दो कविताएँ

- कमलेश कुमार दीवान


अकेले मन का गीत

ओ अकेले मन,
तुझे चलना पड़ेगा

बहुत झगड़े हैं,
ठहरकर आबाद रहने में
सब तरफ से उगलियाँ उठती
भीड़ में अपवाद रहने से।

समय अब चुक गया है
सहन करने का
श्वाँस की उष्माएँ सहने का भी
जीने को भी,
बाँटकर देखा
शहर और गाँव,
अनबन ढेर नातों में,
सोचते षड्यंत्र करते

ओ अकेले मन!


ओ दुनिया वालों  

मौसम हमेशा एक सा नहीं रहता
पेट भर के रोटियाँ मिलें
उनकी तो भूख मिट चुकी
दम-खम हमेशा एक सा नही रहता
हाथों को काम दो
और रह सकने को मकान
सपने दिखाने बंद कर दो
जितने भी कहर बरपे है
हो गये लहू लुहान
विधवाएं बन रही हैं साथ माँ-बेटियाँ या  फिर बहू

ओ दुविधा वाले हाथ मै तिरंगा उठाओ रे
ओ दुनिया वाले हाथ मे परचम उठाओ रे
मुट्ठियाँ बाँधे हुये ये हाथ।

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