लघुकथा: भुलक्कड़पन

- मीनू खरे

स्थानक प्रमुख, आकाशवाणी, बरेली


डॉ. देविना को अपने भुलक्कड़पन पर बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था। सोचा था कि वे अपने भाषण में पीयूष मेहरा के अपनी दिवंगत पत्नी के प्रति अतुलनीय प्रेम और समर्पण पर ज़रूर बोलेंगी पर भाषण देते समय यह बिन्दु भूल गईं जिससे मन खिन्न था।

डॉ. देविना बहुत अंतर्मुखी थीं। बड़ी अधिकारी होकर भी वे उद्घाटन, लोकार्पण, या मुख्य अतिथि बनने जैसे कामों से दूर रहती थीं पर जब पीयूष मेहरा  ने उन्हें  पिछले 14 वर्षों से अपनी पत्नी मोहिनी की स्मृति में जारी ग़रीब और बेसहारा बच्चों की मदद की मुहिम के बारे में बताया तो देविना जी बहुत प्रभावित हुईं। वे बतौर मुख्य अतिथि कार्यक्रम में पधारीं।

अत्यन्त भव्य कार्यक्रम था। पीयूष मेहरा पत्नी को श्रद्धांजलि देते हुए भावुक हो गए। बड़ी संख्या में ग़रीब बच्चों को किताबें, कपड़े, फ़ीस, खिलौने तथा मिठाई का वितरण देविना जी से करवाया गया। देविना जी अभिभूत थीं। उन्होंने सोचा कि वो अपने भाषण में बोलेंगी कि आजकल जहाँ लोग पत्नी के मरते ही दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर देते हैं वहीं पीयूष मेहरा इतने वर्षों से पत्नी की स्मृति में समाजसेवा का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। भाषण का समय आया तो देविना जी बच्चों की शिक्षा में पीयूष मेहरा के योगदान पर जम कर बोलीं। परंतु पत्नी वाले पहलू पर बोलना भूल गईं। यही उनकी खीझ का कारण था। किसी के इतने बड़े त्याग पर कुछ न बोलना उन्हें अपनी संवेदनहीनता लग रहा था।

कार्यक्रम के बाद डिनर के लिए तमाम विशिष्टि लोगों के साथ देविना जी भी बैठी थीं। एक ख़ूबसूरत सी युवती ने बड़ी आत्मीयता से खाने की प्लेट देविना जी को थमाते हुए कहा, “मैडम आपकी प्लेट मैंने अपने हाथों से लगाई है।”

देविना जी ने पूछा, “आपका परिचय?”

“जी, मैं पीयूष जी की पत्नी सुरभि हूँ।” युवती ने मुस्कुराते हुए कहा और अभी अभी आए कुछ मेहमानों को अटेंड करने लगी।

देविना जी अवाक रह गईं! उनकी मन:स्थिति को भाँप कर एक अथिति ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैडम आप नहीं जानती थीं इन्हें? मोहिनी के देहांत के तीन महीने के अन्दर पीयूष जी ने इनसे लव मैरिज कर ली थी... मोहिनी मेरी चचेरी बहन थी… और ये जो फ़ंक्शन करते है न हर बरस... इसमें सारा पैसा मोहिनी के पापा का लगता है। इकलौती सन्तान थी मोहिनी अपने पिता की... बूढ़े, लाचार, अरबपति ससुर का होनहार दामाद पीयूष मेहरा!”

जिस भुलक्कड़पन पर कुछ देर पहले देविना जी खीझ रही थीं वही इस समय उन्हें बड़ी राहत दे रहा था।

2 comments :

  1. बहुत अच्छी लगी यह लघुकथा .

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  2. अच्छी लघुकथा कभी-कभी सच ऐसे भी सामने आता है

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