वर्तमान सन्दर्भ में ‘साये में धूप’

अरुण रंजन

शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
मोबाईल- 9565708701
ईमेल- arunranjankaviau@gmail.com


हिंदी ग़ज़ल साहित्य में दुष्यंत कुमार एक बहुत बड़े उपलब्धि माने जाते हैं। ये हिंदी ग़ज़ल के पहले कवि नहीं थे। इनसे पहले यह परंपरा अमीर खुसरो, कबीर से होती हुई आधुनिक युग में भारतेंदु युग में कुछ पनपती, सँवरती दिखाई पड़ती है, लेकिन इस युग तक ग़ज़ल हिंदी कम और उर्दू ज्यादा दिखाई देती है। दुष्यंत कुमार ने हिंदी गजल को हिंदी ग़ज़ल बनाया। हिंदी ग़ज़ल इनसे पहले देवनागरी में लिखी गई उर्दू ग़ज़ल दिखाई पड़ती थी।
परंपरागत रूप से देखा जाये तो ग़ज़ल का स्वरूप प्रेम प्रणय ही था, जबकि दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को परंपरागत प्रेम प्रणय के स्थान पर समकालीन समय से राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों से जोड़ दिया। दुष्यंत जी का ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ की ग़ज़लें समकालीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का इतिहास जानने के लिए सर्वाधिक उचित मालूम होता है। उस समय देश की राजनीतिक स्थिति बेहद अप्रिय एवं अशांत था, जिसके कारण देश बदहाली का शिकार था और रही बात जनता की, तो वो भी उसे समझ नहीं रही थी क्योंकि सरकार में उपस्थित सियासत करने वाले प्रतिदिन गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं-
मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत तू अभी इंसान है।

राजनेता कैसे कागजी करवाई करके देशवासियों को बहलाते एवं बहकाते हैं-
तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह,
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतर नहीं।

रहनुमाओं की आदतों पे फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को सम्भालो यारो।

दुष्यंत जी की ग़ज़लों में सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों पर बहुत पैनी नजर के साथ गहरी जाँच-पड़ताल दिखाई पड़ती है। इन्होंने आम जनता के दुःख-दर्द,  सरकार की चालाकी, धोखाधड़ी, पाखंड और जड़ हो चुकी व्यवस्था की मूल्यहीनता के खिलाफ काफी तीव्र ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त किया है-
कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए।

यहाँ पर बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी दुष्यंत जी ने। यहाँ प्रत्येक घर के लिए चराग की बात करते हैं। चराग का अर्थ प्रकाश या रोशनी यानी सुख, समृद्धि, शान्ति और समझदारी से है। सोचने की बात यह है कि आज चराग पूरे शहर या दूसरे शब्दों में कहें तो एक बहुत बड़े वर्ग के लिए उपलब्ध नहीं है। इस दृष्टि से यहाँ पर दुष्यंत जी की वर्ग चेतना बहुत स्पष्टता से दिखाई पड़ती है।

भारतीय समाज में  न जाने कितने वर्षों से रोटी, कपड़ा और मकान भारतीयों के लिए मौलिक समस्या के साथ-साथ चुनावी मुद्दा भी रहा है और न जाने यह सिलसिला अभी कितने समय तक चलेगा एवं जनता को लोकलुभावन वादों से ठगा जाएगा। जिन मौलिक समस्याओं से जनता निजात पाने के लिए वर्षों से उम्मीद लगाए बैठी है, वो उम्मीद आज भी कहीं-न-कहीं वैसा ही है। वातानुकूलित विचारग्रहों में जब चाय की चुस्कियों के साथ मौलिक समस्याओं पर मंत्रणा करने के लिए सियासत के लोग  इकट्ठा होते हैं और अपने अनुरूप कागजों पर समस्याओं का समाधान भी कर देते हैं। ऐसे लोगों पर दुष्यंत जी प्रहार करते हुवे नजर आते हैं –
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ,
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दआ
गिड़गिड़ाने का यहाँ कोई असर होता नहीं
पेट भर कर गालियाँ दो आह भर कर बद-दुआ

वर्तमान समय में यह देखा जाता है कि किस तरह से राजनीतिक पार्टियां विभिन्न प्रकार के जुलूस निकाल कर जनता को बाँटने और ठगने का काम करती हैं। आज जनता की चिंता राजनीति की दुनिया में सिर्फ दिखाने भर की रह गई है। जनता की समस्या का समाधान अब तो जलसों-जुलूसों में की जाती है। भव्य आयोजन किये जाते हैं यह बताने के लिए कि वे सभी के लिए कितने फिक्रमंद हैं। तमाम तरह के रथ निकले जाते हैं, करोड़ों रूपये खर्च होता है ये बताने के लिये कि सरकार ने अवाम के लिए कितना काम किया है। इसी पर दुष्यंत जी कहते हैं –
ये लोग हवन में यकीन रखते हैं
चलो यहाँ से चलें,  हाथ जल न जाए कहीं।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी सबको है लेकिन कभी-कभी समय ऐसा आता है जब इससे भी बचना पड़ता है। एक दौर तो वो था जब देश में आपातकाल लागू हुआ था और एक दौर आज का है जब आपातकाल तो नहीं लगा है फिर भी काफी हद तक हालात वैसी ही बनती जा रही है –
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।

आज किस तरह से साम्प्रदायिकता, धार्मिक-पाखंड और जातिगत हिंसा का बोलबाला दिन-प्रतिदिन तीव्रगति से लगातार बढ़ता ही जा रहा है-
गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो उपनिषद खोले हुए हैं,
मजारों से दुआएँ मांगते हो
अक़ीदे किस तरह पाले हुए हैं।

रूढ़िवादी परंपराओं को चलाने वालों में यह डर हमेशा बना रहता है कि कहीं उस परंपरा को समाप्त करके हमारे रोजी-रोटी को ही खत्म कर दिया जाएगा, इसलिए कुछ लोग अपने फायदे के लिए अंधविश्वास और पुरानी रूढ़िवादी जंजीरों में जकड़ रखा है। इन पुराने डरों को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता होती है और वर्तमान समय में यह कई रूपों में सामने भी आया है। इसी संदर्भ में दुष्यंत जी का कहना है-
पुराने पड़ गए डर, फेंक दो तुम भी,
ये कचरा आज बाहर फेंक दो तुम भी।

भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संविधान विश्व में सबसे आदर्श माना जाता है। भारतीय संविधान के प्रस्तावना में ही वो सारे आदर्श समाहित हैं जो एक अच्छे लोकतंत्र के लिए जरूरी होता है लेकिन आदर्श तो आखिर आदर्श ही कहा जायेगा। हमारा संविधान प्रत्येक भारतीय की भलाई के दृष्टिकोण से बना है। हर वर्ग, धर्म, जाति और समाज से सम्बंधित व्यक्ति को इसका लाभ मिलना चाहिए। किंतु व्यवहारिक धरातल पर देखा जाय तो संविधान अपनी जगह है और विशेष व्यक्ति, विशेष वर्ग, विशेष जति और विशेष धर्म अपनी जगह है-
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है।

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के माध्यम से सरकारी कार्यालयों में लालफीताशाही और अफसरों की मनमानी चरम पर पहुंचने से आज की जनता भी यह जानते हुए कि किस प्रकार से उसे लूटा जा रहा है, फिर भी वह मजबूर है अपने आप को लूटते हुए देखने पर। करोड़ों रुपये के घोटालों की खबर मीडिया के माध्यम से जनता उतना ही जान पाती है जितना सरकार चाहती है, आज तो मीडिया भी निष्पक्ष रूप से अपना काम नहीं कर रही है। यह हमारे लिए बहुत ही दुःख का विषय है। कितनी ही योजनाएँ सामने आती है, किंतु गरीब तो और गरीब होता जा रहा है। यहाँ पर दुष्यंत जी आज भी सच्चाई के काफी करीब हैं-
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

यह निर्विवाद है कि जितनी योजनायें आमजन के लिए चलाई जा रही है उसका लाभ आंशिक रूप से ही जनता को मिल पाता है। आज भी भारतीय किसान को अपनी मूलभूत समस्याओं से सामना करना पड़ता है। इनकी स्थिति अभी भी वैसी ही है, ये फिर भी अपने स्वाभिमान के साथ मेहनत करते हैं और अपने हक के लिए समय-समय पर आवाज उठाते रहते हैं। लेकिन इन परिस्थितियों से तंग आकर जब इनके पास कोई रास्ता नहीं होता है, तब कई बार ये हताश होकर ख़ुदकुशी का रास्ता अपना लेते है और इनकी ये ख़ुदकुशी, इनके द्वारा चुना गया रास्ता नहीं अपितु व्यवस्था द्वारा सुनियोजित हत्या की साजिश है। इस परिस्थित को दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है-
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।
कई फ़ाके बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं कि ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।

उपर्युक्त विवरणों के माध्यम से यह कहा जा सकता है कि सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में आम-जनमानस की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उनके सम्बन्धों में तमाम तरह के उलझनों को व्यक्त करते हुए नजर आते हैं दुष्यंत कुमार। अपनी लेखनी के माध्यम से इन्होंने आत्मसंघर्ष और अंतर्द्वंद से भरे अनुभवों से दुधारी तलवार का काम लिया है। इन्होंने सर्वहारा वर्ग के रोजमर्रा से जुड़ी हुई समस्याओं, भय, शंकाओं, कानून-व्यवस्था, न्याय की गड़बड़ियाँ, मानवीय मूल्यों का हनन, सामाजिक विषमता और राजनीतिक धोखाधड़ी को दुष्यंत जी ने आशावादी स्वरों में एवं भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच को प्रस्तुत किया। इसी कारण से इनका स्वर समकालीन समय में भी काफी तीव्र सुनाई पड़ता है तथा इनका स्वर युग का स्वर बन चुका है।

सन्दर्भ ग्रन्थ 

1. साये में धूप: दुष्यंत कुमार, राधाकृष्ण प्रकाशन
2. साठोत्तरी हिंदी ग़ज़ल शिल्प और संवेदना: डॉ. सादिका असलम नवाब ‘सहर’, प्रकाशन संस्थान
3. गद्यकोश

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