समीक्षा: मायानगरी का जीवंत दस्तावेज है सन्तोष श्रीवास्तव की पुस्तक

समीक्षक: राजेश विक्रांत

वरिष्ठ पत्रकार एवं सांध्य दैनिक दोपहर का सामना के सहयोगी संपादक मुंबई


करवट बदलती सदी आमची मुंबई

लेखिका: सन्तोष श्रीवास्तव
प्रकाशक: किताब वाले, नई दिल्ली
पृष्ठ: 126, सजिल्द
मूल्य: ₹ 350


'करवट बदलती सदी आमची मुंबई' के पहले लेख मुंबई का प्रवेश द्वार गेटवे ऑफ इंडिया में लेखिका सन्तोष श्रीवास्तव ने लिखा है कि 'मेरे बचपन की यादों में जिस तरह अलीबाबा, सिंदबाद, अलादीन, पंचतंत्र की कहानियां और अलिफ लैला के संग शहर बगदाद आज भी जिंदा है उसी प्रकार पिछले सैंतीस वर्षो से मुंबई मेरे खून में रच बस गया है। जब मैं यहां आई थी तो यह बम्बई था। अब बम्बई को मुंबई कहती हूँ तो लगता है एक अजनबी डोर मेरे हाथ में थमा दी गई है जिसका सिरा मुझे कहीं दिखलाई नहीं देता। शहरों के नाम जो अनपढ़ गंवार, बूढ़े, बच्चे सबकी जबान से चिपक गए हैं, केवल मुंबई ही नहीं पूरे भारत का हर शहर, हर गाँव बम्बई नाम में अपने सपने खोजता है क्योंकि यह शहर सपनों के सौदागर का है। आप सपने खरीदिए वह बेचेगा, एक से बढ़कर एक लाजवाब सपने, रुपहले, चमकीले, सुनहले और जादुई।'

राजेश विक्रांत
'करवट बदलती सदी आमची मुंबई’ इन्हीं रुपहले सपनों को, मुंबई के बारे में भावनाओं को रोचक तरीके से पेश करती है। यह मुंबई के इतिहास को छूते हुए वर्तमान की पड़ताल  के साथ भविष्य का लेखा जोखा भी कोमलता के साथ प्रस्तुत करती है। साथ ही वे इन जगहों से जुड़ी अपनी यादों को भी ताजा करती हैं। रीगल थिएटर के पास उनकी मुलाकात फ़िल्म एक्ट्रेस निम्मी से हुई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया के बहाने उन्होंने धर्मयुग व डॉ धर्मवीर भारती आदि को याद किया है। चर्चगेट के इंडियन मर्चेंट चैंबर में उन्हें प्रियदर्शिनी अकादमी पुरस्कार तथा सिडनेहम कॉलेज में महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी का पुरस्कार तथा राजभवन के दरबार हॉल में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला था। मीरा रोड के बहाने वे मुंबई की पहली नगर पत्रिका सबरंग के संपादक धीरेंद्र अस्थाना की चर्चा करती हैं और लोकल के अपने सफर भी याद करती हैं।

मुंबई के बारे में अली सरदार जाफरी ने लिखा था कि" न जाने क्या कशिश है बंबई तेरी शबिस्तां में, कि हम शाम-ए-अवध, सुबह-ए-बनारस छोड़ आए हैं।"


संतोष श्रीवास्तव
प्रस्तुत पुस्तक में मुंबई जीवंत हो उठता है क्योंकि 'करवट बदलती सदी आमची मुंबई'  मायानगरी का जीवंत दस्तावेज है।

मुंबई का प्रवेश द्वार-गेटवे ऑफ इंडिया, गोथिक कला की खूबसूरत इमारत, ताजमहल कांटिनेंटल होटल, किसी भी जगह के पहचान हैं वहां के मूलनिवासी, आदिवासी.., कोलियों का कर्मक्षेत्र ससून डाक, मुंबई का टाइम्स स्क्वायर, साहित्यकारों का जमावड़ा रहता था फोर्ट में, उर्दू शायरों की पनाहगाह भिंडी बाजार, वी.टी यानी छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस., बॉम्बे बैकवे की पहली उपनगरीय ट्रेन, मुंबई की शाही घोड़ा गाड़ी विक्टोरिया, मुंबई की आर्थिक प्रगति का सूत्रधार पारसी समुदाय, युद्ध स्मारक, वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि, लंदन के स्थापत्य का आभास कराता चर्चगेट,  महानगर का दिल गिरगांव चौपाटी, वी आई पी लोगों की पसंदीदा जगह मलबार हिल, फिरोजशाह मेहता उद्यान, किसी जमाने में फिल्मों की शूटिंग का केंद्र था, मुंबई आए और महालक्ष्मी के दर्शन न किए तो क्या किया, दादर में निर्मित हो रहा है आंबेडकर स्मारक, नाटकों का बोलबाला था तब, जिस्म का बाजार कमाठीपुरा, भारत का एकमात्र ओपेरा हाउस, सात सौ इकतीस घाट हैं धोबी तालाब में, मुंबई के आकर्षण का केंद्र डब्बावाला, अंग्रेजों के जमाने का  किंग्स सर्कल अब माहेश्वरी उद्यान कहलाता है, मुंबई की सरहद सायन, एशिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी यानी मुंबई का दिल, मुंबई तेरे क्या कहने, आज भी हैं मुगल हमाम, बॉक्स ऑफिस का रिकार्ड तोड़ती फिल्मों के गवाह सिनेमाघर, फिल्म स्टूडियो जहाँ यादगार फिल्में शूट हुई, अद्भुत है दादासाहेब फालके चित्रनगरी, के से शुरु होने वाले धारावाहिकों का शूटिंग स्थल आरे कालोनी, मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे मुंबई की धार्मिक प्रवृत्ति के परिचायक हैं, मुंबई का भूलेश्वर जहाँ का उषाकाल सुबह ए बनारस से कम नहीं, मुंबई की खास रौनक थे यहां के शानदार बंगले, बांद्रा वर्ली सी लिंक रोमांचकारी सफर, मुंबई के खूबसूरत समुद्र तट जहाँ समुद्र बतियाता है हमसे, हरे-भरे पर्वतीय सैरगाह, प्रवासी पक्षियों की सैरगाह हैं अरब सागर की खाड़ियां, लोकल से चर्चगेट से विरार तक का रोमांचकारी सफर, अनजान थी मैं इन नदियों से, मुंबई की नाइट लाइफ, लोकल ट्रेन मुंबई की जीवन रेखा, मुंबई की अपनी अलग संस्कृति तथा एकजुटता की प्रतीक चॉल के उपशीर्षकों के तहत मुंबई की विशेषता, गुण व सुगंध समाई हुई है।

संतोष श्रीवास्तव की कहानी, उपन्यास, कविता, स्त्री विमर्श पर अब तक 15 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। दो अंतर्राष्ट्रीय तथा 19 राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित संतोष जी का नाम दुनिया के वर्तमान में टॉप 100 हिंदी रचनाकारों में शामिल है।

'अभिभूत हूँ तुझसे मुंबई… मुंबई की सरजमीं पर जब मेरा पहला कदम पड़ा था तो सोचा न था कि यहाँ जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुजरेगा। कुछ सुनहरे, कुछ धुपहले, कुछ चितकबरे और बहुत कुछ स्याह काले पल। बहुत अधिक इसलिए कि जबलपुर से 3 महीने के हेमंत को लेकर सपनों से लदी-फंदी आई थी। पत्रकार बनने का जोखिम मेरे बेचैन मन में हड़कंप मचा रहा था। धीरे-धीरे पत्रकारिता में पाँव जमने लगे। छोटा-सा घर भी बस गया, फिर सब कुछ खत्म। न हेमंत रहा न पति रमेश। जब होश आया तो लगा। हेमंत की अकाल मृत्यु के पन्नों को आत्मसात कर मुझे मुंबई का कर्ज उतारना है। उसने जो दिया और जो लिया उसकी फितरत पर मुझे 40 साल का कर्ज उतारना है।’ यह किताब ‘करवट बदलती सदी आमची मुंबई’ अस्तित्व में आई, जिसे किताबवाले नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।

`करवट बदलती सदी आमची मुंबई’ में कई रोमांचक रोचक तथ्य हैं जो मुंबई के बारे में ज्ञान की नई खिड़की खोलते हैं। ससून डाक से रीगल थिएटर तक और उससे भी आगे की सड़क को वे मीना बाजार व मुंबई का टाइम्स स्क्वायर कहती हैं। कोलकाता टैगोरमय है तो मुंबई शिवाजीमय।  छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय का इस्तेमाल प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों के  अस्पताल के रूप में हुआ था। 1931 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के बाद महात्मा गांधी बेलार्ड पियर बंदरगाह पर उतरे थे।

इसे पढ़ते हुए लगता है कि मुंबई संतोष श्रीवास्तव के मन, प्राण, आत्मा में बसी है वे मुंबई को हर क्षण जीती हैं। यह पुस्तक मुंबई के इतिहास को गंभीरता और सरलता के साथ पेश करती है।

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