लघुकथा: पुत्रहीन

- मृणाल आशुतोष

द्यूत-कीड़ा में पराजित होकर पाण्डव वनवास चले गये थे। कुन्ती पुत्र-वियोग में तड़पती हुई तेरह वर्ष पूरा होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। एक-एक दिन पहाड़ साबित हो रहा था। आँखें सावन की तरह बरसती रहती थीं।

एक दिन दासी की आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया, "महारानी की जय हो! महारानी गान्धारी ने आपको याद किया है। द्वार पर सारथी आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।"

बिना एक भी पल गँवाये कुन्ती रथ पर सवार हो गान्धारी के पास पहुँचीं।

"प्रणाम दीदी!"

"आयुष्मती भवः। आओ बहन, आओ! क्या हुआ! आवाज़ में कुछ उदासी सी है!"

"पुत्र-वियोग का दर्द दीदी... आप नहीं समझ पाएँगी। आपके तो सभी सौ के सौ पुत्र साथ हैं न!"

"सौ पुत्र!" उनकी पीड़ा बोल पड़ी, "सौ नहीं। कुन्ती, केवल एक पुत्र! विकर्ण!"

"केवल एक पुत्र! दीदी,आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"

"पुत्र में जब तक पौरुष न हो तो उसका होना न होना एक समान ही है न! और पौरुष तो उसमें है न जो अन्याय का प्रतिकार कर सके।"
....

"क्या हुआ? कुन्ती, तुम चुप क्यों हो गयी?"

"यदि आप केवल एक पुत्र की माँ हैं तो मैं... मैं तो पुत्रहीन ही हुई न! क्योंकि मेरे तो पाँचों ही पुत्र..."

अब कुन्ती की आँखों से बहते नीर गान्धारी की आँखों को भी भिगो रहे थे।


ग्राम+पोस्ट: आरसी नगर एरौत; भाया-रोसड़ा; जिला-समस्तीपुर (बिहार) 848210
चलभाष: +91 801 081 4932, +91 981 132 4545
ईमेल: mrinalashutosh9@gmail.com

5 comments :

  1. 'पुत्रहीन'बेहतर रचना का उदाहरण है |मृणाल की यह लघुकथा बने-बनाये यथार्थ में हस्तक्षेप कर पाठक को पुनर्विचार के लिए विवश करती है |

    ReplyDelete
  2. कम शब्दों में सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  3. कम शब्दों में सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  4. कम शब्दों में सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।