कहानी: एक छोटा शेर

- रविन्द्र कुमार यादव 


गाँव महुआ पहाड़ियों के बीच घिरा चालीस घरों की बस्ती वाला एक छोटा सा पहाड़ी इलाका। लगभग घर अभी भी सरकारी रोशनी को तरसते और इसके लोग और बच्चे भरपूर पोषण को भी। चलचित्रों में ही देखे हैं इन्होने बिजली के खंभे और विभिन्न प्रकार के अनाजों के दानें बाकि तो जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरी जिंदगी लालटेन-दीपकों और मक्का के दानों के ही हत्थे चढ़कर रह गई। पूनम की चंद रातों में जरूर कथा-कहानीयों का कंलकित और चरित्रहीन चांद कुछ सुकून देता है वह भी केवल ग्रीष्म ऋतु की रातों में जब पूरा गाँव आसमान को ही चादर माने बाहर सोता है। चांद भी जगत भर से गाली खाकर थक गया है अतः शायद इनके बच्चों के मुँह से "मामा" शब्द सुनकर यहीं ठहर जाता है और नीम की मंजरियों के संग ऐसी शीतलता बरसाता है कि ये भूल जाते हैं थकान और उपेक्षा के चंद जख्म। फिर ये लागे गहरी नींद के थोड़ी ही देर में दीदार पा लेते हैं वरना ग्रीष्म के ये तपते पहाड़ तो इनका कब का कबाब बना देते। इन दिनों स्त्री-पुरूष और बच्चे सबके-सब बाहर ही सोते हैं सिवाय भेड़ बकरी और अन्य ढोरों के। क्यूकिं इन्हें हर पल डर सताता है कि यदि घोड़े बेच के सोयेंगे तो कोही चोर-उचक्कों और हिंसक बाघ -बघेरों के ये निरीही धक्के ना चढ़ जायें। यहाँ बतौर लिंग पृथक्करण एक महीन चुनरी एक तणीं पर डाल दी जाती है उसके इस तरफ पुरूष और उस तरफ महिलायें... यहाँ महीन चुनरी स्त्री की मर्यादा की रक्षा करती है भले ही चलचित्रों में यह गुलाबी रोशनी में स्त्री की सुंदरता दिखाने का कार्य करती रही हो पर यहाँ रक्षण करती है। कई बार कम पढ़े लिखे होने से भी संस्कार बचे रहते हैं ऐसा कुछ इनकी जीवन शैली से उजागर जरूर होना चाहता है! चुनरी ही नहीं बहुत सारी ऐसी ही कई परम्परायें इसे स्वयंसिद्ध करती हैं।
इस महीन चुंनरी की झिर्री से बच्चे जरूर स्वंतत्र थे वह इस पर माँ के बेटे होते तो उस पार बाप के। और इस दल बदल का उद्घोष वह स्पष्ट मुँह से बोलकर करते थे कभी कभी लगता था जैसे कोई राजनेता इधर से उधर बार बार "घर वापसी" कर रहा है! और अपनी विचारधारा को लेकर बुरी तरह विम्रमित है जब वह बाप का बेटा बोलता तो माँ हंसकर कहती, "ठहर तो अभी बताती हूँ तुझको फिरपौते।" और ऐसा बोलते ही वह बाप की छाती से बुरी तरह चिपट जाता है और बाप भी उसे कसकर छाती से चिपका लेता है ओर हो जाती है सुरक्षा।

वहाँ दल बदलना बीपी को बढ़ाता है यहाँ दिनभर की थकान को मिटा देता है। यहाँ कुदरत पूरा दिल खोलकर इन पहाड़ियों पर मेहरबान थी.. बात चाहे शुद्ध हवा की हो और चाहे भरपूर कुदरती रोशनी की सिवाय सरकारी रोशनी शिक्षा और भरपूर पोषण के इन हेतु कुदरती सब-कुछ प्राप्य था पर सरकारी सब-कुछ अप्राप्य सिवाय मक्की के दूसरा कोई खाद्यान्न नहीं था सिवाय लालटेन के दूसरा कोई रोशनी का रात्रि मे स्त्रोत नहीं था। तो चार पहाड़ियों को लांघने के बाद सिवाय एक सरकारी स्कूल के शिक्षा का कोई ओर दूसरा मंदिर ना था। अच्छा ही वह था वरना क्या पता यदि पूरा पेट भरा होता और गले तक शिक्षा का ज्ञान पा जाते तो झगड़ पड़ते कभी इन मंदिरों और मस्जिदों के लिये।

चांद भी इन पहाड़ियों में उतर कर गर्व से कुप्पा हो जाता था... होना भी था क्योंकि एक इनका "साला" और दूसरा इनके गीतों का अभिन्न अंग... कभी कभी पूनम की रातों में ऐसा लगता जैसे फटने को उतारू है पर फटा कभी नहीं।

शहरों ने तो सदा ही उसे गालियाँ और उपेक्षा ही दी है बार बार उसे उसके भूतकाल के कटु पौराणिक इतिहास के नाम पर आज तक धकियाते रहे और दूसरा कभी सिवाय करवा चैथ के उसका कभी दीदार ही नहीं करते। ये उसकी घोरतम उपेक्षा है और इसी के चलते चांद ने भी शहरों के लिए अपना "पिंड दान" कर लिया है। यही वजह है शायद चैथ के उपवास के बाद भी पति वहाँ अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते है। और शरद-पूर्णिमा की खीर खाकर लोगों के हाजमा बिगड़ जाते हैं। पर यहाँ पूनम का चांद और नीम मंजरियों की खूशबू दोनों ही प्रकृति के अमूल्य वरदान हैं और ये इन्हें भरपूर दोनों हाथों से भुनाते हैं।

यहाँ तो किस्से ही चांद के हैं और क्या हुआ कभी-कभार साहित्य की तर्ज पर नूतन मुद्दों की पैरवी की तर्ज पर कहानियों के विषय जंगली बाघ-बघेरों पर उतर जाते हों पर लगभग मे चांद ही लोकप्रिय विषय था। यदि कभी जंगली बाघ-बघेरों पर विषय उतर भी आते तो साथ में उनसे मुठभेड़ करते साहसी पहाड़ी युवक जरूर होते थे ताकि मक्का के दाने खाकर पली बढ़ी ये "पैलाग्रा" की रोगी पीढ़ी आगे भविष्य में बहादुरी से निष्ठुर और ढीठ प्रशासनों से दो-दो हाथ कर सके अपना हक मांग सके! पर घास की रोटियाँ खाकर गुजरा कौन बचपन यहाँ दुर्गादास राठौड़ बनता। पर इन्हे लगता था कभी ना कभी जरूर सवेरा होगा। इसी उम्मीद मे बहादूरी की ये कथायें पीढ़ी दर पीढ़ी आज तक वैसी ही कायम हैं जैसी कई सालो पहले। मानो खुद कहानियाँ ही कहती थी आशा से भी संस्कृति संरक्षित की जा सकती है! कभी कभी ऐसा भी लगता था जैसे यहाँ चाणक्य चंद्रगुप्तों के हाथो नन्द के समूल विनाश पर तुले थे और महीन चुनरी की पतली झिर्री के उस तरफ से आते औरतों के हुंकारे भी इस हक की लड़ाई का भरपूर समर्थन करते प्रतीत होते थे।

इसी सार्वजनिक पूनम के चांद की मुफ्त की रोशनी और नीम की मंजरियों की खुशबू को मुफ्त में पीता इस पहाड़ी ग्रा म का सबसे खस्ता हाल वाले परिवार का मुखिया " मुंशी" अपने बच्चे "विक्रम" को उसी के हमउम्र एक छोटे शेर की कहानी सुना रहा है। वह चाहता है वह बड़ा होकर जिदंगी रूपी संघर्ष का बहादुरी से सामना करे। मुंशी जानता है शेर का शावक ही शेर बनता है। अतः वह शेर का शावक भी विक्रम की उम्र का ही चुनता है। मुंशी जानता है लोहे के गुणधर्म सोने के संपर्क मे आकर बदल जाते हैं अतः शावक की उम्र जान बुझकर विक्रम जितनी ही रखी है। बीच बीच मे कभी शेर जैसी भावमंगिसा बनाता है। तो कभी उस जैसी दहाड भी मारता है मासूम सूकुमार का इससे बेहद मनोरंजन होता है कहानी का एक-एक पड़ाव उसे जिज्ञासा और डर दोनों से सामना करवा रहा है। मुंशी भी सधे हुए कथावाचक की तरह बीच-बीच में चुप्पी साध लेता था क्योंकि वह उसकी तोतली जुबान से "फिल" (फिर) शब्द सुनने का भूखा है। उसका ग्रास मिलते ही वह फिर उस शावक अठखेलियों पर उतर आता है हालांकि विषय आज चांद का नहीं है पर चांद इस सदियों बाद देखी बाल-क्रीड़ा को देखने हेतु मानो ठहर सा गया था और जब बाल क्रीड़ा का श्रोता धीरे धीरे "फिल फिल" करता कब नींदिया परी की सहायता से उस शावक के साथ खेलने लगा खुद मुंशी ही ना जान सका। जब वह गहरे नींद के आगोेश में चला गया तो मुंशी ने उसे अपनी छाती से उतार कर बिस्तर पर सुला दिया। पूनम के इस चाँद की रोशनी में वह उसके चेहरे की मासूमियत को भरपूर तरीके से निहारता है फिर गहरी निद्रा में लीन सूकुमार के हाथ की कोमल अंगुलियों को नासिक से सूंघकर बचपन की सुगन्ध को भरपूर खींच ता है मानो मंजरियों की खूशबू को चिढ़ा रहा हो और फिर निद्रा मे लीन बच्चे के कपोलों पर होठों से एक चुम्मी लेकर बुदबुदाता है "बदमाश" और फिर करवट लेकर निद्रा लेने का प्रयास करने लग गया।

वक्त के गुजरते लम्हों के साथ मुंशी का विक्रम भी बढ़ने लगा। चार पहाड़ियों दूर एक सरकारी स्कूल में उसका दाखिला करवा दिया और अन्य पहाड़ी बच्चों के साथ वह एक छोटा कपड़े का झोला और उसमें एक पत्थर की स्लेट लेकर आखर-ज्ञान बाबत सरकारी स्कूल में जाने लगा। बड़े बच्चे ही इन नन्हें बच्चों के अभिभावक होते थे। वह ही इनके हाथों को पकड़कर उन्हें कभी डाँटते तो कभी दुलार करते इन्हें शिक्षा के मंदिर तक लेकर जाते और फिर वापस भी लेकर आते। शिक्षा देने बाबत एक शहरी " संदीपन मुन्नी" सप्ताह में एक बार पहाड़ियांे का रूख करते थे बाकि दिन उनकी जिम्मेदारी पास ही की पहाड़ी का एक आठवीं पास शिक्षित युवक ही निर्वाह करता था इस हेतु गुरूजी उसे कुछ "बेरोजगारी भत्ता" दे देते और कुछ पोषाहार के "मल्टीग्रेन" दाने भी। उसका पेट सी पहाड़ो की तरह विशाल नहीं था अतः इनसे ही संतृप्ता प्राप्त कर लेता था। जिस दिन गुरूजी आते उसी दिन गाँव की नर्स बहिनजी भी उन्हीं की मोटर-साईकिल पर बैठकर आती थी। मतलब चिकित्सा एवम शिक्षा विभाग एक ही छत के नीचे "सर्वांगीण विकास" करने पर तुले थे! उसी दिन टीकाकरण, पोषाहार, शिक्षा वितरण व शरीर की साफ-सफाई तथा स्वच्छता का संज्ञान... सब निपटा दिया जाता था। व इसके बाद उसी पुष्पक विमान से दोनों शहर लौट जाते थे। कुछ बदचलन पहाड़ी नर्स बहिनजी को कभी-कभी मास्टरजी की सेटिंग भी कहते थे खैर ये तो राम जाने। पर ये संदीपन ऋषि इसके बाद अपनी शहरी कुटिया में चले जाते थे ताकि समाधि जैसी गहन प्रमादावस्था को साध सकें! इसी साप्ताहिक स्वास्थ्य व आखर शिक्षा के चलते ये पहाड़ कभी मैदान ना हो सके। और ना पैलाग्रा से ही मुक्त हो सके। वैसे पहाड़ भी कोई पर्यटन स्थल होता है? उसे तो पशुओं का चारागार ही बना रहना होता है अतः ये भी ऐसे ही थे तो हर्ज भी क्या था इसमें?

यहाँ के नौजवान तो पैदा ही नाम-मात्र के आखर ज्ञान और शादी के निपटारे के लिए हुए हैं। शादी में शिक्षा का महत्व बिल्कुल नगण्य है पशुबल संख्या ही इसकी योग्यता है। जिसके पास यह ज्यादा उसकी सब पीढ़ियाँ समृद्ध व वैवाहिक और जिसके पास नहीं वह मरे "अनैच्छिक ब्रह्मचर्य" भोगकर भले ही होगा "पाँचवीं पास" ! कई मरे हैं ऐसे एक हो तो बताऊँ।

शिक्षा ही नहीं हर चीज में फिसड्डी हैं ये।.बात चाहे चिकित्सा की हो या नंग धड़ंग "अद्र्वअधोर मासूमों के बेफ्रिके अंदाज में गाँव की शोभा बढाने की। मेरा मतलब ऊपरी भाग की कट्टी-फट्टी शर्ट के अलावा सब दिगम्बर। बस अधोरियों और इनमें फर्क सिर्फ भभूत और धूल-मिट्टी का ही है। इन इलाकों मे सब कुछ बिखरा बिखरा है, ना बिखरा हो तो कूद फांद करते बंदर बिखरे देते हैं जाने बंदरो को भी क्यों इन कंगालों के घर लंका नजर आते हैं?
खैर इस आधुनिक डिजिटल युग मे कौन आदमी देखे कि कितनी चींटियाँ रोज पैरों के नीचे आकर मरती हैं? अतः प्रशासन भी देश के मानचित्रों में ऐसे ग्रामीण कम आदिवासी इलाकों को उपेक्षित मानकर डिजिटलाईजेशन से अलग कर देते हैं। कौन से राम जी जन्मे हैं यहाँ जो वनवास चले गये हैं और कभी लौट आयेंगे तो दीवाली आयेगी। देश के कुछ हिस्सों में हल्ला होगा आदमी की प्राईवेसी ओैर स्वच्छता हेतु शौचालय और स्नानाघरों का पर इन कार्यो की यहाँ चट्टानों पर ही खुल्ले में रोज धज्जियाँ उड़ती हैं हो सकता ये इनका उपेक्षा के ऐवज में विरोध प्रदर्शन हो प्रशासन और सरकार के खिलाफ मानों कह रहे हों जो करना है वह कर रहे हैं और अब राज को जो उखाड़ना हो वह उखाड़ ले! मेरा पहाड़... मेरी मर्जी!

इसी कच्ची-पक्की शिक्षा की खाद पाकर विक्रम बड़ा हुआ और धीरे-धीरे मासूम बचपन कब खिसक कर किशोरावस्था तक आ गया मालूम ही ना चला?

कौन पढ़कर कलेक्टर बन गया इन पहाड़ों में इसी सैद्धान्तिक वाक्य के चलते वह धीरे-धीरे अपने बाबा के साथ भेड़ बकरियों के झुंड संभालने लगा। वक्त गुजरता रहा पर वैसी ही रही वह पहाड़ियाँ पर बचपन बढ़ते रहे और वह भी ! पर एक रात्रि शाम के वक्त खाना खाने के बाद विक्रम को सहसा चक्कर आया और कुछ देर के लिए वह बेहोश हो गया। सारा गाँव चिल्ला-चिल्ला कर मुंशी ने घर पर इकट्ठा किया। चिल्लाना ही यहाँ एक आपातकालीन सूचना संप्रेषण का साधन है। भीड़ उसके घर पर जुट गई उसके हाथ पैर मसले गये। कुछ पानी के छींटे मारे गये और देशी इलाज के नाम पर दुर्गन्ध मारती मोचड़ियाँ उसकी नासिक को अर्पित की गई तब कहीं जाकर उसे होश आया और इसके बाद मुंशी अपने घर और गाँव अपने। पर उस दिन के बाद उसके साथ लगातार अक्सर ऐसा होने लगा। मुंशी से उसे बहुत जगह दिखाया पर कोई फायदा ना हुआ। झाड़-फूँक,तंत्र-मंत्र और देशी दवा के इन प्राथमिक ग्रामीण उपचारों से कोई फायदा ना होते देख उसे शहर के अस्पताल मे लाया गया। शहरी अस्पताल खुद ही उन दिनों बीमारी से गुजर रहा था। मतलब कुछ औपचारिकताओं को छोड़कर कुछ भी नहीं किया जा सकता था। अतः उसे राजधानी के बड़े अस्पताल मे रैफर किया गया। न्यूरोलोजी विभाग मे हुई कुछ जाँचों के बाद मालूम चला उसे ब्रेन टयूमर था। और बायोप्सी रिर्पोट के बाद मालूम चला मस्तिष्क का सबसे घातक कैंसर "ग्लियोमा" है। इतना घातक कि कभी-कभी जीवन घटकर मात्र छह माह ही रह जाता है।
रिपोर्ट के बाद मुंशी सड़क पर खड़ा आती-जाती गाड़ियो को निरुद्देश्य घूरता है और पाता है जीवन भी बिल्कुल ऐसा ही है बिल्कुल नीरस। सिवाय चींचीं-पोंपों के कुछ भी तो नहीं। मुंशी सोचता है इन पहाडो के पत्थरों में पाया क्या? हरपल मुसीबत... ना रोशनी पाई... ना भरपूर खाना-दाना। ख़ैर उसे तो अब आगे का सोचना था अतः वह जाकर डॉक्टर से मिला। "अब क्या होगा?" उसकी आवाज मे हताशा और आँखो मे कर्तव्यविमूढ़ता का भाव स्पष्ट नजर आया। पर डॉक्टर ने इसकी उपेक्षा कर कहा, " घबराओ नही... घबराने से कुछ नही होगा। पहले कीमोथैरैपी होगी फिर आगे गाँठ छोटी होने पर ऑपरेशन कर देंगे ठीक हो जायेगा ये।"

हालांकि मालूम उसे भी था कि यह ठीक नहीं होता। पर उसके इस वाक्य से उसे राहत महसूस हुई पर उसे मालूम था बड़े शहरों के अस्पताल बहुत महंगे है अतः इलाज की कीमत जानना जरूरी था। इलाज मे कितना खर्चा आयेगा? उसने भारी स्वर मे कहा। "पाँच-छः लाख" डॉक्टर ने बताया पर मन-ही-मन नही मन उसके शारीरिक गठन से उसकी अर्थव्यवस्था का भी अध्ययन कर लिया और उसके उत्तर प्रतीक्षा करने लगा। पर इतनी पूंजी तो मेरे पास नही है! उसने निराशा से कहा। वह जानता था पहाड़ के किराने की दुकान नहीं है यह, जो उधार लिखता रहेगा बनिया... अतः साफ ही बोला। "पूंजी किसके पास होती है... बनानी पडती है! डॉक्टर ने व्यंग्यात्मक लहजे मे कहा। व्यंग्य कहने के बजाय सहने मे बड़ा कठिन है। कई बार बहुत सारे लोग तो इसके मायने तक नही समझ पाते अतः वह भी नहीं  समझा। अतः जिज्ञासावश पूछा, "कैसे?" "मेरा मतलब आजू-बाजू नजर दौड़ाओ कुछ तो होगा जिससे तुम्हारा जुगाड़ हो जाये। क्या है बाबू होटल में खाना खाने जाते हैं ना तो पैसा तो खुद को ही भरना पड़ता है... अतः तुम्हारा मरीज है तो पैसा तुम्हीं  भरोगे ना? डॉक्टर ने सुझाया। मुंशी समझ गया। मन ही मन घर के वाणिज्य विज्ञान में प्रवेश लेकर मनोयोग से अध्ययन करने लगा। मतलब यदि सब कुछ बेच डालूँ, भेड़-बकरी,जमीन-जायदाद सब कुछ... सिवाय रहने वाले घर के, तो बनते हैं तीन लाख पहाड़ी हिसाब से। फिर भी दो लाख कम हैं? तो क्या विक्रम यूँ हीं? "नहीं नहीं" उसने अपने अपशुकुनी विचारों को दरकिनार करते हुए कहा। फिर सोचता है वास्तविकता तो यही है। और सच को झुठलाऊँ भी कैसे? फिर उससे आत्मसात करता हुआ बैचेन स्वर मे बोल ही उठा, "दो लाख कम है।" डॉक्टर ने उसकी हालत देखकर पूछा, "बी.पी.एल. हो?"

"नही" उसने उससे संक्षिप्त उतर दिया।

"पर क्यों नहीं?" डॉक्टर मानने को तैयार नहीं था। पर फिर देशभर में फैली अधिकारों की जागरूकता की कमी और उसकी पहाड़ियों तक प्रशासन पहुँचने की असक्ष्मता का अध्ययन कर बोला " चलो कोई बात नहीं ... पर एक उपाय है एक विशेष सरकारी सहायता से तुम्हें दो लाख का क्लेम मिल सकता है! मैं पर्चा बनाकर दूंगा खर्चे का ... उसे तुम्हे सचिवालय जमा करना होगा... तुम्हारा इंतजाम हो जायेगा!"

बरसों से सरकारी योजनाओं से महरूम रहे पहाड़ी आदमी को पहली बार सरकारी सहायताओं का महत्व समझ आया। कभी उसे लगता वही बेवफा है जो सरकारों से मिला ही नहीं... कभी कभी लगता सरकारें ही मौकापरस्ती पर उतरी थी जो कभी उससे मिलना ही नहीं चाहती थी खैर जो भी था वह चहक उठा। असाध्य बीमारी उसे साध्य लगने लगी और उत्साह से बोला, "इलाज शुरू करो अगले माह तक रकम की व्यवस्था हो जायेगी।"

"पहले व्यवस्था कर आओ और ये पर्चा सचिवालय जमा करवा दो।" डॉक्टर ने एक खर्चे का पर्चा उसे थमाकर कहा। अतिउत्साह में आदमी अक्सर हकीकत से रूबरू नही हो पाता...अतः थोड़ी ही देर में उसे अहसास हुआ कि वह जल्दबाजी में गलती कर रहा है "जी... जी" उसने गलती स्वीकार कर पर्चा हाथ मे पकड़ा और ऑटो से सचिवालय जा पहुँचा सरकारी सहायता बाबत। उसने तय कमरे में पर्चा जमा करवाया और डॉक्टर की लिखी कुछ दवायें खरीदी और शाम वाली बस से घर पहुँच गया। घर पहुँच कर खाट पर हताशा में बैठ गया। ऊपर मुँह कर नीले आकाश के अंतस में छुपे अदृश्य शक्तिशाली परमात्मा को ढूंढने की असफल कोशिश करने लगा। वह कुछ पूछना चाहता था पर हृदय में भरे असहनीय दर्द से दहाड़ मारकर रो पड़ा पर उस बुद्धत्व मे खोई अनन्त विराट शक्ति पर उसके आँसुओं का कोई फर्क नहीं पड़ा पर ये जरूर हुआ कि उसका बेटा विक्रम और घरवाली मल्लो उसे घेरकर उसके कंधो को सहलाने लगे और उस पत्थर दिल अदृश्य शक्ति को छोड़कर उसका ध्यान अपनो के कंधों पर ही आ टिका... उसने उनके हाथों को कसकर पकड़ लिया और दोनों को बाहों में भरकर रो पड़ा। पहाडी संस्कृति के हिसाब से ये एक दुर्लभ ही सही पर एक हृदयविदारक नजारा जरूर था। "क्या हुआ बापू। मर्ज से अन्जान विक्रम ने पूंछा। और मल्लो ने भी यही प्रश्न दोहराया बस बापू की जगह विक्रम का बापू हो गया। "कुछ नही ..." उसने आँसू पोंछ लिये और सारे गम और झूठ एक साथ सीने मे दफन कर दिये। फिर झूंठ-मूंठ हंसी का नाटक सा करने की कोशिश की पर आँखे होठों का साथ नहीं दे रही थी इसी चक्कर मे आखांे और नाकों से श्लेष्मा बह रहा था और होठ अनैच्छिक तरीके से फड़कते रहे। "अरे विक्रम तू जा आराम कर उसने सब कुछ सामान्य और सहज करने की कोशिश में विक्रम से कहा। पिता का आज्ञाकारी विक्रम चुपचाप कमरे की तरफ चला गया बग़ैर किसी सवाल और जवाब के। पहाड़ी गरीब जरूर होंगे पर बड़े बुजुर्गों की इज्जत का रिवाज जरूर इनके संस्कारों में है। अतः! कोई न जिद की न सवाल, चुपचाप चला गया और जब विक्रम आँखों से ओझल होकर कमरे मे चला गया तो उसने रोते हुए पूरी कहानी मल्लो को कह दी। धक्क रह गई वह इस अनजाने सदमे से पर फिर रोते हुए वह उसे दिलासा देने लगी और फिर दोनों रोते रहे और एक-दूसरे को दिलासा देते रहे... वे ये भी भूल गये थे कि बेटा विक्रम कमरे से बनीं खिड़की से उन्हें देख रहा है। हालांकि वह समझ कुछ ना पाया... पर हाँ इस दृश्य को देखकर सज़ल वह भी हो उठा और चुपचाप अपने आँसू पोंछकर बैड पर लेट गया। उधर सहायता आई इधर मुंशी ने सब कुछ दाँव लगा दिया सिवाय रहने वाले घर और व्यक्तियो को छोड़कर... राजा नहीं पहाड़ी था वह अतः आदमी दाँव पर लगाना उसके संस्कारो में नहीं था। सारा इंतजाम कर शहर के बड़े अस्पताल में जा पहुँचा। दर्दनिवारक कीमोथैरेपी से गुजरने के दौरान विक्रम को भी अपने रोग के बारे मालूम चला इस कीमोथैरेपी के बाद उसका ऑपरेशन हुआ और वह सकुशल घर लौटा।

बीते होंगे तीन-चार माह और इस खुशी के थोड़े से वक्त बाद एक रात अचानक विक्रम की फिर वही हालत हुई जो इलाज से पूर्व हुई थी। फिर उसी बड़े अस्पताल में जाकर मालूम चला कैंसर अपनी औकात पर उतर आया और पूरे शरीर मे फैल चुका था... पीईटी स्कैन से मालूम चला फेफडे़, हृदय और मस्तिष्क में उग्र तरीेके से फैल गया था यह... आखिर डॉक्टर ने भी अपनी सीमायें बताते हुए इलाज में असमर्थता जाहिर की। मुंशी ने जिन्दगी में बहुत कुछ खोया था... कभी जंगली बाघ-बघेरे पहाडियों में उसकी बकरियों का शिकार कर जाते थे... कभी बंदर घर की लोहे की टिन-शैड तोड़ देते थे... कभी बीमारी से ढ़ोर खोये थे...पर आज जो खोया ... उसके बराबर कुछ भी नहीं था। बड़ी बात ये रही की सब कुछ दाँव पर लगाकर भी खोया। दुर्भाग्य और सौभाग्य स्पष्ट तरीके से उसे समझ आये। वह चुपचाप बस पकड़ कर गाँव लौट आया। विक्रम को कुछ समझ ना आया पर पुरानी बीमारी पर सरसरी निगाह दौड़ाने पर मन मे शंका जरूर हुई कि "कहीं फिर से तो...?" ग्रीष्म कालीन रात्रि का वक्त वही नीम की मंजरियों की खुशबू और पूनम की रात का वही उज्ज्वल चांद। यह ठंडी और खुशबूदार हवा मुंशी को चुभने लगी उसने अपने मैले गमछे को मुँह पर रखा और प्रकृति के इस अनमोल उपहार से किनारा करना चाहा... मानो प्रकृति से कह रहा हो मैं नाराज हूँ तुमसे। पर बहुत देर बाद जब लगा कि प्रकृति उसकी परिस्थितियों कि उपेक्षा कर रही है तो उसके ध्यानाकर्षण बाबत सुबक पड़ा और सुबक दहाड़ में बदल गई। फिर लगा कि यह दहाड़ कहीं विक्रम को सुन गई तो? अतः उसने आवाज रोक ली और अपना गमछा मुँह पर डाल लिया और गहरी साँस खींचकर मुँह से बुदबुदाया, "हे परमेश्वर ये क्या किया?" और इसी के साथ आँखों से आँसू लूढ़क पडे़। ये उसकी शिकायत थी उस परमात्मा से जो पूरे घटनाक्रम में मौन रहा वह भी नाराज था उससे पर विश्वास अब तल़क था... उसे लगता था वह कभी ना कभी तो वह इंसाफ करेगा जो उसके साथ अब तक नहीं हुआ? तभी उसने देखा उसके बालों को कोई सहला रहा है?आवेश में उसे लगा जैसे वह आ गया है मदद करने! उसने सुना है हृदय से पुकारो तो आ जाता है। वह हड़बड़ाकर श्रद्धा से उठ बैठता है पर देखा सामने विक्रम बैठा है। वह उससे लिपट कर रो पड़ा... विक्रम भी रो पड़ा। बिल्कुल पीला और कमजोर चेहरा... आँखें धंसी हुई और हाथ-पाँव काँप रहे थे उसके वह और लड़खड़ाई और कमजोर जुब़ान से जैसे फुस्फुसाया हो" बाबा आदमी मर क्यों जाता है?"

"नहीं मरता आदमी...कभी नहीं मरता। शरीर मर जाता है... पर रूह तो जिन्दा रहती है...और शरीर भी इसलिये मर जाता है कि कभी रोग मार देते हैं तो कभी किस्मत... आदमी तो जिंदा रहता है... कभी विचार में तो कभी दिलों में...और सुबक कर बेटे को भींचकर छाती से चिपका लिया। विक्रम किशोर जरूर था पर पीले पड़े चेहरे और कमजोर होती आँखों की ऊर्जा उसकी आत्मा को जगा रही थी। उसे लग रहा था जैसे कुछ होने वाला है...कुछ अशुभ। कुछ अजीब। जैसे से पहाड़ी ये जंगल यहीं छूटने वाले हैं। मै कहीं... और उसकी इस भावमंगिता को मुंशी ने बोलकर तोड़ा "अबे कहाँ खो गया?" और हिलाने से वह अपनी अर्द्धचेतना की स्थिति मे लौटा। और उसने मुंशी का हाथ पकड़ लिया "बाबा।"

"हाँ बोल मेरे लाल।" मुंशी आज उस पर अतिरिक्त स्नेह बरसा रहा था। "मुझे डर लग रहा है " उसने काँपते शरीर से कहा और इतना कह कर वह मुंशी की छाती से बुरी तरह चिपक गया और मुंशी ने ऊपर से अपना मैला गमछा डाल दिया। वह उसे सांत्वना देते हुए बोला, "हट बावले डर कैसा। मै हूँ ना तेरे साथ तेरी अम्मा भी यहीं सोई है। कोई भूत-वूत नही... कोई डर नही।"बाबा... मुझे डर लग रहा है... भूत का नहीं... कुछ अजीब सा डर... बाबा मुझे कुछ होने वाला है। वह देखो बाबा उधर क्या है?...वो आंखें निकाल रहा है... बाबा...और वह ओर ज्यादा काँपने लगा और मुंशी ने इसी के साथ उसे कसकर छाती से चिपका लिया। आवाज के साथ पास सोई मल्लो ने लिंग पृथककरण चादर को हटाया और डर से काँपते बेटे को सहलाने लगी और मुंशी उसका उत्साह बढ़ाने लगा, "डर नहीं बाबू देख मैं तुझे अभी डर को भगाने वाली छोटे शेर की कहानी सुनाता हूँ...एक छोटा शेर था एक जंगल में... कटे-फटे टूटे-फूटे वाक्यों के बीच मुंशी रो-रो कर कृत्रिम हँसी हँसता रहा उसने दहाड़ की माफिक़ आवाज निकाल कर उसे सुनाई तो कभी शेर के शावक की अठखेलियाँ सुनाने लगता। उसे लग रहा था ये वह ही छोटा विक्रम है बिल्कुल वह ही... पंद्रह साल पुराना वक्त है कुछ भी नही बदला है अभी... अतः वह उसी उम्र का शावक चुनता है वह भावावेश में उसकी "फिल-फिल (फिर-फिर)" को सुनना चाह रहा था
पर लगभग उसकी हाँफती साँसो में वह इसका अहसास नही कर पा रहा है...पर वह तो उसका डर दूर करने को कह रहा है... ऐसा एहसास होते ही वह "फिल" (फिर) शब्द से ध्यान हटाकर कहानी की अनवरतता पर ध्यान जमा देता है... पर अचानक ही साँसो की आवाज भी ठंड़ी हो गई और मुंशी की पीठ पर गये उसके हाथ सहसा ही कड़क हो गये उनकी कसावट जब बढ़ गई तो मुंशी ने उसे हटाकर खाट पर लिटा दिया। और उसकी मृत देह पर फफक कर रो पड़ा। पूनम का चांद आज भी पूरे उजास पर था .. नीम की मंजरियाँ भीनी खूशबू छोड़ रहीं थी... पर इस पहाड़ी दंपति के गहरे रूदन और दहाड़ो को सुनकर आस-पास के लोग इनके घर जमा हो गये। बदहवास मुंशी ने दिलासा के दौर के बीच एक देहाती से सुबककर कहा " रामू पच्चीस सौ रूपये उधार दे दो... जवान बच्चा है जलाना तो पडे़गा...

3 comments :

  1. पिता की व्यथा, मजबूरी, हालात , सरकार की अनदेखी और योजनाओ का उचित लोगो तक न पहुँच पाना ़़़़़इन सभी का सटीक लेखन किया है आपने

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