सत्येन्द्र नाथ बोस और मेघनाद साहा

मेहेर वान

- मेहेर वान

प्रोफ़ेसर मेघनाद साहा और प्रोफ़ेसर सत्येन्द्र नाथ बोस दोनों प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता में जगदीश चन्द्र बोस के छात्र रहे थे। उन्नीसवीं शताब्दी में ये दोनों देश में विज्ञान की स्थिति बेहतर बनाने के प्रयासों में लगे रहे। पढ़ाई के बाद सत्येन्द्र नाथ बोस ढाका विश्वविद्यालय चले गए और मेघनाद साहा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग की स्थापना की। दोनों ने विश्व भर में अपने सिद्धांतों और खोजों के ज़रिये सम्मान प्राप्त किया, और देश में ही रहकर देश की सेवा की। यह दोनों लोग सहपाठी थे और इन दोनों को “इंग्लैण्ड की रॉयल सोसाइटी का फ़ैलो” भी चुना गया। दोनों ही नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किये गए और दोनों को नोबेल मिलते-मिलते रह गया। मेघनाद साहा ने तो बाद में सन 1951 में लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते भी। सन 1921 में सत्येन्द्र नाथ बोस ने मेघनाद साहा को यह दो पत्र लिखे थे -

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ढाका, 19 जुलाई, 1921  
मेरे प्रिय मेघनाद,

काफी समय हुआ तुम्हारी तरफ से कुछ सुनने को नहीं मिला। तुम्हें यह जरूर पता होना चाहिए कि मैं वापस अपने देश आकर तमाम परेशानियाँ झेल रहा हूँ। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने अंततः मुझसे अपना पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन ढाका विश्वविद्यालय में मेरे वेतनमान को लेकर झगड़ा अभी भी बना हुआ है। वे मुझे नौकरी देने में बहुत अधिक रुचि ले रहे हैं। मैं इस अगस्त तक सब ठीक हो जाने की आशा कर रहा हूँ। कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में तुम्हें इस समय में किन-किन स्थानों से निमंत्रित किया गया और तुम कहाँ-कहाँ घूमने गये? तुम्हारा काम हाल में ही कई विश्व स्तरीय जर्नल्स में प्रकाशित हुआ है यद्यपि लोग कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोध अवस्था को लेकर कुछ हद तक संशय में हैं। मैंने अपने शोध कार्य का प्रूफ “फिजिकल रिव्यू बी” को भेजा है। मैं इसमें भूल सुधार करने के बाद अगले सप्ताह तक इसकी एक प्रति तुम्हें भेज दूंगा। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि भारत वापस आने की बजाय विदेश में ही डेरा जमाकर रह जाना बहुत अधिक बेहतर है। तुम कब वापस आ रहे हो? क्या तुम आचार्य को पत्र लिखते हो? जगदीश बोस अभी ढाका में हैं। वे आजकल काफी निरुत्साही महसूस कर रहे हैं।

तुम्हारा,
बोस
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मेरे प्रिय मेघनाद,

तुम्हारी ओर से पत्र काफी लम्बे समय से प्राप्त नहीं हुआ। मुझे लगता है तुमने मेरा तिरस्कार कर दिया है, क्या यह सच है?
मुझे पता चला कि तुम जर्मनी की यात्रा के दौरान अपने विषय से सम्बंधित तमाम महान लोगों से मिले। सुना है कि तुम म्यूनिख घूमने गए हो। मैं तकरीबन एक महीने पहले देश वापस आ गया था, यहाँ काम अब तक शुरू नहीं हुआ है। रखरखाव के अभाव में सबसे अच्छी मशीनें दाँव पर लगी हुई हैं। यहाँ जर्नल्स की संख्या भी बहुत कम है। विज्ञान पुस्तकालय को अलग कर दिए जाने की बात चल रही है। यहाँ यही सब चल रहा है, तुमने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ क्या किया, मुझे इसके बारे में ज़रूर बताना। क्या तुम्हें कोई मानद उपाधि प्रदान की गई है। 

सप्रेम,
बोस
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