काव्य: सुमित कुमार झा (रूमित)

शोधार्थी, विश्वभारती शान्तिनिकेतन, हिन्दी विभाग। 
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लिखना! 
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कोरे कागज़ पर
लिख कर सन्नाटा
मैंने सन्नाटे के साम्राज्य को
एक रूप में खत्म करना चाहा
यकीन मानिए साम्राज्य की नींव
जरा ही सही मुझे हिलती
नजर आई
घुप्प अंधकार
इसकी अगुवाई कर रहा था
इसे रोकने के प्रयास से मैंने
सन्नाटे के ठीक बगल में
लिख डाला अंधकार
यकीन मानिए
अंधकार अब क्षीण होने लगा था
कागज़ातों पर जब भी
समस्याओं का चित्र उकेरा गया है
समस्याओं का समापन होने लगा है
जरूरी है कागजों पर लिखना
लड़ने के लिए
प्रकाश के लिए
परिवर्तन के
शोर के लिए।

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शब्दकोश
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हर शब्द सिमटा है इस कोश में
लोग ढूंढ रहे हैं चंद शब्द
शब्द बड़े साधारण हैं
लेकिन अर्थ समझ नहीं आ रहा
अर्थ समझ लेना आवश्यक है
अर्थ समझ लेने से संतुष्टि मिलती है
अर्थ समाधान करते हैं समस्याओं का? 
इन शब्दों से जूझता मनुष्य ये सोचता है

रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार

ये चंद शब्द हैं जिनके अर्थ
ढूंढने में असफल हो रहा हूँ
शब्दकोश से उब कर
मैंने सहारा लिया उनका
जो बन चुके हैं दार्शनिक
इन्हीं अर्थों की तलाश में
ये चंद शब्द
हमें जीवन के सही अर्थ समझाते हैं
खाक से उठाकर
मंचों पर बिठाते हैं
मैंने मंच से भी पूछा
लेकिन दर्शन के सिवा
कुछ भी न पाया
लगता है
ये शब्द दर्शन है
दर्शन है जीवन का
दर्शन है यथार्थ का
दर्शन है मानव मात्र का
इनकी तलाश आपको
दार्शनिक बना सकता है
हों कहीं भी आप
मंच दिला सकता है।

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स्पर्श
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स्पर्श बहुत कुछ कह जाता है
स्पर्श हाथों का हो
या हो ऩजरों का
हवाओं का हो या फिजाओं के
बहुत कुछ कह जाता है
जैसे कह जाती है
माँ की चोटिल मुस्कान
जैसे कह जाती है 
पिता के ललाट पर
दिखने वाली वक्र लकीर

स्पर्श बहुत कुछ कह जाता है
जब छूता है कोई अन्तरतम को
बिना किसी झुंझलाहट के
जैसे नापता हो कोई व्यापारी
कोई वस्तु
अपने बनाये मापदण्डों पर

ये शहर अपने मापदण्डों पर चलता है
छूता है हमें अपने मापदण्डों पर
तौलता है अपने मापदण्डों पर
और दिखाता है
आईना
जिंदगी का

शहर
तय करता है नियति
त्याग कर नीति
केवल इसलिए
कि नहीं कहता कोई कुछ भी
कि सब गुमशुदा हैं अपने जीवन में
हमारी तुम्हारी तरह।

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गोली 
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बंदूक की गोली बोली
सन्नाटा टूटा
पेड़ों में सरसराहट हुई
फूलों ने सिर हिलाया
हवाओं से
बारूद की महक आ रही थी
चिड़ियों की आवाज में
भयानक खनक आ रही थी
कुत्ते खामोश खड़े थे
गीदड़ शोर मचा रहे थे 
चूहे बिल में जा छिपे थे
मकड़ी के जाल में फँसा
कीट बेसबब तड़प रहा था
खिड़कियों के शीशे
दरारों से रेखांकित हो गए
दिवारों पर रक्ताभ छींटे पड़े
दरवाजे की कुंडी काँप उठी
गोली की बोली
सुनकर फिजाओं ने
करवट ली थी
कुहासा बढ़ रहा था
संपूर्ण दृश्य आँखों से
जबरन ओझल हो रहा था
रात काफी हो रही थी
चमकता सूरज सो रहा था
समय नियमरत चल रहा था
पेट भर सारे जानवर
अपने अपने घरों में
जग रहे थे
सब सभी से
सुबह होगी
यही कह रहे थे।

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फिर मिलूंगा!
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फिर मिलूंगा!
तुम्हारे गर्भ में
महसूस करोगी मुझे
जब जब तुम्हारे रस से
मैं सींचा जाऊंगा
चुपचाप रहूँगा
जैसे चुपचाप एक बीज
छिपा रहता है मिट्टी में
एक विराट उद्देश्य लिए
संसार की दिठी से दूर

फिर मिलूंगा!
एक नन्हीं किलकारी बनकर
तुम्हारी गोद में
अंकुरित हो रहा होगा
मेरा विराट उद्देश्य
और
संस्कृत हो रहा हूँगा
संसार की दिठी से दूर

फिर मिलूंगा!
चलकर घुटनों के बल
चल रहा होगा
समय अपनी गति में
युगों युगों की तरह
और
घुटनों के बल
चल रहा होगा मेरा उद्देश्य

फिर मिलूंगा!
कदमों पर खड़ा होकर
भावनाओं की धरा पर
अबकी उद्देश्य
पा रहा होगा यौवन
विरोधों की आंधी
चलनी शुरू हो जाएगी
हर बार की तरह
झंझावतों की मार से
घायल हो रहे होंगे
मेरे उद्देश्य
जैसे घायल होती है
कोई चिड़िया
जबरन हो रही मार से

फिर मिलूंगा!
जबरदस्त अनुभव के साथ
कुछ कुछ जो सबकी तरह होगी
आवाज थोड़ी गंभीर हो जाएगी
जैसे गंभीर होता है समंदर
अपनी अनंतता में
मेरे उद्देश्य अब गंभीर हो चुके होंगे
कुछ करीब हो चुके होंगे
मेरे मुख पर एक मलिनता होगी
आप सब की तरह
और मुस्कुरा रहा हूँगा मैं
आप सब की तरह

फिर मिलूंगा!
एक भीड़ के बीचोंबीच
लेटा हूँगा चिता पर
उन सबकी तरह
मेरे उद्देश्य इंतजार कर रहे होंगे
भीषण अग्नि में जलने को
जैसे जलता है हर मनुष्य
अपनी अंतिम अवस्था में
लेकिन
खुली होगी मेरी आँखें
देख रही होगी उद्देश्यों के
जलने की पारंपरिक प्रक्रिया को निर्निमेष

फिर मिलूंगा!
याद रखना अपने उन्हीं उद्देश्यों के साथ
फिर किसी
गर्भ की अतल गहराई में।

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पता : सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल, 734003। india
चलभाष: +91 980 068 8441
(हस्ताक्षर वेब पत्रिका,जनकृति पत्रिका, वागर्थ, साहित्य उदय के काव्य संग्रह एवं अन्य  प्रतिष्ठित ऑनलाइन-ऑफलाइन पत्रिकाओं में  प्रकाशित।)

1 comment :

  1. अच्छी कविताएँ बधाई के पात्र हैं-कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती अतिरेक योगाचार्य

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