अनकहे प्रेम की दास्तान: स्वरम्भरा

समीक्षक-डॉ.अरुण कुमार निषाद
पुस्तक-स्वरम्भरा (हिन्दी काव्य संग्रह)
लेखक-डॉ.राम विनय सिंह
प्रकाशन-विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून
संस्करण-2011
मूल्य- ₹ 170
पेज-96


प्रत्येक मनुष्य की जीवन में कुछ ऐसी  बातें कुछ ऐसी घटनायें होती हैं, जिसको वह किसी से कह नहीं पाता तो वह कलम और कागज का सहारा लेता। वह अपने उन्हीं मनोभावों को गद्य या पद्य के माध्यम से अपने चाहने वाले तक, किसी-न-किसी रुप में पहुँचता है। ऐसे ही कुछ अनकहे अल्फाजों का संग्रह है, डॉ. रामविनय सिंह द्वारा प्रणीत काव्य संग्रह “स्वरम्भरा”।

अरुण कुमार निषाद
डॉ. राम विनय सिंह का जन्म 10 जून 1970 ई. को हुआ था। इनके माता-पिता का नाम स्व. गायत्री देवी और स्व. महेन्द्र सिंह था। आप डी.ए.वी. (पी.जी.) कालेज, देहरादून में संस्कृत के प्रोफेसर हैं। आपकी रचनायें हैं- 1. शाश्वती (संस्कृत गीत संकलन), 2. मुक्ताशती (मुक्तक काव्य),  3. शेवधि: (संस्कृत काव्य), 4. स्वरम्भरा (हिन्दी गीत संकलन), 5.आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का संस्कृत कृतित्त्व: एक समीक्षा, 6. रोशनी के पृष्ठ (गजल संग्रह), 7. वैचारिकी (शोधात्मक निबन्ध संग्रह), 8. प्रणय पथिक (खण्डकाव्य), 9.घनाक्षरी (काव्य)।  

यह अभिलाषा हर प्रेमी की होती है कि- उसकी प्रेमिका को किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो। डॉ.राम विनय सिंह की इच्छा है कि उनकी प्रेमिका सदैव प्रसन्न रहे। उनके गुनगुनाती रहो’ गीत को पढ़कर उनके मन के भाव स्वत: प्रकट हो जाते हैं।
गीत सम्वेदना बन हरिक साँस  की
प्राण–वन में सदा गुनगुनाती रहो। [1]

कवि की इच्छा है कि- भले ही उसकी प्रेमिका से उसका मिलन देर में हो, परन्तु जब भी हो तो सुखद हो। ठीक वैसे ही जैसे गर्मी के बाद यदि वर्षा हो तो घनघोर वर्षा हो, जिससे प्राणी मात्र का मन तृप्त हो जाए।
जिन्दगी की नदी को समन्दर मिले
इस कदर धीरता का प्रणय कूल हो! [2]

प्रथम मिलन के स्पर्श सुख को कोई भी भुला नहीं पाता है। वह वैसे ही होता है, जैसे गूंगे के मीठे फल का स्वाद।
छुअन पा सिहरी बहुत नूतन कली,
गंध भी होने लगी कुछ मनचली,
भ्रमित भ्रमरों को न कुछ मालूम है,
हो रहा क्यों आज मन-वन सन्दली! [3]

डा.राम विनय सिंह कहते हैं कि- हे प्रिये! तुम सच में बताओ कि-तुम मुझको प्यार करती हो या तुम्हारा यह प्रेम केवल दिखावामात्र है।
एक पथ जो भावना से दूर है,
एक पथ जो भाव से मजबूर है,
तुम दूराहे पर शपथ लेकर कहो
जिन्दगी में कौन पथ मंजूर है। [4]

डॉ.राम विनय सिंह अपने प्रेम का ऐलान करते हुए अपनी प्रेमिका से कहते हैं कि-
तुम्हें किससे मोहब्बत है, न कुछ भी जानता हूँ मैं,
मुझे तुमसे मोहब्बत है, यही बस मानता हूँ मैं
हृदय के प्यार को तुम रेत का घर मान लो चाहे
मगर सच प्यार है उसको अछूता मानता हूँ मैं। [5]

पवन का हाल कविता में कवि लिखता है कि-हे प्रिये! मैं तुम्हें निशदिन अपलक निहारता रहता हूं। तुम भले ही किसी और को चाहो। [6]

माँगकर देखो! गीत की एक-एक पंक्ति प्रेमिका से प्रणय करती नजर आती है। [7]
डॉ.राम विनय सिंह लिखते हैं कि- हे प्रिये! तुम्हारे आने से मेरे जीवन में सब शुभ-ही-शुभ हो रहा है।[8]

तूने भी छला गीत में कवि ने अपनी प्रेमिका की निष्ठुरता का वर्णन किया है। डॉ. सिंह ने लिखा है कि- हे प्रिये! इस दुनिया ने तो मुझे पहले ही ठगा है। इस पर से तो मेरा विश्वास उठ चला है। आज तुम भी उसी दुनिया के रंग में रंग गई।
रात दिन मधुमास की चाहत रही,
स्वप्न में कुछ पास की आहट रही,
किन्तु तोड़ा इस कदर पतझार ने
वेदना की सांस अव्याहत हो रही। [9]

कवि अपनी प्रेमिका के याद में एकदम  हताश और निराश है। वह कहता है-
टूट गये सब तार बिखरकर साज हुई बेजान प्रिये। [10]

प्रेमी या प्रेमिका के दूर होने पर कितना कष्ट होता है। यह डॉ. राम विनय सिंह से बेहतर  कौन बता सकता है।तुम्हारी याद में कविता में वे लिखते हैं-
प्रिय तुम्हारी याद में जलता रहा दिन-रात मैं। [11]

कवि अपनी प्रेमिका पर अपना सम्पूर्ण न्यौछावर करने को तैयार है, बेशर्ते वह उसके प्रणय को स्वीकार कर ले।
तुम्हारी चाहतों के नाम दिल की भावना कर दूँ,
तुम्हारी आहटों के नाम कोमल कामना कर दूँ,
प्रणय के इस मधुरवन में प्रणय मेरा अजाना है,
कलम गर चूम लो पल में अनोखी सर्जना कर दूँ।
तुम्हें मंजूर हो तो भेद का मंजर मिटा देंगे,
प्रणय के पंथ से हर निर्दयी पत्थर हटा देंगे,
हमें तो तीरगी का खौफ कुछ लगता नहीं लेकिन,
हृदय के प्रेम मन्दिर मेम नया दीपक जला देंगे। [12]

प्रथम मिलन और स्पर्श की बात ही कुछ और होती है। डा.सिंह भी इस बात का समर्थन करते हैं।
देखा था जब चल चितवन ने,
पहली पहली बार तुझे,
अंखुआए बीजों ने जीभर
समझया था प्यार मुझे। [13]

हर प्रेमी की लालसा होती है कि-उसकी प्रेयसी एक पल के लिए भी उससे दूर न हो। 
मेरे नयनों के प्राण आज
बन ध्यान कहीं से आ जा रे! [14]

प्रेमी अपनी प्रेमिका को नाना प्रकार के विशेषणों से सुशोभित करता है। डॉ.सिंह भी इस विषय में क्यों पीछे रहते।
मैं खिंचा-सा तार, मृदु-झंकार तुम हो। [15]
सदा रहकर मुझी से दूर
मेरे पास होती हो।
अनामा रागिनी बनकर
हृदय के पास होती हो। [16]

डॉ. राम विनय सिंह का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। उन्हें हिन्दी भाषा के साथ ही संस्कृत उर्दू, तथा अरबी का भी सम्यक्‍ ज्ञान है। डॉ.सिंह के इस संग्रह के यदि कुछ गीत गजल शैली में हैं तो कुछ विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ कविता शैली में। उनकी वसंती रागआदि कुछ कवितायें तो पाठ्यक्रम में रखने योग्य हैं। डॉ. सिंह की लेखनी निरन्तर चलती रहे तो वे नित नये-नये प्रयोग करते रहें।

संदर्भ
[1] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 27
[2] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 28
[3] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 29
[4] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 31
[5] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 32
[6] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 33-34
[7] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 35-36
[8] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 40
[9] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 42
[10] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 49
[11] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 53
[12] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 54
[13] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या61
[14] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 63
[15] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 76
[16] स्वरम्भरा (गीत संग्रह), डॉ.राम विनय सिंह, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून, प्रथम संस्करण 2011ई., पृष्ठ संख्या 90  

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