मालवी कहानी: पिजा का टुकड़ा

- राजेश भंडारी “बाबु"

104 महावीर नगर, इंदौर;  चलभाष: +91 900 950 2734


रोज की तरे 'गोबर वाली माँ' सबेरे छे बजे आई गी और आखा कोठा को गोबर निकाली के साफ़-सुफ करी के कंडा थापी-थुपी के हाथ मुंडो धोई के म्हारा सामने उब्बी थी। हम इनके बचपन से गोबर वाली माँ ज बोलता  आया। हमारा या सबके एसेज बुलावे या तो उनका पियर का गाव का नाम से जेसे कनाडिया वाली माँ, हिन्गोंया वाली माँ या फिर उनका काम का हिसाब से। इ गोबर निकालने को काम करता था तो शुरू से इनके गोबर वाली माँ का नाम से ज बोलता आया। उम्र अबे हुई गी साठ का आसपास पर अभी भी माँ साब कड़क हे गोबर को टोपलो एकलाज माथा पे रखी ले नीतो आज काल की छोरी होन के तो एक जनो टोपलो माथा पे चडाने वालो चिये पर इ माँ साब आज भी खुद टोपलो चड़ाई के बाड़ा में ली जावे।

तो काम निपटाई के वि म्हारा सामने खडी थी। बोली :बीर हु छोरी का घरे जाई री हु थोड़ा पैसा दी दो जल्दी से। अरे माय अभी तो महिना का दिया था हु बोल्यो। अरे  वि तो सब ख़त्म हुई गया। पापा दी दो नि 500 रुपया माय के भीतर से अपनी रस्मी बेटी आती हुई  बोली। ऐसो करो आज तम म्ह्के इंदौर ली जय के पिजा खावाड़ने वाला था नि हु अबे उ प्रोग्राम केंसल करू उका पैसा अपनी माय के दी दा। म्हने सोच्यो चलो सब की इच्छा हे तो दी दा 500 रुपया बिचारी कितरो मेंन्नत को काम करे अपना घरे। एसो सोची के म्हने 500 रुपया माय के दी दिया।

बाबु भिया हु आई गी ; तिन दन बाद ज माय की सबेरे से आवाज आई गी। वाह माय अबे काम निपटाई लो ने फिर आई के सुना जो बेटी घर का हाल चाल। होऊ बाबू भिया करी के माय काम में लगी गी। काम निपटाई के माय आई गी बोली लो भिया अबे लाड़ी बहु के बोलो चाय पिवाड़ी दे पड़ता पानी में आली हुई गी ने ठण्ड बाजी री हे। म्हने कयो ठीक माय। अबे यो तो बतावो तमने 500 रुपया किके-किके दिया। माय बोली कई नि छोरी वास्ते 120 की साड़ी, 40 रुपया की पाव भर कलाकंद, जमाई के 21 रुपया नारियल, नाती सारु टी शरट 80 रुपया को, छोटी वास्ते फराक 70 की और 80 रुपया आवा जावा में खर्च हुई गया फिर आते टेम छोरा छोरी जिद करवा लगया के कलर पेन्सिल को डब्बो नि हे उनका कने तो आते आते 70 रुपया को डब्बो कलर पेन्सिल को भी देवाडी दियो हो। माय को मुह जवानी गणित और उपयोग सुनी के हु तो दंग री रियो। अबे म्हारी आख का सामने उ पिज्जा बार बार आवा लगियो जो 20 मिनिट में 6 टुकड़ा चिठी ब्रेड का जीपे अद्कचिरो डाली के गरम गरम खाने में जिबान को उपर को भाग जली जावे। हर टुकड़ा पे एक का बाद एक चीज दिखी री थी एक पे साड़ी, एक पे कलाकंद, एक पे नारियल, एक पे टी शर्ट, एक पे कलर पेन्सिल को डब्बो। 500 रुपया की कीमत बार बार म्हारे समज में आई री थी। एक एक पिजा का टुकड़ा से कई कई हुई सके यो ऊनि माय ने सम्जाई दियो।

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