कहानी: सृजन

आशीष सहाय श्रीवास्तव

कभी-कभी कुछ घटनाएँ ऐसी घट जाती हैं, जो व्यक्ति के जीवन में नया सृजन कर जाती हैं। बड़े ही नहीं,  बच्चों विशेषकर किशोरावस्था को पार करते छात्र-छात्राओं के मानस पटल को भी ऐसी कई घटनाएँ गहरे तक प्रभावित करती हैं। ये घटनाएँ हमें कुछ समय के लिए भले ही विचलित कर दें, परंतु वे हमारा आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और कुछ कर गुजरने की लगन को सशक्त कर जाती हैं। ऐसा ही कुछ शांभवी के जीवन में भी घटित हुआ, जिसने शांभवी ही नहीं उनकी माँ के जीने की राह ही बदल दी।

मोहल्ले में नई-नई दो पहिया गाड़ियाँ और अपनी सहेलियों को स्कूटी चलाते देखकर शांभवी भी अपनी माँ से स्कूटी चलाने की जिद करने लगी। वह जब भी पढ़ाई से ऊब जाती, तो खिड़की में आकर खड़ी हो जाती और सड़क पर आते-जाते वाहनों को देखती। जब वह किसी लड़की को गाड़ी चलाते देखती तो स्वप्निल विचारों में डूब जाती। गाड़ी चलाने का रोमांच बेटी को किसी और ही सुनहरे संसार में ले जाता, जहाँ वह हवा से बातें करने लगती। हवा में खुले लहराते काले बाल, जींस और कुर्ती के साथ कमर में बंधा दुपट्टा, उसे नीलगगन और चंद्रदर्शन की ओर ले जाता, उसे लगता जैसे गाड़ी चलाने का आनंद वैसे ही आता होगा जैसे झील में आती-जाती लहरों के ऊपर छोटे-बड़े पक्षियों के साथ आकाश में उड़ना।

शांभवी के पिताजी सेना में होने के कारण उसके साथ नहीं रह सकते थे, इसलिए माँ अपनी बेटी का विशेष ध्यान रखती, ताकि उसे अपने पिता की कमी महसूस न हो। माँ, पढ़ी-लिखी थीं, वे चाहती तो किसी अच्छे संस्थान में नौकरी कर सकती थीं, लेकिन वे अपनी बेटी के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहती थीं और बेटी की आवश्यकताओं, आदतों और स्वभाव का भी पूरा ध्यान रखतीं। माँ ये भलीभांति जानती थीं कि बेटी को दिये हुए अच्छे संस्कार, सेवाभाव और शिक्षा ही उसके काम आएगी। फिर बेटी भी एक ही, इसलिए माँ घर में ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करती। आवश्यक  कामकाज के लिए घर में स्कूटी पहले से ही थी, जो अक्सर सीढ़ियों के नीचे खड़ी रहती थी।

जब कभी भी बेटी दो पहिया गाड़ी पर बैठती या गाड़ी चलाने की जिद करती तो माँ प्यार से यही समझाती कि पहले बड़ी हो जा फिर चलाना। 18 से पहले तो लायसेंस भी नहीं बनता। माँ ये बताना चाहती है कि नियमों का पालन भी जरूरी है ये नहीं कि मन में जो आया कर दिया। छुटपन में भी बेटी जब कभी मौका मिलता, माँ की दुपहिया गाड़ी पर बैठ जाती और मुँह से पी-पी की आवाज निकालकर हार्न बजाती और गाड़ी का हैंडल हिला-डुलाकर मुँह से भुड़र्र-भुड़र्र भुर्र.र्र र्र.... जैसी आवाज निकालकर गाड़ी चलाने का अहसास करती। लेकिन बड़े होते-होते बेटी को गाड़ी चलाने का काम दुनिया का सबसे कठिन काम लगने लगा, वह अक्सर सोचती पता नहीं कब गाड़ी चलाना आएगी और वह कब अपने सपनों की उड़ान भरेगी।

ऐसी स्थिति में जब कभी भी शांभवी की मां को कोई निर्णय लेना होता तो वह यह सोचती कि यदि शांभवी के पिता होते तो ऐसी स्थिति में क्या करते? तब वह अपना निर्णय लेती। फिर वह भी कॉलेज जाने के दौरान अपनी रिश्ते की बड़ी बहिन से गाड़ी चलाना सीखीं थीं, जो उनके बहुत काम आई। मोहल्ले में एक तो वैसे ही लड़कियाँ कम ही थीं, जो तीन-चार घरों में बड़ी लड़कियाँ थीं वे सभी गाड़ियाँ चलाने लगी थीं। उन्होंने पाया कि आधुनिक समय की माताएँ अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाने के सभी जतन करती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को स्कूटी चलाना सिखाने की हामी भर दी। उन्होंने अपनी बेटी का धैर्य, संयम और सहनशीलता बढ़ाने के लिए कुछ दिन रूकने, मुख्य सड़क पर फिलहाल गाड़ी न ले जाने और रसोईघर में हाथ बँटाने की शर्त भी रख दी। बेटी भी गाड़ी चलाने को लेकर उत्साहित थी इसलिए तुरंत हॉं कर दी। इसके बाद जब माँ ने पाया कि बेटी ने गाड़ी चलाने की रट छोड़ दी है तो एक दिन वह बाजार से यातायात नियमों का सुंदर-सा चार्ट खरीद लाईं, ट्यूशन के बाद उन्होंने सभी को यातायात नियमों की जानकारी चार्ट के माध्यम से प्रदान की। सड़क किनारे लगे संकेतों के बारे में भी रंगीन चित्रावली से समझाया।  प्रश्नोत्तर के माध्यम से उन्होंने बेटी की जिज्ञासाओं को पूरा किया। स्पीड ब्रेकर पर गाड़ी धीमी करने, कभी भी तेज गति से ओवरटेक न करने, दायें-बांयें मुड़ने के लिए इंडीकेटर जलाने, बेवजह हार्न न बजाने, पानी, कचरा, तेल या रेत-गिट्टी जिस जगह पड़ी हो, वहाँ गाड़ी चलाने में विशेष सतर्कता बरतने, गाड़ी पंचर होने पर पूरी गाड़ी घसीटकर न ले जाने और हेलमेट अवश्य लगाये रखने जैसी बातें बताई और इनसे संबंधित प्रश्न भी पूछे। बेटी के द्वारा सभी प्रश्नों के उत्तर कुशलतापूर्वक दे दिये जाने के बाद भी माँ सशंकित थी, क्योंकि जब उन्होंने अपनी किशोरावस्था में गाड़ी चलाना सीखी थी, तब सड़क की रैलिंग से टकराने के कारण वे दुर्घटना का शिकार हो चुकी थीं। वे नहीं चाहती थीं कि ऐसा कुछ बेटी के साथ भी हो। इसलिए वे पूरी योजना के साथ बेटी को प्रशिक्षित करने लगीं। माॅ ने बेटी को ये भी बताया कि आखिर क्यों पानी या तैलीय सड़क पर गाड़ी फिसल जाया करती है। पानी वाहन चलाते समय रबर के पहिये अक्सर सड़क पर अपनी पकड़ छोड़कर कुछ ऊपर उठ जाते हैं और सजगता न बरती जाए तो गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त होते देर नहीं लगती।       

इतना सब होने के बाद माँ ने बेटी को सुबह पांच बजे उठने को कहा, और धीरे-धीरे स्कूटी चलाना सिखा दिया। उन्होंने एक हाथ हमेशा ब्रेक पर रखने और सीधे देखकर गाड़ी चलाने की समझाइश दी, यह भी बताया कि गाड़ी चलाना हो या कोई भी काम करना हो, स्वयं पर विश्वास, जिम्मेदारी का भाव, सावधानी, सतर्कता, सक्रियता और निडरता अवश्य मन में होना चाहिए। निडरता भी ऐसी नहीं कि सामने से बड़ा-सा ट्रक आ रहा है और हम तेजी से आगे बढ़ते हुए बगल से निकल जायें, जहाँ जरूरी हो वहाँ साइड इंडीकेटर चलाकर गाड़ी को एक किनारे भी खड़े कर सकते हैं। अतिविश्वास में गाड़ी अनियंत्रित गति से न भगाने की सलाह भी दी गई। ये सारा ज्ञान मिलने के बाद अब अकेले ही बेटी, गाड़ी घर से निकालकर अभ्यास करने लगी। अब बेटी को मुख्य सड़क पर भी सुबह-सुबह गाड़ी ले जाने की अनुमति मिल गई। सुबह की ताजी हवा में गाड़ी चलाना सीखकर वह बहुत प्रसन्न हो उठी। बेटी को लगा कि वह अब पापाजी से मिलने भी जा सकती है।

एक दिन सुबह-सुबह जब वह खुशी-खुशी स्कूटी चला रही थी तो कुछ दूर आगे पहुँचते ही एक कुत्ते का पिल्ला सामने आ गया। बेटी ने उसे बचाने के लिए गाड़ी धीमी किये बगैर ही घबराहट में एकदम से ब्रेक लगा दिया। गाड़ी का एक्सीलेटर कम न होने के कारण गाड़ी घिसटते हुए पिल्ले के ऊपर ही जाकर गिर गई। शांभवी भी दूर फिका गई। वह जैसे-तैसे उठी और कपड़े झाड़े। देखा, पिल्ला भी घायल हो गया है। वह दर्द से कूकते हुए सड़क की एक ओर भाग ही रहा था कि बहुत से कुत्ते भौं....भौं...भूँ  भौंकते हुए वहाँ आ गए। आवारा काले, भूरे, सफेद, चितकबरे श्वानों के कान फोड़ू भौंकने की आवाज से शांभवी सहम गई। बड़ी मुश्किल से शांभवी बचते-बचाते घर आ पाई। ये बात बेटी ने अपनी माँ को नहीं बतायी। वह डर गई कि यदि माँ को बताया तो फिर गाड़ी नहीं चला पायेगी। इसके बाद वह संभल तो गई, पर उसके मन में वही बात घूमती रही। माँ ने जब बेटी के एकाएक उदास रहने का कारण पूछा तो समझ गई कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ है। माँ के बार-बार पूछने पर बेटी ने भी बता दिया कि सुबह गाड़ी से पिल्ला घायल हो गया। उसे अच्छा नहीं लग रहा। उसके भी पैर और हाथ में मोच-खरोंच आई है। इसके बाद माँ-बेटी ने जाकर देखा तो पिल्ला वहीं फुटपाथ पर खेलता मिला। उन्होंने देखा कि पिल्ले को पशु  चिकित्सालय ले जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि बेटी को आरटीओ ले जाकर लायसेंस बनवाने की जरूरत है, इसलिए घर लौट आईं।   

बेटी भी अच्छी तरह से गाड़ी चलाने लगी, वह कॉलेज, ट्यूशन ही नहीं जाती, घर का सामान भी स्कूटी से लाने-ले-जाने लगी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन शाम को माँ की तबियत खराब हो गई, बेटी ने अस्पताल में ले जाकर डॉक्टर को दिखाया और माँ को घर छोड़ने के बाद दवाई लेने मेडिकल स्टोर चली गई। लौटते समय हल्की बारिश और अंधेरा गहराता देख घर जल्दी पहुंचने के चक्कर में जब गाड़ी की स्पीड कुछ अधिक थी, आवारा श्वान तेजी से भौंकते हुए गाड़ी के साथ भागने लगे। बेटी चौंक गई, क्या करे, गाड़ी तेज की तो, झपटमार अंदाज में दो-तीन श्वानों ने और तेजी से दौड़ लगा दी। सामने से बड़ी गाड़ी आ रही थी, आखिर बेटी को गाड़ी रोकना पड़ी। गाड़ी रूकते ही श्वान भी कान खड़े करके भौंकते हुए रूक गए। वे बेटी के पैरों के पास और गाड़ी के पहिये को सूंघने लगे। शांभवी का दिल अब तक जोर-जोर से धड़कने लगा था, हिम्मत जुटाकर धीरे से बेटी ने गाड़ी आगे बढ़ा दी और घर आ गई। घर पहुंचकर माँ को डॉक्टर के निर्देश अनुसार दवा दी और सोने के लिए बिस्तर पर चली गई। बेटी को वापस वही कुत्तों के लपकने का घटनाक्रम याद आ गया। सोचा कुछ करना पड़ेगा। ऐसे तो कई लोग दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। बेटी की सोचते हुए ही नींद लग गई।

सुबह उठी तो अपनी पढ़ाई की टेबिल पर आकर एक सफेद कागज और पेन से लिखने लगी। माँ ने पूछा तो बताया कि वह महापौर को पत्र लिख रही है, जिसमें आवारा श्वानों को पकड़ने का अभियान जारी रखने के लिए बधाई दी गई, साथ ही आवारा कुत्तों के लिए एक अलग आश्रम बनाने का सुझाव भी दिया गया। ये पत्र बेटी ने सोशल साइट और मुख्यमंत्री के सुझाव वाली वेबसाइट पर भी साझा कर दिया। एक दिन समाचार-पत्र पढ़ते हुए बेटी ने देखा कि समाचार-पत्र में पाठकों के लिए एक समस्या-सुझाव प्रतियोगिता आयोजित की गई है जिसमें पूछा गया है कि आप अपने शहर के लिए क्या करना चाहते हैं तो बेटी ने भी हिस्सा लिया और आवारा कुत्तों के लिए आश्रम बनाने की बात बताई। बेटी के सुझाव को इतना पसंद किया गया कि गली-मोहल्ले के सड़क पर आवारा घूमते रंग-बिरंगे श्वानों के लिए नगर सरकार ने आश्रम बनाने की घोशणा कर दी। आवारा कुत्तों के लिए आश्रम बनाया गया, जहाँ लोग स्वेच्छा से कुत्तों की सेवा कर सकते थे। जो व्यक्ति ज्योतिष ग्रह नक्षत्र के अनुसार चलते वे आश्रम में आकर श्वानों को तेल-घी चुपड़ी रोटी, ब्रेड, बिस्किट खिलाते। कुछ पैसे भी दान कर जाते। आश्रम में श्वानों की अच्छे से देखभाल होने लगी, समय पर डॉक्टर टीकाकरण करते।  देखते ही देखते आश्रम आकर्षण का केन्द्र बन गया। कई माता-पिता अपने बच्चों को श्वान आश्रम की सैर पर ले आते, जहाँ छोटे-बड़े सभी नस्ल के एक से एक श्वान अपनी ही शैली में दिखाई देते, बच्चे इन श्वान को सुरक्षित तरीके से देखकर बहुत आनंदित होते, तो कुछ धनवान, सुरक्षा की दृष्टि से श्वान आश्रम से कुत्ते पालने के लिए ले जाने लगे और इस प्रकार आश्रम की आमदनी भी होने लगी।

शांभवी के पिताजी जब दीवाली पर अवकाश लेकर घर आए तो उन्होंने पाया कि माँ-बेटी की पहल पर बहुत अच्छा श्वान आश्रम संचालित हो रहा है, उन्हें गर्व की अनुभूति हुई। बोले: मन को प्रसन्नता हुई ये जानकर कि हम देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लड़ रहे हैं और मेरी प्यारी-सी बेटी देश की अंदरूनी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष कर रही है। एक सच्चे सैनिक के रूप में पिता ने अपनी बेटी को अच्छी पहल के लिए सलाम किया। पिता का ये अंदाज देखकर बेटी के कानों में भी जन-गण-मन राष्ट्रीय गान की संगीतमय धुन गूंजने लगी। भारत माता की जय।

स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल मप्र
चलभाष: +91 887 158 4907
ईमेल: ashish35.srivastava@yahoo.in

11 comments :

  1. जीवन के बहुत सारे पहलुओं का स्पर्श करती हुई एक अच्छी कहानी के लिए आशीषजी असपको बधाई

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    1. किशोर वय पाठक को सजग, धैर्यवान और रचनात्मक विकास का पाठ पढ़ाती सकारात्मक सोच की अच्छी कहानी ।शिल्प और कसावट पर थोड़ा प्रयास किया जा सकता है बहुत बधाई ।

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    2. सादर नमस्कार! आदरणीय राजेन्द्र जी। आपकी कीमती सलाह, और सुझाव को अवश्य ही ध्यान में रखा जाएगा। आपके लिए आभार जो आपने न केवल कहानी को पढ़ा बल्कि अपनी प्रतिक्रिया से अवगत भी कराया। हमारी ओर से देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा। विश्वास है भविष्य में भी आपका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। धन्यवाद!

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  2. बहुत-बहुत धन्यवाद। आदरणीय प्रगति जी, आपकी बहुमूल्य टिप्पणी प्राप्त हुई। आज के व्यस्त समय में जब विस्तृत प्रतिक्रियाओं का अभाव हो गया है तब आपके द्वारा व्यक्त किये गए विचार हमारा उत्साहवर्द्धन करने के लिए काफी हैं। हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। विष्वास है भविष्य में भी आपका मार्गदर्षन प्राप्त होता रहेगा। साधुवाद

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  3. आप की कहानी सृजन बहुत अच्छी है। जिंदगी की सार्थकता को सिद्ध करते हुए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज ।
    मेरी बेटी दिव्या सड़क के बीमार दुर्घटनाग्रस्त कुत्तों की ऐसी ही सेवा करती है। वह उन्हें डॉक्टर को दिखाकर दवा इंजेक्शन आदि का प्रबंध करती है और उसके स्वस्थ होते तक महीनों अपने पास रख कर उसी जगह छोड़ना ताकि वह अपनी टेरिटरी में खुश रहे।
    सच्चाई से परिपूर्ण कहानी। बहुत बहुत बधाई।।

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    1. सादर नमस्कार! सर्वप्रथम देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा। आपकी बहुमूल्य टिप्पणियां प्राप्त हुई। आज के व्यस्त समय में जब विस्तृत प्रतिक्रियाओं का अभाव हो गया है तब आपके द्वारा व्यक्त किये गए विचार हमारा उत्साहवर्द्धन करने के लिए काफी हैं। हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। विश्वास है भविष्य में भी आपका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। धन्यवाद! सम्मानीय दिव्या जी को भी नेक कार्य के लिए सादर नमन! बुजुर्गों का कहना है कि नेकियां लौट कर आती हैं।

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  4. आप की कहानी सृजन अच्छी है। सीधा सपाट तरीके से आगे बढ़ती है। संवाद शैली का थोड़ा अभाव मगर कथनाक जबरदस्त। बहुत बहुत बधाई।

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    1. आपकी ही पोस्ट की गई एक रचना का एक शेश्र कि ‘‘कौन किसको पूछता टूटे हुए आशियानों में, हम अपनी ही कब्र में सिमटकर रोये जार-जार’’ आज के व्यस्त समय में जब लोग इसी प्रकार का एकाकी जीवन जीने को विवश हैं, और एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होने तक का समय नहीं है तब आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया उत्साहवर्द्धन करने के लिए काफी है। आपको सादर नमस्कार! आदरणीय जय हिंद जी। आपका उपनाम मन को छू लेता है। आपके लिए आभार जो आपने न केवल कहानी को पढ़ा बल्कि अपनी प्रतिक्रिया से अवगत भी कराया। हमारी ओर से देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा। विश्वास है भविष्य में भी आपका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। धन्यवाद!

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  5. आज की सबसे ज्वलंत समस्या पर आपने कलम चलाकर लेखकीय धर्म का निर्वहन किया है आपको बधाई। सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की बढ़ती संख्या कहीं न कहीं आम जनमानस को चिंतित करती है परंतु इन दुर्घटनाओं को रोकने के ठोस उपाय करने होंगे। प्रस्तुत कहानी हर भाषा में अनुवादित होकर जहां तक पहुंचे वहां तक कम है। प्रकाशन और लेखक दोनों को धन्यवाद

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  6. हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। आपकी बहुमूल्य टिप्पणियां प्राप्त हुई। आपके द्वारा व्यक्त किये गए विचार हमारा उत्साहवर्द्धन करने के लिए काफी हैं। विश्वास है भविष्य में भी आपका मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। धन्यवाद!

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  7. ईश्वर आपको सर्वश्रेष्ठ लेखन की शक्ति प्रदान करें। ऐसी रचनाएं सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं बल्कि मैगजीन और समाचार पत्रों में भी प्रकाशित होना चाहिए। ऐसी रचनाएं समाज के लिए जरूरी व पठनीय हैं। धन्यवाद हमारी बधाई आ. आशीष भाई ऐसे ही सार्थक कलम चलाते रहिए हमारी शुभकामनाएं।

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