कहानी: उपकार

अमर कुमार चौधरी
 गोवर्धन बाबू निम्न मध्यवर्गीय समाज के जाने-माने अच्छे व्यक्ति थे। वह समाज की भलाई के लिए हमेशा किसी भी कार्यों में सबसे आगे रहते थे। जनता के दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझते थे। गाँव के लोग भी उनका आदर और सम्मान करते थे, उनके द्वारा कही बातों का पालन करते थे। समाज का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं जो गोवर्धन जी की बातों का अनादर करते हो। किन्तु उनके दो पुत्र शेखर और रतन समाज में उतने ही कुख्यात थे, वे पिता के स्वभाव से पूरे विपरीत थे, पिता जीतने मिठबोले और मिलनसार थे, बेटें उतने ही विषबोली और अकेला रहने वाला। एक तरह से गोवर्धन को विशुद्ध बुद्धिजीवी भी कहा जा सकता है। उनका जीवन इतना व्यस्त था कि घरेलू मामलों के लिए उनके पास बहुत कम फुर्सत होता था। अपना अधिकांश समय वह समाज के लोगो के साथ व्यतीत करते थे।

 शेखर और रतन दोनों निरक्षर था। उनमें सभी प्रकार की बुराई व्याप्त थी। पिता के मृत्यु उपरांत वह शहर में आकर नगरपालिका द्वारा निर्मित मकान की एक छोटी कोठरी में रहता था। शहर में आकार भी वे दोनों भाई निरक्षर होने के कारण एक सेठ के यहाँ मोटियागिरि करते थे तथा अपने स्वभाव के कारण कुख्यात हो गया था, लोगों द्वारा कुछ भी पुछे जाने पर दोनों भाई सबसे ऐंठकर बोलते थे। जिनके कारण उनके जाती समुदाय के लोग भी उनसे बातें नहीं करते थे। शेखर जवान, फुर्तीला, मेहनती, अहंकारी और काइयाँ था, जबकि रतन अपने भाई शेखर की तरह जवान, लंबा होते हुए भी दुबला-पतला, मरियल, बुद्धू, लापरवाह और घुमक्कड़ था। अपने भाई रतन के ऐसे प्रवृति के कारण शेखर उसे हमेशा समझाता-बुझता की वह यह सब छोड़ दे, और मेहनत-मजदूरी करे, लेकिन रतन अपने भाई की बातों पर ध्यान नहीं देता और अपना वाला ही करता था। जिसका परिणाम यह हुआ कि एक दिन दोनों भाइयो में खूब उठा-पटक हुई, जैसे कोई तगड़े और दुर्बल दो साँड़ों के एक भयावह युद्ध का दृश उपस्थित हो गया हो, चुकी रतन अपने बड़े भाई से कमजोर होने के कारण उसे पराजय होना पड़ा और उसे घर से भागना पड़ा।

 शेखर ने जब अपने छोटे भाई रतन को घर से निकाल दिया तो रतन एक टूटे-फूटे मकान में रहने आ गया, उस मकान में दो कोठरियाँ थीं, जिसमें से एक में पहले से ही एक बुढ़िया रहती थी। दोनों कोठरियों में कोई खिड़की नहीं थी, चारों ओर अंधेरा और उमस भरी गर्मी व्याप्त थी। कोठरियाँ इतनी छोटी थीं कि बिना किसी खिड़की की इन कोठरियों को बिल-सूराख ही कहना चाहिए, जिसमें चूहे, खटमल, झींगुर और तिलचट्टे स्वतंत्रतापूर्वक चहलकदमी करते रहते थे और सीलन से दीवारें भीगी रहती थीं।

 रतन सदा अपने भाई पर भुनभुनाया करता। वह हमेशा तले सूखे लाल मिर्च की तरह जला, ऐंठा और कड़वा बना रहता। दूसरे कोठरी में रहने वाली बुढ़िया से भी वह मुँह बिगाड़ कर बोलता। वह उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था, जब वह अपने भाई शेखर से अपने अपमान का बदला पाई-पाई चुका सकेगा। इसीलिए वह अपनी शक्ति से अधिक दंड-बैठक करने लगा, किन्तु संतुलित आहार न मिलने के कारण उसका शरीर और कमजोर हो गया था और गाल पिचक गए थे। वह कसरत करते हुए बाहर निकल आता और बहुत दूर से ही अपने भाई शेखर की कोठरी की ओर मुँह करके देर तक बड़बड़ाया करता। जब वह अपने भाई शेखर को बाहर देखता तो उधर गर्दन थोड़ा-सा घुमाकर धीरे-धीरे मुछों पर ताव देने लगता अथवा बाई बाँह को मोड़कर इस प्रकार प्रहार करता, जैसे कोई पहलवान अखाड़े में दूसरे पहलवान को पकड़ के लिए ललकारता है। कभी वह शेखर को अपनी ओर देखता पाता तो वह बाई ओर मुँह करके जमीन पर ज़ोर से थूकता-थू। ‘बताऊंगा साले को एक दिन। कौन कहता है यह भाई है ? बाप का रुपया कहाँ गया ? सब दबा लिया है साले ने। पाई-पाई वसूल लूँगा, खून पी जाऊंगा...।’ वह बड़बड़ाते हुए कहता।

 उन दिनों ऐसा करीब-करीब रोज ही होता था। एक दिन बुढ़िया कही बाहर गई थी, और जब घर वापस लौटकर आई तो रतन की कोठरी में कराहने की आवाज आई। बुढ़िया जब उसकी कोठरी के अंदर गई तो जमीन पर बिछे गुदडीनुमा बिस्तर पर उसे मछली की तरह छटपटाते हुए देखा। उसका मुँह इस तरह लाल हो गया था, मानो वह जेठ की दोपहरी की तेज धूप से चलकर आया हो । बीच-बीच में वह छटपटाना तथा कराहना बंद करके आँखें फाड़-फाड़कर चारों ओर सनकी की तरह देखने लगता था।

 बुढ़िया उसके पास बैठ गई। जब उसने उसके माथे पर हाथ रखा तो उसके मुख से चीख निकल आई, “हाय राम! अरे तुम्हारा शरीर भट्टी की तरह जल रहा है, ए बचवा। क्या हो गया तुम्हें भइया ? घबराओ नहीं.....भगवान सब दुख हारेंगे...।”

 “ए मैया, मैं अब नहीं बचूँगा।” सर्दी में एकदम ठंडे पानी से नहाने के बाद दाँत किटकिटाने से रुक-रुककर जैसे आवाज निकलती है, उसी तरह काँपते हुए स्वर में वह बोला, “मेरा कोई नहीं है, ए मैया। तुम ही हमारी मैया हो। ए मैया कपार फट रहा है। देह में बड़ा दर्द है। कपार चाँप दो... अब नहीं बचूँगा ए दादा, ऊँह-ऊँह।” उसका सर एक ओर लटक गया और वह कुछ क्षणों के लिए सुन्न-सा पड़ गया।

 “ए बच्चा घबड़ाओं नहीं, भगवान पर भरोसा रखो.........सब दुख दूर होगा।” बुढ़िया रोती हुई उसके सिरहाने खिसक गई और उसके सिर को दबाती हुई बोली, “तुम जल्दी ही अच्छे हो जाओगे। मैं अभी दवाई दूँगी, आराम हो जाएगा।” सिर दबाने से उसको सचमुच आराम मिला। पर शरीर उसका गरम तवे की तरह जल रहा था। वह कुछ देर तक चुपचाप पड़ा रहा। फिर वह इतने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने औए प्रलाप करने लगा, मानो उसने यमदूतों के दर्शन कर लिए हों। बुढ़िया पास की गली में एक वैध से कुछ गोलियाँ चार आने में ले आई थी। उसने उसके कपार पर लौंग पीसकर लगाई थी। वह रात भर उसके पास बैठी रही। वह उसको छोड़ने को तैयार भी नहीं थी। रतन बार-बार उसका हाथ अथवा पैर पकड़कर जाड़े से काँपते रोगी के स्वर में कहता “तुम मेरी मैया हो......ए मैया, मुझे छोड़कर न जाना।”

 दूसरे दिन उसका बुखार कम हो गया और तीन-चार दिन में उठकर वह काम-धाम पर जाने लगा था। बुढ़िया के प्रति रतन अत्यंत कोमल हो गया, और उसे काकी कह कर बुलाने लगा, पर अपने भाई शेखर को देखकर अब भी उसका खून जला करता था। उसकी दंड-बैठक और भी बढ़ गई थी और बाहर जाकर बड्बड़ाना भी उसका जारी था। अपना गुस्सा वह कई प्रकार से प्रकट करता। एक दिन शेखर दोपहर में सत्तू खाने के बाद पीतल की थाली बाहर बैठे माँज रहा था, उसी समय रतन कहीं से अपने घर आया। रतन के पास कोई थाली-वाली नहीं थी। वह अक्सर सत्तू अपने गमछे में सानकर बड़ा-सा पिंड बना लेता था और जल्दी-जल्दी खाकर पानी पी लेता था। पीतल की थाली देखकर उसका खून खौलने लगा था। कुछ ही क्षणों में उसका गुस्सा इतना बढ़ गया कि उसने आव देखा न ताव, बरामदे में दौड़ता हुआ गया और बाँस का एक फट्टा उठाकर ले आया और अचानक पास में बैठे एक निश्चिंत, वफादार कुत्ते को ज़ोर से मारते हुए बोला, “भाग साले यहाँ से ! जब देखो, इसकी मनहूस शकल दिखाई देने लगती है। साले, तू सड़-सड़कर मरेगा, यह मौज-मस्ती भूल जाएगा। जनता है, दूसरा का जमा मारने से कुकर का जन्म मिलता है। तूने जरूर पिछले जन्म में अपने भाई का हक मारा होगा।”

 शेखर ने उसको कुछ देर तक घूरा। उसकी आँखें लाल हो गई। वह एक ऊँचे , मजबूत किले की तरह खड़ा हो गया और छाती निकालकर बोला “क्यों रे, देख रहा हूँ, तेरा ज़ोर फटने लगा है आजकल। उस दिन का भूल गया? चुपचाप चला जा, नहीं तो सारा भूत अभी झाड़कर रखा दूँगा।”

 रतन की समझदारी की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि उसने ऐसा चेहरा बनाया मानो उसके कानों में कोई बात गई ही न हो और सचमुच वह कुत्ते पर ही गुस्सा हो। इसके बाद वह फौरन बरामदे में लौट भी आया, जैसे बाँस का फट्टा रखने के उद्देश्य से ही आया हो। बुढ़िया काकी उस समय अपनी कोठरी के चौखट पर बैठी सब देख-सुन रही थी। वह बोली “ए बचवा मैं तो एक बात जानती हूँ, जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। तुम गुस्सा करके अपना खून क्यों जलाते हो ? भगवान सब देख रहे हैं। तुम कोई काम-धंधा क्यों नहीं करते ? देनेवाला वह है। सब वही देगा।”
 “कौन धंधा करूँ ए काकी ? मेरे पास रूपये-पैसे कहा है, जो भी था वह हड़प गया।”

 “ए बचवा अपना जी छोटा न करो। उस पैसे की बात ध्यान में न लाओ। तुम घबड़ाते क्यों हो ? मैं दिलवा दूँगी। मैं सेठजी के घर आती-जाती हूँ, कहकर कुछ दिला दूँगी। उनके यहाँ से सभी छोटे-मोटे मजदूर और दुकानदार कर्ज के रूप में दस-पाँच ले जाते हैं, दूसरे दिन, तीसरे दिन एक-दो रुपया अधिक लौटा देते हैं। कहकर दिलवा दूँगी, सेठजी का मूल-सूद धीरे-धीरे लौटा देना.....।”

 रूपये-पैसे की बात सुनकर रतन का मन बहुत हल्का हो गया। उसके खुशी का टिकाना न रहा। वह डिगें मारने लगा, “जान देकर पैसा चुकानेवाला मर्द हूँ। इस शहर में कोई कह न दे कि रतन ने हमारा पैसा मार लिया है। मूंछ मुड़वाकर गदहे पर शहर भर घूमूँगा .......।” वह कुछ देर तक रुका, फिर गंभीर होकर बोला, “ए काकी दौरी-दुकान मुझसे न चलेगा।”

 “ए बचवा, करने से सब कुछ होता है। तुम परौठा-तरकारी, चाय की दुकान खोल सकते हो। मकुनी-चोखा की दुकान भी खूब चलेगी। टीसन पास है न, मोटिया-मजूरों का ठिकाना हो जाएगा.......।”

 “मेरा बनाया परौठा- मकुनी कौन खाएगा, ए काकी ?” व हँसने लगा था।

 बुढ़िया काकी ने फुसफुसाए स्वर में कहा, मानो भरी रहस्य की बात हो, “चलो मैं सीखा दूँगी। खुश ? बनाकर दिखा दूँगी। मौका मिलने पर बना दिया करूंगी। मन में हिम्मत लाओ। बड़ा भाई है, गाली मत दो, तुम्हें फलेगा नहीं। दो दिन की जिनगी है, कौन किसका है ? सबको तो आखिर में भगवान के यहाँ जाना ही है। अपना काम सबसे अच्छा होता है, किसी का सहारा अच्छा नहीं। हाँ तो, तुम दौरी-दुकान कर लो, तुम जो कहोगे, कर दिया करूँगी....।”

 रतन अत्यंत गद्गद हो गया। मुलायम करुण स्वर में बोला, “तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगा, ए काकी । पता नहीं तुम उस जन्म की कौन हो। मेरा मन कहता है, उस जन्म में तुम मेरी माँ थी।

 ए काकी, तुम पराठा-मकुनी बना दिया करना, फायदा में आधा तुम्हारा-चार आने में दो आने।” ना.....ना......ना... बुढ़िया काकी ने कई बार सिर हिलाया, “मेरा कौन बैठा है ? तुम्हीं लोग तो हो। लेकर करूँगी भी क्या ? मैं तुम्हारा सब काम कर दिया करूँगी।

 सेठ श्यामदास का गोला स्टेशन के पास ही था, जो काफी मशहूर था। उनके यहाँ कई प्रकार के काम होते थे, विशेष कर सूद पर पैसा उधार देने का काम होता था। बुढ़िया काकी रतन को सबेरे-सबेरे ही लेकर सेठ श्यामदास के यहाँ पहुँच गई। सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे थे। बुढ़िया काकी ने हाथ जोड़कर कहा था, “मालिक दुखिया है, बड़ा सीधा-सादा है। मेहनत खूब करता है।” “हाँ मालिक, यह कुछ दौरी-दुकान करना चाहता है.... कुछ मिल जाता तो काम बन जाता। मूर-सूद सभी चुका देगा।”

 “ठीक है, इसको मैं नहीं जानता..... आप कहती हैं तो पचास रुपए दे देता हूँ, दस रुपया पर एक रुपया रोजाना का सूद पड़ता है। इससे बीस रुपए पर लूँगा। मैं इस तरह का धंधा नहीं करता, पर आप बहुत दिनों से आती-जाती हैं, लेहाज करना पड़ता है। पर यह पैसा जल्दी से जल्दी चुकता जाए, मूर नहीं तो सूद यह जरूर दो रुपया रोज दे जाया करे। पैसा जब इकट्ठा हो जाए तो मूर दे जाए। है न ? एक कागज पर अँगूठा का निशान लगवाकर मुनीम ने पाँच रुपया काट कर 45 रुपया दे दिया। रतन रुपया पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।

 जल्दी ही रतन की दौरी-दुकान खुल गई। पराठा की तो उस मोहल्ले में कई दुकानें थीं, लेकिन मकुनी-चोखा की यह पहली दुकान थी।

 रतन को कुछ आता नहीं था। वह लापरवाह भी खूब था, पर बुढ़िया काकी ने उसे एक-एक चीज सिखाई थी। बुढ़िया काकी सबेरे ही उठकर दुकान साफ करके चूल्हा जला देती थी। अंत में वह रतन को उठा देती थी। रतन पहले गुस्से में भुनभुनाते हुए उठता था, पर बाद में उसकी आदत पड गई। जब तक रतन सुबह के काम से निजात पाता, तब तक बुढ़िया काकी मकुनी-चोखा के सभी सामग्री को तैयार कर देती थी। अंत में वह तरकारी छौंककर आटे की लोई को कटोरी की तरह गहरा करके तथा उसमें भरता भरकर गेंदनुमा मकुनी तैयार करने लगती है।

 महीनों बुढ़िया काकी का यह कार्यक्रम रहा। धीरे-धीरे दुकान चल निकली। मकुनी उसकी बहुत स्वादिष्ट बनती थी कि मोटिया मजूरों के अलावा दूसरे लोग भी खरीदा करते थे।
 एक दिन बुढ़िया काकी ने रतन से कहा, “ए बचवा अपना काम अपने हाथ से करने में अच्छा होता है। दूसरे का सहारा ठीक नहीं। मैं कब तक बनाऊँगी ? मेरे शरीर का भी कोई ठिकाना नहीं। मुझे और भी काम करने हैं। तुम शादी-ब्याह कर लो और अपना घर-गृहस्थी चलाओ। काम नहीं करोगे तो दुकान बंद हो जाएगी। जगहंसाई होगी। भाई भी हँसेगा......।”

 भाईवाली बात ने जादू का असर किया। रतन मेहनत करने लगा। उसका भाग्य भी खूब चरचराया, दुकान जमती जा रही थी।

 कुछ दिनों के अंदर रतन ने शादी कर ली। रतन ने उसे बहुत प्यार से रखा। उसको एक औरत और सहयोगी की सख्त जरूरत भी थी। वह दुकान को भी संभालने लगी। साथ-ही-साथ वह बुढ़िया काकी की तो बहुत इज्जत करती। रात में वह बुढ़िया काकी का सर दबा देती, देह चाँप देती। दिन में बाल में तेल लगा देती, पानी भरकर रख देती, बर्तन माँज देती।

 दिन बिताते गए थे, बुढ़िया काकी का शरीर कमजोर होती गई थी। झुर्रियाँ और लकीरें चेहरे पर बनने लगीं। शरीर झुकने लगा। लेकिन सर्दी-जुकाम अथवा सो-एक दिन के बुखार या हरारत के अलावा वह लंबे समय तक कभी भी खाट पर नहीं पड़ीं। टाँगों में दो-चार बार अवश्य पीड़ा उठी थी, पर उसने दो-तीन से अधिक परेशान नहीं किया। लेकिन इस बार की बीमारी करीब चार महीने तक रही। दर्द का इतना भयंकर दौरा उस पर कभी नहीं पड़ा।

 रतन की पत्नी उसकी बहुत सेवा की। रतन डाक्टर से उपचार कराया। किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहने दी, लोगो के कहने के मुताबित विभिन्न प्रकार तेल से पैरों की मालिश भी की थी। झाड-फूँक कराया था, और भी कई प्रकार के घरेलू उपचार किए थे। इसके अलावा खाना बनाकर खिलाने, हाथ-पैर व माथे चाँपने और गू-मूत करने में उसने किसी प्रकार की उदासीनता अथवा उपेक्षा का भाव नहीं दिखाया।

 कुछ दिनों बाद बुढ़िया की तबीयत में सुधार आ गया, और जल्द ही खटिया से उतरकर डंडा के सहारे चलने लगी। और कहने लगी, “ए रतन की दुल्हिन, जी करता है खूब चलूँ, खूब काम करूँ। तुम्हारा उपकार नहीं भूलूँगी ए रतन की दुल्हिन। तुम दोनों ने माँ-बाप की तरह सेवा की है.......।” रतन की पत्नी रोने लगी, और कहने लगी, “ ऐसा न कहिए, ए काकी । हम तो आपके बच्चे हैं। आपका दिया तो हम सात जन्म में भी नहीं चुका पाएँगे। मैं भगवान से रोज मनाती थी, ए काकी। आपकी कराह सुनकर रात में नींद नहीं आती थी। आप अच्छी हो जाएँ, आप मजे में रहें - बस। अभी आराम कीजिए, ए मैया। जब ताकत आ जाए तो कोई काम कीजिएगा।”

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