काव्य: अनीता सक्सेना

- अनीता सक्सेना

बी-143, न्यू मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल , म.प्र.
+91 942 440 2456 

बादल घनेरे 

घनघोर घटाएँ 
न तो एक दिन में आएँ 
न हीं एकाएक छाएँ  
हवाओं के होने लगें 
जब अनगिनत फेरे
बनने लगें सागर में 
खरब-खरब घेरे 
तपने लगे सूरज और 
जलने लगे धरती 
मचलते तब नभ में 
तब बादल घनेरे!

हवाओं में उड़ चलें, 
रुइयों से बादल 
हाथों में हाथ डाले, 
गुइयों से बादल 
नींद डूबी घाटियों के, 
नम्र-नम्र  हाथों में 
पावस के आने की, 
पाती थमा कर 
बढ़ चलें ऊंदी 
घटाओं से बादल!

सागर से तिर कर, 
हवाओं में घिर कर 
पेड़ों से, पत्तों से,
मिल कर, फिसल कर 
दरख्तों के सीने से,
यूँ ही लिपट कर  
लहराएँ  काली 
घटाओं से बादल!

मीलों सफ़र पर ये 
चलते ही जाएँ 
हरकारे बन के 
ये संदेसा लायें 
सीने में अपने ये 
बिजली छिपा कर 
अम्बर की बाहों से 
वसुधा पर छाएँ !

नागिन सी बलखाती, 
जुल्फों से बादल 
पावस की काली 
घटाओं से बादल
काली चूनर लपेटे, 
ये लहराते बादल! 
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मन का पंछी 

मन का पंछी सुध-बुध खो कर 
डाल-डाल पर रुकता –उड़ता 
चोंच में तिनके,दिल में यादें 
तन्हा यूँ ही भटक रहा 
मन का पंछी भटक रहा!

सोच रहा वो बीता कल जब 
शाखें पास बुलाती थीं 
पत्ते फैलाते थे बाहें 
गीत लताएँ गाती थीं 
अकुलाया मन , धुंधली आँखें 
आज भीड़ में खड़ा अकेला 
सुबह गई सब चमक गई अब 
आई साँझ की धुंधली बेला 
सिंदूरी सूरज सा तप कर 
पर्वत जैसा चटक रहा 
मन का पंछी भटक रहा!

पलकों के सपने मुरझाए 
इंद्रधनुष धुंधला हो जाए    
किसका कौन , कहाँ लगता अब    
दिल का हाल किसे बतलाए 
किस को बोले पल भर थम जा 
किसके आगे हाथ फैलाए 
कल आया जो दबे पाँव 
आज दबे पाँव ही सरक रहा 
मन का पंछी भटक रहा!

जाने भी अनजाने भी 
कुछ चेहरे थे पहचाने भी 
कुछ साथ कदम दो चल भी दिए पर 
कुछ ने किये बहाने भी 
दरकी शाखें , झरते पत्ते 
उभरे दर्द पुराने भी 
जीवन की अब डोर टूटती 
मौसम गए सुहाने भी 
बिना भरे ही आँख से जैसे 
मोती कोई टपक रहा 
मन का पंछी भटक रहा!
सेतु, दिसम्बर 2018

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