तोक्यो में एक दोपहर नेताजी के साथ

18 अगस्त: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि पर एक संस्मरण

- मुनीश शर्मा


प्रति वर्ष 18 अगस्त के दिन जापान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि मनायी जाती है, जिसमें 100-150 जापानी इकट्ठे होते हैं । पिछले 69 वर्षों से हर साल उनकी बरसी यहाँ बड़ी श्रद्धा से मना रहे हैं जापानी । खास बात ये है कि आयोजनस्थल साल में एक बार ही खोला जाता है आम जनता के लिए और 18 अगस्त वही तारीख है ।

18 अगस्त 2012 का वह भाग्यशाली शनिवार, जब मैं रेनकोजी मंदिर पहुँचा! ... इस बार इत्तेफ़ाक़ से 20-30 भारतीय भी नज़र आ रहे थे। दरअसल यहाँ रह रहे युवा भारतीय आईटी इंजीनियरों में अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की एक ललक सी दिखाई देती है और, उसी के चलते कुछ युवाओं ने यहाँ आने का आह्वान किया था। दफ़्तर के काम से मैं भी मौजूद था। इस वार्षिक आयोजन में आने वाले जापानियों में उनके साथ काम कर चुके सिपाही और उनके परिजन प्रमुख होते हैं। ये एक विशुद्ध धार्मिक रस्म होती है जो रैनको जी मंदिर में बौद्ध रीति से निभाई जाती है और वहाँ उनकी अस्थियाँ रखीं हैं ऐसा जापानी पूरी श्रद्धा से मानते हैं। मैं इन पलों का साक्षी रहा और मुझे नेताजी के साथ काम कर चुके सेनानियों से भी बात करने का भरपूर अवसर मिला । उनमें से एक यामामोतो जी तब 90 वर्ष के थे और हर वर्ष नमन करने पहुँचते थे। वे कहने लगे, "कामाकुरा के अमिताभ बुद्ध की तस्वीर देखते हो न वहाँ? बस कुछ वैसा ही तेज था उनमें।"

बूढ़े, परदेसी फ़ौजियों की पार्टी में किसी ने हम हिन्दुस्तानियों को परायेपन से नहीं बल्कि असीम प्रेम से देखा, वह भी केवल इसलिए कि हम सुभाष के देश से आए थे। इनमें से किसी के नाज़ की वजह यह थी उससे सुभाष ने कहा था अब तुम आराम करो थक गए होगे, तो किसी की यह कि वह कई रात उनके कमरे की रखवाली की ड्यूटी पर रहा। भारत में नेता जी की अनुपस्थिति सबसे बड़े राज़ की संज्ञा पाती है लेकिन यहाँ सब कुछ वैसे हुआ जैसे किसी महान दिवंगत आत्मा के लिए होता है। हाँ यामामोतो जी ने ये ज़रूर कहा कि नेताजी भगवान् से एकाकार हो गये हैं तभी तो उनको पूजा में रखते हैं हम यहाँ इस मंदिर में। अस्थियाँ एक डब्बे में हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी फ़ौजी की तब होती थीं जिस पर अंग्रेज़ी में बड़े बेढब से अक्षरों में उनका नाम लिखा है और इसे सुनहरे छत्र के नीचे रखा गया है। भारत में अभी उनका मामला विचाराधीन है लेकिन यहाँ उनकी पुण्यतिथि ऐसे मनती देखी जैसे किसी परिवार के सदस्य की होती है। लोगों ने आधे घण्टे पहले पहुँच कर उसी तरह श्रद्धांजलि संदेशों के लिफ़ाफे दिए जैसे वो अपने घरों में देते हैं और उसके बाद भोज हुआ वो भी बिल्कुल वैसा ही।

एक बूढ़ी जापानी महिला हिन्दी में गा रही थीं, "दुनिया रंग रंगीली रे बाबा" और "दिल्ली जाएँगे... हम दिल्ली जायेंगे।" कहती थीं उस फौज के हिन्दुस्तानी 'हाईक्लास' फ़ैमली के लोग थे। हाईक्लास उन्हीं का शब्द है जिसे मैंने यहाँ यथावत कहा। मोर्चे पर कैसे दिखते थे सुभाष और अकेले बैठे कैसे नज़र आते थे, ये भी यादें ताज़ा हुईं साहब। लेकिन कुल मिलाकर इस आयोजन में दैवी आस्था का गहरा रंग था और नेता जी सशरीर हैं या नहीं यह दावा तो मैं नहीं करता लेकिन मोर्चे के जापानी साथियों के दिलों में अब भी लहू बन के दौड़ रहे हैं वे यह अपनी आँखों से देख लिया मैंने  ... और वह हाथ मिलाना दूसरे विश्वयुद्ध के बूढ़े जापानी शेरों से! ... उस तजुर्बे का तो कोई मुक़ाबला ही नहीं है। कोई शक़?












1 comment :

  1. Great soul, Netajee Subhash Chandra Bose has left his permanent impression on Indian mind for ever, particularly on those who respect Mother India in their hearts no matter where they are situated in the globe at the moment. Wrong impressions about Japan was spread by the Britishers then , giving it a color of Japanese war with India, which in fact was the Indian national army fighting against the English people.

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