आलेख: परस्पर सम्मान

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

भारत ऋषियों-मनीषियों का देश रहा है। आर्ष संस्कृति ने हमें सद्भाव और सम्मान के साथ जीना सिखलाया है। यहाँ के संस्कारों में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अथिति देवो भव के साथ-साथ वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव सन्निहित है। यही कारण है कि प्राचीन भारत विश्वगुरु के नाम से जाना जाता था तथा मानवता का संदेश इसी धरा-धाम से प्रसारित हुआ था। यह वही पावन धरती है, जहाँ से आध्यात्मिकता का ज्ञान विश्व में फैला तथा मानव को मानव बनने के लिए संस्कारित किया। भारतीय संस्कृति में आज भी ये तत्व विपुल मात्र में मौजूद है। वर्तमान युग वैश्वीकरण का है। इसमें भौतिक विकास तो काफी हुआ है, लेकिन सांस्कृतिक, मानवीय एवं आध्यात्मिक गुणों का ह्रास हुआ है। यह वैश्वीकरण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भावना से भिन्न है जो अवसरवादी सिद्धांतों पर अवलम्बित है। आज का तथाकथित मानवतावाद भी विभेदकारी विचारों का पोषण करता है। अतः आवश्यकता है कि पुनः ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भावों को जगाया जाय ताकि परस्पर सम्मान एवं सौहार्द में वृद्धि हो सके तथा मानवतावाद का विशुद्ध संदेश विश्व भर में फैलाया जा सके।

आधुनिक समय में पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति का बोलबाला है। इस सभ्यता-संस्कृति ने उपभोगतावादी प्रवृति को बढ़ावा दिया है। आधुनिक सुख-सुविधाओं में तो काफ़ी वृद्धि हुई, लेकिन मानवीय गुणों का ह्रास हुआ है। पारिवारिक एवं सामाजिक विघटन को बढ़ावा मिला है। एकल परिवार की अवधारणा बलवती हुई है। घर में ही माता-पिता एवं वृद्धजन तिरस्कृत हो गये हैं। व्यक्ति आत्मकेद्रित हो चुका है। वह सिर्फ स्व के लिए जीता है, पर उपकार की भावना उसमें से तिरोहित हो चुका है। यही कारण है कि आज की तारीख़ में परिवार व समाज में परस्पर सम्मान की भावना एवं आपसी समन्वय तथा सद्भाव का सर्वथा अभाव-सा दिखता है जो घोर चिन्ता का विषय है। हम सभी जानते हैं कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र एवं राष्ट्र से विश्व का निर्माण होता है। ऐसे में यदि परिवार व समाज में आपसी समन्वय एवं सम्मान का अभाव होगा तो निश्चित ही राष्ट्र एवं विश्व भी प्रभावित होगें। ऐसी हालात में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर कुठाराघात होगा तथा विश्व अशांति के भवंर जाल में फँस जायेगा। वर्तमान समय में भौतिकवादी प्रवृति के साथ-साथ राजनीति जो सत्ता का नियामक केन्द्र है,  ने भी सौहार्द व समन्वय की भावना को क्षतिग्रस्त किया है। क्षुद्र स्वार्थों के खातिर स्त्री-पुरुष,  अगड़ा-पिछड़ा,  हिन्दू-मुस्लिम,  ऊँच-नीच आदि की भावना को भड़काकर पूरे सामाजिक ताने-बाने को असंतुलित कर दिया गया है।     

विश्वस्तर पर भी समृद्ध व शक्तिशाली देशों द्वारा अविकसित एवं विकासशील देशों के हकमारी करने से शोषित राष्ट्रों में असंतोष की भावना पैदा हुई है। एक देश द्वारा दूसरे देश के सीमा का सम्मान नहीं करने से तनाव पैदा हुआ है। कुछ देशों द्वारा आतंकवाद का पोषण करने तथा उसका इस्तेमाल दूसरे देशों में अशांति फ़ैलाने में किये जानें से विश्व-शान्ति ही खतरे में पड़ गया है। अतः समय आ गया है कि बीमारी का ईलाज समय रहते कर दिया जाय ताकि विश्व में अमन-चैन का माहौल कायम रह सके। ऐसा करने से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा को अमल में लाया जा सकता है तथा परस्पर सम्मान एवं सौहार्द का वातावरण आच्छादित किया जा सकता है।

व्यक्ति का प्रथम पाठशाला परिवार होता है। यदि परिवार को ही मानवीय गुणों से ओतप्रोत करने का प्रयास किया जाय तो निश्चित ही व्यक्ति में आपसी प्रेम एवं सद्भाव का संचार होगा तथा वे एक-दूसरे का आदर करेगें। चुकी व्यक्ति ही समाज एवं राष्ट्र का निर्माता होता है,  वैसे में सुसंस्कृत व्यक्ति से समाज एवं राष्ट्र का कायाकल्प हो जायेगा तथा प्रेम व आदर की गंगा चहुँओर बहने लगेगी। आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के साथ-साथ मूल्यपरक शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी करना होगा। जहाँ आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा भौतिक सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी करता है,  वहीं मूल्यपरक शिक्षा नैतिकता का पाठ पढाकर वास्तविक जीवन जीने का ढ़ंग सिखलाता है। अधिकार के साथ-साथ कर्तव्यबोध व उतरदायित्व के ज्ञान को भी जीवन में आत्मसात करना होगा। समाज में प्रेम एवं भाईचारा को बढ़ाना होगा। चंद स्वार्थों के खातिर नफ़रत के आग में जलने एवं जलाने से परहेज करना होगा। महिलाओं के साथ-साथ समाज में अभिवंचित-शोषित-वृद्ध-विकलांगो को उचित सम्मान देना होगा। आपसी कटुता की भावना को तिलांजलि देकर जीवन में प्रेम का संचार करना होगा और ऐसा तभी होगा,  जब व्यक्ति में प्रारम्भिक काल से ही बीज रूप में संस्कारों का अभिरोपन होगा।

विश्व में परस्पर शान्ति एवं सौहार्द के लिए एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र का सम्मान करना होगा। संयुक्त राष्ट्रसंघ के कायदे-कानून को पक्षपात रहित होकर अमल में लाना होगा। मानवाधिकार जैसे मानवीय हक़ को सकारात्मकता के साथ अपनाना होगा। आतंकवाद, भुखमरी एवं गरीबी से मिलजुल कर सामना करना होगा। यदि ऐसा होगा तभी एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के प्रति सम्मान व आदर का भाव रखेगें तथा वैश्वीकरण की अवधारणा वास्तविक अर्थों में सफलीभूत होकर मार्ग प्रशस्तक होगा।

अन्त में कहा जा सकता है कि परस्पर सम्मान की भावना में ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना सन्निहित है। यदि विश्व में शान्ति एवं सौहार्द की स्थापना करनी है तो सर्वप्रथम व्यक्ति को आपसी प्रेम व स्नेह के साथ-साथ एक-दूसरे का सम्मान एवं आदर करना सीखना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि माता-पिता,  गुरुजनों एवं अतिथियों के साथ-साथ सभी प्राणिमात्र के साथ स्नेह व सम्मान का भाव रखा जाय। भारत को पुनः एकबार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के प्रसार के लिए अग्रसर होना होगा तथा विश्व का नेतृत्व करते हुए परस्पर सम्मान की भावना को आधार प्रदान करना होगा।

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