ग़ज़ल: महेन्द्र अग्रवाल

महेन्द्र अग्रवाल

सम्पादक, नई ग़ज़ल, सदर बाजार शिवपुरी म.प्र.473551
चलभाष: +91 942 576 6485, +91 877 003 0577

ग़ज़ल 1

उम्मीद की किरन भी सलामत नहीं रही
वो सरपरस्त सर पे मगर छत नहीं रही

कुछ भेड़िये-सियार सियासत में आ गए
क़ानून की कहीं भी तो दशहत नहीं रही

जब यार दुश्मनों की तरह से लगे मुझे
फिर दुश्मनों से कोई अदावत नहीं रही

इंसाफ मांगने गए सो मांगते रहे
जैसी थी पहले आज अदालत नहीं रही

माँ की दुआ है सर पे मुसीबत नहीं मगर
वालिद नहीं हैं जब से वो बरक़त नहीं रही

हम भी ठिठुर रहे हैं इसी सर्द हवा में
सूरज से इस समय भी शिकायत नहीं रही

पढ़ लिख के रोज़गार मिला ज़िन्दगी नई
माँ बाप की किसी को ज़रूरत नहीं रही

आज़ाद हो गए तो वो जज़्बा चला गया
इस दिल में पहले जैसी बग़ावत नहीं रही
***

ग़ज़ल 2

सलीक़े से अपना कथन कर रहा हूँ
सभी दुश्मनों को नमन कर रहा हूँ

चुका दूँ पसीने से मिट्टी का कर्जा
मैं सहरा को ऐसे चमन कर रहा हूँ

है जम्हूरियत की कहानी में दानव
इसे मारने का जतन कर रहा हूँ

जहाँ पर मगर हों वहीं मछलियाँ हों
यही है व्यवस्था सहन कर रहा हूँ

चुनावों में जीतें सभी मेरे दल के
सो मानव बलि का हवन कर रहा हूँ

चलो साथ आओ मुझे दो समर्थन
बुराई का रावण दहन कर रहा हूँ

नदी बह रही है रहूँ क्यों मैं प्यासा
ये मौक़ा मिला है गबन कर रहा हूँ

उठाओ जो लाठी तो हर भैंस अपनी
तुम्हारी कहन है कहन कर रहा हूँ

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