समीक्षा: बुरी औरत हूँ मैं (वंदना गुप्ता) समीर लाल

किताब: 'बुरी औरत हूँ मैं
लेखक: वन्दना गुप्ता
मूल्य:  ₹ 270.00  रुपये
प्रकाशक: एपीएन पब्लिकेशन, नई दिल्ली

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’


वन्दना गुप्ता के उपन्यास ’अँधेरे का मध्य बिंदु’ के विषय में मैं कुछ अरसा पहले लिख चुका हूँ। हर लेखक का लेखन मँजते मँजते एक नई ऊँचाई पाता है। यही सोचकर मैंने उनका कहानी संग्रह ’बुरी औरत हूँ मैं’ पढ़ना शुरू किया। वन्दना गुप्ता से मेरा परिचय मूलतः एक ऐसी बोल्ड कवयित्री के तौर पर रहा है जिन्हें पढ़कर यूँ ही स्वीकार कर लेने वाले कम ही होते थे। बहुत अनर्गल टिप्पिणियाँ की जाती थी और वे सभी का यथोचित जबाब रखती थीं।

समीर लाल 'समीर'
 20 कहानियों वाले इस संग्रह ने मुझे बहुत प्रभावित किया आज एक बहुत बड़ा साहित्यकारों का वर्ग जहाँ कहानियों में कविताओं के बेजा इस्तेमाल से बचने की सलाह देता है ऐसे में इस संग्रह की बहुत सी कहानियों के बीच बीच में कवयित्री से भी मुलाकात होती रही किन्तु वे उस कहानी में ऐसे घुली मिली थीं कि पता ही नहीं चलता कि कब कहानी कविता का दामन पकड़ लेती है और फिर कब कविता से हाथ छुड़ा कर कहानी कहना शुरू कर देती है कहीं भी वे जबरदस्ती उतारी गई नहीं लगती हैं और वही सुन्दर सा ताना बाना बुनना ही खूबसूरती है वन्दना के लेखन की

बीसों कहानियाँ अलग अलग विषयों पर हैं और विषय भी सब आसपास के कहानी गढ़ने में वह कहानी और उसके तत्व को ही मूख्य बिन्दु मानती हैं और नई कहानी के फॉर्मेट की वे पक्षधर नहीं हैं, ऐसा वह खुद कहती है जब उनकी कहानियाँ पढ़ो तो वे इस बात को बखूबी निभाती भी नजर आती हैं

ये कहानियाँ उन्होंने छ साल के लेखन सफर में अलग अलग वक्त में लिखी हैं मगर मुझे तो कहीं भी परिपक्वता में कमी नजर नहीं आई शायद ही कोई बता पाये कि कौन सी कहानी आरम्भिक दौर की है और कौन सी लिखते लिखते मंझ चुकी लेखनी के दौर की बहुत सी जगह डायरी के पन्ने भी कहानी कहते दिखेंगे उनकी कहानियों में

विषयों की विविधता और उनका प्रस्तुतिकरण कमाल का है फिर वह किसी का एकाकीपन हो, उत्तरदायित्व का निर्वाह हो, एडवेन्चर के नाम पर लड़कों द्वारा की गई मस्ती की परिणिति की बात हो, डेमेंशिया या स्मृतिह्रास से जुझती एक माँ की मन में उमड़ते भावों की बात हो, या फिर औरत का एक ऐसे रास्ते पर निकल जाना जिसका अंत एड्स जैसी भयंकर बीमारी के साथ होते हुए अंत समय की मानसिक उधेड़बुन की बात हो, वन्दना की कलम ने सभी स्थितियों को बखूबी बया किया है

पाठक के मन में प्रश्न आ सकता है कि किताब का शीर्षक ’बुरी औरत हूँ मैं’ क्यों रखा? शीर्षक तय करना तो पूर्णतः लेखिका का अधिकार क्षेत्र है किन्तु अगर सबसे लम्बी कहानी को आधार माना जाये तो शायद इस संग्रह का नाम ’अमर प्रेम’ भी हो सकता था, तब शायद लोग इसे प्रेम कथाओं का संग्रह मान बैठते या फिर ’बुरी औरत हूँ मैं’ के बराबर लम्बाई की कहानी ’कातिल कौन’ रखती तो लोग इसे कुछ मर्डर मिस्ट्री जैसी पुस्तक मान कर उठाते किन्तु अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचते कि क्या शानदार संग्रह है कहानियों का दो कहानियों के कुछ हिस्से सिर्फ उनके लेखन की झलक देखने के लिए:
कहानी ’छोटी सी भूल या गुनाह’:

प्लीज बताओ मुझे“, जैसे पानी की एक बूँद के लिए कोई प्यासा तरसता है ऐसे घबराते हुए मयंक बोला, अंकल मेरे डैड नहीं हैं, मुझे मेरी मॉम ने ही पाला हैमेरे मॉम डैड का तलाक हो गया था और मेरी मॉम दोबारा शादी नहीं करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने अकेले माँ बनने का फैसला लिया और स्पर्म सेंटर से आर्टिफीसियल तरीके से मुझे जन्म दिया

जब उन्होंने जबरदस्ती पूछा तो जो सत्य आज तक किसी को नहीं पता था जब उससे नकाब उठा तो किसी के भी पैरों के नीचे खड़े होने को जमीन नहीं बची थीमयंक रोते हुए हाथ जोड़कर एंजेल की तरफ देखते हुए बोला, हमने तो शौकिया एक एडवेंचर की तरह इस बात को लिया और चारों पहुँच गए अपने स्पर्म डोनेट करने और कर आये बेशक ये न तो हमारा पेशा था न जरूरत लेकिन फन के लिए ऐसा करना हमें गलत नहीं लगा मेरी एक छोटी सी भूल ने आज मुझे किसी से नज़र मिलाने लायक नहीं छोड़ा, हो सके तो मुझे मेरे इस गुनाह के लिए माफ़ कर देना एंजेल, मगर तुम समझ सकती हो अब ये रिश्ता किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता कहते कहते मयंक की गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी
वन्दना गुप्ता
कहानी ’बुरी औरत हूँ मैं’:

“नरेन, कैसे पहचान सकते हो तुम मुझे, ये सब मेरा ही किया धरा है तो भुगतना भी मुझे ही होगा। अच्छा है तुमने नहीं पहचाना, जाना आसान हो जायेगा वर्ना हमेशा एक खलिश के साथ याद आती रहूँगी। जिन रास्तों की मंजिलें नहीं हुआ करतीं वहीँ फिसलने ज्यादा होती हैं और उन पर चलने का खामियाज़ा मैंने ऐसा रोग पाकर किया कि अब जीने की चाह ही ख़त्म हो चुकी और वैसे भी अब तो जीने की मियाद भी ख़त्म हो चुकी है, कौन सी सांस आखिरी हो कह नहीं सकती। बस जाते जाते एक विनती है तुमसे, हो सके तो मुझे माफ़ कर देना, मैं तुम्हारे काबिल कभी नहीं थी “

“क्या हुआ है तुम्हें और तुम्हारा मुझसे आखिर क्या नाता है? मैं तुम्हें पहचान क्यों नहीं पा रहा, प्लीज बताओ मुझे। ”“बस इतना याद रखो, अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने वाली एक ‘बुरी औरत हूँ मैं’- तुम्हारे अनुसार, जो यौन संक्रमण से ग्रसित हो कब एड्स को दावत दे बैठी पता ही नहीं चला। ... जो मैंने किया उसका दंड तो भुगतना ही था। बस ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ जो उसने तुमसे मिलवा दिया ताकि एक बार माफ़ी मांग सकूँ। हो सके तो माफ़ कर देना मुझे” अपनी थरथराती साँसों के साथ उसके आखिरी लफ्ज़ फिजा में गूँज उठे और मैं पहचान के तिलिस्म में घूमता एक असमंजस का आईना बन गया था जहाँ न रूप ने न गंध ने पहचान के बादलों को छाँटा, बदली छंटी भी तो लफ़्ज़ों की कुदाल से कटती हुई या जाने काटती हुई, मेरे प्रेम के वटवृक्ष को धराशायी करने को काफी थी। लेकिन अंतिम शब्दों ने एक बार फिर मेरी चेतना को झंझोड़ दिया। अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने वाली ‘एक बुरी औरत हूँ मैं’-तुम्हारे अनुसार। ये ‘तुम्हारे अनुसार’ शब्दों ने एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया, ‘यानि’ ‘उसके अनुसार’ वे अब भी सही थी?

अगर बात किताब से लिये बेहतरीन उद्धरणों की हो तो शायद पूरी किताब ही दोहरानी पड़ेगी यहाँ। ऊपर दिये गये अंश सिर्फ लेखन शैली और सोच का उदाहरण देने हेतु हैं। साथ ही किताब का आवरण भी बहुत सुन्दर बन पड़ा है और आकर्षित करता है जिसे जानेमाने चित्रकार कुंवर रविन्द्र जी ने बनाया है।

मेरे मानना है कि इस संग्रह को अवश्य पढ़ा जाना चाहिये। एक संग्रहणीय संग्रह। बहुत शुभकामनायें वन्दना गुप्ता को। ऐसे ही कलम चलाते रहिये। बहुत ताकत है आपकी लेखनी में।

1 comment :

  1. समीर जी आपकी समीक्षा ने संग्रह को एक नयी ऊंचाई दे दी है। समीक्षा पढ़कर निशब्द हो गयी हूँ। धन्यवाद कहकर इस स्नेह को कम नहीं करुँगी। बस आज का दिन बन गया। और क्या कहूँ ख़ुशी से अभिभूत हूँ। :) :) :)

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