विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दीः स्वरूप और संभावनाएँ

-  पूजा झा

एम. ए. (हिन्दी), बी. एड., पी. एच. डी., राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा - नेट उत्तीर्ण
माध्यमिक शिक्षिका, इण्टरस्तरीय श्याम सुंदर विद्या निकेतन, मुख्य डाकघर के निकट, भागलपुर-812001, बिहार
ईमेल: jhapuja004@gmail.com
चलभाष: - +91 919 951 9779


प्रस्तुत शोध आलेख संचार क्रांति के इस युग में विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दी के स्वरूप और उसकी संभावनाओं को उजागर करने की दिशा में एक प्रयास है। वर्तमान समय बाजारवाद का समय है। चारों ओर हर क्षेत्र में चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो, राजनीतिक हो या मनोरंजन से जुड़ा क्षेत्र हो, विज्ञापनों का हर ओर प्रभुत्व है। एक सामान्य व्यक्ति का जीवन विज्ञापनों से इस कदर प्रभावित होता है कि उसके दैनिक जीवन से जुड़ी प्रत्येक वस्तु पर विज्ञापनों की छाप नजर आती है। अब बाजारवाद के इस माहौल में विज्ञापनों के लिए एक उपयुक्त और लोकप्रिय भाषा माध्यम की अनिवार्यता सहज ही स्पष्ट है। यदि हम विज्ञापनों की भाषा के रूप में हिन्दी भाषा का स्वरूप विश्लेषण करें तो यह आज सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा माध्यम है। यद्यपि वर्तमान समय में विज्ञापन की भाषा के रूप में हमें हिन्दी और अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी भाषा ‘हिंग्लिश’ के ही दर्शन होते हैं। नयी पीढ़ी के लोग इसे बखूबी समझते हैं और पसंद भी करते हैं। शायद इस कारण भी आज विज्ञापनी हिन्दी की लोकप्रियता खूब बढ़ी है। यद्यपि शैक्षणिक कार्यों या कार्यालय के लिए मानक हिन्दी का ही प्रयोग देखने को मिलता है, लेकिन मनोरंजन, स्वास्थ्य, राजनीति जैसे विभिन्न क्षेत्रों में ‘नई हिन्दी’ या ‘हिंग्लिश’ के रूप में विज्ञापनों की हिन्दी का प्रयोग अनवरत जारी है। आज जनसंचार के विभिन्न माध्यम बच्चे, युवा, वृद्ध सभी वर्ग से जुड़े हुए हैं। विज्ञापनों का प्रभाव हर वर्ग पर समान रूप से है। हिन्दी भी प्रत्येक वर्ग के लोगों की और विशेष रूप से भारत में जनसंचार की प्रमुख भाषा माध्यम है। अतः भविष्य में निश्चय ही हिन्दी का विकास विज्ञापनों की भाषा के रूप में और भी तीव्र गति से होगा। भारत में नहीं बल्कि इसका प्रभुत्व संपूर्ण विश्व बाजार पर परिलक्षित होगा।

कुंजी शब्दः-
विज्ञापन, जनसंचार, हिन्दी, बाजारवाद, हिंग्लिश, संदेश।


प्रस्तावनाः-
किसी भी विषय में विशेष जानकारी उपलब्ध कराना विज्ञापन है और विज्ञापन की सफलता के लिए एक उपयुक्त भाषा माध्यम का होना अनिवार्य है। हिन्दी हमारी राजभाषा और राष्ट्रभाषा है। वर्तमान समय में भूमंडलीकरण के बढ़ते दायरे के बीच हिन्दी का वर्चस्व देश में ही नहीं विदेशों में भी बढ़ता जा रहा है। आज चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व की दूसरी लोकप्रिय भाषा है। ऐसे में विज्ञापनों की भाषा के रूप में हिन्दी में असीम संभावनाएँ हैं। हिन्दी में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने और उसे आत्मसात करने की अदभुत शक्ति है, इसलिए शायद यह इतनी तेजी से लोकप्रियता के हर स्तर पर खरी उतरती जा रही है। विज्ञापन मानव जीवन के हर वर्ग को प्रभावित करता है। ऐसे में यदि हिन्दी भाषा विज्ञापनों की भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है तो यह विज्ञापनों की लोकप्रियता को भी बढ़ाने सक्षम होती है। विज्ञापनों की भाषा के रूप में हिन्दी का भविष्य निस्संदेह उज्ज्वल है। हमें इसकी कुछ खामियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जिससे कि भविष्य में हिन्दी विज्ञापनों की सर्वाधिक उपयुक्त और लोकप्रिय भाषा माध्यम बन सके।


उद्देश्यः-
1. विज्ञापन, उसके रूप और महत्व के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगें।
2. हिन्दी भाषा का स्वरूप और विज्ञापन की भाषा के रूप में उसकी विशिष्टताओं को समझ सकेंगें।
3. विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग में समस्या और समाधान से अवगत हो सकेंगें।
4. बाजारवाद के संदर्भ में विज्ञापनों के बढ़ते प्रभाव और उसके साथ हिन्दी की संभावनाओं को जान सकेंगें।


शोध प्रविधिः-
“प्रस्तुत शोध आलेख विवरणात्मक शोध परिकल्पना पर आधारित है, जिसमें विषय के संबंध में सत्य, प्रमाण तथा यथार्थ सामग्री एकत्र करके उनका क्रमबद्ध, तार्किक और व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया जाता है।”1 हिन्दी भाषा का स्वरूप, विज्ञापनों की भाषा के रूप में उसका महत्व तथा इसके मार्ग में आने वाली समस्या और उसके समाधान की विवेचना के लिए विवरणात्मक शोध परिकल्पना सर्वथा उपयुक्त है। “इसमें तथ्यों का संकलन, अवलोकन, वर्गीकरण एवं सारणीय आदि क्रमबद्ध रूप में होता है। इसके लिए अध्ययन की योजना पूर्व से ही निश्चित होती है।”2

विज्ञापन, उसके विभिन्न रूप और उसका महत्वः-
"किसी वस्तु के विक्रय के लिए ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करना ही विज्ञापन है। यह विक्रय कला का मौखिक मुद्रित रूप है। इसका उद्देश्य किसी उत्पादित वस्तु का अधिकाधिक बाजार उपलब्ध करवाना है। यह उत्पादन के प्रति ग्राहक के मन में आकर्षण का भाव पैदा करवाता है और उसे खरीदने के लिए प्रेरित करता है।"3
"विज्ञापन को हम निम्नलिखित रूपों मे बाँट सकते हैः-
1. लिखित अथवा मुद्रित- इसके अंतर्गत समाचार-पत्र व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापन, इश्तहार, सूचीपत्र आदि आते हैं।
2. मौखिक- ऐसे विज्ञापन मुद्रित अथवा लिखित होकर मौखिक होते हैं अर्थात् ये केवल उच्चरित होते हैं।
3. दृश्य-श्रव्य- दूरदर्शन, फिल्म स्लाइड पर दिखाए जानेवाले ये विज्ञापन इसके अंतर्गत आते हैं। जिसमें वस्तु का प्रदर्शन तथा वर्णन आर्कषक ढ़ंग से किया जाता है।"4
"विज्ञापन जनसंचार का एक विशिष्ट रूप है। उत्पादों और सेवाओं का संदेश विभिन्न माध्यमों, समाचार-पत्रों, रेडियो, टीवी के द्वारा या सीधे ही भेजकर दिया जाता है। यह दत्त शुल्क सम्प्रेषण है जिसमें विज्ञापन निर्धारित शुल्क चुकाता है तथा संदेश को जन-जन तक पहुँचाता है।"5 "विज्ञापन जनता को असीमित स्तर तक प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यह न केवल लोगों के दृष्टिकोण बदलने में सहायक होता है बल्कि लोगों की विचारधारा में भावनात्मक परिवर्तन भी करता है। विज्ञापन विहिन समाज की आज कल्पना ही नहीं की जा सकती।"6

हिन्दी भाषा का स्वरूप और विज्ञापन की भाषा के रूप में उसकी विशिष्टताएँ-
"हिन्दी जिस भाषा-धारा के विशिष्ट दैशिक और कालिक रूप का नाम है, भारत में उसका प्राचीनतम रूप संस्कृत है। संस्कृत का काल मोटे रूप में 1500 ई. पू. से 500 ई. पू. तक माना जाता है। इस काल में संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। इस संस्कृतकाल के अंत तक मानक या परिनिष्ठित भाषा तो एक थी, किन्तु तीन क्षेत्रीय बोलियां विकसित हो चली थी, जिन्हें पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी तथा पूर्वी नाम से अभिहित किया जा सकता है।"7 "हिन्दी की आदि जननी संस्कृत है। संस्कृत पालि, प्राकृत भाषा से होती हुई अपभ्रंश तक पहुँचती है। फिर अपभ्रंश, अवहृट्ट से गुजरती हुई प्राचीन/प्रारंभिक हिन्दी का रूप लेती है।

हिन्दी का विकास क्रम - संस्कृत > पालि > प्राकृत > अपभ्रंश > अवहट्ट > प्राचीन/प्रारंभिक हिन्दी"8

हिन्दी भाषा का उद्‍भव व मूलतः अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी तथा मागधी रूपों से हुआ है। हिन्दी की पाँच उपभाषाएँ है, जिनके अंतर्गत मुख्यतः दस बोलियाँ है। अब हम जब विज्ञापन की हिन्दी के रूप में तो "भारत के संदर्भ मे विज्ञापन-क्षेत्र के लिए हिन्दी की आवश्यकता निर्विवाद है। हिन्दी भाषा विज्ञापन की अनिवार्यता है। मानो यह सूत्र-सा बना है कि "हिन्दी नहीं तो विज्ञापन नहीं।" लाखों-करोड़ों के हृदय, मन और मस्तिष्क पर हावी होनेवाले लक्स, लिरिल या संतुर जैसे साबुन हों अथवा कोलगेट, सिबाका या पेप्सोडेंट जैसे टूथपेस्ट- सबके सब अपने-अपने कारखानों और दुकानों में "हिंदी के बिना बंदी है।" यह कहना गलत नहीं होगा कि "हिन्दी विज्ञापन का अभिन्न अंग है और विज्ञापन का अस्तित्व हिन्दी के कारण रक्षित है।" अतः यह स्पष्ट है कि हिन्दी दूरदर्शन के विज्ञापन को 'थोक आश्रय' देती है और विज्ञापन से हर चीज ‘लोक आश्रय’ पाती है।"9 विज्ञापन में हिन्दी एक लोकप्रिय भाषा माध्यम है। इसका प्रभुत्व लोगों के हर वर्ग तक है।

विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दी प्रयोग में समस्या एवं समाधान-
हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किये जाने के बाद विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा हिन्दी को विज्ञापन की भाषा के रूप में अधिक प्रश्रय दिया जाने लगा। स्टारप्लस जैसे अंग्रेजी के चैनल अब अपने नए कलेवर में हिन्दी को अपनाते हुए दिखाई दिए। यद्यपि जनसंचार माध्यमों की भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग में कुछ समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं, लेकिन यदि कुछ सावधानियाँ बरती जाए तो इनका सहज ही निराकरण किया जा सकता है। सबसे पहले देखा जाय तो हिन्दी में विज्ञापन के लिए मौलिक लेखन के बजाय अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है। "नवीन विषयों के विज्ञापनों के लिए हिन्दी पर अंग्रेजी भाषा की छाया बरकरार है। पारिभाषिक शब्दों का अपरिचय तथा अप्रचलन भी हिन्दी भाषा की एक समस्या हैं। वर्तनी की विभिन्नता या अर्थ भिन्नता की समस्या भी देखी जा सकती है। निश्चित अपरिवर्तनीय विज्ञापन की शब्दावली का अभाव भी देखा जा सकता है। अंग्रेजी में भाव की अभिव्यक्ति के लिए एक ही शब्द का प्रयोग सर्वत्र होता है, लेकिन हिन्दी में शब्दों का पर्यायवाची रूप की वजह से भिन्न-भिन्न जगहों पर भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है, जैसे- अंग्रेजी शब्द 'Love' के लिए हिन्दी में प्रेम, प्यार, मुहब्बत, इश्क, स्नेह, प्रणय आदि पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग प्रचलित है।"10

इन समस्याओं के निराकरण के लिए हमें अपनी हठधर्मिता को छोड़ नवीन विचारों को अपनाना होगा। हमें लोकप्रचलित तथा व्यवहारिक शब्दों का ग्रहण करते हुए एक नई हिन्दी का स्वागत ‘विज्ञापनी हिन्दी’ के रूप में करना होगा, ताकि इसकी लोकप्रियता बढ़ती रहे।

बाजारवाद के संदर्भ में विज्ञापनों के बढ़ते प्रभाव तथा उसके साथ हिन्दी की संभावनाएँ-
"हिन्दी को माँ की लोरियों से लेकर बाजार की जरुरतों की पूर्ति करनी है। ऐसा करते वक्त वह सहज-सरल बनी रहे। ‘पारिभाषिक शब्दावली’ के नाम पर हिन्दी को ‘टकसाली हिन्दी’ बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।"11 पिछले बीस पच्चीस सालों में वैश्वीकरण की आंधी से कोई नहीं बच सका है। हमारी रोज की जिंदगी से लेकर बड़े काॅरपोरेट निर्णय तक वैश्वीकरण से प्रभावित है। पर जहाँ तक बात हिन्दी की है, तो वैश्वीकरण से इसे गजब का फायदा मिल रहा है। आज की तारीख में बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय ब्रांड हिन्दी भाषा में अपने विज्ञापन प्रसारित कर रहे हैं। "आज औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उपभोग्य वस्तुओं का उत्पादन बड़ी मात्रा में हो रहा है, जिनके विपणन हेतु विज्ञापन ही सहारा है। फिल्म, रेडियो, टेलीविजन, पोस्टर्स, हैंडबिल, साइनबोर्ड, सिनेमा स्लाइड और बैलून आदि अनेक माध्यमों से विज्ञापन होता है। उत्पादित वस्तु के ब्रांड को लोकप्रिय बनाना तथा कंपनी के नाम को जनता के मन-मस्तिष्क में जमाने का कार्य विज्ञापन ही करता है।"12 इस रूप में विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दी आज अपने सशक्त रूप में है। हिन्दी जनसंचार माध्यमों पर बहुत तेजी से लोकप्रिय हुई है। आने वाले समय में इसकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ेगी। देश-दुनियां के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार और सर्वाधिक देखे जाने वाले टीवी चैनल हिन्दी के ही है। तो फिर इसमें बिल्कुल शक की कोई गुंजाइश नहीं कि आखिर जिस भाषा का विस्तार इतना अधिक है तो विज्ञापनी हिन्दी के रूप में इसे और अधिक अवसर मिलेंगें ही।


निष्कर्षः-
हिन्दी को आधुनिक भाषाओं के बीच प्राणभाषा का दर्जा दिया जा सकता है, क्योंकि यह अत्यंत ही वैज्ञानिक भाषा है और इसका बाजार निरंतर विकासमान है। मानक हिन्दी स्थानीयता या अपने नए रूप हिंग्लिश में विज्ञापनी हिन्दी भी अपना जलवा बिखेर रही है। आज हिन्दी बाजार की मांग बन चुकी है। आज बाजार के लिए जितना महत्व विज्ञापन का है शायद उतना ही महत्व उन विज्ञापनों की भाषा के रूप में हिन्दी का भी। विज्ञापन की भाषा के रूप में हिन्दी भाषा के प्रयोग में अपार संभावनाएँ हैं।


संदर्भ ग्रंथ सूचीः-
1. पत्रकारिता एवं जनसंचार, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, इंडियन आर्ट्स ऑफसेट - पत्र संख्या-. 4 - पृष्ठ संख्या 5
2. पूर्वोक्त- पृष्ठ संख्या 6
3. सिंह, डॉ. दिनेश प्रसाद- व्यावहारिक हिन्दी और भाषा संरचना, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, वाराणसी, पुणे, पटना- पृष्ठ सं. - 41
4. पूर्वोक्त- पृष्ठ सं. - 41
5. तिवारी, डॉ. अर्जुन- संपूर्ण पत्राकारिता, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी- पृष्ठ संख्या 1
6. पत्रकारिता एवं जनसंचार स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, इंडियन आर्ट्स ऑफसेट, पटना - पत्र संख्या-12- पृष्ठ सं. - 123
7. डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल- हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरवैक्स, नोएडा- पृष्ठ संख्या 6
8. कुमार संजीव- सामान्य हिन्दी(लूसेंट), लूसेंट पब्लिकेशन, पटना- पृष्ठ संख्या 1
9. चव्हाण, डॉ. अर्जुन- मीडियाकालीन हिन्दी स्वरूप एवं संभावाएँ, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड, जगतपुरी, दिल्ली - पूर्वोक्त- पृष्ठ सं. - 63
10. सिंह, डॉ. दिनेश प्रसाद- व्यावहारिक हिन्दी और भाषा संरचना, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर, वाराणसी, पुणे, पटना- पृष्ठ सं. - 45, 46
11. ‘हिन्दुस्तान’- दैनिक समाचार-पत्र, भागलपुर, विशेषांक ‘प्रतिबिम्ब’, गुरुवार 13 सितम्बर 2007- पृष्ठ संख्या 1
12. तिवारी, डॉ. अर्जुन- संपूर्ण पत्राकारिता, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी- पृष्ठ सं. - 322, 323

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