कविताएँ और रेखाएँ: तन्वी गौरव श्रीवास्तव

तन्वी गौरव श्रीवास्तव
दो पल्लों की हिस्सेदारी...

तब दरवाज़ा आधा खुलता था
खुले पल्ले की थोड़ी सी जगह में
ढेर सारी छोटी बातें समाया करती थी
लीपी हुई दीवार से टिकाई वो टूटी सायकिल
टेढ़ी कील पे टंगी छैनी-हथोड़ी वाली थैली
मचिया कोने से उधड़ा हुआ; बेपरवाह
तब नववधू चौखट के अंदर बैठती; घूँघट की ओट में
चौखटे पार मचिये पे पंडिताइन का आसन जमता
धार्मिक साजिशों से लेकर छोटे-मोटे घरेलू तांडव
तब सलाइयों पे बुने जाते
और सर्दियों के झबले
खुद से मजे-मजे में तैयार हो जाते थे
छज्जे ऊपर कैरी के अचार से गमकता खाली मर्तबान
उस पे अलमुनियम की तश्तरी की ढकनी,
सबसे भीतरी कोने में टिकायी
किसी पुरनिये की बकुली!
छत पर ऊपर आधे हिस्से के
ठंडे-पक्के पे उस जीवटवाली चिड़िया की कहानी छपी थी
जो आज भी गाती है के;
"का खाऊँ, का पीऊँ, का ले के परदेस जाऊँ"
अब कौन जाने वो क्या ले के परदेस गयी होगी
छत के बाहरी कोने में टूटे मिट्टी के बर्तन बिखरे थे
मनो सुगना अभी-अभी चूल्हा-चाकी खेल के थकी हो
अपनी तोतली आवाज़ में कहती थी; ब्या बाद सब
साथ ले जाएगी, खैर!
नीचे चौखट से सटे ओसारे में
शिद्दत से धूप पसरती थी
और शाम बाहरी में जलता
आधा पीला बल्ब!
बंद पल्ले के हिस्से बड़ी बातें लगी
हरी घास की कालीन के नीचे
खुद की जुगत में लगे
मान-सम्मान, तप-नियम
उबाल मारते संयम और जतन!
और इन सबका रख-रखाव करता वह
तीन पाये के गोल मेज पे सजा चेसबोर्ड
तब खेलने वाले थे
पर मोहरे प्यादे धुत मिले
उसके ऊपर बल्ब का वह बुझा हिस्सा पड़ता था
ऊपर छत पर उस हिस्से में
करेले की गाँछे थी,
उसी हिस्से मुनरी डोम के नीम के पेड़ की
डालियाँ छाँव करती
उस ओर नववधू नहीं जाती
उस ओर पंडिताइन को भी धरम भरष्ट होने का भय सताता
सुगना ब्याहकर खिलौनों संग परदेस जा चुकी थी
छोटी जात वाले इक दूरी बनाकर रस्ता बदलते थे!
बंद पल्ले का ये हिस्सा सारे जुगाड़ के बाद भी
काफी गर्म था!
उस हिस्से की ज़मीं गर्म भाप उगलती थी
नेमप्लेट पे दीमक लगे ओहदे थे,
उस हिस्से के चौखटे में फफोले पड़े थे
और दरवाजे के उस हिस्से की कड़वाहट तो
आज भी लाज़मी थी!
***

लै अस मीट अगेन

कीट्स शैली और ड्राइडेन सरीखे
तमाम रणबाकुरों ने मिलकर
उन बाकी के पन्नों को जब  कुतर डाला
तब बचे उस आखिरी पन्ने पे
कोई अपने चहेते इलियट को समेट रहा था
एक हड़बड़ी में,
हम्मपहली बार
कोई उस बुद्धू प्रुफॉक संग अपने बुद्ध होने को समेट रहा था।
क्या बुद्ध को भी बुद्ध होने की इतनी हड़बड़ी होगी? या
नहीं दिखने वाली एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरा?
"बुद्ध था अंजान उसको बुद्ध होना है?
थक गया वो बुद्ध अब तो बुद्ध होना है?
उकता गया बस ठान बैठा बुद्ध होना है"
जैसे मेरी पहली  कविता
आठ साल पुरानी "लेट अस मीट अगेन"
बस प्रुफॉक को एक नायिका ने रिप्लेस किया
जिसने उसके संकोच के कुएँ को सोख
उसे ऑप्टिमिज्म  से लबालब किया 
मिलने के गुहार, मिलने के वायदे और
मिल जाने पे कविता ख़त्म क्या किससे किस पते पे? हीं पता
क्या ऐसे ही सवालों की खोज में बुद्ध निकला था?
हाँ! बुद्ध होना खोज ही तो है
एक रास्ता है बुद्ध होना
तमाम सवालों का जवाब है
समेटना  है तो एक फैलाव भी बुद्ध है
संकोच सोखना और खुद को 
ऑप्टिमिज़्म से भर लेना ही तो बुद्ध है
तो उस आखिरी से शुरू होने वाले
हर आखिरी पन्ने पे मैंने
एक बुद्ध को एक बुद्ध से मिलाया है, हाँ
आधा पौना कभी पूरा खुद को बुद्ध होना पाया है!

***

विराम से विस्तार...

एक टुकड़ा आसमान
तेरी-मेरी जेब का
दो कदम ज़मीन
हम रुके, के सिरफिरे चले
तू हाँ ठहर, जहाँ
हो गूंज-गूंज कर विराम
हो विराम! हो विराम!
कर सपाट तीलियों को
बुझती ठूठी तीलियों को
थाम इन हथेलियों को
कर पुकार!  कर पुकार!
मै ही तेरा आसमान
मै ही दो कदम ज़मीन
हम रुके क्यों रुके?
हम चले मिसाल बन
कर विशाल मन मगन
तो बुझती ठूठी तीलियों से
लौह जलेगी सांझ की
क्यों बाट जोहे रात की
तू कर विहान,  कर विहान!
एक टुकड़ा आसमान
तेरी- मेरी जेब का
दो कदम ज़मीन
हम रुके , सिरफिरे चले
 ***

3 comments :

  1. it's amazing dear...this is ur spectaculous talent...I wish that it will take u to a zenith of success..ur wellwisher..

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  2. धार्मिक साजिशों से लेकर छोटे-मोटे घरेलू तांडव
    तब सलाइयों पे बुने जाते.. हा हा हा .. सही कहा

    'एक टुकड़ा आसमान' कितनी कवितामयी पंक्ति है बेहद ख़ूबसूरत...
    - मयंक मुसाफ़िर


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