विसंगतियों पर तीव्र प्रहार का रोचक संग्रह है “डोनॅल्ड ट्रंप की नाक”

समीक्षक: दीपक गिरकर

पुस्तक: डोनॅल्ड ट्रंप की नाक
लेखक: अरविंद तिवारी 
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी - 322201 
मूल्य: 195 रूपए
पेज: 120

“डोनॅल्ड ट्रंप की नाक” अरविंद तिवारी का सांतवा व्यंग्य संग्रह हैं। अरविंद जी के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है। इनके तीन व्यंग्य उपन्यास, एक आदर्शवादी उपन्यास और दो बाल कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा इन्होंने शिक्षा विभाग राजस्थान की मासिक पत्रिका शिविरा एवं नया शिक्षक का तीन वर्षों तक सम्पादन भी किया था। अरविंद जी ने दैनिक नवज्योति में ढाई वर्षों तक प्रतिदिन “गई भैंस पानी में” व्यंग्य स्तंभ और राजस्थान पत्रिका की इतवारी पत्रिका में “ठंडी गर्म रेत” शीर्षक से एक वर्ष तक साप्ताहिक स्तंभ लेखन किया था। इनकी रचनाएँ निरंतर देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. अरविंद तिवारी की गिनती आज के चोटी के व्यंग्यकारों में है। व्यंग्यकार ने इस संग्रह की रचनाओं में वर्तमान समय में व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं, विसंगतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं, खोखलेपन, पाखण्ड इत्यादि अनैतिक आचरणों को उजागर करके इन अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार किए हैं। इस व्यंग्य संग्रह में अधिकाँश व्यंग्य सामयिक घटनाओं पर आधारित हैं। साहित्य की व्यंग्य विधा में अरविंद जी की सक्रियता और प्रभाव व्यापक हैं।

अरविंद तिवारी
शीर्षक रचना “डोनॅल्ड ट्रंप की नाक” व्यंग्य में लेखक लिखते है ड्राइवर ट्रंप के सामने गिड़गिड़ाया “मैंने तो हुजूर प्रोटोकॉल के हिसाब से मध्य प्रदेश के नेता को गड्ढे वाली सडकों पर इसलिए घुमाया था, ताकि इन्हें विदेश में भी मध्य प्रदेश जैसे फीलिंग हो। व्यंग्य रचना “प्रमाण पत्रों वाला देश” में लेखक कहते है “दरअसल हमारे देश का विकास प्रमाणपत्रों पर टिका हुआ है।” और आगे कहते है “इस देश में प्रमाणपत्र के आधार पर कई नौजवान वृद्धावस्था पेंशन प्राप्त कर रहे हैं।” यह रचना अधिकारियों और कर्मचारियों के आचरण पर तीव्र प्रहार हैं। “राजनीति में रिस्क बहुत है” में लेखक लिखते है “जो राजनीति में आलाकमान के मूड को भाँप कर बयान देता है वही सफल होता है।” और आगे लिखते है “भाई साहब! मैं अपने ड्राइवर के थुलथुल बदन को लेकर चिंतित रहने के कारण उसे योग करने की सलाह देता रहता था। एक बार मैंने जब सलाह देने की अति कर दी, तो वह बोला, ठीक है मैं अभी इसी वक्त स्टेयरिंग छोड़कर योग शुरू करता हूँ। वह दिन था और आज का दिन है, मैंने ड्राइवर से कभी योग की चर्चा नहीं की। ड्राइवर से मुझे सबक मिल गया है। अब मैं किसी नेता को प्रधानमंत्री बनाने की सलाह नहीं देता।” राजनीति में सफलता के कई समीकरण होते हैं। इस रचना के माध्यम से व्यंग्यकार ने राजनीति के एक बहुत बड़े यथार्थ को उघाड़ कर रख दिया है। “नहीं आई खुशहाली” रचना में व्यंग्यकार कहते है "खुशहाली उर्फ़ अच्छे दिन जब तक नहीं आते तब तक इसे मुहावरा ही समझा जाएगा।” अपने खेमे के पिद्दी, साहित्य में ब्लू व्हेल, व्यंग्य के मारे नारद जी बेचारे, दिल्ली में धुंध और नेताओं का मोतियाबिंद, अपने-अपने कोहरे, सुदामा का सुथन्ना, उठो लाल अब डाटा खोलो, गोभी का डंठल, पुलिस थाने में चिंतन शिविर, देश का पारदर्शी हो जाना जैसे रोचक और चिंतनपरक व्यंग्य पढ़ने की जिज्ञासा को बढ़ाते हैं। कतिपय बानगी प्रस्तुत है। “ये पिद्दी राज्य सभा या विधान परिषद् की खाली होने वाली सीट पर नजर गढ़ाए होते हैं। मौक़ा मिलते ही, मौके का फ़ायदा उठा लेते हैं।” (अपने खेमे के पिद्दी) “साहित्य के अर्जुन अब चिड़िया की आंख में निशाना नहीं लगाते, बल्कि, उसे अपनी काँख में दबाए पूरे भारत का पर्यटन करते हैं। दूसरे के लिए चांस ही नहीं है, चिड़िया उनकी काँख में दबी है। साहित्य में प्रतिबद्धता क्रिकेट की रैकिंग हो गई हैं, हर रोज बदलती है।” (साहित्य में ब्लू व्हेल) “हिन्दी के व्यंग्यकारों की फितरत है, सुबह लड़ते हैं और शाम को फेसबुक पर एक दूसरे के साथ सेल्फी चेपते हैं।” (व्यंग्य के मारे नारद जी बेचारे) “धुंध के कारण दिल्ली की सरकार रुकी पड़ी है। एल.जी. साहब को दिल्ली के मुख्यमंत्री दिखाई नहीं देते, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री मोतियाबिन्द के कारण एल.जी. साहब को नहीं देख पाते। दिल्ली की जनता को धुंध के कारण न मुख्यमंत्री दिखाई देते हैं और न एल.जी. साहब। मुख्यमंत्री और एल.जी. साहब के बीच जो लड़ाई चलती है, उसके मूल में धुंध ही है।” (दिल्ली में धुंध और नेताओं का मोतियाबिंद) “वैसे भी हिन्दी के दर्जे को उठाना हमारी पहली प्राथमिकता है। हमारी संस्था यह काम बखूबी कर रही है। हमारा सम्मान समारोह इतना भव्य होता है कि लोगों को मंत्री के बेटे की शादी याद आ जाती है! ढाई लाख का सम्मान देने के लिए हम पच्चीस लाख रूपये समारोह पर खर्च कर देते हैं।” (सुदामा का सुथन्ना) “सुबह-सुबह सोशल मीडिया पर कबाड़ा डालने वालों की कमी नहीं है। कई तो पानी का लोटा लेकर ही सोशल मीडिया पर अवतरित होते हैं। उनका प्रेशर यहीं आकर बनता है।” (उठो लाल अब डाटा खोलो)

दीपक गिरकर
टाँग का टारगेट, एक जूता काफी है, आप तो अन्ना लगते हैं, रोटी मत तौलिए, सदन स्थगित होने का आनंद, रक्षाबंधन “लाइव”, टीवी चैनलों की बहस में हाथपाई और एक  लाइन के व्यंग्य जैसी व्यंग्य रचनाएँ अपनी विविधता का अहसास कराती है और पढ़ने की जिज्ञासा को बढ़ाती हैं। व्यंग्यकार ने इस संग्रह में व्यवस्था में मौजूद हर वृत्ति पर कटाक्ष किए हैं। देश में प्रमाणपत्रों, चमचों की अहमियत, राजनीति के अपने समीकरण, साहित्य, दिल्ली की सरकार और दिल्ली के एल.जी. के बीच सियासती धुंध, कोहरे में भिड़ंत, पुस्तक मेले की वास्तविकता, झूठ और दर्शन की जुगलबंदी, सोशल मीडिया, दलित सरोकार, मिड्डेमील की सच्चाई, बयानवीरों के बयान,  मध्यप्रदेश की सड़कें, इमोशनल चीटिंग, सरकार का अण्डरग्राउण्ड होना, देशभक्ति के टोटके, महंगाई पर गहन चिंतन, फागुन की महिमा, बुद्धिजीवी वर्ग, अच्छे दिनों का जुमला, चुनाव में जाति की महत्ता, रूकावट कला, पारदर्शिता, टीवी चैनलों की बहस इन सब विषयों पर व्यंग्यकार ने अपनी कलम चलाई हैं।

अरविंद जी पेशे से शिक्षक थे। उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को बहुत नजदीक से देखा, अनुभव किया है, उन्हीं विसंगतियों, मानवीय प्रवृतियों, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं को उन्होंने अपनी व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से उजागर किया है और साथ ही उन्होंने पाठकों को जगाने का भी प्रयास किया है। लेखक को जो बातें, विचार-व्यवहार असंगत लगते है वे उसी समय अपनी लेखनी से त्वरित व्यंग्य आलेखों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्षेत्र से जुड़े सभी कर्णधारों को सचेत करते रहते है और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर उन्हें झकझोर कर रख देते हैं। लेखक ने इस संग्रह में सबसे ज्यादा सन्दर्भ साहित्य की दुनिया से लिए हैं। व्यंग्यकार अरविंद तिवारी के लेखन में पैनापन और मारक क्षमता अधिक है और साथ ही रचनाओं में ताजगी है। लेखक के व्यंग्य रचनाओं की मार बहुत गहराई तक जाती है। संग्रह की सभी रचनाओं को बहुत रोचक शब्दों में लिखा है और गहरी बात सामर्थ्य के साथ व्यक्त करने का प्रयास किया है और वे अपने इस प्रयास में सफल हुए है। अरविंद जी व्यंग्य विधा के धनी है। आलोच्य कृति “डोनॅल्ड ट्रंप की नाक” में कुल 40 व्यंग्य रचनाएँ हैं। यह व्यंग्य संग्रह भारतीय व्यंग्य रचनाओं के परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हुआ है। नि:संदेह अरविंद जी की लेखन शैली और अनैतिक मानदंडों पर उनकी तिरछी नज़र देश के अग्रणी व्यंग्य लेखकों में उन्हें स्थापित करती हैं।

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड, इंदौर- 452016
चलभाष: +91 942 506 7036; ईमेल: deepakgirkar2016@gmail.com

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