कहानी: मायके की डोर

- अश्विनी यू नंबियार


"शहीद रणजीत सिंह अमर रहे"

"भारत माता की जय"

ऐसे ही जोशीले नारों के बीच उनकी अंतिम विदाई हुई थी। गढ़वाल के दूर-दराज़ में बसा यह छोटा सा गाँव 'चंदेली' समाचार पत्रों व टीवी चैनलों पर छाया हुआ था। कैसा जन सैलाब उमड़ा था उस दिन! कौन कौन से नेता आए, किसने क्या कहा, उसे कुछ याद नहीं। उसे तो अपनी भी सुध न थी। किसी ने बाँह पकड़कर खड़ा किया था तो कोई सिर का पल्लू संभाल रहा था। चंद रोज़ पहले तक जो जीवन से भरपूर था, उसकी दुनिया था, आज वही दुनिया से बेखबर ताबूत में कैसे बेखबर सो रहा था। एक तूफान सीने में उफन रहा था मगर आँखे इस प्रत्यक्ष सत्य को नकारती बाँध बनी उसे रोके हुए थीं। बिट्टू को देखते ही वह उसके सीने से लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी। बिट्टू जो उसकी बिदाई में धैर्य की मूरत बना था, आज बिखर गया। उसे देखकर तो आज किसी का भी दिल रो पड़ता, फिर वह तो उसका सगा भाई था। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कहता, "हाथों की मेंहदी तक न छूटने पाई थी और माँग सूनी हो गई।" तो कोई कहता, "कैसे काटगी बेचारी पहाड़ सी जिंदगी? अभी उम्र ही क्या है?" लोगों की बातें जहरीले भालों सी कभी कभार उसके कानो में भी आ जाती थीं। तब तीव्र वेदना उठती थी  हृदय में।

एक तीव्र वेदना उसने फिर महसूस की। कांटे की चुभन की वेदना। नीरू की आह निकल गई और ध्यान टूट गया। काँटा खींचने पर खून टपकने लगा। मीना पैर पर रुमाल बाँधते हुए बोली, "कहाँ ध्यान है दी। काँटे के पौधे पर ही पैर रख दिया?"  नीरू चुप रही। कैसे कहे कि वह सारी बातें आज भी चलचित्र की भांति उसके दिलो-दिमाग़ पर छाई रहती हैं। वह जय-जयकार के नारे अब तक उसके कानों में गूँजते हैं। मीना उसका उदास और हतप्रभ चेहरा देख कर समझ गई कि ये आँसू काँटे की चुभन के नहीं बल्कि दिल के जख्म के हैं।

मीना: "संभालो खुद को दी। वैसे भी शहादत पर गर्व किया जाता है। आँसू नहीं बहाए जाते।"

नीरू: "जानती हूँ मीना। देश के लिए कुर्बान होकर वह तो अमर हो गए। इस बात का बेहद गर्व है मुझे। मगर इस सब में मेरा तो कोई कसूर नहीं है। माँजी और जेठजी क्यों मुझे दोषी मानते हैं? सोचती हूँ कि ऐसा क्या करूँ कि वे मुझसे पहले जैसा ही व्यवहार करने लगें।"

मीना: "रहने दो दी। अब और क्या बाकी है करने को। कितना कुछ मिला था सरकार से आपको। सब कुछ सास के नाम कर दिया। सच बहूत भोली हो आप।"

नीरू: "मैं क्या करती उस दौलत का। वह घर की बड़ी हैं, यही सोचकर सब उनको सौंप दिया।"

मीना: "क्या करती क्या। आप अपना सपना तो पूरा कर सकती थीं। आपके पति की भी तो यही इच्छा थी। अब कौन करेगा आपकी मदद? आपके भाई को कुछ बताया आपने?"

नीरू: "नहीं। क्या बताऊँ? अब मेरी आँखों में कोई सपना नहीं। बस ससुराल में सबकी सेवा करुँगी। यही मेरा धर्म है।"

मीना: "और जो वे लोग आपको ससुराल में रहने ही न दें तो? मुझे तो उनके इरादे ठीक नहीं लगते।"

नीरू: "तब भाई को सब बता दूँगी। मैं जानती हूँ वह हर हाल में मेरा साथ देगा। बस मेरा माइका खुशहाल रहे मेरे लिए यही काफी है।"

उसका माइका खुशहाल रहे इसलिए तो वह हर सोमवार नंगे पाँव महाकालेश्वर के मंदिर जल चढ़ाने आती है। बिट्टू की परीक्षा चल रही है। वह अच्छे नंबंरों से पास हो जाए इसी की मन्नत माँगी है महादेव से। नौकरी के लिए तो वह पहले ही चुन लिया गया है।

मंदिर घर से काफी दूर है और फिर पैदल जाने का संकल्प। इसलिए सुबह-सुबह ही निकलना होता है ताकि नाश्ता बनाने के समय तक लौटा जा सके। मीना नीरू के पड़ोस में रहती है। बी.ए के प्रथम वर्ष में है। उसका कॉलेज महाकालेश्वर के रास्ते में ही है। सोमवार को वह नीरू के साथ पैदल ही चल पड़ती है। लौटते हुए वह कॉलेज चली जाती है और नीरू घर लौट आती है।

कॉलेज के बाहर आज भी लड़कों का वही झुंड टकरा गया या शायद उनके इंतज़ार में ही वहाँ बैठा था। और सब मिलकर वही धुन गुनगुनाने लगे
"मुड़ के ना देखो दिलबरो... दिलबरो...
मुड़ के ना देखो दिलबरो... ।"

मीना दबी हँसी हँसने लगी। बोली, "ये मेरे सीनियर हैं। पूछ रहे थे कि हर सोमवार आलिया भट्ट को कहाँ से ले आती है।" वे भी तो उसे आलिया भट्ट कहकर ही छेड़ते थे। नीरू थोड़ी शर्मायी मगर अगले ही पल संभल गई। वह कोई कुँवारी लड़की नहीं है, न ही सुहागन। वह तो विधवा है। उसे यों शर्माते देख लोग क्या सोचेंगे? मीना क्या सोचेगी?

मीना उसके मन के भाव समझ गई और उसका हाथ दबाते हुए बोली, "अब जीना फिर शुरु करो दी।" नीरू बिना कुछ कहे चली गई।

मीना खड़ी सोचती रही कि कैसे बस सात फेरों ने उससे कुछ माह बड़ी नीरू से उसका लड़कपन ही छीन लिया। मीना अब भी आंगन में भाई-बहनो के साथ लड़ती झगड़ती है, दोस्तों के साथ घूमती-फिरती है और नीरू एक प्रौढ़ा की भांति घर के चूल्हे-चौके से बंधी है। मीना की आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने हैं और नीरु की हताश आँखों में जीने की चाह  तक नहीं। सच, कच्ची उम्र की शादी अपराध नहीं पाप है!

एक दिन  मीना कॉलेज से लौटी तो माँ ने बताया कि नीरू को रोते-रोते कहीं जाते देखा था।

मीना: "अब  क्या हुआ?" मीना खाते-खाते रुक गई।

"पता नहीं मगर उसका सामान गाय के छप्पर में डाला हुआ है और एक पुरानी खटिया भी धरी है वहीं एक कोने पर।" माँ ने कहा।

मीना: "ये लोग तो उसे घर से निकालनेपर उतारू हैं। कहाँ गई होगी?"

माँ: "और कहाँ जाएगी। मायके की डोर ही ऐसे वक्त में बड़ा सहारा होती है हर औरत का। जानती है हमारे पहाड़ों में दाह-संस्कार के बाद शमशान से लौटते वक्त मृतक के भाई-बंधु रास्ते में राई बिखेरते आते हैं। आत्मा के लिए इस राई से लंबी-लंबी घाँस फूट पड़ती है जो उसे घर की ओर आने से रोकती है। लड़की की बिदाई में दरांथी इसलिए दी जाती है कि उसकी आत्मा वह घाँस के जंगल काटकर अपने मायके आ सके। तभी तो कहते हैं कि सारे दरवाजें भले ही बंद हो जाएं पर मायके का दर बेटी के लिए सदा खुला रहता है।"

नीरु के मायके में बस दो ही लोग थे। माँ और भाई बिट्टू यानि बिरेंदर।

बिट्टू और नीरू जुड़वाँ थे। पिता का साया बचपन में ही छिन गया था। पिता सरकारी नौकर थे इसलिए पेंशन सहारा बन गई। मगर आधी पेंशन किसी चैरिटेबल ट्रस्ट को चली जाती जिसे  पिताजी कई सालों से दे रहे थे। माँ इतनी पढ़ी – लिखी न थी कि उसे रोकने के लिए अर्जी वगैरह करती और फिर उनका मानना था  कि माँ-बाप द्वारा  किए गए पुण्यों का फल बच्चों को अवश्य  मिलता है। बच्चे दोनों ही होनहार थे। बारवीं में बिट्टू अच्छे  नंबरो से पास हुआ और नीरू पूरे उत्तराखंड़ में तीसरे नंबर पर आयी। माँ की तरह उसके  दिल में भी इच्छा थी डाक्टर बनने की मगर घर की हालत वह जानती थी। फिर भी नीट की परिक्षा दे ही आई और उसमे भी उसका नाम पहले 100 छात्रों में था। माँ ने बहूत कोशिश की मगर डाक्टरी की पढ़ाई के लिए कहीं से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी। बिट्टू को शहर में दाखिला मिल गया और नीरु ने आगे ना पढ़ने का फैसला  किया। जानती थी  कि माँ दोनो की पढ़ाई का बोझ नहीं उठा सकती। नीरू ट्यूशन लेने लगी ताकि भाई की फीस भरी जा सके। इसी दौरान मेजर रणजीत सिंह का रिश्ता आया गया। काफी नामी परिवार था। माँ की उम्मीद  फिर जग उठी। माँ ने कहा "बहूत संपन्न परिवार है। कहते हैं तुझे आगे पढ़ाऐंगे।" फिर क्या था नीरू ने भी हामी भर दी। चट मंगनी और पट ब्याह हो गया। शादी के बाद नीरू की तो दुनिया ही बदल गई थी। मेजर साब अपनी होनहार पत्नी को डाक्टर बनता देखना चाहते थे। भोली-भाली और मासूम नीरू पर पति ही नहीं सास भी जान छिड़कती थी। सास बड़े गर्व से सबसे कहती  फिरती “मेरी बहू डॉक्टर बनेगी।“ शादी के बाद की पहली पोस्टिंग काश्मीर में थी जहाँ दुश्मन से लड़ते-लड़ते मेजर शहीद हो गए।

तेहरवीं पर जब भाई आया तो उसे साथ ले जाने पर अड़ गया था। तब सास ने कहा था "बेटा तो चला गया अब बहू का चेहरा देखकर ही तो जियूँगी। उसे मेरे पास ही रहने दो।"

सास की ममता की छाँव में नीरू को भी बेहद सुकून मिलता था। उसके लिए तो सास माँ समान ही थी  फिर उसे अपने भविष्य की  चिंता करने की क्या जरूरत। यही सोचकर तो उसने मुआवज़े में मिली धनराशि और जमीन सब कुछ सास के नाम कर दिया था। उसे पूरा विश्वास था  कि माँजी  सदा उसका भला ही सोचेगी।

मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की तिथि नज़दीक आ रही थी। वह दिल थामे माँजी के कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थी। खुद पूछने से झिझकती थी।

एक दिन वह आँगन में बर्तन माँज रही थी जब ननद ने उसे सुनाने की मंशा से, अखबार पढ़ते हुए सास से कहा था "अरे माँ डॉक्टरी के पर्चे भरने की तारीख तो आ गई है।" नीरू के हाथ थम गए और धड़कन तेज़ हो गई। वह दिल थामे सास के जवाब का इंतज़ार करने लगी। मगर सास ने कुछ कहा नहीं।

आखिर हिम्मत कर उसने रात को सास के पैर दबाते हुए पूछ ही लिया "माँजी क्या मैं डाक्टरी का पर्चा भर दूँ?"  इतने दिनो का लाड़-प्यार का नाटक खत्म कर, सास ने दिल की भड़ास निकाल ही दी। गुस्से से कहने लगी "डायन! मेरा बेटा खा गई। मेरे घर का चिराग बुझाकर अपना भविष्य उज्वल करना चाहती है? बेहया शर्म नहीं आती?" नीरू सन्न रह गई। तो क्या वह प्यार और फिक्र सब ढ़कोसला था उससे सब हथियाने के लिये? उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

उस दिन से ससुराल वालों के असली रंग दिखने लगे। हर बात पर ताना मारा जाता। उसकी हैसियत वहाँ एक नौकरानी की थी यह वह जानती थी मगर फिर भी कभी घर की बात उसने बाहर नहीं कही। यहाँ तक कि अपने माँ या भाई से भी उसने अपने पर हो रही ज्यादती का कभी ज़िक्र नहीं किया। मीना तो पड़ोसन थी। उससे कुछ छुपा नहीं था।

उस दिन जब वह मंदिर से लौटी तो घर के सब लोग किसी के गृह-प्रवेश पर गए हुए थे। नंदोयी आए थे इसका उसे तब पता चला जब वह अपने कमरे में गई। वह गलत नीयत से वहाँ छुपकर बैठा था। उसकी तेज परफ्यूम से नीरू सतर्क हो गई वरना अनर्थ हो जाता। वह बदहवास सी कमरे से भागी तो लौट आई ननद से जा टकराई। वह खुद तो कभी मुँह न खोलती मगर यह सच तो घरवालों के सामने था। वह काँपती हुई सास से जा लिपटी। उसकी जारों से धडकती धडकन सामान्य होने लगनी। मगर सास ने सबके सामने उसे जोर का तमाचा जड़ दिया और जैसा होता है वैसा ही हुआ। सास और ननद ने उसे ही दोषी ठहराया। नीरू उस दिन पूरी तरह टूट गई थी। उसके  आत्म-सम्मान को गहरी ठेस लगी थी। अब उसके पास बस मायके का ही सहारा बचा था।

मायका उस घने वृक्ष की तरह होता है जिसकी ठंडी छाँव में बेटियाँ घड़ी भर बैठकर अपने सारे कष्टों से राहत पाती हैं। नीरु भी माँ के आँचल में छुपकर अपना सारा अपमान भुला देना चाहती थी।

माँ आँगन में अंगीठी फूँक रही थी। आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे, दुबला शरीर और मैले कपड़े। नीरु माँ की ऐसी दशा देखकर सहम गई। माँ ऐसी तो कभी नहीं थी। वह तो सदैव साफ-सुथरी रहती व अपना ध्यान रखती थी। नीरू को देखते ही माँ की आँखें छलक आई।

माँ कहने लगी "अपनी किस्मत को रो रही हूँ। मेरे ही पिछले जन्म के पाप होंगे जो आज मेरी ये दशा है। वरना क्या बात थी जो बेटे की ऐसी मति फिरती।"

नीरू: "क्या बोल रही हो माँ? ये क्या हाल बना रखा है और यहाँ बाहर क्यों रसोई बना रही हो?"

माँ: "तो क्या करूँ? बुढ़ापे में धर्म भ्रष्ट कर लूँ? रसोई तो उसके सुपुर्त की है तेरे भाई ने।"

नीरू और कुछ कहती उससे पहले ही भीतर से नाटे कद और भारी शरीर की एक औरत कसला लिए बाहर आई। कानो तक छोटे रूखे खुले बाल, चपटी नाक और मोटे काले होंठ साफ बता रहे थे कि वह पहाड़ी तो नहीं है। वह बिना कुछ बोले पानी भरने चली गई। नीरू समझ गई कि भाई ने माँ की देख-रेख के लिए आया को रखा है। मगर माँ ठहरी पुराने ख्यालों वाली। दूसरे के हाथ का पकाया वह नहीं खाएगी।

नीरू माँ को समझाते हुए बोली " मैं आज ही कह दूँगी बिट्टू से कि इसे वापस भेज दे।"

माँ तिलमतला उठी। बोली "अरे ये ना जाएगी अब सात जनम तक। बिट्टू के हॉस्टिल के आस-पास की बस्तियों में रहती थी। शादी टूटकर मायके में बैठी थी। पता नहीं किस जाल में हमारे बिट्टू को फंसाया और उसके साथ भाग आई। मेरी तो कुछ समझ न आया। क्या करती। उसे न सही हमें तो लोक-लाज का भय है ना। ऊपर देवी के मंदिर ले जाकर फेरे पड़वा दिए दोनो के। कैसे तो माँ-बाप हैं जो खोज-खबर करने भी न आए। सोचा होगा कि चलो सर से बला टली..." माँ बोले जा रही थी मगर नीरू और कुछ सुन ही नहीं पा रही थी।  उसके दिमाग में बस यही सवाल गूँज रहा था  कि बिट्टू ने आखिर क्यों अपनी ज़िंदगी यों तबाह कर दी? क्या मजबूरी होगी उसकी।

इस बीच बिट्टू की पत्नी छाया लौट आई। माँ की जली कटी बातें उसने सुन ली। फिर क्या था वह अपने संस्कार के अनुरुप माँ को गालियाँ देने लगी। नीरू बीच में बोली तो उसे साफ लफ्जों में घर से निकल जाने को कह दिया। नीरू ने उसी वक्त बिट्टू को फोन लगाकर बात की। बिट्टू का स्वर रूखा ही नहीं पराया भी लग रहा था। अब वह ना तो किसी का बेटा था और ना ही किसी का भाई। वह तो सिर्फ छाया का पति था। उसने न उसका हाल पूछा न माँ का। उसने तो बस यही रट लगा रखी थी " छाया घर की बहू है। वह जो भी फैसला लेगी मैं उसके साथ हूँ। तुम माँ को समझाओ।"

अब नीरू के पास वापस ससुराल जाने के अलावा और कोई रास्ता न बचा था। कहाँ तो वह माँ के पास आसरे के लिए आई थी और अब लज्जित होकर जा रही थी।

कुछ दिनो बाद माँ ने बताया कि अब तो छाया का पूरा परिवार यानी माँ, बाप, भाई और  बहने सब वहीं आ धमके हैं। उसका भाई तो दादा किस्म का था। हर दिन के गाली-गलौज व क्लेश से माँ का स्वास्थ गिरता जा रहा था। वहाँ नीरू भी ससुराल में तिल -तिल  मर रही थी। वह चाहकर भी माँ की मदद करने में असमर्थ थी।

माँ के सुझाव पर नीरू मीना के साथ तहसीलदार के पास गई। माँ का विचार था कि अब जमीन का बँटवारा कर लिया जाय ताकि वह नीरू के साथ अपने अलग रहने का इंतजाम कर सके। माँ की इच्छा थी कि घर उनके हिस्से ही आए। कितनी यादें जो जुड़ी थी उस घर से और फिर सर पर छ्त भी हो जाती। नीरू  को कोई छोटा-मोटा काम मिल ही जाता। फिर ना तो नीरू को ससुराल वालों का मोहताज होना पड़ता और न ही माँ को कुसंस्कारी बहू और उसके घरवालों को झेलना पड़ता।

 नीरू को माँ के इस फैसले में नई उम्मीद नज़र आ रही थी। मगर यह उम्मीद दो ही दिन में टूट गई जब उन्हें बताया गया कि  राज्य के कानून के अंतर्गगत पिता की मृत्यु के उपरांत जमीन बेटे के नाम अपने आप दर्ज हो जाती है। किसान बही केवल परुष वारिस को ही हकदार मानती है। राज्य का कानून बेटियों को पुश्तैनी ज़मीन का वारिस नहीं मानता। नीरू ने डी. एम, सी. एम सब से गुहार लगाई मगर इस पक्षपाती कानून के आगे सबके हाथ बंधे थे। नीरू बुरी तरह टूट गई। मीना बिफर पड़ी। बोली, "लैंगिक समानता के युग में भी बेटा-बेटी में ऐसा भेदभाव! यकीन नहीं होता। यूँ तो कहते हैं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। मगर ऐसे कानून जब बेटी के हाथ-पैर बाँध दें तो वह कैसे स्वावलंबी बनेगी? बेटी के पास क्या दो ही विकल्प हैं। शादी करो और ससुराल में पिसती रहो या फिर मायके में भाई-भाभी की दया पर पड़ी रहो। क्या उसे सर उठा कर जीने का हक नहीं?" नीरु चुपचाप बैठी आँसू बहाती रही। क्या-क्या सपने देखे थे। सोचा था खेती बाड़ी करेगी और  साथ-साथ ट्यूशन भी लेगी। माँ की खूब सेवा करेगी। फिर उसे ज़िंदगी से या किसी और से भी कोई शिकायत न रहती। वह माँ के लिए दुखी थी और खुद से खफा।

 बुत बनी नीरू आँसू बहा रही थी। आज मायके की याद कुछ ज्यादा ही सता रही थी। जेठानी के मायके से भिटोली यानि भेंट थी। नीरू की भिटोली तो न आई हाँ मगर भाई का फोन आया था। उसने बड़ी बेरुखी से उससे नाता तोड़ दिया था। नीरू समझ नहीं पा रही थी कि उसपर जान छिड़कने वाला भाई ऐसा क्यों हो गया? क्या शादी के बाद खून के रिश्ते बेमानी हो जाते  हैं? अब उसे माँ की और ज्यादा चिंता होने लगी। न जाने अब वे लोग उससे कैसे पेश आएंगे?  मगर करे तो क्या करे? मन बेहद घबरा रहा था। नीरू को वह गाना याद आने लगा जो माँ अक्सर गुनगुनाती थी।
"मेरी प्यारी घुघुती जैली,
मेरी माँ को रैबार लैली।
माँ जा रितु बौडीक ऐणा,
दगड्यानी सब मैत गैणा।
मैं भी अपणा मैत जौलू,
मेरी माजी थे भेटि औलू।

नीरु ही नहीं माँ ने भी इन दो दिनो में कितने सपने बुन डाले थे। नीरु को अपने आँचल में सहेजने के सपने। उसके सारे जख्म मिटा देने के सपने। अपनी ममता उसपर लुटाने के सपने। दोबारा उसके हाथ पीले करने के सपने। मगर ये सारे सपने शीशमहल  से नाजुक निकले। जो समाज के कायदे-कानून की मार से पलभर  में चकना चूर हो गए। टूटे काँच की तरह टूटे सपने भी बेहद चुभन देते हैं। उसपर जमीन के बँटवारे वाली बात के बाद अब तो छाया और उसके घर वालों का सलूक माँ साथ और बुरा हो गया था। वह बुखार में तड़पती रही और किसी ने दवा-दारु तो क्या पानी तक न पूछा। भूख-प्यास से जब वह मरणासन्न हो गई तो तब जाकर नीरू को खबर दी।

नीरू अपना सब कुछ खो चुकी थी। अब माँ को नहीं खोना चाहती थी। माँ को खोने के डर ने ही उसे ये हिम्मत दी कि उसने पहली बार खुद फैसला लिया। अपने गहने बेच माँ को तुरंत पौड़ी के अस्पताल ले गई।

मीना तक को इस बात की खबर न थी। मीना हैरान थी कि नीरू दी जिसने कभी अकेले घर की दहलीज तक पार नहीं की थी वह अचानक बीमार माँ को लेकर कहाँ चली गई?  नीरू का फोन तो पहले ही उसकी सास ले चुकी थी।  वह एक-एक कर सारे अस्पतालों में फोन कर करके पता लगाने लगी। वह परेशान थी नीरू दी तो इतनी मासूम और भावुक है अनजान जगह में कैसे निबाह रही होगी!

आखिरकार उसे उस अस्पताल का पता लग ही गया जहाँ नीरू की माँ का इलाज चल रहा था।

मीना जब उसके पास पहुँची तो हैरान रह गई। उसे नीरू में एक नया आत्मविश्वास नज़र आया। अब अपनी ज़िंदगी की डोर उसने अपने हाथों में ले ली थी। माँ की हालत में सुधार था। नीरू को काम भी मिल गया था। एक डाक्टरनी ने उसे अपनी बच्ची के लिए गवर्नेस रख लिया था। तनख्वाह के साथ उसके रहने का बंदोबस्त भी था। नीरू बेहद खुश थी। वह अपनी माँ के साथ थी और उसका पूरा ख्याल रखने के काबिल थी। कुछ  दिन वहाँ रहकर मीना लौट आई। घर लौटते वक्त उसे बेहद सुकून महसूस हो रहा था जैसे दिल से कोई भारी बोझ उतर गया हो।

वह चहकती हुई आई और आते ही माँ के गले लग गई। माँ ने पूछा "तो तेरी नीरू दी ठीक है ना।"

मीना : "हाँ माँ । तुम सच कहती थीं। भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। याद है नीरू दी हमेशा किसी ट्रस्ट की बात करती थी जिसमें उनके पिता की आधी पेंशन हर माह जाती थी। दरअसल वह कोई ट्रस्ट न थी बल्कि उनकी माँ के नाम की जीवन बीमा थी। पूरे 25 लाख की। बीमा अवधि अब पूरी हो गई।  घर पर जब खबर पहुँची तो बिट्टू दौड़ा-दौड़ा आया था माँ को लिवाने। मैंने ऐसा सुनाया कि उल्टे पैर लौट गया।"

माँ: "ये तो बड़ा अच्छा हुआ। अब कहाँ है नीरू?"

मीना: "उसने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया है। देहरादून में है अपनी माँ के साथ।"

माँ: "महाकालेश्वर की मन्नत विफल नहीं जाती। उसका मायका आबाद हो गया।"

मीना: "हाँ माँ। मायके की डोर मगर बड़ी मजबूत होती है।"

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