राष्ट्रीय एकता: भाषा, समाज और संस्कृति

- आर सपना

हिंदी प्रवक्ता, हिंदी महाविद्यालय, हैदराबाद

राष्ट्रीय एकता भारत की आत्मा है और राष्ट्रीयता एक प्रकार की भावना है तथा राष्ट्र मनुष्यों का वह समूह है जो इस भावना से अनुप्राणित रहता है। राष्ट्रीयता का अर्थ है- एक प्रकार की एकता की भावना, जिसका आधार विभिन्न प्रकार की समानताएँ हैं; जैसे- मूलवंश, जाति, धर्म, भाषा, इतिहास, भूगोल, राजनीतिक, आकांक्षाएँ आदि। यह एक प्रकार की राष्ट्रीय आध्यात्मिक भावना है। यह आम जनता का सम्मिलित गुण है। राष्ट्र के विभिन्न वर्गों की संस्कृति, परंपराओं तथा जीवन प्रसार के लिए आपसी सद्भावना और सम्मान प्रमुख है।

‘‘प्रत्येक राष्ट्र की अंतरात्मा उस देश की जाति, भाषा और संस्कृति को लेकर ही चलती है और हम देखते हैं कि इन तीनों की आपस में एक बड़ी ही गहनतम आत्मीयता स्थायी रूप से आदि-काल से ही चली आ रही है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक भाषा होती है वह उस राष्ट्र में रहने वाले मनुष्यों की अंतरात्मा की ध्वनि है जिसके माध्यम से वे अपने विचारों का आदान-प्रदान और भावों का प्रदर्शन करते है।’’1

रवीन्द्रनाथ टैगोर का विश्वास है कि आत्मज्ञान तथा आत्मानुशासन के द्वारा नैतिक उत्थान संभव है जिससे मानव-मन में सद्गुण और सद्वृत्तियाँ जन्म लेती है और अंततः मानव को आंतरिक प्रदीप्ति प्राप्त होती है। वे मानव मात्र की एकता में विश्वास करते थे उनके अनुसार ‘‘मानवता को पहले अधिक विस्तृत, भावुकतापूर्ण और शक्तिशाली एकता की अनुभूति करना है।’’2 संसार की समस्त मानवता पारस्परिक सहानुभूति की कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत होकर सांस्कृतिक और भावात्मक एकता का अनुभव करता है। राष्ट्र के विकास के दो स्तंभ समाज और संस्कृति है। मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज के अभाव में उसके विकास और जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

हिंदी साहित्य की भाषात्मक प्रकृति और भाषिक चेतना प्रारंभ से ही सामाजिक एवं समन्वयात्मक रही है। संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश देशव्यापी संपर्क के साधन बने। भारत देश में विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती है। यह भाषाएँ देश के विभिन्न भागों में प्रचलित है। इनका अपना शब्द-कोश, साहित्य और लिपि है। स्वतंत्रता के पश्चात् इन भाषाओं ने पर्याप्त प्रगति की है। जहाँ तक कविता, कहानी, उपन्यास आदि का संबंध है, इन भाषाओं में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। ‘‘नाथों और सिद्धों का साहित्य पूर्वी परंपरा और रासों तथा वीरगाथाओं का साहित्य पश्चिमी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी की विशाल चेतना में एकान्वित हो गया है। दोहा, चौपाई तथा अन्य समरूप छन्दों ने इसे एक सूत्र में बांध दिया है, वैसे ही जैसे शैव-वैष्णव पद साहित्य से सारा देश आज भी बंधा हुआ है।’’3 भारत में भाषा, धर्म, जन में जो भेद हैं, प्रकृति की ओर से जो भेद-विधान है, उन पर अपने हृदय की शक्ति से मानवों ने विजय पायी और अनेकता में एकता अथवा भेदों में अभेद का सूत्र खोज निकाला। भक्ति कालीन कवियों में सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, जायसी जैसे भेद-भाव रहित, उदार एवं उदात्त प्रेम-भाव से परिपूर्ण संतों की वाणी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। हरिव्यास ने लिखा -
‘‘भगतिवन्द अति नीचड प्रानी।
मोहि प्रान प्रिय अस मम बानी।।’’


भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वान था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। हिंदी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतंत्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी। साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिकता भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है।
हिंदी साहित्य प्रारंभ से ही मानवीय समता, सांस्कृतिक एकता तथा अपने भावात्मक विस्तार द्वारा विश्वव्यापी सामाजिक चेतना से युक्त रहा है। भारतीय साहित्य की विश्व में अपनी एक अलग पहचान है। भारतीय साहित्य की बहुआयामी एकता हिंदी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता का मूल आधार है। संस्कृति व्यक्ति के जीवन को परिशुद्ध करने या व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का एक साधन है। मैथ्यू आरनोल्ड के अनुसार- ‘‘किसी समाज और राष्ट्र की श्रेष्ठतम् उपलब्धियाँ ही संस्कृति है, जिनसे समाज एवं राष्ट्र परिचित होता है।’’ किसी समाज और राष्ट्र की सदियों की उपलब्धियों का समुच्चय है। संस्कृति मनुष्य के मन और मस्तिष्क की श्रेष्ठतम् उपलब्धियों का समाहार है ऋषियों, तपस्वियों और कर्मयोगियों की पुरुषार्थ गंगा है। हमारी संस्कृति जहाँ शांति, अहिंसा, कोमलता, सहिष्णुता, उदारता, दया का पाठ पढ़ाती है वहीं विपत्ति के समय वज्र के समान कठोर होकर परिस्थिति का सामना करने की प्रेरणा भी देती है।

‘‘भारतीय धर्म की सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति गीता है। इसमें स्वधर्म पालन करना, कर्तव्य-कर्म करना, दायित्व निर्वहन करना आदि कर्म का संकेत देते है। रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के प्रणेता है। धर्म के सर्वांगीण विकास के उपादान भी है। पुराण भी समन्वयात्मक धर्म का संकेत देते है। यही कारण है कि विभिन्नता में एकता और असमानता में समानता तथा विषमता में समता की स्थापना ही साहित्य की निधि है।’’4
समाज में व्याप्त सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद आदि राष्ट्रीय एकता के अवरोधक तत्व है। हमारे देश की भौगोलिक भिन्नता जिसमें अनेक क्षेत्रों व उनमें रहने वाले विभिन्न जातियों व संप्रदायों का समावेश है ये सभी परस्पर राष्ट्रीय एकता को कमजोर बनाते हैं।

यह हमारी एकता और अखंडता की बाधक बन गयी है। ‘‘राष्ट्रीय संचेतना को झकझोरने वाला काव्यजन मानस को आंदोलित कर नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का साहस भरता है। उन मूल्यों को महत्व देने के लिए प्रेरित करता है जिनमें हिंसा, घृणा को नकारकर एक उन्मुक्त वातावरण उत्पन्न किया जा सके और जिसमें सभी धर्म निश्चिंत होकर सांस ले सकें। यदि प्रत्येक राष्ट्रधर्मी काव्य अपने समाज के अंदर व्यापक उदात्त भाव और रचनात्मक संस्कार उत्पन्न कर सकें, तो निश्चय ही ऐसा काव्य मानव के कल्याण के लिए होगा। अर्थात् राष्ट्रीय-काव्य मूलतः मानवतावादी काव्य ही है।’’5

भारतीय इतिहास के उन गौरवपूर्ण नायकों, ग्रंथों और विचारों को शिक्षा का मेरुदण्ड बनाना होगा जो हमारी राष्ट्रीयता की भावना को प्रदीप्त और स्थिर बनाते है। बिना आदर्श राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण के न तो हमें प्रजातांत्रिक व्यवस्था का लाभ मिलेगा और न राष्ट्रीयता की भावना ही मुखर होकर सही जनमत को व्यक्त कर सकेगी। भारत का वैशिष्ट्य उसकी संस्कृति है। हमारा समाज अनेक रूपों में वर्गीकृत है। जिसमें विभिन्न धर्म, जाति, भाषा, मत विश्वास के लोग रहते है। यही समाज की शक्ति है।

संदर्भ :
1. शिक्षा समस्या : विशेषांक (1969), पृ.141
2. शिक्षा समस्या : विशेषांक (1969), पृ. 262
3. हिंदी भाषा संरचना एवं प्रयोग- डॉ. लक्ष्मीकांत पाण्डेय (द्वितीय खंड), पृ. 1
4. साहित्य समीक्षा के नये मानदण्ड- डॉ. पशुपति नाथ उपाध्याय, पृ.29
5. https://vimisahitya.wordpress.com

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