प्रसाद काव्य की मूल चेतना

अरविन्दर कौर

अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, ए .एस. कालेज, खन्ना
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प्रसाद साहित्य देश की परम्परा, सभ्यता और संस्कृति को नवजीवन प्रदान करते हैं। उन्होंने सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रयत्न किया वह अपनी विचारधारा से आध्यात्मिक क्लेवर से भर लेने वाले कवि हैं उनका विश्वास है कि इतिहास का पुनर्जागरण राष्ट्र उत्थान के लिए आवश्यक है इतिहास को प्रस्तुत करके वे राष्ट्र की खोई हुई चेतना को लौटाना चाहते हैं जहां एक ओर उन्होंने युग, देश, समाज और मानव की समस्याओं को उठाने का प्रयास किया, वहीं उनका समाधान भी प्रस्तुत करने की कोशिश की है आज मानव-जीवन सर्वथा अस्त-व्यस्त और संत्रस्त हो गया है इस संकट से मुक्ति का केवल एक ही उपाय है और वह है कि मानव कल्याण को केन्द्र में रखकर विज्ञान, राजनीति और धर्म-संस्कृति से सामंजस्य स्थापित किया जाये प्रसाद ने आधुनिक सभ्यता की इस विषम समस्या का शाश्वत समाधान प्रस्तुत किया है चाहे कामायनी का कवि अपनी विचारधारा को आध्यात्मिकता से जोड़ता है फिर भी उसका व्यावहारिक पक्ष सबल है इस प्रकार काव्य में प्रसाद की विचारधारा कई दिशाओं में प्रवाहित प्रतीत होती है
            मूलतः प्रसाद सांस्कृतिक दृष्टि रखते हैं और वे इतिहास के अन्वेषण में प्रयत्नशील रहते हैं उनका विश्वास है कि भारत ही आर्य जाति की जननी है आर्यों के प्रारम्भिक स्वरूप पर विचार करते हुए प्रसाद जी ने लिखा है - “आत्मा से आनन्द भोग का भारतीय आर्यों ने अधिक स्वागत किया”1 आर्यों के पूर्वज मनु का निरूपण करने में भी कवि ने इतिहास का ध्यान रखा आधुनिक परिस्थितियों में निर्मित आदि पुरुष का चरित्र उस आर्य की भांति है जो जीवन से संघर्ष करता हुआ आगे बढ़ता है इतिहास के प्रति प्रसाद का मोह ऐसा है कि विदेशी बालिका कार्नेलिया भीअरुण यह मधुमय देश हमाराका गीत गाती है उसे इस देश की भूमि से प्यार हो जाता है आदि पुरुष मनु को हिमालय के उतुंग शिखर पर प्रतिष्ठित कर कवि ने मानसरोवर से सभ्यता का विकास दिखलाया है भारतीय इतिहास को प्रकाश में लाने के साथ कवि ने प्राचीन संस्कृति, सभ्यता को भी नई व्याख्या देने का प्रयत्न किया एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान की रेखाएँ उनके साहित्य में सबसे अधिक बलवती हैं उनके द्वारा आदर्श पात्रों का नियोजन भी संस्कृति के प्रति दिखाया गया अनुराग है बाबा रामनाथ, दाण्डयायन, चाणक्य आदि पात्र भारतीय संस्कृति के प्रतीक बनकर आये हैं महाराणा के आदर्श पराक्रम, चाणक्य की अदम्य नीति के सम्मुख सभी नतमस्तक होते हैं धर्म की अपेक्षा उन्होंने दर्शन का ग्रहण अधिक किया और बौद्धों की करुणा, शैवागम का प्रत्यभिज्ञादर्शन भी उनके काव्य में दिखाई देते हैं इसप्रकार प्रसाद जी देश की वास्तविक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा में प्रयत्नशील प्रतीत होते हैं वे भारतीय आत्मवाद तथा सार्वभौमिकता के पक्षधर हैं
            प्रसाद की दार्शनिक प्रवृत्तियाँ क्रमशः विकसित होती गई उन्होंने समस्याओं के मूल में जाकर उन पर विचार किया अपने गहन अध्ययन, चिन्तन, मनन से वे जिन निष्कर्षों पर पहुँचे थे उन्हें अपने काव्य में व्यक्त किया आरम्भिक काव्य में उपनिषद्- दर्शन का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है चित्राधारमें प्राप्त होने वाली भावनाओं के दर्शन के प्रति कवि की जिज्ञासा प्रतीत होती है मनु ने प्रलय के अनन्तर इसी आकुलता से अनेक प्रश्न किए थे जीवन-जगत्, प्रकृति, पुरुष के प्रति इस जिज्ञासा का उत्तर दर्शन से प्राप्त होता है समस्त जगत और प्रकृति निरन्तर शक्ति की छाया है अणु-अणु में उसकी सत्ता व्याप्त है -
अपना ही अणु-अणु कण-कण,
द्वयता ही तो विस्मृति है (कामायनी, आनन्द सर्ग)
अहं और इदंका समन्वय आनन्द का सृजन करता है उपनिषदों की अद्वैत भावना की भाँति प्रसाद ने शैवागम से समरसता को भी ग्रहण किया जीवन में समन्वय की नितान्त आवश्यकता है कामायनीकी श्रद्धा इच्छा-क्रिया-ज्ञान में समन्वय स्थापित करते हुए आनन्द की ओर अग्रसर होती है आनन्द की कल्पना प्रसाद को शैवागम से प्राप्त हुई विश्व शिव का ही प्रसाद है और उसी के तांडव नर्तन से सम्पूर्ण, स्वाप और ताप भस्म हो जाते हैं -
स्वप्न, स्वाप, जागरण भस्म हो
इच्छा, ज्ञान, क्रिया मिल लय थे (कामायनी, रहस्य सर्ग)
मानव शिव की कृपा से ही इनसे मुक्ति प्राप्त कर सकता है प्रसाद को समरसता, भक्ति भावना तथा आनन्दवाद की  प्रेरणा शैवागम से प्राप्त हुई जिसे उन्होंने काव्य में व्यक्त किया इरावतीमें कथन है कि अवसान को आर्यजाति से हटाने के लिए आनन्दवाद की प्रतिष्ठा करनी होगी2
            ‘आँसूमें करुणा दर्शन एक स्वतन्त्र चिन्तन पर अवलम्बित है, किन्तु उसमें बौद्धों की करुणा का प्रभाव भी हो सकता है करुणालय’, ‘अशोक की चिन्ताका मूल तत्व भी बौद्धदर्शन से प्रभावित है विभिन्न दर्शनों से अपने चिन्तन पक्ष को प्रौढ़ करते हुए वे क्रमशः आगे बढ़े
            प्रसाद को मूलतः प्रेम सौन्दर्य का कवि कहा जाता है प्रेम के उदात्त रूप को ग्रहण किया, इस कारण वह साधारण स्वच्छन्दतावादी कवियों से एक पृथक् भाव-भूमि पर पहुंचता है प्रसाद का प्रेम अशरीरी, अतीन्द्रिय और निर्मल है उनका प्रेम साधारण प्रणय की भांति नहीं है, जो केवल दो प्राणियों के बीच की वस्तु बन जाता है, उसका क्षेत्र व्यापक है मनु को प्रेम करने वाली श्रद्धा सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की कामना करती है प्रसाद ने अपनी प्रेम कल्पना में मनोविज्ञान और दर्शन से भी सहायता ली और उसे आदर्श रूप में अंकित किया नारी-पुरुष की समस्या निरन्तन है आधुनिक युग में उसका स्वरूप और भी जटिल हो गया प्रसाद पुरुष को किंचित कठोर और नारी को कोमल भावनाओं की प्रतिमूर्ति-सी मान लेते हैं नारी-रूप का अंकन करने में उनका दृष्टिकोण एक आदर्शवादी का रहा है नारी को उन्होंने एक उच्च स्थान दिया श्रद्धा, देवसेना आदि नारियों का चरित्र महान् है और और वे अपने प्रत्येक रूप में आकर्षण का केन्द्र बनती है मनु का समस्त पौरुष श्रद्धा के चरणों पर नत-शिर-सा दिखाई देता है नारी को श्रद्धा के रूप में स्वीकार करने वाले प्रसाद कहते हैं -
नारी माया ममता का बल,
वह शक्तिमयी छाया शीतल (कामायनी, दर्शन सर्ग)
नारी-पुरुष के सम्बन्धों को दृढ़तर बनाने के लिए प्रसाद विश्वास की आवश्यकता का अनुभव करते हैं इन दोनों का मिलन ही जीवन की पूर्णता है पुरुष का हृदय नारी के अभाव में मरुप्रदेश है और नारी भी पुरुष के बिना विटपविहीन बेलि की भांति है दोनों एक दूसरे के पूरक हैं नारी-पुरुष की समस्या को एक चिरन्तन प्रश्न के रूप में प्रसाद जी ने स्वीकार किया और उसका उत्तर दिया
            भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति अनुराग के मूल में प्रसाद की राष्ट्रीय भावना कार्य करती है वे एक ऐसे युग में उत्पन्न हुए थे जबकि देश दासता के बन्धनों से मुक्त होने का प्रयत्न कर रहा था उनकी भावना साधारण राष्ट्रीयतावादी कवि से किंचित भिन्न है प्रसाद के नाटकों में राष्ट्रीय भावना अवश्य अधिक प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत हुई किन्तु काव्य में राष्ट्रीयता के संकेत कुछ एक जगह ही मिलते हैं
            प्रसाद की विचारधारा के पीछे उनका मानवीय स्वर है समाज और युग परिवर्तित हो जाते हैं, किन्तु मानवीय भावनाओं के कुछ पक्ष बराबर जीवित रहते हैं जो रचनाकार जितना अधिक महान् होता है, वह जीवन की उतनी ही विस्तृत समस्या पर विचार करता है, प्रसाद मानव को सर्वोपरि स्वीकार करते हैं मनु मानवता का प्रतीक है और उसकी आन्तरिक भावनाएँ व्यक्तिगत होकर समाजगत हैं वे मानव-मन का प्रतिनिधित्व करती हैं और उसमें जीवन की गहनता है श्रद्धा के द्वारा कवि ने मनु को जो जाग्रत संदेश सुनाया, वह सम्पूर्ण मानवता के लिए है -
यह नीड़ मनोहर कृतियों का,
यह विश्व कर्म-रगस्थल है
है परम्परा लग रही यहाँ,
ठहरा जिसमें जितना बल है
कामायनी में प्रसाद का मानववाद अपने प्रांजल रूप में आया है जहां मानवता के लिए अनेक मंगलमय संदेश मिलते हैं श्रद्धा मनु से कहती है कि दूसरों को हँसते देखकर सदा प्रसन्न रहो सब कुछ अपने में भरकर मनुष्य व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता। बसुधा में करुणा का प्रसाद ही वास्तविक सुख-संतोष है इस प्रकार प्रसाद काव्य की चेतना अपने युग, समाज और इतिहास से प्रभावित है प्रसाद का काव्य-निर्माण एक क्रमिक विकास के रूप में हुआ उनका कृतित्व प्रमाणित करता है कि जिन रचनाकारों में खुद का अपना रचना-संसार बना लेने का धैर्य होता है, वे स्वच्छन्दतावाद की सीमाओं के बावजूद स्वयं को स्थापित कर लेते हैं और उन्हें नकारना सम्भव नहीं होताप्रसाद एक क्रियाशील रचनाकार हैं उन्होंने क्रमशः अपने लक्ष्य तक जाने का प्रयास किया और उनका प्रत्येक चरण एक नये विकास का सूचक है चित्राधारका कवि रीतिकालीन परम्परा से प्रभावित है रसाल, चन्द्रोदय, शारदीय शोभा आदि विषय प्राचीन ही हैं आख्यानक कविताओं की विषय सामग्री भी कालिदास आदि से प्राप्त की गई है प्रसाद इस अवसर पर किसी आदर्श की खोज करते दिखाई देते हैं, जिस आधार भूमि पर खड़े हैं, उसका क्षेत्र सीमित नहीं है और कवि में जिज्ञासा की भावना उसे आगे ले जाती है कानन-कुसुमका कवि भाव, भाषा, छन्द की दृष्टि से अधिक स्वतन्त्र होने की चेष्टा में है। इस काव्य की आख्यानक कविताओं की प्रेरणा यद्यपि प्रसाद जी को प्राचीन ग्रंथों से प्राप्त हुई तथापि उससे उन्होंने अपनी मौलिक भावनाओं को प्रकाशित किया चित्रकारमें उन्हें अधिक सफलता प्राप्त हुई है प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, करुणालय आदि में उन्होंने कई प्रयोग किये प्रेम पथिकमें प्रेम के विराट और भव्य रूप का अंकन किया गया कवि का यह प्रेम-दर्शन क्रमशः गतिमान होता जाता है करुणालय में करुणा की भावना को महत्व प्राप्त हुआ यही करुणा व्यापक होकर और बौद्ध दर्शन से मिलकर उदार विचारधारा की नियोजना करती है महाराणा का महत्वमें एक स्वाभिमानी का चरित्र-चित्रण किया गया है प्रसाद के काव्य-विकास मेंआंसूका विशेष महत्व है हिन्दी के वियोग काव्य की परम्परा का एक नया रूप उसके द्वारा प्रस्तुत हुआ गीतिकाव्य का वैभव उसमें प्राप्त होता है कवि पूरी मार्मिकता से अपनी आन्तरिक पीड़ा का प्रकाशन करते हुए देखा जाता है अपने नवीन कलेवर मेंआंसूवेदना दर्शन के द्वारा एक सार्वभौमिक संदेश देता है प्रसाद की गीत-दृष्टि का आरम्भिक स्वरूप किंचित शिथिल और मंथर है झरनाका कवि अपनी दुर्बलताओं को नहीं छिपा पाता इसमें अनुभूति का सत्य हो और इसी कारण कवि को एक ऐसी दृढ़ भूमि प्राप्त हो जाती है जिसके सहारे वह आगे बढ़ सकता है विषादमें वह कहता है -
निर्झर कौन बहुत बल खाकर,
बिलखाता ठुकराता फिरता?
खोज रहा है स्थान धरा में,
अपने ही चरणों में गिरता (झरना, पृ.27)
काव्य और दर्शन का समन्वयलहरकाव्य-संग्रह है अशोक की चिन्ता में बौद्ध दर्शन की छाया है, किन्तु करुणा को अधिक महत्व दिया बहुजन हिताय, बहुजन सुखायउसका मूल स्वर है प्रलय की छायाप्रसाद की सर्वोत्तम कविताओं में एक है नारी का मनोवैज्ञानिक  विश्लेषण उसके भावों में पल-पल परिवर्तित रूप को लेकर अत्यन्त सजीव है कवि ने कमला मेंपराजित सौन्दर्य की रानीकी प्राण प्रतिष्ठा कर दी आरम्भ से अन्त तक कवि एक मादक वातावरण जीवित रखता है ओर उसी की भीतर से सौन्दर्य और नारी जीवन की विडम्बना झांकती है  ‘कामायनीप्रसाद के सम्पूर्ण  व्यक्तित्व से निर्मित है  उसमें कवि की कला का चरमोत्कर्ष है और वह समग्र जीवन-चिन्तन से अनुप्राणित है कुलगत शैव दर्शन को क्रमशः प्रसाद ने एक जीवन-दर्शन में परिणत किया चित्राधारमें शिव के प्रति भक्ति-भावना का परिचय प्राप्त होता है प्रेम-पथिकमें भीशिव समष्टिकी चर्चा है कामायनीमें इच्छा, ज्ञान क्रिया का समन्वय प्रत्यभिज्ञा दर्शन से प्रेरित है समरसता और आनन्द की कल्पना कवि को यहीं से प्राप्त हुई और प्रसाद ने उन्हें अधिकाधिक व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत किया कामायनीका कवि मानव-मन की व्याख्या करता है और अन्त में उसमें आनन्द की प्रतिष्ठा कराता है उसमें कृतिकार का एक समन्वयवादी दृष्टिकोण रहा है और हृदय-बुद्धि, नारी-पुरुष आदि को मिलाना चाहता है समरसता अथवा समन्वय से आनन्द का सृजन होता है इस आनन्द को मानवता के कल्याण में नियोजित करना रचनाकार का मुख्य उद्देश्य है प्रसाद एक मानववादी के रूप मेंकामायनीमें आते हैं जो जीवन को सर्वांग सम्पूर्ण तथा मानवता को सुखी बनाने में प्रयत्नशील हैं भावना क्षेत्र में कामायनीकार व्यापक दृष्टिकोण लेकर प्रस्तुत हुआ
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संदर्भगत सूची
1.         काव्य और कला, पृष्ठ 22
2.         इरावती, पृष्ठ 2
3.         प्रेमशंकर, हिन्दी स्वच्छन्दतावादी काव्य, पृष्ठ 20

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