हिन्दी साहित्य और मीडिया के सम्बन्ध एवं सरोकार

- सचिन मिश्र


हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 953 278 0470



साहित्य शब्दों की विधा है। साहित्य की सत्ता शब्दों, सम्बन्ध एवं सरोकार में बंधकर साकार होती है। उसे अपनी सार्थकता के लिए मीडिया या किसी अन्य की जरूरत नहीं। मीडिया अपने आप में एक परिपूर्ण संप्रेषण का माध्यम है, जिसके अन्तर्गत जनसंचार माध्यम-नाटक, सिनेमा, पत्रकारिता आदि का समावेश होता है, लेकिन बिना साहित्य के मीडिया भी कुछ नहीं कर सकता। साहित्य सृजन है, जबकि पत्रकारिता एक कौशल है, हुनर है, शिल्प है। साहित्यकार चिंतन-मनन पर प्रतिक्रिया करता है, जबकि पत्रकार तात्कालिक प्रतिक्रिया करता है। निष्कर्षतः साहित्य सत्यपरक है, तो पत्रकारिता तथ्यपरक रचना-विन्यास है। मीडिया की गम्भीरता एक खास अंश में व्याप्त रहती है, जबकि साहित्य अपने समग्र प्रभाव के कारण अपनी महत्ता पाता है। साहित्य का कार्य जीवन के अनुभवों को संवेदना में परिवर्तित करना है। इसके विपरीत मीडिया का कार्य इन्हीं अनुभवों को सूचना में बदलना है। साहित्य उन तमाम चीजों को देखने-समझने की दृष्टि प्रदान करता है, जिन्हें मीडिया मोहक अंदाज में प्रस्तुत करता है। साहित्य एक संस्कार की भाँति होता है। वह हमें उस उतावलेपन से सचेत करता है, जिसमें शामिल होने के लिए हमें मीडिया उकसाता है। साहित्य सूचनाओं के भीतरी आवरण को परखने की सूक्ष्म दृष्टि देता है, जबकि मीडिया केवल सूचनाओं को परोसता है। इस प्रकार मीडिया एक आवरण है और साहित्य उसमें कहीं भीतर छिपी बैठी आत्मा।

सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में साहित्य और मीडिया दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। साहित्य भावना के धरातल पर ‘बेहतर मनुष्य’ और ‘बेहतर समाज’ की संकल्पना को साकार करने में समाज का मददगार बनता है और मीडिया अपनी संचरणशीलता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में जनजागरण की पृष्ठभूमि तैयार करता है।  दो ढ़ाई शताब्दी पूर्व तक जो सूचनाएँ केवल शक्तिशाली वर्गां तक सीमित थीं, उसे आम लोगों तक पहुँचाने में प्रिंट मीडिया का अवदान अविस्मरणीय है। प्रेस ने लिखित ज्ञान को किताबों के रूप में सार्वजनिक किया। पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन ‘हिन्दुस्तानियों के हित हेतु’ आरम्भ हुआ। भारतेन्दु युगीन हिन्दी रचनाकारों की सामाजिक और राष्ट्रीय चिन्तायें पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों तक पहुँची। उन दिनों का साहित्यकार अपनी विचारधारा से लोगों को जोड़ने के लिए न केवल साहित्य का सहारा लेता था, बल्कि वह स्वयं किसी न किसी पत्र-पत्रिका का सम्पादक अथवा पत्रकार हुआ करता था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पंडित प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रेमधन आदि की रचनाधर्मिता और पत्रकारिता में विभाजक रेखा खींचना उनके व्यक्तित्व का विभाजन करना होगा। उन दिनों साहित्य एवं पत्रकारिता का उद्देश्य लगभग एक था, उनके सरोकार एक थे। दोनों एक दूसरे से संवाद करते हुए गतिशील थे। यही स्थिति लगभग द्विवेदी युग और प्रेमचन्द युग तक विद्यमान रही, किन्तु भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने मीडिया की भूमिका, उसकी कार्यप्रणाली, अर्थ-प्रणाली, चिंतन और उद्देश्य को काफी गहराई तक प्रभावित किया है। राजनीतिक और सांस्कृतिक दबाव आदि ने साहित्य और पत्रकारिता के सम्बन्धों को पहले जैसा नहीं रहने दिया है।

आज साहित्य और पत्रकारिता दोनों के उद्देश्य एवं सरोकार अब अलग-अलग दिशाओं में गतिशील लगते हैं, किन्तु पहले ऐसा नहीं था। पत्रकारिता और साहित्य में उतना ही अंतर था, जितना कि सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में। यह इसलिए था, क्योंकि अधिकांश पत्रकार साहित्यकार होते थे और साहित्यकार पत्रकार। इसी पृष्ठभूमि में समाचार पत्र देश के साथ-साथ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना को जगाने का भी कार्य करते थे। आचार्य शिवपूजन सहाय का यह कथन भी इसी बात की पुष्टि करता है- ‘‘हिन्दी दैनिकों ने जहाँ देश को उद्बुद्ध करने में अथक प्रयास किया है, वहाँ जनता में साहित्यिक चेतना जगाने का भी श्रेय पाया है।’’  चूँकि अब पत्रकार का साहित्यिक होना एक विरल संयोग है, साथ ही समाचार पत्रों को साहित्य से कोई आर्थिक लाभ नहीं दिखता, अतः वे साहित्य के लिए पृष्ठ खर्च करने में संकोच करते हैं।

साहित्य के प्रचार-प्रसार का दुर्वह बोझ उठाती लघु पत्रिकाएँ अपने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त हैं। सातवें दशक में बुर्जुआ पत्रकारिता से अलग साहित्यिक संचार के उद्देश्य से लघु पत्रकारिता का आरम्भ हुआ था। लघु-पत्रिका आन्दोलन जिस उद्देश्य को लेकर गतिशील हुआ था, उसके अर्थ में ही अनेक विसंगतियाँ उत्पन्न हो गईं। इतने के बावजूद यह स्वीकार किया जा सकता है कि लघु-पत्रिकाओं ने हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी बखूबी निभाई हैं। यदि ये पत्रिकाएँ नहीं होती तो हिन्दी साहित्य के समक्ष अँधियारा और सघन होता।

एक इलेक्ट्रॉनिक  माध्यम के रूप में रेडियो ने हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार में अमूल्य योगदान दिया है। कविताओं, कहानियों, साहित्यिक-सांस्कृतिक वार्ताओं, परिचर्चाओं का प्रसारण कर लोक-संवाद कायम किया है। रेडियो से जुड़ने वाले आरम्भिक अधिकारी, कर्मचारी, साहित्यकार अथवा साहित्यिक अभिरूचि के थे। अपने भीतर की साहित्यिक अभिरुचि को परिष्कृत करते हुए इन्होंने आकाशवाणी के भीतर-बाहर भी एक साहित्यिक वातावरण निर्मित किया। आकाशवाणी ने मानवीय संवेदनाओं को उद्बुद्ध करने, जन-जागृति लाने, राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्यिक-सांस्कृतिक समारोहों एवं आयोजनों से अपने को जोड़े रखा है। ‘प्रसार भारती’ बनने के बाद रेडियो भी विज्ञापन की बैसाखी पर सवार होने के लिए विवश हुआ है। उसका असर कार्यक्रमों पर पड़ा है। साहित्य-सृजन को बढ़ावा देने वाला वह वातावरण अब नहीं रह गया है। फिर भी अच्छी कविताएँ, कहानियाँ, वार्तायें, रेडियो प्रसारित करता है, लेकिन अब उनके श्रोता नहीं हैं। श्रव्य माध्यम को दृश्य माध्यम ने पछाड़ रखा है। रेडियो की अपेक्षा टीवी लोगों को अधिक प्रभावित कर रहा है। इलेक्टॅ्रानिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने सामाजिक जन-जीवन को गहराई से प्रभावित किया है, क्योंकि साहित्य जनता की चितवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है। इसलिए सामाजिक जनजीवन में आये व्यापक परिवर्तनों ने साहित्य की दिशा और दशा पर व्यापक प्रभाव डाला है। यद्यपि श्रव्य एवं दृश्य माध्यम होने के कारण टेलीविजन काफी सशक्त एवं आकर्षक माध्यम है, जिसका उद्देश्य प्रारम्भ में मनोरंजन, संदेश एवं प्रचार था, किन्तु अब यह सिमटकर केवल मनोरंजन तक ही सीमित रह गया है। साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उपदेश और संदेश भी है और वह भी कांतासम्मित उपदेश। साहित्य व्यक्तिगत हित-अहित की भावना से उपर उठकर सामूहिक हित साधना के लिए संकल्पबद्ध होता है। साहित्य मात्र घटनाओं का चित्रण नहीं, बल्कि वह व्यक्ति के भावजगत और मानस जगत का स्पर्श कर उसमें सुख-दुःख, आशा-निराशा तथा इच्छा-आकांक्षाओं का सहयोगी बनता है। छोटे-छोटे कथा-प्रसंगों, कथानकों, प्रतीकों आदि के माध्यम से वह शाश्वत संदेश देता है; मानवीय संवेदनाओं को गहराई से झिंझोड़ता है। वहीं दृश्य मीडिया अपने विविध रूपों द्वारा उक्त भावमय संवेदनाओं को पात्रों व उनके चरित्रों के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है, जिसका प्रभाव क्षणिक नहीं स्थायी होता है।

साहित्यकार के भीतर भविष्य के प्रति एक अन्वेषी दृष्टि होती है। प्रिंट मीडिया में जहाँ वर्तमान पर दृष्टि होती है, वहीं साहित्यकार इन घटनाओं को व्यापक परिदृश्य में महसूस कर भविष्य की सम्भावनाओं को उद्घाटित करता है। ‘‘एक अच्छे साहित्यकार के पास एक आध्यात्मिक दृष्टि होती है जो कि समस्या की अनन्त गहराई में होकर गुजरने वाली किरण-रेखा की तरह वह तथ्य साहित्यकार के मानसलोक की नैसर्गिक प्रभा से प्रभामंडित होकर बाहर आता है। अगर पत्रकार की दृष्टि सत्य पर होती है तो कहा जा सकता है कि साहित्यकार के पास सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की एक समन्वित दृष्टि होती है जो कि दुर्लभ है।’’  साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करने से यह पता चलता है कि अधिकांश साहित्यकारों में पत्रकारीय प्रतिभा रही है, वहीं पत्रकारों में साहित्यिक प्रतिभा का समावेश भी रहा है। भारतेन्दु जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार ने हिन्दी पत्रकारिता को भी विशेष दिशाबोध दिया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो ‘सरस्वती’ के माध्यम से हिन्दी भाषा के विकास और लेखकों की पीढ़ी तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। आधुनिक युग के साहित्यकारों में प्रेमचन्द, पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रभाकर माचवे, मृणाल पाण्डेय आदि अनेक नाम हैं। इन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में रचनात्मक लेखन के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रियता के साथ रुचि प्रदर्शित की है।

वर्तमान समय में मीडिया बहुत सशक्त है। मीडिया का कार्यक्षेत्र केवल सूचनाओं को उपलब्ध कराने तक नहीं रह गया है। आज मीडिया प्रबल जनमत-निर्माण करने का प्रभावी साधन है। समाज को दिशा देने के दायित्व का भी मीडिया निर्वहन कर रहा है, किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि मीडिया के सशक्तीकरण के पीछे साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है। विभिन्न विषयों से सम्बन्धित साहित्य की पुष्टता का परिणाम है- प्रभावी मीडिया की उत्पत्ति। मीडिया का आधार है विचार, घटनायें, सूचनायें और भाषा। इन्हीं चार मूल तत्वों पर साहित्य का भी निर्माण होता है। किसी भी समय और काल का साहित्य उस समय और समाज की परिस्थितियों से अप्रभावित नहीं रहता हैं उसमें वह समस्त प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होते हैं, जो तत्कालीन समाज में जनजीवन के नियामक रहे हैं। साहित्यकार का संवेदनशील अन्तःमन इन समस्त प्रभावों को सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से जाँच-परखकर सुंदर, सरल एवं सर्वग्राह्य भाषा में लिपिबद्ध करता हैं जो चिर काल तक लोगों को उनकी पूर्वकालीन सभ्यता से परिचित करता है। साहित्य का अपना एक अलग संसार है, जहाँ जीवन विराम नहीं पाता है। पूर्व में लिखा गया साहित्य आज भी जीवित है। सूर, कबीर, तुलसी, रहीम आदि समस्त साहित्य-सर्जक और उनके द्वारा रचित साहित्य आज भी लोगों की प्रेरणा का स्रोत है। इस सम्पूर्ण एवं अमूल्य धरोहर को संजोकर रखने एवं निरंतर नई सभ्यताओं को इसके हस्तांतरण का गुरुतर एवं दुरूह कार्य मीडिया ने ही किया है। कभी यह कार्य मीडिया के रूप में लोक-नाटकों या लोक-नृत्यों ने किया तो कभी देशाटन-प्रेमी व्यक्तियों ने।

हिन्दी साहित्य के मूर्द्धन्य आचार्य शुक्ल ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि साहित्य, विशेषकर गद्य साहित्य के विकास में देश के विभिन्न भागों से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जो साहित्य जागरण हुआ, उससे भाषा के विकास तथा साहित्य के निर्माण को बहूत प्रोत्साहन मिला। भारतेन्दु युग के बाद हिन्दी पत्रकारिता मालवीय युग में भी साहित्य और साहित्यकारों के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। मनीषी साहित्यकारों ने पत्रकारिता को न केवल एक नई दिशा दी, अपितु उसे सशक्त भी किया। साहित्य और पत्रकारिता के घनिष्ठ सम्बन्धों का परिचय उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द के ‘हंस’, पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की ‘प्रभा’, महाकवि प्रसाद की ‘इंदु’ से मिलता है। इसी प्रकार बालमुकुन्द गुप्त, धर्मवीर भारती, अज्ञेय, इलाचंद जोशी, रामवृक्ष बेनीपुरी, रघुवीर सहाय एवं अनेक शिखर के साहित्यकारों ने पत्रकारिता को नये आयाम दिये। आज भी मीडिया के विकसित स्वरूप के समक्ष बढ़ती चुनौतियों का सामना साहित्य ही कर रहा है।

गत सौ वर्षां में कथा, कहानी, दर्शन और विज्ञान साहित्य के निर्माण का जो अबाध क्रम आरम्भ हुआ है, उसकी देन है- मीडिया की आवश्यकता। यदि साहित्य-निर्माण की गति अबाध नहीं होती तो आज सैकड़ों टीवी चैनल और चलचित्र उद्योग अपने वर्तमान शिखर पर नहीं होते। दूरदर्शन पर दिखाये जाने वाले सीरियल रेडियो पर प्रसारित होने वाले रूपक एवं समाचार-पत्रों में प्रकाशित लेख, संस्मरण, कहानी वे सशक्त विधायें हैं जो लोगों को समय के मध्य उत्पन्न हुई रिक्ति को भरने का कार्य करती हैं। यह समस्त विधायें साहित्य की अभिन्न अंग हैं। इसके अतिरिक्त मल्टीमीडिया की श्रेणी में आने वाले यन्त्र जैसे- आडियो, वीडियो, कैसेट, इंटरनेट व कम्प्यूटर के प्रसार ने साहित्य को गतिशील बनाया है। हरिवंश राय ‘बच्चन’ की ‘मधुशाला’ के कैसेट ने दूरस्थ प्रस्तर में रहने वालों को भी बच्चन जी की साहित्यिक उत्कृष्टता का ज्ञान कराया है। इसी प्रकार अनेक कवियों एवं साहित्यकारों की रचनाओं पर बने ये आडियो, वीडियो कैसेट उनके साहित्य का प्रचार अबाध गति से कर रहे हैं। इन कैसेटों के माध्यम से साहित्य-प्रेमी व्यक्ति अपने पसंदीदा साहित्यकार के स्वरों को उनके देहावसान के पश्चात् सैकड़ों वर्षां तक सुन सकता है और उनके साहित्यिक व्यक्तित्व से रू-ब-रू हो सकता है। इसके साथ ही इंटरनेट पर कौन सा ऐसा साहित्य है जो उपलब्ध नहीं है। आज से पचास वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि घर बैठे और कम से कम खर्च पर वे विश्व के साहित्यकारों, विचारकों, वैज्ञानिकों एवं अन्य विशिष्ट लोगों के सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकेंगे एवं उनके विचारों और जीवन-दर्शन को समझ सकेंगे। आज कम्प्यूटर पर बस एक ‘क्लिक’ से अपने पसंदीदा साहित्यकार, विचारक के सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

सन्दर्भ
1. राजकिशोर, (संपादक) मीडिया और हिन्दी साहित्य, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली 2009, पृष्ठ-53
2. वही, पृष्ठ- 39
3. अर्जुन तिवारी, हिन्दी पत्रकारिता और भावात्मक एकता, पृष्ठ- 36
4. प्रतिमा वर्मा, पत्रकारिता और साहित्य, पृष्ठ- 181

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