मुख्य संस्कृत साहित्य में वर्णित-नारी विमर्श

वंदना द्विवेदी
यह सत्य है कि कवि क्रान्ति द्रष्टा होते हैं। उनके विचार स्वतंत्र होते हैं, जैसा उनको समाज में दिखता है वैसा ही वे अपने मनोभावों को व्यक्त कर समाज के सम्मुख लाने का प्रयत्न करते हैं तथा अपनी मान्यताओं की प्रस्थापना करने में सफल होते हैं। जैसा कि कहा भी गया है कि, “कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः तथा अपारे काव्य संसारे कवि रेकः प्रजापतिः। यथास्मै रोचते विश्वं तथैव परिवर्तते।"

अतीत के दास समाज और सामन्ती समाज से लेकर आज भी पूञ्जीवादी समाज में नारी उपेक्षित, शोषित, और परतंत्र रही है नारी सदैव पुरुष वर्ग के मनोविनोद का साधन रही है चाहे वह दासी के रूप में हो या पत्नी के रूप में या वेश्या के रूप में। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होने के कारण ही पुरुष प्रभुत्व समाज में नारी शोषित रही है। संस्कृत साहित्य के आदिकवि वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति के ग्रन्थों को देखें तो स्पष्ट होता है कि नारी अस्मिता के लिये सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं और नारी समाज को उच्च पद पर स्थापित करने का प्रयास करते हैं जैसे-सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी नारायण आदि- स्त्री पात्रों का नाम पुरुष के नाम के पूर्व लगाना ही स्त्री समाज की उच्चता को दर्शाता है। आदि कवि वाल्मीकि, कालिदास भवभूति जन मानस के कवि हैं इन लोगों ने अपने चतुर्दिक वातावरण को तत्कालीन परिस्थितियों में निकट से देखा एवं अनुभव किया। इसलिये इन कवियों के काव्यों में पर्याप्त विषय वैविध्य है।

नारी शब्द नृ $ अञ् $ डीष् नि से बना है। नारी की स्त्री संज्ञा उसके लज्जाशील होने के कारण है ऋग्वेद में "नृ" का प्रयोग नेतृत्व करने, दान देने और वीरता करने के अर्थ में ग्रहण किया है। स्त्री शब्द "सत्यै" धातु से बना है। योग दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि के अनुसार, “सत्यास्ति अस्यां गर्भ" इति। स्त्री के उसके भीतर गर्भ की स्थिति होने से उसे "स्त्री" कहा गया है।1

महिला शब्द महा$इलच$आ त्र महिला है। नारी को सरस्वती, धन की देवी, लक्ष्मी और शक्ति की देवी दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। श्री दुर्गासप्तसती में "श्री महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गा, प्रीत्यर्थं... कहकर देवी के विवध रूपों को वर्णन किया गया है। मनुस्मृति में कहा गया है-
"स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु ना विशेषोऽस्ति कश्चन" अर्थात मनु मानते हैं कि (मनु 9/26) स्त्री और श्री में कोई भेद नहीं होता है।

"संस्कृति" शब्द सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु तृच प्रत्यय से निष्पन्न है जिसका अर्थ है-सुधारना, सुन्दर बनाना-परिपूर्ण बनाना-किसी देश की संस्कृति वहां के रीति-रिवाज परम्परा, रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान, धर्म-कर्म, दर्शन-संस्कार आदि को मिलाकर बनती है। भारतीय संस्कृति का आदर्श, “सत्यं शिवं सुन्दरं" है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है-करूणा, दया, उदारता, परोकार-त्याग बन्धत्व, सहिष्णुता आदि भारतीय संस्कृति की आधार शिला गंगा, गायत्री-गौ-गीता चार ‘ग’ पर आधारित है।2 भारतीय संस्कृति का उद्घोष है-ईशा वास्यमिदं सर्वम् यत्किन्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विधनम्।।" (ईशा0)।

हमारा चिन्तन "आत्मवेत् सर्वभूतेषु, सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयः........।3 माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्या4 वसुधैव कुटुम्बकम् का है। हमारी संस्कृति अध्यात्म प्रधान, सर्वसमावेशी, समन्वयवादी, गतिशील शाश्वत सिद्धान्तों पर आधारित है विश्व के सर्वोत्कृष्ट विचारों का ज्ञान ही भारतीय संस्कृति है। सारी दुनिया का ज्ञान-विज्ञान जहां समाप्त होता है वहीं से भारतीय संस्कृति का सूर्योदय होता है यदि हम विनाश से बचना चाहते है तो हमें अपनी संस्कृति की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। संस्कृति "कल्चर" नीतिगत बाह्य अवधारणा है जबकि संस्कृति सत्य शोधक आन्तरिक रसमयता का प्रवाह है।

भारतीय समाज में नारी त्याग तथा तपस्या की प्रतीक है। मनुस्मृतिकार मनु के इस वचन से नारी समाज को एक नवीन ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्र एतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रियाः।।
(मनु0 3/56)

जहाँ स्त्रियों की पूजा की जाती है, उनका सम्मान किया जाता है वहां देवता लोग निवास करते हैं और जहां पूजा न करके अपमानित किया जाता है मर्यादा के अनुरूप स्थान नहीं दिया जाता है वहां सारी क्रियांए निष्फल हो जाती है।

स्त्रियों का पूजन देवताओं के समाराधन का मुख्य साधन है। यदि वैदिक इतिहास को पलटकर देखें तो नारी भारतीय संस्कृति में अतीव उन्नत गौरव की अधिकारिणी सदा से रही है। स्त्रीत्व के नाते उसमें स्वभाववशात् अनेक प्रकार की दुर्बलताएं स्वतः विद्यामान रहती है। इसलिये भारतीय समाजशास्त्रियों ने , “न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति" का उदघोष किया है।5

इस कथन से एक भ्रान्ति होती है कि यह स्त्री समाज की निन्दा या अपमान सूचक है किन्तु यदि तत्कालिक परिस्थितियों को भी ध्यान दिया जाय तो उस समय समाज तत्जन्य वस्तुस्थिति के अनुरूप रहा होगा। क्योंकि हमारा भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज रहा है और पुरुष प्रधान समाज होने के नाते बल एवं पौरूष का समूचा स्रोत पुरुष को ही माना जाता था। इसलिए धर्मशास्त्रियों ने नारी के संरक्षण का भार शक्ति के स्रोत पुरुष पर ही छोड़ दिया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय समाज में नारी के तीन रूप दृष्टिगोचर होते हैं-(1) कन्यारूप (2) भार्यारूप (3) मातृरूप

मनु स्त्रियों के विषय में स्वतंत्रता को कदापि स्वीकार नहीं करते दिखते हैं उनका दृष्टिकोण है कि पति को स्त्री की रक्षा के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये।
पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा, न स्त्रीस्वान्त्रयमर्हति।।
(मनुस्मृति 9/2)

कौमार काल नारी जीवन की साधनावस्था है और उत्तर काल उस जीवने की सिद्धावस्था है। इस अवस्था में पिता कन्या की रक्षा करता है और जब युवावस्था में कन्या का पदार्पण होता है तब उसका पति उसकी रक्षा करता है और वृद्धावस्थां में पुत्र नारी के जीवन की रक्षा करता है स्त्री स्वतंत्र नहीं रह सकती है। इस प्रकार का वाक्य परिस्थिति जन्य सत्य हो सकता है किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार का बन्धन नारी अस्मिता पर प्रश्नवाचक चिह्न है। आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उचित नहीं है।
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम।
विषयेषु च सज्जनतयः संस्थाप्यादत्मनो वशे।।  (मनु0 9/3)

पुरातन काल से पुरुष ने नारी को अपनी पैतृक सम्पत्ति माना है पहले पुरुष घर-परिवार का पालन-पोषण करने के लिये अधिक परिश्रम का कार्य करती थी और नारी घर के कार्यो में उलझी रहती थी।

नारी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं थी और कालान्तर में इस कमजोरी के कारण शोषित होती गयी।
नारी कन्या रूप मेंः- संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदाास द्वारा कुमार संभवम् महाकाव्य में पार्वती का चित्रण नारी के रूप में किया गया है। आर्य संस्कृति के प्रतिनिधि कवि कालिदास माने जाते हैं। आर्य कन्या के आदर्श को पार्वती के रूप में उल्लिखित करते हैं। पार्वती आर्य कन्या के लिये प्रतिमान बनी है और इसके लिये आर्य कन्या को अदम्य, अजेय तथा जितेन्द्रिय, बनाने का मुख्य साधन तपस्या ही है। कुमार संभवम के पंचम सर्ग में भग्न मनोरथा पार्वती शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये जगत की सभी भौतिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर कठोर तपस्या की साधना में जुट गयी। पार्वती की तपस्या दिन-प्रतिदिन इतनी कठोर होती जा रही थी कि तपोवन में रहने वाले मुनियों की तपस्या भी प्रभावहीन प्रतीत होने लगी थी। इस प्रकार कठोर से कठोर तपस्या करके अपने अकीष्ट शिव को पति के रूप में प्राप्त करना। मुख्य उद्देश्य था-
इयेष सा कर्तुमबन्ध्यरूपतां
समाधिमास्थाय तपोभिरात्मनः।
अवाप्यते कथामन्यथा इयं
तथा विधं प्रेम पतिश्च तादृशः।।
   (कुमार सम्भव 5/2)

पार्वती की तपस्या का फल था-उत्कट कोटि का अलौकिक प्रेम और तादृशः पतिः तथा मृत्युको जीतने वाला पति-जगत के समस्त पति मृत्यु के क्रीत दास है केवल एक ही व्यक्ति मृत्यु को जीतने वाला है और वह है मृत्युजय महादेव। आज तक कोई अन्य कन्या मृत्युंजय महादेव को पति के रूप में वरण करने में समर्थ नहीं हो पायी जो कार्य पार्वती ने तपस्या के द्वारा सिद्ध करके दिखाया है। तथाविधं शब्द में गंभीर अर्थ की अभिव्यंजना हुई है भगवान शंकर ने पार्वती को उचित आदर-सम्मान दिया है। पत्नी को जितना उच्च स्थान भगवान शंकर ने दिया है उतना किसी अन्य देवता ने नहीं दिया है। कालिदास के तत्कालिक समाज में स्त्रियों को स्वतंत्रता प्राप्त थी अपना वर स्वयं वरण करती थी-अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला, कुमार संभवम् में पार्वती और रघुवंश महाकाव्य में इन्दुमती का विवाह पूर्णतः उनकी इच्छा से हुआ है। विधवा स्त्री की उस समाज में स्थिति का ज्ञान रघुवंश के उन्नीसवें सर्ग में होता है जब राजा अग्निवर्ण की मृत्यु हो जाती है तब उनकी विधवा रानी का राज्य मंत्रियों के द्वारा सम्मान एवं अधिकार के साथ विधिवत् राज्याभिषेक किया जाता है।10

"मालविकाग्निमित्रम" में "परिब्राजिका" का उल्लेख प्राप्त होता है। जो विधवा थी लेकिन विदुषी इतनी थी कि विद्वानों की योग्यता का परीक्षण भी करती थी।

महाकवि कालिदास अभिज्ञान शाकुन्तलम सप्तम सर्ग में स्वयं कहते हैं कि सहधर्मिणी का परित्याग पाप होता है, “कस्तस्य धर्मदार परित्यागिनो नाम संकीर्तयितुं चिन्तयिष्यति।"11

पत्नी को इतना उच्च स्थान प्रदान करना सत्कार का महान प्रकर्ष है, आदर की पराकाष्ठा है। गौरी की यह साधना भारतीय कन्याओं के लिये अनुकरणीय वस्तु है। संस्कृति के प्रारम्भ से भारतीय कन्याओं के लिये एक महान प्रारम्भ से भारतीय कन्याओं के लिये एक महान आदर्श कोई यदि है तो वह है पार्वती। आज भी "गौरी पूजन" का महत्व इस प्रकार के पूजा में आदर्श के प्रति आदर एवं सम्मान भाव आज भी दृष्टिगोचर होता है।
संस्कृत वाड़ग्मय देदीप्यमान जगत में महर्षि वाल्मीकि एवं वेदव्यास के बाद जिन महाकवियों ने सर्वाधिक सम्मान एवं लोक प्रियता अर्जित की है उसका नाम है कालिदास भवभूति। इन लोगों ने अपने काव्यों में नारी समाज का सम्यक् दिग्दर्शन किया है। कालिदास की रचनाओं में समाज का सांगोपांग वर्णन हुआ है तथा उनकी रचनाओं में नारी समाज का एक ऐसा स्वरूप दृष्टिगत होता है जिसे समाज की प्रमुख भित्ति कह सकते हैं। तत्कालीन समाज में नारी समाज का महत्व पूर्ण अंग थी जिसकी सहभागिता सभी कार्यों में थी। सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ समझा जाता था इस आश्रम का आधार पत्नी होती थी क्योंकि गृहस्थ उसी की सहायता से अपने धार्मिक अनुष्ठान का सम्पादन करता था।

रघुवंश महाकाव्य के चतुर्दश सर्ग में प्रसंग प्राप्त होता है कि राम ने अश्वमेध यज्ञ के समय अपने वामभाम में अद्धार्गिंनी सीता की स्वर्णमयी मूर्ति की स्थापना की थी।6

कुमार संभवम के छठे सर्ग में हिमालय राज पार्वती के विवाह के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय मेना से सुनना चाहते हैं। "शैलः सम्पूर्ण कामोऽपि मेनामुखमुदैक्षत प्रायेण गृहणी नेत्रः, कन्यार्थेषु कुटुम्बिनः।"7

कालिदास के तत्कालीक समाज में नारी के वचनबद्धता का मानना पुरुष का प्रमुख धर्म था जैसे कैकेयी के वचन का अनुपालन करने हेतु राजा दशरथ राम को चैदह वर्ष का वनवास देते हैं।8

कुमार संभवम् से यह ज्ञात होता है कि पार्वती को समस्त विद्यालयों को ज्ञान था अभिज्ञान शाकुन्तलम् में प्रियं वदा, अनुसूया, शकुन्तला शिक्षितस्यिा है जो कण्ण प्रत्तषि द्वारा शिक्षित हुए थे।
गृहणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिता कलाविधौ।
करूणविमुखेन मृत्युना हरतां त्वां वद किं न मे हृतम्।।9

कालिदास के तत्कालिक समाज में स्वतंत्रता प्राप्त थी, अपना वर स्वयं वरण करती थी-अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला, कुमार संभवम् में पार्वती, और रघुवंश महाकाव्य में इन्दुमती का विवाह पूर्णतः उनकी इच्छा से हुआ है। विधवा स्त्री की उस समाज में स्थिति का ज्ञान रघुवंश के 19वें सर्ग में होता है। राजा अग्निवर्ण की मृत्यु हो जाती है। तब राज्य मंत्रियों के द्वारा सम्मान एवं अधिकार के साथ उनकी विधवा रानी का विधिवत राज्याभिषेक किया जाता है।10

मालविकाग्निमित्रम में "परिव्राजिका" का उल्लेख प्राप्त होता है जो विधवा थी लेकिन विदुषी इतनी थी कि विद्धानों की योग्यता का परीक्षण भी करती थी।

महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् सप्तम सर्ग में स्वयं कहते हैं कि सहधर्मिणी का परित्याग पाप होता है-
"कस्तस्य धर्मदार परित्यागिनों नाम संकीर्तयितुं चिन्तयिष्यति।"11

सीता राम के प्रश्न का प्रत्युत्तर देते हुये कहती है कि- मनुष्य उसी वस्तु के लिये उत्तरदायी होता है, जिस पर उसका अधिकार होता है मैं केवल अपने हृदय की स्वामिनी हूँ उसी पर मेरा पूरी तरह से नियंत्रण है जो कि सदैव आपका चिन्तन करता रहता है। शरीर के अंग मेरे वश में नहीं है वह पराधीन होते हैं। यदि रावण ने बलात् स्पर्श कर लिया हो तो मेरा इसमें कोई दोष नहीं है।

इस प्रकार मेरे चरित्र पर लांछन लगाना कथमपि उचित नहीं है। महर्षि वाल्मीकिं सीता से कहलाते हैं कि आपने मेरे निर्बल अंश को क्यों पकड़ लिया है मेरे सबल अंश को क्यों पीछे ढकेल दिया है। नारी का दुर्बल अंश है उसका नारीत्व -स्त्रीत्व का सबल अंश है पत्नीत्व और पतिव्रता सीता कहती है कि हे नरशार्दूल! आप मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं परन्तु क्रोधावेश में आकर आप जो अनुचित बातें कह रहे हैं वे साधारण जन के समान हैं। सीता कहती है कि मेरा स्वभाव और हृदय दोनों निश्छल है पवित्र है मैं हृदय से आपकी भक्ति करती हूँ - सीता के मर्मस्पर्शी शब्द कितने ओजस्वी एवं महत्वपूर्ण हैं स्त्री समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिये -
त्वया तु नरशार्दूल क्रोधमेवा नुवर्तता।
लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम्।।
न प्रमाणीकृतः पाणिर्बाल्ये बालेन पीड़ितः।
मम भक्तिश्च शीलश्च सर्व ते पृष्ठतः कृतम।।
(वाल्मीकि रामायण)

सीता के इस प्रकार के वचन को सुनकर सहृदय व्यक्ति के आँखों में सहानुभूति के आँसू निकल पड़ते हैं।

कालिदास ने सीता का चरित्र चित्रण जिस वैदग्धवाणी से किया है वह आज भी मानव चित्त को मोहित कर देने वाली है।

प्रजापालन की वेदी पर भववान श्री राम ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर के समाज में एक आदर्श उपस्थित किया है लेकिन परित्यक्ता वैदेही ने अपना आदर्श उपस्थित किया है। घने जंगल में जब लक्ष्मण जी सीता को छोड़कर जाने लगे तो सीता ने जो आत्मनिवेदन किया है वह भारतीय नारी के गौरव, मर्यादा तथा त्याग का ज्वलन्त उदाहरण है।

लोकमंगल की वेदी पर आत्मोत्सर्ग भारतीय नरेशों का आदर्श प्रजापालन व्रत है।

प्रजा अनुरंजन के लिये राम ने अपनी प्राणवल्लभा सीता को छोड़ने में थोड़ा भी देर नहीं किया गर्भभार से आक्रान्त सीता राम की बुराई न करके इस हृदय विदारक दृश्य के औचित्य को अच्छी तरह से समझ रही है किन्तु फिर भी परिस्थिति वश उलाहना देने में देर नहीं लगाती है और लक्ष्मण से पूछती है कि इस विकट परिस्थिति में परित्याग शास्त्र के अनुकूल है क्या? यही इक्ष्वाकुवंश की मर्यादा है? फिर भी सीता सोचती है कि राम तो किसी का अहित नहीं सोच सकते हैं हो सकता है यह मेरे किसी जन्म के कर्म का फल हो। इस प्रकार सीता कर्मवाद के सिद्धान्त से आत्मतुष्टि का अनुभव कर रही हैं।
कल्याण बुद्र्धेश्थवा तवायं न कामचारो मयिशड़क्नीयः।
ममैव जन्मान्तर पातकानां विपाक विस्फूर्ज धुर प्रमेयः।।

सीता जी सोच रही है कि मुझे अपने पापों से मुक्त होने का एकमात्र साधन है तपस्या और साधना भारतीय नारियों के लिये आदर्श एवं त्याग की प्रतिमूर्ति सीता जी की एक विषाद भरी प्रार्थना जो समााज में सीता को और उच्चस्थान प्राप्त करती है त बवह कहती है कि राजा राम अयोध्या के महाराजा है और प्रजाओं के कल्याण के विषय में सोचना एक राजा का धर्म है इसलिये एक सामान्य प्रजा की ही भाॅति मुझे तपस्विनी की भी चिन्ता करे। जनक नन्दिनी सीता की इस प्रार्थना में कितना ओज एवं मर्मस्पर्शिता भरी है तथा आत्म त्याग की भावना तथा इससे भी ज्यादा करूणा क्या हो सकती है-
"तपस्विसामान्यमवेक्षणीया।"
इस प्रकार का जीवन सदैव से ही नारियों का आत्मत्याग का जीवन रहा है।

इतिहास भी साक्षी है कि जितना आत्म त्याग नारियों में दृष्टिगोचर होता है उतना और किसी में नहीं। नारी पशुप्रवृत्ति की प्रतीक नहीं है वह तो दिव्य गुणों की प्रतिमा है। अलौकिक गुणों की मूर्ति है इसलिये हमारी तान्त्रिक पूजा में शक्ति या मुद्रा की महती उपयोगिता है।12 इस प्रकार हम देखते है कि सीता से सम्बन्धित जितने भी साहित्य है सभी में सीता के लिये उत्कृष्ट गुणों का समायोजन किया गया है और इन उत्कृष्ट गुणों के कारण ही भारतीय स्त्रियों के लिये सीता सर्वोत्कृष्ट आदर्श है और आज भी सीता का चरित्र अनुकरणीय है। नारी चित्रण के जितने भी भारतीय आदर्श है वे सभी सीता के चरित्र से ही प्रार्दूभूत हुये है। इसलिये सम्पूर्ण आर्यावर्त में सहस्रों वर्षों से माँ सीता की पूजा हो रही है।

भारतीय साहित्य एवं समाज में "सीता" शब्द परम पवित्रता, विशुद्धता तथा अति निर्मलता तथा विशुद्ध चरित्र का ही सूचक है। कोई वरिष्ठ या वृद्ध जन यदि किसी कन्या या वधू को आशीर्वाद देते है तो कहते हैं कि "सीता बनो" इसका तात्पर्य है कि सीता सी पवित्र, पतिपरायण पतिव्रता, विशुद्ध आचरण सर्वसहिष्णु समभाव युक्त बनो।

भारत वर्ष में पारम्परिक मान्यता है कि प्रत्येक बालिका को सीता का रूप तथा प्रत्येक बालक को श्रीराम का रूप  माना जाता है-
चन्दन है इस देश की माटी तपोभूमि हर ग्राम है
हर बाला देवी की प्रतिमा बच्चा बच्चा राम है।13

आदर्श भाव की प्रतिनिधि सीता:-
  भारतीय नारियों के लिये आज भी माता सीता आदर्श भाव की प्रतिनिधि है। सीता मूर्तिमयी साक्षात भारत माता मानी जाती है। भारतीय नारियों से सीाता के चरणचिन्ह का अनुसरण कराकर अपनी उन्नति करनी होगी, यही एकमात्र पथ है।
स्वामी विवेकानन्द कहते है, “मैं दिव्य दृष्टि से देख रहा हूॅ कि यदि भारत की नारियाँ देशी पोशाक पहने भारतीय ऋषियों के मुख से निकले हुये धर्म का प्रचार करे तो एक ऐसी बड़ी तरंग उठेगी जो सारे पश्चिमी संसार का डुवा देगी।

भारतीय में स्त्रीजीवन का आदर्श मातृत्व है "स्त्री" शब्द के उच्चारण मात्र से भारतीयों के मन में "मातृत्व" भाव उत्पन्न होता है।

जैसा कि हितोपदेश में स्त्री को माँ के रूप में देखने का उपदेश दिया गया है।
मातृवत पर दारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूर्तषु यः पश्चति स पण्डितः ।।14

अर्थात जो परस्त्रियों को माता के समान परदृव्य को मिट्टी के ढेले के समान तथा सव भूतप्राणियों को अपने ही समान देखता है वही यथार्थ देखता है और वही पण्डित है। पश्चिमी देशों में भारतीय मातृ संकल्पना के विपरीत विचारधारा है वहाँ पर स्त्री का आदर्श मातृत्व न होकर पत्नीत्व तक ही सीमित है। किन्तु भारत में समस्त स्त्रीत्व को मातृत्व रूप में केन्द्रीभूत माना जाता है। पाश्चात्य संस्कृति में गृह की स्वामिनी शासिका पत्नी है, वही भारतीय गृहों में स्वामिनी और शासिका माता है। पाश्चात्य संस्कृति में माता को वह गौरव स्थापित नहीं है जो भारतीय संस्कृति में स्थापित है। विश्व में माँ से अधिक पवित्र और निर्मल दूसरा कौन सा नाम है? माँ तो त्याग, पवित्रता दिव्यता ममता आदि गुणों का प्रतीक रही है।

माता ही शिशु की प्रथम गुरू शिक्षिका होती है और परिवार प्रथम पाठशाला होता है।

प्राचीन काल में गार्गी, मैत्रेयी, विदुषी अपाला, घोषा आदि विदुषी महिलाएं हुई है। जिन्होंने किसी भेद भाव के बिना पुरुषों के समान ही शिक्षा प्राप्त की थी। वैदिक मंत्रों की रचना तथा शास्त्रार्थ में समान रूप से भाग लेने का आख्यान उपलब्ध होता है।
1- सरमापाणि संवाद-10/108 (ऋग्वेद)
2- याज्ञवल्क्य मैत्रेयी संवाद।
3- पुरुरवा-उर्वशी संवाद-
4- यम-यमी संवाद-10/10
5- विश्वामित्र नदी संवाद- 3/33

वर्तमान युग में बालिकाओं के शिक्षा पर सरकार ज्यादा जागरूक हुई है और सभी बालिकाओं को भेद-भाव के बिना बालक के समान ही शिक्षा प्रदान करने की कोशिश की जा रही है।

काल विशेष एवं परिस्थिति विशेष के हिसाब से देखे तो स्त्रियों के साथ भेदभाव विश्व के अनेक देशों में रहा है। भारत से कही अधिक भेदभाव पाश्चात्य देशों में था क्योंकि इस बात की पुष्टि स्वामी विवेकानन्द के कथन से होती है-

“यह आश्चर्य की बात है कि कैम्ब्रिज और आक्सफोर्ड वि0वि0 के दरवाजे स्त्रियों के लिये आज भी बन्द है यही स्थिति हावर्ड और येल के विश्वविद्यालयों की भी है पर कलकत्ता वि0वि0 ने बीस वर्ष पूर्व ही स्त्रियों के लिये अपना द्वार खोल दिया था। मुझे स्मरण है कि जिस वर्ष मैं बी0ए0 में उत्तीर्ण हुआ था, उस साल कई लड़कियाँ भी मेरे साथ बी0ए0 में उत्तीर्ण हो हुई थी। उन लोगों की पाठ्यपुस्तके और अन्यान्य विषय लड़कों के ही समान थे। फिर भी बहुत सी लड़कियाँ सफलता पूर्वक उत्तीर्ण हुईं।

स्वामी विवेकानन्द जी आगे कहते है कि हमारे धर्म में तो लड़कियों को शिक्षा देने का निषेध है ही नहीं। प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि विद्यापीठों में लड़के लड़कियाँ दोनों ही जाते थे।

महाकवि भवभूति ने यदि राम को एक आदर्श राजा के रूप में वर्णित किया है तो माता सीता को एक आदर्श सती स्त्री, तपस्विनी, कुशल वहू आदि के रूप में चित्रित किया है।

दाम्पत्य जीवन का जितना स्वाभाविक और मार्मिक वर्ण भवभूति ने किया है उतना अन्यत्र दुर्लभ है। दाम्पत्य भाव सुख-दुख में एक रूप रहता है जीवन की सभी अवस्थाओं में व्याप्त रहता है। इसमें हृदय को विश्राम मिलता है। वृद्धावस्था इसके रस को हर नहीं सकती है। यह विवाह से मृत्यु तक परिपक्व प्रेमरूप में रहता है। अतएव इसकी कामना की जाती है।

भवभूति कहते हैं, “स्नेहश्च निमित्तसव्य पेक्षश्च इति विप्रतिषिद्धमेतत" प्रेम हो और फिर वह किसी कारण पर आश्रित हो, ये दोनों बातें एक दूसरे के सर्वथा विरूद्ध है। प्रेम तत्व एक दुरूह तत्व है जिसे यथार्थतः जानना उतना कठिन नहीं है जितना उसका आचरण में लाना। गृहस्थ जीवन में इसी प्रेम तत्व की साधना सिखलायी जाती है-महाकवि भवभूति ने इसी तत्व की सुन्दर व्याख्या की है-
अद्वैतं सुखदुःखयोर नुगुणं सर्वास्वस्थासु यद
विश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा यस्मिन्नहार्यो रसः।
कालेनावरणात्ययात् परिणते यत्स्नेहसारे स्थितं
भद्रं प्रेम सुमानुषस्य कथम्प्येकं हि तत् प्राप्यते।।
उत्तर रामचरितम् (1/39)

भवभूति कहते हैं प्रेम का रहस्य तो केवल हृदय ही जानता है-
हृदयं त्वेय जानाति प्रीतियोगं परस्परम् (6/32)
(उत्तर रामचरितम्)

जीव को भगवान की ओर उन्मुख करने का साधन नारी है।

संस्कृत अलंकार साहित्य में तीन प्रकार के शब्द माने गये हैं-
1-प्रभुसम्मित शब्द 2- सुहृत सम्मित शब्द 3- कान्ता सम्मित शब्द
काव्य के लक्षण में-आचार्यकहते हैं कि कान्ता सम्मित शब्द वे होते हैं जो प्रियतमा के कमनीय वचन के समान जो शब्द रसमय होने से शीघ्र ही हृदय पर प्रभाव डालते हैं और सहृदय व्यक्ति मानने के लिये बाध्य हो जाता है।
जैसे-रस प्रधान काव्य।

इस प्रकार साहित्य में नारी को विशेष रूप से महत्व दिया गया है और सम्पूर्ण विमर्श के केन्द्र में नारी को केन्द्रित किया गया है।
काव्यं यशसे अर्थ कृते व्यवहारविदे...
कान्ता सम्मित तयोपदेशयुजे।11

महर्षि व्यास के महाकाव्य महाभारत में नारियों का चित्रण हुआ है लेकिन रामायण कालीन संस्कृति के समान समुन्नत एवं सुसंस्कृत नहीं प्रतीत होती है। धार्मिक विश्वास और नैतिक नियमों में भी परिवर्तन न हो गया था। रावण सीता का बलात अपहरण करता है पर जब हनुमान सीता को राम के पास अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाना चाहते हैं तब सीता पर पुरुषस्पर्श के भय से यह प्रस्ताव अस्वीकाार कर देती है। रावण वध के अनन्तर सीता को अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के लिये अग्नि परीक्षा देनी पड़ी है। किन्तु काम्यक् वन में जब जयद्रथ द्रोपदी का बलात् अपहरण करता है तब उसके पतिगण द्रोपदी के चरित्र के सम्बन्ध में कुछ भी सन्देह नहीं करते। इससे प्रतीत होता है कि राम के समय पतिव्रत की भावना अधिक कठोर थी तथा नैतिक आदर्श अत्युच्च था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महर्षि वाल्मीकि, कालिदास, व्यास, महाकवि भवभति ने अपनी रचनाओं में नारी पक्षों के प्रति आदर भाव प्रकट किया है सीता, पार्वती, गौतमी धारिणी, शकुन्तला, यक्षिणी, द्रोपदी आदि स्त्रियों का चरित्र वर्तमान में भी अनुकरणीय है और युगों-युगों तक इन स्त्रियों का चरित्र नारी समाज के लिये आदर्श बना रहेगा।

सन्दर्भ ग्रन्थ-
1- भारत राष्ट्र चिन्तन- रामजन्म सिंह पृष्ठ-45
2- दुआ (श्रीमती) सरला, आधुनिक हिन्दी साहित्य में नारी पृष्ठ-149
3- गरूण पुराण उ0 खण्ड
4- अथर्ववेद
5- भा0 धर्म और दर्शन आचार्य वल्देव उपाध्याय पृष्ठ-438
6- डा0 कृष्ण मणि त्रिपाठी 14/87 चौखम्भा सुरभारती, वाराणसी।
7- पाण्डेय प्रद्युम्न- कुमार संभवम् पृष्ठ 6/85 चौखम्भा
8- त्रिपाठी डा0 कृष्ण मणि, रघुवंशम् 12/5, 6-चौखम्भा सुरभारती, वाराणसी।
9- वही 8/67
10- पाण्डेय डा0 रमाशंकर, मालविकाग्नि मित्रम-चौखम्भा सुरभारती वाराणसी पृष्ठ-39
11- द्विवेदी डा0 कपिलदेव, आभिज्ञान शाकुन्तलम्-सप्तम अंक-पृष्ठ 421
12- आचार्य बल्देव उपाध्याय-भा0 धर्म और दर्शन-पृष्ठ 445
13- बाल संस्कार पाठशाला, गीता परिवार-संगमनेर, पुर्ण महाराष्ट्र संवत् 2066 पृष्ठ-9
14- हितोपदेश
15- विवेकानन्द साहित्य, अद्वैत आश्रम कोलकाता वर्ष-1963 ई पृष्ठ सं0 320-21
16- वही-पृष्ठ सं0 321
17- काव्य प्रकाशः आचार्य विश्वेश्वर

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।