संत ब्रह्मानन्द सरस्वती और उनका जीवन दर्शन

डॉ. मुकेश कुमार

ग्राम हथलाना, पो. मंजूरा, जिला करनाल। (हरियाणा)
चलभाष: +91 989 600 4680

जब सूर्य का उदय होता है तो अन्धकार का विनाश निश्चित ही होता है। कस्तूरी अपनी सुगन्ध वातावरण में फैलाकर सारे पर्यावरण को सुगन्धित बना देती है। उसी प्रकार विश्व कल्याण के लिए व अज्ञान के
अन्धकार को समाप्त करने के लिए इस पवित्र धरा पर भगवान किसी न किसी महापुरुषों, सन्तों के रूप में अवतार लेता है। क्योंकि जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि का स्वरूप मनुष्यों पर नास्तिक, पापी, दुराचारी और बलवान मनुष्यों का अत्याचार बढ़ जाना तथा लोगों में सद्गुण-सदाचारों की अत्यधिक कमी और दुर्गुण-दुराचारों की अत्यधिक वृद्धि हो जाना। तभी किसी न किसी अवतार रूप की आवश्यकता पड़ती है। तब भगवान किसी अवतार रूप में जन्म लेता है। इसी प्रकार से गीता में भी बताया गया है-
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि र्भवति भारत।
अभ्युत्थान धर्मस्य तदात्माने सृजाम्यहम्।।"1

अर्थात् (भारत)-हे भारत वंशी अर्जुन, (यदा,-यदा धर्मस्य (जब जब धर्म की), (ग्लानिः)-हानि और (अधर्मस्य)-अधर्म की, (अभ्युत्थानम्)-वृद्धि, (भवति)-होती है, (तदा)-तब-तब, (हि)-ही, (अहम्)-मैं, (आत्मानम्)-अपने-आपको (सृजामि), साकार रूप से प्रकट करता हूँ। तो इसी प्रकार की पुण्य आत्मा जो दयायुक्त हृदय वाली, यज्ञमय जीवन धारण करने वाली, श्रेष्ठ योगी व जिसके हृदय में पशु, पक्षी, वृक्ष, पर्वत, मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, मुनि आदि सबका हित भरा रहता हो वो योगी आत्मा है एवं शिरोमणि, जगद्गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती जी। आपका जन्म 24 दिसम्बर सन् 1908 पौष शुक्ल प्रतिपदा को हरियाणा में जिला कैथल के ग्राम चूहड़माजरा में किसान परिवार (क्षत्रिय रोड़ वंश) में हुआ। आपके पिता चैधरी बदामाराम व माता श्रीमती रामी देवी धार्मिक सरल स्वभाव वाले व ईश्वर के पूजारी थे। आप एक योगी तपस्वी, जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया हो, जिसका शरीर अपने वश में हो, जिसको गर्मी-सर्दी, दुःख, सुख समान भाव से दिखाई देते हो आप ऐसे योग महापुरुष है। तभी आप जगद्गुरु कहलाए।
"योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।"2

अर्थात्-(जितेन्द्रियः)-जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, (विशुद्धात्मा)-जिसका अन्तःकरण निर्मल है, (विजितात्मा)-जिसका शरीर अपने वश में है और (सर्वभूतात्मभूतात्मा)-सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा (योगयुक्तः)-कर्मयोगी, (कुर्वन्)-कर्म करते हुए (अपि)-भी, (न लिप्यते)-लिप्त नहीं होता।

संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी का जीवन दर्शन ब्रह्म, जीव और जगत् आदि पर विचारणीय है। ब्रह्म अकेला ही इस नाम स्वरूपात्मक जगत् का शासक है। सकल विश्व का व्यापार उसी आज्ञा से चल रहा है। एक अच्छे न्यायाधीश की तरह वह निष्पक्ष भाव से जीवों को कर्मानुसार फल देने वाला है, वह सच्चिादानंद स्वरूप है सब दुनिया को एक समान समझता है।
"सच्चिदानंद स्वरूप! सब दुनिया का एक है भूप।
न्यायकारी है न्यायकत्र्ता! तेरे न्यायालय से सब जग डरता।।"3

आत्मा अजर है, अमर है, अविनाशी है। अर्थात् कहा गया है कि शरीर का नाश होने पर भी इस अविनाशी शरीर का नाश नहीं होता। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने ‘पचासा’ में लिखा है-
"अजर अमर अविनाशी, काटो जन्न मरण की फांसी।
तेरे लिए है बात जरा सी। सब जीवों की कटे चैरासी।।"4

ओउम् ही सब परा-अपरा भगवान की प्रकृति का मूल है। शब्द ब्रह्म की दृष्टि से देखा जाए तो संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने निर्गुण एवं सगुण सृष्टि का मूल ‘ओंकार’ शब्द से दर्शाया गया है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ‘ओम्’ को सर्वोपरि मानकर साधना करने का निर्देश दिया है। विवेचन की दृष्टि से देखा जाए ‘ऊँ’ शब्द निर्गुण ब्रह्म का वाचक है। गुरु जी की द्वितीय दृष्टि से इसका सार तीनों लोकों में दर्शाया गया। अल्पज्ञ व जनसामान्य व्यक्ति ‘ओंकार’ की महिमा को समझकर सम्यक एवं योग मार्ग जीवन जी सके। ‘अ’ से भूः लोक, ‘उ’ से भुवः लोक और ‘म्’ से सब लोक का प्रतिपादन किया है अर्थात् ओंकार एक ऐसा शब्द है जो तीनों लोकों में विद्यमान है। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने तीनों वेदों में ‘ओंकार’ की महिमा दर्शायी है। चतुर्थवेद, अर्थर्वेद में चन्द्र एवं बिन्दु की महिमा का वर्णन किया है। यदि हम संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की त्रिगुणात्मक शक्ति को, जिसमें ‘अ’ को ब्रह्म ‘उ’ को विष्णु और ‘म’ को शंकर मान कर ‘चन्द्र’ को माया और ‘बिन्दु’ को आदि शक्ति ब्रह्म को ओंकार में दर्शाया गया है। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को ‘ओम्’ से प्रकट मान कर बिन्दु एवं अनुस्वार को चतुर्थ वर्ण दर्शाया गया है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, गिरस्ती, सत् रज और तम इनका वर्णन कर बिन्दु को अलग दर्शाया गया है। ओउम के प्रथम वर्णन से सृष्टि का विकास बताया ‘उ’ के अन्दर क्रिया ‘म’ के अन्दर ठहराव दर्शाया। इस प्रकार ‘ओंकार से ही पंचमहाभूत सृष्टि का प्रादुर्भाव दर्शाया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी का जीवन निर्गुण साधकों की श्रेणी में रहा है। समस्त जीवन वेदों, उपनिषदों, दर्शनों गीता एवं पुराणों पर आधारित रहा है। सनातन धर्म का मूल ओंकार को मानकर सत् के लिए कर्म करने की प्रेरणा दी है।
"‘ओउम्’ सर्व संसार का है सब कारण मूल।
शब्द सर्व संसार के, धातु मूल समूल।।
‘अ’ से भूः ‘उ’ से भुवः ‘म’ से स्वः जान।
ऋण् ‘अ’ में ‘उ’ में यजुर ‘म’ में साम।।"5

संत ब्रह्मानंद जी ने इस एकमात्र सत्य ब्रह्म रूप की अनुभूति
साधना द्वारा कर उसे निर्गुण रूप से निरूपित किया है तथा भावना के क्षेत्र में उसकी आधिदैविक सत्ता को स्वीकार कर उस पर गुणों का आरोपकर, उसे सगुण रूप में प्रतिष्ठित किया है। माया विशिष्ट ब्रह्म ही अपर अथवा सबल अथवा सगुण ब्रह्म है तथा उसका निर्विशेष, निर्विकार स्वरूप ही निराकार है-
"सबल ब्रह्म पार ब्रह्म है, दो रूप अपार।
सबल ब्रह्म साकार है, पारब्रह्म निराकार।।"6

संत का मानना है कि निर्गुण-सगुण एक ही है। सगुण की व्यावहारिक सत्ता निर्गुण का ही रूपान्तर है। सन्तों ने अपनी-अपनी भावना-बुद्धि द्वारा उसके दिव्य और विराट स्वरूप की कल्पना की है। उस निर्गुण-सगुण पारब्रह्म स्वरूप का परमात्मा की साधना एवं उपासना द्वारा प्रत्यक्ष होने वाला बताया है-
"सबल ब्रह्म प्रत्यक्ष है, क्रिया नाड़ी सार।
पारब्रह्म उगति दूर है योगी योगाधार।।"7

कोई भगवान इस पारब्रह्म की सगुण रूप में कल्पना करता है, कोई समस्त सृष्टि का सृजनकर्ता व पालनकर्ता होने के कारण उसे सर्वव्यापक शक्ति के रूप में सम्पूर्ण जड़ चेतन को व्यापक मानता है। सर्वशक्तिमान, सर्वगुणसम्पन्न, पुरुषोत्तम राम इन सबसे परे व सर्वश्रेष्ठ है।
"एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में लेटा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा।।"8

आत्मा क्या है, जीव कैसा है, उसका स्वरूप कैसा है? आदि प्रश्नों का अनन्तकाल से मानव की जिज्ञासा रहे हैं। वास्तव में सर्वथा शुद्ध परमेश्वर का अंश, जन्म, मरण से रहित, विज्ञान स्वरूप, नित्य व अविनाशी यह जीवात्मा स्थूल व कारण-तीन प्रकार के शरीरों से तादात्म्य होकर-
"स्थूल-सूक्ष्म, कारण शरीर तो यह तीन है।
इनसे न्यारी आत्मा जाने तो प्रवीण है।।"9

जगत् का मूल कारण कौन है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? इसी प्रकार से स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने जीव-ब्रह्म-प्रकृति-इन तीनों को परमात्मा और प्रकृति-दो विभाजित माना है। जीव अस्तित्ववान होने के साथ-साथ चेतनायुक्त भी है। सत् चित्त, आनंद स्वरूप ब्रह्म ही सर्वोपरि है-
"तीन पदार्थ अनादि जान। जीव ब्रह्म-प्रकृति मान।
जीव ब्रह्म प्रकृति, इन तीनों का दो में बंटवारा।
प्रकृति जड़-चेतन ब्रह्म सर्वज्ञ, अल्पज्ञ है जीव विचारा।।"10

प्रकृति परिवर्तनशील है। समय-समय पर बदलाव होता है, जीवात्मा भी इन दोनों से मुक्त नहीं है। अतः वह अलाज्ञ, अल्पशक्ति और एकदेशीय है तथा वह अपनी शक्ति से भी कुछ नहीं कर सकता, परन्तु ब्रह्म इन दोनों से परे अपने महान रूप में प्रतिष्ठित रहता है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी एवं समस्त प्रपंच से पृथक है।
"प्रकृति है परिवर्तनशील। सर्वदेशी ब्रह्म, एकदेशी जीव।
अनन्त की महिमा अनन्त ही जाने, अनन्त के अनन्त गावे।"11

उस परमपिता परमेश्वर की आज्ञा से ही समस्त प्रकृति जगत् का प्रसार करती है। अतः ब्रह्म सृष्टि को अपने में से उत्पन्न ही नहीं करता, प्रयुक्त वह सृष्टि, ब्रह्म का ही प्रतिबिंब बन कर व्यवस्त होती है।
"आज्ञा ऐसा शब्द है, जिसके अन्दर सब।
इससे कुछ न्यारा है, जिससे बतावें रब।।"12

इस व्यक्त जगत् के विभिन्न रूपों को देखकर इसके अव्यक्त कारण को जानने के प्रयास में शास्त्रों ने अव्यक्त से व्यक्त की सृष्टि को अश्वत्थ वृक्ष के समान माना है। संसार ब्रह्म के रूपक को स्वामी जी ने इस प्रकार
प्रस्तुत किया-
"उल्टा वृक्ष है दुनिया सारी, पाल डाल फल फूल।
जड़ ऊपर तना समझ ले, कभी न लागे भूल।।
मन को अपने टिकाना चाहिए, कर वैराग्य अभ्यास।।
ब्रह्मानंद पूर्ण ब्रह्म का हो सर्वत्र प्रकाश।।"13

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की वाणी में ब्रह्म, जीव, माया, प्रकृति आदि दार्शनिकता की झलक दिखाई देती है। उनकी वाणी आज के इस आपाधापी, भौतिकवादी युग में प्रेरणादायक है।

संदर्भ

1. श्री मद्भगवदगीता (साधक संजीवनी)
2. वही
3. संत ब्रह्मानंद सरस्वती पचासा, पृष्ठ 3
4. वही, पृष्ठ 26-30
5. वही, पृष्ठ 52
6. वही, पृष्ठ 33
7. वही, पृष्ठ 33
8. ब्रह्म-विचार, पृष्ठ 13
9. वही, पृष्ठ 38
10. वही, पृष्ठ 40
11. वही, पृष्ठ 40
12. वही, पृष्ठ 41
13. वही, पृष्ठ 42

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