चर्चा: नाम को यूँ बदनाम मत करो

- अज़ीज़ राय


"नाम में क्या रखा है, गर गुलाब को हम किसी और नाम से भी पुकारें तो वो ऐसी ही खूबसूरत महक देगा" लगभग सवा चार सौ वर्ष पहले का विलियम शेक्सपियर का यह उद्धरण एक धारणा सम्बन्धी प्रश्न है कि क्या सत्य हम जीवों की चेतना से स्वतंत्र है? सरल शब्दों में कहूँ तो क्या फूलों की सुन्दरता या महक मनुष्य के अस्तित्व के बिना अर्थहीन है?

मेल्विल आर्थर फाइनमेन (Melville Arthur Feynman) ने अपने बेटे रिचर्ड फिलिप्स फाईनमेन को बचपन से ही वैज्ञानिक बनने के लिए प्रशिक्षित किया था। परन्तु उन्होंने अपने बेटे से एक वैज्ञानिक बनने के लिए कभी नहीं कहा था। हालाँकि उन्होंने अपनी पत्नी से रिचर्ड फिलिप्स के जन्म के पहले ही बेटे होने पर उसके वैज्ञानिक बनने की भविष्यवाणी कर दी थी। आखिरकार आगे चलकर रिचर्ड फिलिप्स नोबल पुरस्कार सम्मानित वैज्ञानिक बने। वे अपनी आत्मकथा 'व्हाट डू यू केयर व्हाट अदर पीपल थिंक' में अपने बचपन के प्रशिक्षण को याद करते हुए लिखते हैं कि मुझे सिखाया गया है कि किसी चिड़िया को लोग किस-किस नाम से पुकारते हैं यह मायने नहीं रखता है। बल्कि उस चिड़िया के बारे में यह अवलोकन करना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि चिड़िया आखिर अपने पंखों में चोंच क्यों मारती है? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति, वस्तु या स्थान विशेष को हम किस नाम से पुकारते हैं, सत्य के लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। वैज्ञानिक-सत्य के लिए विशिष्ट से सामान्य और व्यक्तिनिष्ठ से वस्तुनिष्ठ की ओर प्रवृत्त होना महत्त्वपूर्ण होता है। इसलिए किसी भी घटना के घटित होने का कारण या प्रक्रिया का ज्ञान सामान्यीकरण से प्राप्त वस्तुनिष्ठ होता है।

महान दार्शनिक सुकरात के अनुसार “ज्ञान प्राप्ति की ओर पहला कदम परिभाषा है।” परिभाषाओं में हम पहले से परिभाषित विषय-वस्तु, घटना या प्रक्रिया के लिए एक नया शब्द नहीं गढ़ते हैं और न ही नयी विषय-वस्तु, घटना या प्रक्रिया के लिए पहले से प्रयुक्त परिभाषित शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसलिए हम किसी अस्तित्व, घटना या कार्य को परिभाषित करते समय विशेष रूप से यह ध्यान में रखते हैं कि अनजाने में ही सही कोई अन्य अस्तित्व, घटना या कार्य परिभाषित नहीं होना चाहिए। और परिभाषा में न ही उस शब्द का प्रयोग करना चाहिए जिसे हमारे द्वारा परिभाषित किया जा रहा है।

प्लाज़्मा (पदार्थ/द्रव्य की विशिष्ट अवस्था) शब्द का भौतिकी में पहली बार प्रयोग करते समय वैज्ञानिक खोजों के नामकरण के बारे में भौतिकशास्त्री अरविंग लैंगम्यूर (Irving Langmuir) और उनकी टीम की तात्कालिक समझ यह कहती है कि “खोज का श्रेय उस व्यक्ति को नहीं जाता है जो इसे बनाता या प्रतिपादित करता है, बल्कि उस व्यक्ति को जाता है जो इसे नाम देता है।” चूँकि एक वैज्ञानिक खोज व्यक्ति, वस्तु या स्थान विशेष के बजाय सामान्यीकरण द्वारा प्राप्त अप्रत्याशित वस्तुनिष्ठ सत्य के बारे में होती है। तो गुणों और विशेषताओं के आधार पर नामकरण करने में कठिनाई आना स्वाभाविक है। यही कठिनाई ज्ञात ज्ञान और अब तक अज्ञात रही वैज्ञानिक खोजों में भिन्नता दर्शाती है। इसी भिन्नता को न पहचानने की वजह से रसायनज्ञ जोसेफ प्रिस्टले ने ऑक्सीजन की अपनी ही खोज को अनदेखा कर दिया था। इसलिए नामकरण करने वाले को वैज्ञानिक खोज का श्रेय दिया जाना चाहिए। परन्तु महा-विस्फोट सिद्धांत की खोज के लिए खगोलशास्त्री फ्रेड हॉयल ने यह दावा कभी नहीं किया कि वह उनकी खोज है। बल्कि महा-विस्फोट सिद्धांत का यह नामकरण उन्होंने आलोचनावश दिया था। जिसे बाद में भौतिकशास्त्री एलन हार्वे गुथ की व्याख्या अनुसार स्फीति (Inflation) सिद्धांत कहा जाने लगा। इसी तरह से लिओन मैक्स लीडरमिन ने ईश्वरीय कण की खोज का दावा कभी नहीं किया। क्योंकि हिग्स-बोसॉन कण की प्रायोगिक पुष्टि में आने वाली कठनाइयों के बारे में लिखी गई पुस्तक का नाम संपादक ने बदलकर ईश्वरीय कण रख दिया था; जो उसी नाम से प्रसिद्ध हो गया था।

वैज्ञानिक खोजों की श्रेय सम्बन्धी विवाद तो नामकरण से सुलझाये जा सकते हैं परन्तु गलत जानकारियों के आधार पर किसी खोज का खंडन करके विवाद को जन्म देना कहाँ तक उचित है? दरअसल वैज्ञानिक सत्य समय के साथ संशोधन, विस्तार या एकीकरण की माँग करते हैं। कभी-कभी तो सिद्धांतों के आधार पर वे पूर्णतः गलत सिद्ध कर दिये जाते हैं और विज्ञान जगत में अमान्य हो जाते हैं। वैज्ञानिक सत्य गलत नहीं होता है बल्कि खोजकर्ता के द्वारा किया गया दावा मानव जाति की वर्तमान समझ या मान्य सिद्धांतों के आधार पर अमान्य हो जाता है। इसलिए गणितीय, दार्शनिक या धार्मिक सत्य के उलट वैज्ञानिक सत्य के साथ खोजकर्ता का नाम होना आवश्यक हो जाता है। क्रिस्टोफर शिअनर तथा विलियम थॉमसन (केल्विन) अपनी खोजों को छद्म नाम से प्रकाशित करवाते थे; जो आज विज्ञान जगत में अमान्य हैं।

बुद्ध, चाणक्य, अरस्तू, आर्यभट्ट, विंची, शेक्सपियर, न्यूटन, ग़ालिब, आइंस्टीन, हॉकिंग, फाइनमेन, स्टीव जॉब्स, बिल गेट्स आदि नाम आज भी बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं। कुछ लोग अपने सहजबोध को इनके नाम से प्रचारित कर देते हैं। जो अधिकतर बार एक सत्य होता है। सहजबोध होने के कारण समाज इन कथनों को तत्काल स्वीकार लेता है। परन्तु इसके उलट कुछ लोग इन नामों की प्रतिष्ठा पर आघात करते हैं ताकि उनकी बराबरी का दर्जा पा सकें। अधिकतर विज्ञान-संचारकों के द्वारा यह प्रचारित-प्रसारित किया जाता है कि अरस्तू के मत अनुसार - एक ही ऊँचाई से छोड़ी गयी भारी वस्तु कम भारी वस्तु की तुलना में पृथ्वी तल को सबसे पहले छुएगी। जबकि अरस्तू की खोजों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता ही नहीं है तो विज्ञान-संचारकों के द्वारा अरस्तू के नाम पर यह खंडन क्यों किया जाता है?

आयोनियावासी एम्पिडाकल्स की धारणा को अरस्तू के नाम से खंडित करना अनुचित है। एम्पिडाकल्स की धारणा थी कि अंतरिक्ष को छोड़कर शेष चारों महाभूत तत्वों की प्रकृति अपने स्वाभाविक स्थान को प्राप्त करने की होती है। फलस्वरूप उन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि स्वतंत्र रूप से एक ही ऊँचाई से छोड़ी गयी भारी वस्तु कम भारी वस्तु की तुलना में पृथ्वी तल को सबसे पहले छुएगी। क्योंकि उसमें पृथ्वी तत्व की मात्रा कम भारी वस्तु की तुलना में अधिक होती है। जबकि अरस्तू अपने वैचारिक प्रयोगों (निगमन विधि) के माध्यम से इस धारणा का विरोध करते रहे कि अंतरिक्ष में हल्की और भारी वस्तुओं को एक साथ स्वतंत्र छोड़ने पर दोनों वस्तुएँ पृथ्वी तल को एक ही समय में छुएँगी। चूँकि व्यवहार में ऐसा देखने को नहीं मिलता है इसलिए अंतरिक्ष अर्थात शून्य का अस्तित्व ही नहीं है और परमाणुवाद की धारणा गलत है। क्योंकि परमाणुवाद के लिए अंतरिक्ष एक आवश्यक तत्व है और उस स्थिति में भारी परमाणु हल्के परमाणु की अपेक्षा अधिक गति से गिरते हैं। इस तरह से अरस्तू ने परमाणुवाद और सम्बंधित धारणा का सदैव विरोध किया था। इसलिए यह धारणा अरस्तू के तर्कों के सामने टिक नहीं पाई थी। इसके बावजूद विज्ञान संचारकों के द्वारा गैलिलियो गैलिली के पीसा के मीनार वाले प्रयोग का उदाहरण देकर अरस्तू के नाम पर धारणा का खंडन किया जाता है। जबकि गैलिलियो गैलिली ने पीसा के मीनार वाला प्रयोग किया ही नहीं था। विज्ञान संचारकों का यह व्यवहार उनके अज्ञान, या बदनाम करने की गलत मंशा को दर्शाता है।

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