काव्य: सारिका पारीक 'जुवि'

तेरी यादों का दिसंबर

इतनी कड़ाके की सर्दी
बरसों के रिकॉर्ड टूट गए
अरे स्वेटर कहाँ है तुम्हारा?
अटैची में
मर जाओगी
यह काशी हैं
बदन नीला पड़ने लगेगा
फिर न दवा न दारू
नहीं-नहीं, मुझे ठंड नही लगती
कोई जड़ी-बूटी खा ली?
नसा-पत्ता कर लिया?
अच्छा! मेरा कोट पहनोगी?
हाँ! जरूर
कितना प्रपंच किया था
उसकी साँसों की खुशबू से भीगा
उतरा गर्म कोट पहनने के लिए
स्वर्ग के पारिजात का वैभव
भी न्यून हीं प्रतीत हो रहा था
उस साल के बाद गर्म कोट से परहेज़ कर रखा हैं
किसी ने हाथ देखकर कहा था
दिसंबर भारी है बिटिया
ई महीना निकल जाइ, तो खूब जियब।
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स्मृति लोप

मुझें स्मृति लोप होता जा रहा हैं
कुछ याद ही नहीं रहता
चाय में चीनी
पौधों को पानी
सब हवा हो रखा है
लेकिन इतनी
उहापोह में
मुझे याद है
सालों पहले जब मिली थी
उसकी सफेद शर्ट
और वो काले बूट
जिस पर अपने पैरों की
लाल मिट्टी लगा दी थी
कितनी डॉट पड़ी थी
लेकिन स्मृति दोष तो है
कल भूल गई
ख के बाद ' घ 'या  'ग'
हँसी हो गई
अरे कैसी कवयित्री हो?
बारह खड़ी भूल गई
झेंप गई थीं
इन सारी किल्लतों  के बावजूद
मैं भूलती नहीं
उसका वो रुमाल
जो सहेज रखा हैं
मेरी पुरानी डायरियों
के बीच में
मगर दुविधा हैं
कुछ याद ही नहीं रहता
आज अपने ही घर का रास्ता भटक गई
न जाने कैसे?
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एक टुकड़ा आसमान

अनमने भाव से उपजे
सृजन को मैंने तिलांजलि
देना ही उसका सार्थक
प्रकाशन समझा
क्या लिखने को कुछ शेष नहीं?
शून्य मन और मस्तिष्क
पंगु होकर
अपने होने पर
पश्चतयाप कर रहे हैं
उस मेले में खोई हुई बच्ची की तरह
जिसका हाथ छोड़कर कोई
भाग गया हैं
केवल एक याद है
अनामिका उँगली का स्पर्श
खंडित रिक्त मन
जिसमें न प्रेम है न वात्सल्य
इतने विशाल भूमंडल पर
होना चाहिए था न?
उसका भी कहीं
एक टुकड़ा आसमान।
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क्या कभी संभव होगा

मेरी कविताओं की
एक विडंबना रही हैं
जिसके लिए लिखती हूँ
उसकी समझ से परे हैं
शब्द हमेशा ऊपरी
सतह छू कर
लौट आते हैं
कई बार पूछा
अपना नाम पढ़ा?
हर प्रश्न  पर
निरुत्तर लौट आई
कहीं कोई तो उपाय हो?
कोई जादू, कोई मंतर
कविता साध्य हो जाए
उसके सौहर को
अमरत्व प्राप्त हो सकें
अब कैसे लिखूँ?
एक तीर जो बेध सकें
उसके भीतरी कोर को
एक धारा उसकी आँखों
से भी निकले
क्या कभी संभव होगा?
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चुटकी भर नमक

मैंने मेरी सुंदरतम
कविताओं का सृजन
रसोई में किया
क्योंकि वहाँ कोई
वाद-विवाद नही होता
सारे मसाले
मेरे कहे अनुसार
चलते हैं
सारी बर्नियाँ
मुझसे निश्चल प्रेम करती हैं
कभी कोई उपहास नहीं
और मेरी इसी सबसे
पसंदीदा जगह के
ऊँचे वाले शेल्फ
पर रखती हूँ
लाल मिर्च का आचार
जो याद दिलाता हैं
उसके तीखे खट्टे
गुस्सैल, चटपटे स्वभाव की
इतना सुनते ही
त्योरियाँ टेढ़ी हो गई
मैं अचार, तो तुम क्या हो?
मैं वो हूँ जो इन सारे
मसालों की सत्ता बनाए हुए है
जिसके बिना हर स्वाद व्यर्थ
अति घुलनशील पदार्थ
वही तुम्हारी
चुटकी भर नमक।

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