कविताएँ: अशोक शाह

अशोक शाह

पेड़ के पास टेलीफोन नहीं है

पेड़ के पास
नहीं है टेलीफोन
घर नहीं उसका
कोई परिचित भी नहीं
फिर भी उससे मिलता हूँ
जब चाहे छू लेता हूँ

उसके पास फोन है
घर भी
एक पता है, पहचान भी
पर उससे मिला नहीं जा सकता
उसकी अपनी सीमाएँ है

इन सीमाओं का मालिक है
आदमी
जितनी संकीर्ण हैं ये सीमाएँ
आदमी उतना ही बड़ा होता है

पेड़ मुक्त है
उसका कोई मालिकाना हक़ नहीं किसी पर
पेड़ के पास टेलीफोन भी नहीं है
फिर भी वह बात करता है
एकदम अद्भुत


दिन की वह दोपहर

काल के लम्हे को
अपनी आवाज़ के नेजे़ से भेदकर
बदल दिया उसने
वक़्त का पसमंज़र

बयक वक़्त इस दुनिया में
दोपहर का वह दिन
रात की तैयारी में
किरनों की सेज बिछा रहा था


कुम्हडे़ की बत्तिया
कुम्हडे़ की वह छोटी-सी बत्तिया
ओढ़े सिर पर नारंगी कुम्भ
मानो सूरज क्षितिज से नहीं
उसके सिर से निकल रहा हो

पर सुना है
तर्जनी दिखाने से मर जाती
कुम्हडे़ की बत्तिया

यह मानकर मैंने उंगली नहीं उठायी
उंगली उठाने से डर जाती है चिड़िया
हमने फेंके है काफी पत्थर उस पर

पर उंगली उठाने से क्यों डरते हैं
शास्त्री और मौलवी जी
सबसे अधिक चौंकता है सफेद बादल
जो बिना बरसे हो जाता नौ दो ग्यारह

कितना अधिक घबराता है ईश्वर
उसने सारे मनुष्यो को लगा रखा है सिर्फ़ अपनी पहरेदारी में
हमें पता है कुम्हड़े की बत्तिया के मर जाने पर
फिर निकल आयेगी दूसरी
लेकिन ईश्वर के मर जाने पर
क्या होगा अपनी देहाती दुनिया का

इसी घबराहट में बंद है दिलों के सारे द्वार
और कुम्हड़े की बत्तिया रोज़ मुस्कुराती है
धरकर सिर पर फूल की एक और नयी गगरी


ट्रैफिक सिग्नल

ट्रैफिक सिग्नल पर रूकीं हैं
कारें, साइकिलें, रिक्शें, बसें और ट्रक
कैसे कट मारकर सबसे आगे की लाईन में
जेब्रा क्रासिंग पर खड़ा हो जाने वाला
मोटरसायकिल वाले की स्टाईल भी

तभी पहुँचते हैं बगल से कार के शीशे तक
अख़बार बेचने नौ साल के हाथ
आँखों में लिये हरी ज़िन्दगी की आस
कहीं फूल, कहीं नारियल के कटे फल
फूग्गे, झण्डे, खिलौने बेचते खाली पेट
साठ वर्ष की रिरियाती ज़िन्दगी
अब तक पसारती हाथ, मिल जाए कुछ खाने को

शीशे उतारकर या भीतर से
लोग देखते हैं थमे हुए परेषान देश को
देखना या नहीं देखना मजबूरी है उनकी
किसी से मिल जाए नज़र तो
झट से फेर लेते है आँखें
और दिखाते ऐसे जैसे एफएम सुन रहे हों

देखते ही देखते अत्याशित बढ़ जाता रक्तचाप
कारों के भीतर बढ़ जाता ताप
कोई हाथ न घुस पाए उसके भीतर
जबरन माँग न ले कोई सामान

उस साठ सेकेण्ड के अन्तराल में
देश हड़बड़ाया दिखता है हलकान
लाइट ग्रीन हो छूटे जी का जंजाल
तभी सिग्नल हरा हो उठता है
आगे निकल जाती हैं गाड़ियाँ
पीछे छूट जाता है देश
ट्रैफिक सिग्नल पर
एक और अन्तराल के इंतजार में


देखा नहीं उसने पलटकर

वह आती सुबह की धूप की तरह
हल्के कदम रखकर
वक़्त गुजरता ज़िन्दगी का
मुसलसल पहर बदलकर
क्यों रहता बैचेन समन्दर
चीखता हर लहर बदल कर

उदास रात की ख़ामोशी को
तोड़ती सहर में बदलकर
मेरे चेहरे पर जड़ गया ताला
कई दिनों से देखा नहीं उसने पलटकर

बहते अश्कों का सुकून लिए वह
चली गयी मेरे गीतों के हर्फ़ बदलकर
ग़मगीन दिनों का दर्द वह भुला न पायी
आजमाया उसने है खुद को कई शहर बदलकर

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