नेहरू की किताब और आइन्स्टीन

मेहेर वान

- मेहेर वान

सन 1949 का समय था, भारत को आज़ाद हुए दूसरा साल हो रहा था। भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू वैश्विक स्तर पर देश की पहचान स्थापित करने और वैश्विक संबंधों की नींव डालने समृद्ध देशों की यात्राएँ कर रहे थे। इन्हीं यात्राओं में वे अप्रवासी भारतीयों से भी मिलते और समर्थ लोगों से भारत के निर्माण का भागीदार होने हेतु आग्रह करते। नया देश अपना आकार ले रहा था। संविधान से लेकर आम नियमों के निर्माण के साथ-साथ देश के सार्वभौमिक विकास के सपने लोगों की आँखों में थे। इसी बीच जवाहर लाल नेहरू ने भारत पर एक नयी किताब लिखी थी, जिसका नाम था, “डिस्कवरी ऑफ़ इन्डिया”। सन 1949 की अमेरिकी यात्रा के दौरान नेहरू की मुलाक़ात प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन से हुयी थी और इसी मुलाकात के दौरान नेहरू ने अपनी पुस्तक “डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया” की एक प्रति भेंट स्वरूप अलबर्ट आइन्स्टीन को दी थी। अलबर्ट आइन्स्टीन ने यह पुस्तक न सिर्फ बहुत ही रोचक ढंग से पढ़ी, बल्कि उन्होंने नेहरू को एक पत्र लिखकर इसके बारे में अपने विचारों से अवगत कराया।

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प्रिंसटन, न्यू जर्सी, अमेरिका
18 फरवरी, 1950

प्रिय श्री नेहरू,

मैंने आपकी अद्भुत पुस्तक “भारत एक खोज” को अत्यंत रुचि लेकर पढ़ा। एक पश्चिमी व्यक्ति के लिए इसका पहला भाग पढ़ पाना थोड़ा कठिन है। लेकिन, यह आपके महान देश की भव्य बौद्धिक और आध्यात्मिक परम्पराओं के बारे में समझदारी बनाता है। पुस्तक के द्वितीय भाग में, त्रासदिक प्रभावों और अंग्रेजों द्वारा बलपूर्वक थोपे गए आर्थिक, नैतिक और बौद्धिक विघटनों , तथा भारतीय लोगों के शातिर तरीकों से किये गए शोषण के, आपके द्वारा किये गये विश्लेषण से मैं गहरा प्रभावित हुआ हूँ। अहिंसा और असहयोग के ज़रिये मुक्ति के लिए गांधी और आपके कार्यों के लिए मेरी प्रशंसा अब उससे और अधिक बढ़ गयी है जितनी कि यह इस पुस्तक को पढने से पहले थी। बाहरी अत्याचारों के दबाव के बावजूद वस्तुनिष्ठ समझदारी के संरक्षण में आतंरिक संघर्ष और आंतरिक रूप से अपमान, क्रोध और घृणा के शिकार हो जाने के विरुद्ध संघर्ष - विश्व के इतिहास में बहुत ही अद्वितीय होना चाहिए। अपनी सराहनायोग्य-पुस्तक मुझे देने में लिए मैं आपका गहराई से आभारी महसूस करता हूँ।

आपके महत्वपूर्ण और लाभकारी कार्य के लिए मेरी सर्वोत्कृष्ट शुभकामनाओं और सादर अभिवादन सहित,

सहृदय आपका,
अलबर्ट आइन्स्टीन

कृपया, अपनी बेटी को मेरी याद दिलाइयेगा।

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(From the Letter printed on the back-cover of Discovery of India (Oxford edition, 1981).
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