मनोऽनुरञ्जिनी: बेवफाई की दास्तान

समीक्षक- डॉ. अरुण कुमार निषाद

पुस्तक- मनोऽनुरञ्जिनी (संस्कृत काव्य)
लेखक - युवराज भट्टराई
प्रकाशन- विद्यानिधि प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2014
मूल्य- ₹ 195
पेज-141


सृष्टि रचना से ही जीव अपने विपरीतलिंगी के प्रति आकर्षित हुआ है वह चाहे मनुष्य हो या फिर जानवर। वेदों में ऐसे बहुत सारे आख्यान भरे पड़े हैं। जहाँ पर कभी पुरुष प्रणय के लिए स्त्री को रीझता है या कभी स्त्री प्रेम पाने के लिए पुरुष पर रीझती है। प्रेम के बिना यह सारा संसार सूना है। इसी बात को युवराज भट्टराई ने अपने काव्य में दिखाने का प्रयास किया है और इसमें वह सफल भी रहे हैं। आधुनिक संस्कृत साहित्य के युवाकवि युवराज भट्टराई किसी परिचय के मोहताज नहीं हैंआपका जन्म 4 मार्च 1988 को दिल्ली में हुआ।मनोऽनुरञ्जिनीइनका प्रथम काव्य संग्रह है। यह बारह शीर्षकों में विभक्त है। इसमें कुल 334 पद्य हैं। इस काव्यसंग्रह को यदि प्रणयी हृदय की अभिव्यक्ति का स्वर कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। 
अरुण कुमार निषाद
सुकुमारमतेर्मम कौतुकता’ में कवि लिखता है प्रेम पूछकर नहीं होता, इसीलिये प्रेम को अन्धा कहा जाता है। कवि लिखता है- सहसैव मिथ: प्रथमे मिलने/अनिमेषतया मिलिते नयने/ हृदयं जड़ितं तदनु प्रणये/न तथाऽप्य भवद् यतनं कथनेमयि प्रेम प्रिये! विदधासि न वा

कवि अपनी प्रेमिका के हाव-भाव से यह सुनिश्चित कर लेता है कि वह उससे प्रेम करती है, तभी तो वह बार-बार उसे स्मरण करा रहा है। वह कहता है- मनसा शपथो विहितस्सुचिरं/न जहामि च ते! भज मां ससुखम्/मम स्वीकारणञ्च करोसि न वा?/मयि प्रेम प्रिये! विदधासि न वा।

अन्यत्र भी वह कहता है कि- अपनी सुन्दर भावभंगिमाओं से तथा मृदुल चारू एवं प्रसन्न मुख मुद्राओं के द्वारा तुम मेरा प्रेम समर्थित करती हो। हे प्रिये! मुझसे प्रेम करती हो या नहीं? अर्थात् अवश्य करती हो। वह प्रकृति के कण-कण में अपनी प्रेमिका का दर्शन करता है हृदये नयने वदने कथने/ स्मरणे विरहे कविताकवने/ सलिले तपने पवने गगने/ रमणी तव दर्शनमेव दृढम्।

स्पृहयामि शुभे! कुरु रे प्रणयम्’ कविता मैं कवि जब विरहे विलिखामि च ते कवितांतो बरबस वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गानयाद आ जाता है। बसंत ऋतु में चारों तरह मादकता छा जाती है ऐसे में कवि का मन भी चंचल हो उठता है परितो मधुमास सुगन्ध भरं/सुमेदित रति: प्रतिलोक्यमुखम्। 

कवि कहता है कि- हे प्रिये प्रेम को छिपाओ मत प्रेम छिपाने की चीज नहीं है नहि गोपय सम्प्रति मे प्रणयं। 
भट्टराई जी ने अपने काव्य को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रसाद गुणयुक्त सरस, सरल एवं सुमधुर भाषा का प्रयोग किया है। विप्रलम्भ रस से ओत-प्रोत इस काव्य में कवि ने त्रोटक तथा स्रग्विणी छ्न्द का बड़ा ही अद्भुत समन्वय किया है। उनके छोटे-छोटे वाक्य सरस एवं चुस्त हैं जो अनायास ही भाषा बोध करने में पूर्ण सक्षम हैं। इस काव्य संग्रह की सबसे खास बात यह है कि कवि ने स्वयं ही इसका हिन्दी अनुवाद भी इस संग्रह में किया है जिससे असंस्कृत भाषी पाठकों को भी इसका रसास्वादन करने में कोई रुकावट या कठिनाई नहीं होगी। संस्कृत जगत को इस युवाकवि से बहुत आशायें हैं।

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