लघुकथा: विकल्प

ऋचा जोशी


उस दिन बेटे की शादी की खरीददारी से वापस आई तो देखा बरामदे में गौरैया का घोंसला पड़ा हुआ था। पशु-पक्षी प्रेम के चलते उसे घर ले आई।

चोंच फैलाये चीं चीं करते दोनों बच्चे माँ का इंतज़ार कर रहे थे। रसोई से चावल ले कर खिलाया, शांत हो गए।

शादी की भागदौड़ में उन्हें संभालना थोडा मुश्किल था,पर पतिदेव ने सहयोग किया, हम एक पिंजरा ले आये, समय पर खाना पीना दे दो तो बस फुदकते रहते उसमे। महीने भर में तो अच्छे बड़े हो गए, पंख भी आ गए, दोनों नर चिड़ा थे।

मुझे पक्षियों को पिंजरे में रखना पसंद नहीं है इसलिए मैं घर के अंदर ही उन्हें उड़ने का अभ्यास कराती रहती और फिर एक दिन उन्हें खुले आसमान में उड़ने को छोड़ दिया पर शाम होते ही दोनों वापस आ जाते, सच बड़ा सुकून मिलता दिल को।

इस बीच बेटे की शादी हो गई, बहू भी घर आ गई, पर पता नहीं क्यों, हमारे पूरे सहयोग के बाद भी, हमारे साथ,उसका मन, नहीं लग रहा था।मुझे एहसास हो रहा था की दोनों तनाव में रहते हैं।

आज सुबह बेटे ने बोला की "माँ  मैंने अपने दफ्तर के पास एक मकान देख लिया है, हम यहाँ  सहज महसूस नहीं कर रहे हैं" अभी उन दोनों को विदा कर के आई।

मन बड़ा खराब था। बालकनी में जाकर खड़ी हुई तो देखा मेरा एक चिड़ा अपनी चिड़ी के साथ वहाँ घोंसला बनाने की तैयारी में है। मुझे देखते ही, फुदकता हुआ मेरे पास आ गया जैसे बोल रहा हो... माँ मैं हूँ ना!

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