इसमें निराला ने मध्यकाल के जो दृश्य प्रस्तुत किये हैं। वे मध्यकाल से तो सम्बंधित है किंतु उन्हें आधुनिक संदर्भों में परिलक्षित किया सकता है; यथा-
"भारत के नभ का प्रवाहपूर्ण
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य,
अस्तमित आज रे-तमस्तूर्य दिङमण्डल;
उर के आसन पर शिरस्त्रान
शासन करते हैं मुसलमान,
उर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल।”

इसमें एक ओर मुग़ल-क़ालीन समाज का यथार्थ चित्रण है तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति का परंपरागत गुणगान है। मुग़ल शासन के माध्यम से प्रकारांतर में निराला ने अंग्रेजों के द्वारा भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों का सफलतापूर्वक चित्रण किया गया है। यहाँ मुग़ल शासन अंग्रेजों की दासता का प्रतीक है। तुलसीदास की सम्पूर्ण कथा के तीन आयाम हैं। प्रथम भारतीय संस्कृति के ह्रास का चित्रण, दूसरा चित्रकूट में तुलसी के मन का ऊर्ध्वगमन तथा तीसरा रत्नावली द्वारा तिरस्कृत होने पर ज्ञान की प्राप्ति। बच्चन सिंह लिखते है- "तुलसीदास का कथातन्तु अत्यंत क्षीण है। ‘सरोज स्मृति’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ में कथा-क्रम साफ़ परिलक्षित होते हैं। इसमें कथा-तत्व उस जनश्रुति पर आधारित है जिसमें विरहानुकूल तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली से मिलने उसके मायके जाते हैं और भर्त्सना पाकर विरक्त हो उठते हैं। ये भी प्रबंध के बीच थोड़ी दूर तक जाता है। प्रबन्ध को तीन-खण्डों में बांटा जा सकता है - सांस्कृतिक ह्रास, चित्रकूट प्रसंग और ज्ञानोदय।"¹⁰ वस्तुतः कथा के विस्तार के आभाव में चिंतन पक्ष को अधिक महत्व दिया गया है। तुलसीदास का अंतर्द्वंद्व मात्र तुलसी का अंतर्द्वंद्व न रहकर सम्पूर्ण समाज का अंतर्द्वंद्व बन जाता है। प्रकृति-चित्रण एवं परिस्थितियों का मनोवैज्ञानिक उद्घाटन कथा-प्रबन्ध को अवरुद्ध कर देता है। इसमें मानव मन में घटित होने वाली आकांक्षाओं को मनोविज्ञान के आलोक में चित्रित किया गया है। "तुलसीदास में निराला जी ने इतिहास पर नई दृष्टि डाली है। मध्यकाल में समाज का जो पतन हुआ, और पतन में शूद्रों पर जो अत्याचार हुए वह इस कथा की पृष्ठभूमि में हैं। मूल चित्र गोस्वामी तुलसीदास के अंतर्द्वंद्व का है।"¹¹ वस्तुतः तुलसीदास कविता स्वाधीनता की भावना से अनुप्रेरित है। इसमें चित्रित गोस्वामी का अंतर्द्वंद्व निराला का अपना ही अंतर्द्वंद्व हैं, जिसमें स्वाधीनता की छटपटाहट हिलोरें ले रही है। यहाँ मुग़ल शासन प्रकारांतर में अंग्रेज़ी सत्ता का प्रतीक है जो भारतीय समाज एवं संस्कृति को अपनी उपनिवेशवादी नीतियों में जकड़े हुए है।

‘जागो फिर एक बार’ कविता में निराला ने स्वाधीनता आंदोलन का शंख फूँका है। इसमें भारतवासियों को संबोधित करते हुए वह कहते हैं कि स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए अन्याय के विरुद्ध शेर की तरह अंग्रेजों का मुकाबला करो । बलि के लिए शेरनी का बच्चा कोई नहीं छीन पाता क्योंकि वह अत्याचार नहीं सहती, बल्कि वह अपने शत्रु पर आक्रमण करती है जबकि बकरे की माँ कायर होने के कारण अपने शिशु की रक्षा नहीं कर पाती। परिणामस्वररूप उसके बच्चे की बलि दे दी जाती है। अतः भारतवासियों को सिंह कि तरह अंग्रेजों का सामना करना चाहिए क्योंकि कायर और डरपोक लोग चुपचाप रहकर अत्याचार सहते हैं। अतः निराला ने परतंत्रता से मुक्ति के लिए देशवासियों में अंग्रेज़ों से शेर की तरह मुकाबला करने आह्वान किया है-
"सिंही की गोद से
छीनता रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अजान!
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष"¹²

इस प्रकार निराला ने वासियों में स्वाधीनता की भावना जगाते हुए उन्हें अज्ञान अकर्मण्यता और कायरता की नींद से जगाने का प्रयास किया है। निराला ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारतवासियों में स्वाधीनता की भावना का संचार करते हुए लिखते हैं-
"शेरों की मांद में
आया है आज स्यार-
जागो फिर एक बार"¹³

निराला स्वाधीन प्रवृत्ति के कवि थे। स्वाधीनता के विषय में उनके विचार किसी राजनीतिक पार्टी या गुट से संबंधित नहीं रखते बल्कि उनके विचार समाज से अनुप्रेरित हैं। "कांग्रेसी साम्यवाद और निराला की राजनीतिक चेतना में यह अंतर है कि निराला के लिए स्वाधीनता आंदोलन अभिन्न रूप से सामाजिक क्रांति से जुड़ा है।"¹⁴ डॉ रामविलास शर्मा ने निराला की प्रथम कविता जन्मभूमि बताते हैं। जिसमें देश प्रेम एवं आत्म गौरव की भावना साफ झलकती है। ‘जन्मभूमि’ कविता की निम्न पंक्तियाँ मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम प्रकट करती हैं साथ ही भारतीय जनमानस में स्वाधीनता की भावना, देश-प्रेम तथा आत्म गौरव का संचार भी करती हैं-
"बंदूँ मैं अमल-कमल,-
चिरसेवित चरण युगल-
शोभामय शांतिनिलय पाप ताप हारी,
मुफ्त बंध घनानंद मुदमंगलकारी।।
वधिर विश्व चकित भीत सुन भैरव वाणी।
जन्मभूमि है मेरी जगन्महारानी।।"¹⁵

इस प्रकार निराला के काव्य में स्वाधीनता प्रेम के साथ मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा देखने को मिलती है। वह स्वाधीनता के सच्चे साधक थे। वे तत्कालीन राजनीतिक, सांस्कृतिक, एवं राष्ट्रीय विचारधाराओं से परिचित एवं प्रभावित थे। उनकी कविता में प्रारम्भ से राष्ट्रीय स्वाधीनता का स्वर दिखायी देता है। वह केवल उल्लास- विलाष के ही कवि नहीं हैं, माना; उनके काव्य में समाज के यथार्थ चित्र भी विद्यमान है। ‘राग-विराग’ काव्य की भूमिका में डाक्टर रामविलास शर्मा लिखते हैं- "निराला उल्लास-विषाद के ही कवि नहीं, संघर्ष और क्रांति के भी कवि हैं, इस क्रांति का लक्ष्य है, स्वाधीन शोषण मुक्त समाज। भारत में तरह-तरह के क्रांतिकारी कार्य हुए हैं, किंतु भारत में क्रांति नहीं हुई। अंग्रेज़ी क़ानून के मातहत विभाजित राष्ट्र को आज़ादी मिली। प्रेमचंद और निराला का ऐतिहासिक महत्व यह है कि इन्होंने समझा स्वाधीनता आंदोलन की धुरी है- किसान क्रांति।”¹⁶ इसी प्रकार ‘महाराज शिवाजी का पत्र’ कविता मिर्ज़ा जयसिंह को लिखा गये शिवाजी के फ़ारसी पत्र का अनुवाद एवं परिवर्ध्दन है। इसमें निराला ने साम्प्रदायिक प्रकरण को संशोधित कर, हिंदू-मुस्लिम एकता को समाहित करके; उसे अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के विरोध के संदर्भ में रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है; यथा- "एक ओर हिंदू एक ओर मुसलमान हों/ व्यक्ति का खिंचाव यदि जातिगत हो जाए/ देखो परिणाम फिर/ स्थिर न रहेंगे पैर यवनों के/ पस्त होगा हौसला/ ध्वस्त होगा साम्राज्य/ जितने विचार आज/ मारते तरंगे हैं/ साम्राज्यवादियों की भोग-वासनाओं में/ नष्ट होंगे चिरकाल के लिए/ आएगी भाल पर/ भारत की गयी ज्योति/ हिंदुस्तान मुक्त होगा घोर अपमान से/ दासता के पाश कट जाएंगे/"¹⁷ इस प्रकार निराला ने अपने काव्य में अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद का प्रत्यक्ष रूप से विरोध किया। वे अंग्रेज़ों की शोषणकारी नीतियों से भली-भाँति परिचित थे। वस्तुतः उनके काव्य में अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति का स्वर सर्वत्र देखा जा सकता है।

इस प्रकार उक्त विवेचन के आलोक में हम कह सकते हैं कि छायावाद मुक्ति की चेतना का काव्य है। आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने उसके मूल में प्रथम विश्वयुद्ध की प्रेरणा मानी है, जिसके फलस्वरूप भारत में उपनिवेश विरोधी भावना का प्रसार हुआ। ऐसी परिस्थिति में छायावादी कविता का स्वाधीनता आंदोलन से अंतरंग संबंध होना निश्चय ही स्वाभाविक है। स्वाधीनता के लिए देश-प्रेम का होना ज़रूरी है और यह प्रवृत्ति निराला में शुरू से ही विद्यमान थी। इसका प्रमाण उनकी सन् 1920 ई॰ में रचित ‘जन्मभूमि’ कविता है। यह उनकी प्रथम देशभक्ति पूर्ण कविता थी। इसके बाद वह लगातार देश-प्रेम एवं स्वाधीनता प्रेम से सम्बंधित कविताएं लिखते रहे। वे आर्थिक राजनीतिक तथा सामाजिक स्वतंत्रता के साथ मानसिक स्वतंत्रता को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। ‘बाहरी स्वाधीनता और स्त्रियाँ’ नामक निबंध में उन्होंने स्त्रियों की स्वाधीनता को समाज के लिए महत्वपूर्ण माना है। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि निराला ने स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने सभ्य समाज के लिए राष्ट्रीय स्वाधीनता के समांतर व्यक्तिगत तथा सामाजिक स्वाधीनता पर भी विशेष बल दिया।

संदर्भ ग्रंथ सूची-
1. सिंह, नामवर, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, 19वाँ संस्करण, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ-16
2. सिंह, बच्चन, क्रांतिकारी कवि निराला, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 5वाँ संस्करण, 2003, पृष्ठ- 165।
3. नवल, नंदकिशोर (संपा॰), निराला रचनावली, भाग-1, राजकमल प्रकाशन, 5वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ- कवर पेज।
4. सिंह, बच्चन, क्रांतिकारी कवि निराला, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 5वाँ संस्करण, 2003, पृष्ठ- 42।
5. वही,पृष्ठ-136।
6. सिंह, नामवर, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 19वाँ संस्करण, 2015, पृष्ठ-81।
7. उपाध्याय, विश्वम्भरनाथ, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, द्वितीय संस्करण,1965, पृष्ठ-67।
8. नवल, नंदकिशोर (संपा॰), निराला रचनावली, भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 5वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ- 99।
9. वही, पृष्ठ- 281।
10. सिंह, बच्चन, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृष्ठ-374।
11. शर्मा, रामविलास, निराला, शिवपाल अग्रवाल एंड कम्पनी प्रकाशन, आगरा, तृतीय संस्करण, 1962, पृष्ठ-100।
12. नवल, नंदकिशोर(संपा॰), निराला रचनावली, भाग-1, राजकमल प्रकाशन, 5वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ- 153
13. वही, पृष्ठ-153।
14. शर्मा, रामविलास,निराला की साहित्य साधना भाग-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 9वाँ संस्करण, 2016, पृष्ठ-153।
15. नवल, नंदकिशोर(संपा॰), निराला रचनावली, भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 5वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ-39।
16. शर्मा, रामविलास, राग-विराग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सप्तम संस्करण, 1981, पृष्ठ- 21।
17. नवल, नंदकिशोर(संपा॰), निराला रचनावली, भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 5वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ-169।

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