लघुकथा: ऐंजल

ऋचा जोशी

"पागल हो क्या? गोद लिया है हमने गुड़िया को। माना कि न्यायिक रूप से नहीं लिया पर अपनी बेटी बना के ही लाए हैं। दस साल बच्चे नहीं हुए तो तुम भाभी से मांग कर उसे अपने साथ ले आईं। उसकी माँ छीनी उससे। अब तुम्हारा बच्चा होने को है तो तुम ऐसे बर्ताव करती हो उसके साथ जैसे वो जबरदस्ती आईं हो। हद्द है अंजलि। उसे अनाथ मत बनाओ। हम उसे वापस नहीं देंगे।"

"तो क्या करूँ मैं सुमित? मेरी तबीयत ठीक नहीं, इसका कैसे करूँ?"

"अरे तो वो थोड़ा-सा ही ध्यान चाहती है।"

"हम कहे देते हैं, अपने बच्चे का हक ना छीनने देंगे उसे।"

"अरे वो कहाँ छीन रही है कुछ तुमसे? तुम ही उसका सब कुछ छीनने का मन बना बैठी हो। जिसे कभी तुम ऐंजल बोलती थीं आज वही तुम्हारी आँखों में खटकने लगी है।"

टुकर-टुकर आँखों से देखती चार साल की गुड़िया इतनी प्यारी लगती जैसे दिल ही निकाल लेगी। छह महीने की थी तभी भाभी ने उसे अंजलि की गोद में डाल दिया था। बच्चे की चाह में अंजलि का सूखा मातृत्व गुड़िया को पा कर खिलखिला उठा था। जैसे लंबे समय तक छाए बादलों के बाद धूप का एक टुकड़ा भी धरती को जगमगा देता है ठीक उसी तरह अंजलि एक बार फिर से चहक उठी थी। बच्चा ना होने से पति-पत्नीि के बीच भी सब कुछ जमाव बिंदु तक पहुँच चुका था। बस ज़िंदा रहने के लिए जिए जा रहे थे। सब कुछ था, नहीं थी तो बस खुशी। गुड़िया के आने की गर्माहट ने उस जमाव को पिघला दिया था। और आज अंजलि अपने खुद के बच्चे के आने की खुशी में उसी को भूली जा रही थी।

जाने किस धुन में सुमित गुस्से  में घर से निकल गया। अपना फोन भी उसने स्विच ऑफ कर लिया।

यहाँ-वहाँ भटकने के बाद जब देर रात घर पहुँचा तो घर पर ताला लगा हुआ था। फोन खोला तो मेसेज की झड़ी लग गई। हाथ-पाँव को जैसे पाला मार गया हो। पता चला अंजलि अस्पताल में है। भागता हुआ सुमित वहाँ पहुँचा। अंजलि उसे देख रोती हुई लिपट गई। एक हाथ से गुड़िया को सीने से चिपकाए हुए थी।

"तुम्हारे जाने के थोड़ी ही देर बाद मैं फिसल कर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। गुड़िया ने ही तुम्हें फोन किये और नहीं उठाने पर दौड़ कर रमेश जी को बुला लाई।" अंजलि सुबकते हुए बोली।

"घबराने की कोई बात नहीं है। सब ठीक है। हाँ, यहाँ आने में देर हो जाती तो कुछ भी हो सकता था।" पास खड़े रमेश जी ने कहा।

"सचमुच मैं ठीक हूँ, और हमारा बच्चा भी, सुमित। … हमारी गुड़िया सच में ऐंजल है!"

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