पुस्तक समीक्षा: कौन तार से बीनी चदरिया

अंजना वर्मा

अंजना वर्मा की कहानियाँ


अंजना वर्मा की मुख्य पहचान एक कवयित्री के रूप में है। ‘चौराहा’ पत्रिका की सम्पादक के रूप में भी उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनायी है। उनकी सर्जनात्मकता अभिव्यक्ति की नयी राहों का अनुसंधान करती रही है। वे एक ऐसी रचनाकार रही हैं जो अपनी कविताओं में विधागत वैविध्य के साथ उपस्थित होती रही हैं। उन्होंने कविताओं के साथ गीत, दोहा, लोरी तथा बालगीत भी लिखे हैं।

अंजना वर्मा की जीवन सजग दृष्टि जब अपने परिवेश से साक्षात्कार करती हुई उसके प्रति प्रतिक्रियात्मक होती है तो कहानी का रूप लेती है। लम्बे समय से उनकी कहानियाँ प्रतिष्ठित प़त्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं जिनका संग्रह इसी वर्ष ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें उनकी तेरह कहानियाँ संकलित हैं जो अपने परिवेश की विविध छायाओं का कोलाज बनाती हुई अपने समय का एक सार्थक परिदृश्य बुनने में समर्थ होती हैं। ये कहानियाँ लेखिका के समृद्ध अनुभव जगत से परिचित कराती हैं जो उनकी अनुभूतियों के स्पर्श से दीप्त हैं और इसप्रकार अपनी कहानियों में वे अपने समय की बहुमुखी पहचान दर्ज करने में सफल हुई हैं।

संग्रह की कहानियों के बारे में कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ बिल्कुल आज की हैं - आज की इन अर्थों में कि इसमें नयी सदी के बदलते संदर्भो को पकड़ने का प्रयास किया गया है। नयी सदी अपने साथ संभावनाओं के असंख्य द्वार लेकर आयी, यही कारण है कि आज का जीवन किसी एक कूल से बंधा हुआ नहीं है। यह तेज गति से भागता समय है जहाँ जीवन अनेक आयामों में विभाजित है। यह तकनीक की सदी है जिसने जीवन को गति और नवीन दिशा दी। पर तकनीक अंततः यंत्र है और यांत्रिकता की अपनी विडम्बनाएँ भी हैं। यांत्रिकता ने मनुष्य की संवेदना को आच्छादित कर लिया। अंजना वर्मा की कहानियों में कई सदियों की एक समय में उपस्थिति देखी जा सकती है। एक तरफ तेज भागता और यांत्रिक होता जीवन है, और दूसरी तरफ इतिहास के किसी बिंदु पर ठहरा हुआ जीवन जिनके लिए विकास के कोई मायने नहीं हैं। इस चमकीले समय का एक अंधेरा कोना भी है जहाँ आहें भरती, संवेदना को तरसती अतृप्त जिंदगी है। इन्हीं सबके बीच अंजना वर्मा की कहानियाँ आकार लेती हैं। उनकी कहानियों में नयी सदी का यही समय है - दौड़ता-भागता और पस्त होता। इस अंधी दौड़ में बहुत कुछ ऐसा है जो नर्म मुलायम घास की तरह हमारे पांवो के नीचे कुचला जा रहा है। ये कहानियाँ बताती हैं कि इस दौड़ में कितना कुछ कोमल, संवेदनापूर्ण और मूल्यवान है जो हमसे छूटा जा रहा है। यह दौड़ विकास के एक ऐसे माॅडल के लक्ष्य की ओर है जो हमारी संवेदना पर आच्छादित होकर जीवन को हाॅर्स रेस में परिणत कर दे रहा है। ‘हॉर्स रेस’ उनकी एक ऐसी कहानी है जिसमें कारपोरेट जगत के अपने में संवेदन को लील जाने वाले फैलते साये हैं। ‘नंदन पार्क’ कहानी इस सवाल को चुपचाप हमारे सामने रखती है कि विकास किसके लिए? सत्ता और पूंजी का गठबंधन किस प्रकार आम लोगों के हिस्से की धूप, हवा और हरियाली को छीन रहा है - इसे इस कहानी में देखा जा सकता है। इसी तरह कि एक कहानी है ‘पेड़ का तबादला’। इसमें अपनी जमीन में फूटता, पल्लवित होता एक अनाम पेड़ है जिसे एक खास सरकारी योजना के तहत उखाड़कर किसी सड़क के किनारे रोप दिया जाता है जहाँ वह अपनी धरती, अपनी माटी, पशु-पक्षियों और प्रकृति का साथ छोड़ कंक्रीट, गाड़ियों और संवेदनहीन मनुष्यों के बीच जीवन बिताने को विवश होता है। कहना न होगा कि कहानी का संदर्भ काफी दूर तक जाता है। प्रकृति से दूर निस्पंद जीवन की ओर विस्थापित करने वाला यह कैसा सौन्दर्यीकरण है?

‘सोयी झील में पत्थर’ स्त्री अस्मिता का कहानी है। यहाँ ठुकरायी गयी स्त्री अस्मिता है जो किसी पुरुष की जरूरत बनने से इनकार कर देती है। एक दिन जिसने उसके बजूद को ठुकराया था, वही वर्षों बाद निराधार हो जाने के बाद उसे पुनः अपनी जिन्दगी में आवाज देने आता है। नायिका समझ जाती है कि यह आवाज दिल की तहों से नहीं, जीवन की जरूरतों से निकली है। वह अपने अकेलेपन को स्वीकार करती है पर स्वयं के वस्तु बनने से इंकार कर देती है। ‘जगमगाती रात’ एक व्यक्तिपरक कहानी है जिसमें अपार ऐश्वर्य के बीच अकेलेपन की त्रासदी को झेलती एक स्त्री की नियति है। धन, सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य और सुविधाओं के बीच भी संवेदना के अभाव में जीवन अतृप्त रह सकता है। एक पुरुष के दोहरे व्यक्तित्व को यह कहानी उजागर करती है। ‘अनारकली’ कहानी निम्नवर्गीय स्त्री के जीवनसंघर्ष को व्यक्त करती है। ‘यहाँ वहाँ हर कहीं’ में वृद्ध जीवन के अकेलेपन को लेखिका ने मार्मिकता से उभारा है।

‘नीला शून्य’ एक अलग तरह की कहानी हैं। यह अपने शिल्प की प्रतीकात्मकता मे ध्यान आकृष्ट करती है। चांद की अंध लालसा हमें एक ऐसे कुएँ की गर्त में ले जाती है जहाँ चारों ओर फैला नीला शून्य व्यक्ति के अस्तित्व तक को निगल जाता है। नीले शून्य की इस नियति का जिम्मेदार व्यक्ति खुद है और अपने ही प्रयास से इससे बाहर निकला जा सकता है।

जीवन का बहाव आगे की ओर प्रवाहित रहता है। इसमें बहते हुए कभी अतीत का कोई पत्थर टकरा जाता है और स्मृतियों के जाने कितने ही तार झंकृत हो उठते हैं। अंजना वर्मा की कुछ कहानियाँ इसी प्रकार की हैं। ‘रेलवे क्रांसिग’ ऐसी ही एक हल्की-फुल्की कहानी है। इस कहानी की नायिका वर्षों बाद पुरानी गुमटी से गुजरती हुई विगत के किसी पल में अटक जाती है जब उसकी प्यारी राजस्थानी जूती की जोड़ी में से एक वहाँ छूट गयी थी। उस छूटी चीज से स्मृतियों के कितने ही मधुर पल जीवंत हो उठते हैं।

स्पष्ट है कि इन कहानियों में अपने समय के कुछ अलग-अलग प्रतिबिम्ब उभरते हैं। इन बिंबों के पीछे कोई वैचारिक आग्रह या पूर्वाग्रह नहीं है। यह संवेदना की वह नम भूमि है जिसमें लेखिका इन कहानियों को रोपती हैं। ये कहानियाँ किसी गंतव्य की ओर नहीं जातीं। ये ठहरी हुई कहानियाँ हैं जिनमें से मोती स्वयं ढूंढने हैं।

इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है ‘कौन तार से बीनी चदरिया’। कबीर की पंक्तियों के द्वारा गूढ़ार्थ को भेदती हुई यह कहानी एक ऐसे वर्ग के दर्द को रूपाचित करती हैं जिन्हें मानव-योनि में जन्म लेने के बाद भी मनुष्य होने का हक नहीं मिलता। जीवन से बहिष्कृत और समाज से तिरस्कृत ये लोगों की उपेक्षा और हंसी को झेलते एक तरह से भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करने को विवश होते हैं। भिक्षा मांगना इनका चुनाव नहीं, मजबूरी होती है क्योंकि समाज ने इनके लिए कोई और विकल्प छोड़ा ही नहीं है। इनके हिस्से न कोई रिश्ता आता है न किसी की संवेदना - घर परिवार, नाते-रिश्ते और आत्मीय-स्वजन, यहाँ तक कि माता-पिता से दूर एक सजायाफ्ता का जीवन जीना इनकी विवशता होती है। और सजा भी वैसी जिसमें इनका कोई अपराध ही नहीं, बल्कि एक ऐसी सजा जिसमें अपराध जैसा कुछ है ही नहीं।

यह कहानी किन्नर समुदाय की सुंदरी नामक एक पात्र की है। लोगों के घरों में नाच-गाकर और ट्रेन में गाना गाकर भीख में मिले पैसे से अपना जीवन गुजारने वाली सुंदरी का भी एक अतीत है जिसकी याद उसे समय-असमय विह्वल कर जाती है। अपने जिस अतीत से वह वंचित कर दी गयी, उसे वह अपना भाग्य समझकर संतोष कर लेती है। उसे दंड भोगना है अपनी देह का - "हमारा ई शरीर कोनो काम का है क्या ? चइला जैसा देह! चढ़ जायेगा अगिन पर" और इस देह का हासिल - "मेरे भाग्य में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसकै मिली!" अनकहे सवालों के बीच तड़पती सुंदरी और वर्षों बाद भी अपनी संतान के लिए व्याकुल छाती पिटती माँ के साथ यह कहानी एक गहरी टीस छोड़ जाती है। स्वीकार करना होगा कि कहानी के तार बड़े जतन से बुने हुए है। संवादों के बीच कथा के सूत्र बिखरे हुए हैं जिसे सधी हुई भाषा में पिरोकर कथा की चादर बुनी गयी है। सुंदरी की माँ अपनी इस संतान को लोगों की नजरों से बचाकर रखती थी। पर एक दिन असावधानीवश दरवाजा खुला रह गया और किन्नरें उसे उठा ले गयीं। जीवन में तीन बार सुंदरी अपनी माँ और बहन से मिल पाती है - वह भी छुपकर। उसकी जन्मदात्री जीवन के अंतिम पड़ाव तक अपनी इस संतान के लिए छाती पिटती रह जाती है, यहाँ तक कि स्वयं उसकी तिरस्कृत संतान, सुंदरी को ही उसे दिलासा देना पड़ता है।

प्रत्येक कथाकार की और प्रत्येक कहानी की अपनी एक निर्दिष्ट भावभूमि होती है। कुछ कहानियाँ मनोलोक में विचरण करती हैं, कुछ यथार्थ की तंग और वीभत्स गलियों में। कुछ कहानियाँ तरल भाव के रूप में आती है, कुछ विश्लेषण के रूप में, कुछ रेखाचित्रों की भांति चुपचाप कुछ रेखाएँ खींच जाती है और कुछ सवाल के रूप में आती हैं। अंजना वर्मा अपनी कहानियों में एक कुशल चित्रकत्री के रूप में आती हैं। उनकी कहानियाँ अपने समय का सजग चित्र उकेरती हैं - विश्लेषण और सवाल वे पाठकों के हिस्से छोड़ जाती हैं।


समीक्षक: सुनीता गुप्ता 
हिन्दी साहित्य के आलोचना-संसार में सुनीता गुप्ता एक जाना-माना नाम हैं। तीन आलोचना-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । इनकी किताब 'हिन्दी साहित्य में स्त्री-स्वर' की काफी चर्चा हुई।

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