पुस्तक समीक्षा: बातें अपनी सुरक्षा की

पुस्तक: बातें अपनी सुरक्षा की
लेखिका: श्रीमती शेफाली शर्मा
प्रकाशन वर्ष: 2019

समीक्षक: प्रभुदयाल श्रीवास्तव

विगत दिनों श्रीमती शेफाली शर्मा द्वारा लिखी पुस्तक "बातें अपनी सुरक्षा की" का विमोचन दिल्ली से पधारे डा. दिविक रमेश के विशिष्ठ आतिथ्य, जिला कलेक्टर श्री श्रीनिवास शर्मा के मुख्य आतिथ्य और पुलिस अधीक्षक छिंदवाड़ा श्री मनोज राय की अध्यक्षता में समपन्न हुआ था। इस पुस्तक के चित्र स्वप्निल कपूर ने बनाये हैं। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य आजकल बच्चों खासकर अबोध बच्चियों के साथ होते दुराचार/ ज्यादतियाँ/ दुष्कर्म जैसी घिनौनी हरकतों से बचने /रोकथाम करने के उपाय बताना है। और बच्चों और उनके पालकों को जागरूक करना है।

देश के कोने कोने से बच्चों के साथ हुए दुराचार की खबरें हम रोज पढ़ते हैं। न जाने कितने भोले और मासूम बच्चे विकृत मानसिकता के लोगों द्वारा शिकार बना लिए जाते हैं यह आँकड़े हमें ठीक से ज्ञात भी नहीं हो पाते। हमें ज्ञात जानकारी से न जाने कितने गुना अधिक भोले बच्चे इन शिकारियों के शिकार हो जाते हों हम अनजान ही रहते हैं। शेफाली शर्मा ने इसी मुद्दे को अपनी बीस पेज की इस छोटी सी किन्तु तथ्य परक पुस्तक में उठाकर बाल मनोविज्ञानिक तरीके से इससे बचने के उपाय सुझाये हैं।

पुस्तक को पाँच खण्डों में बाँटा गया है। प्रथम खंड में बच्चों को उनके खास होने का महत्व बताकर उनको हीन भावना से उबारकर उनमें आत्म विश्वास जगाने की कोशिश है।। यह सच भी है  कुदरत ने सभी बच्चों में कोई न कोई विशेष गुण दिया होता है और यदि यह बात बच्चों को समझाई जा सके तो कोई कारण नहीं कि बच्चे आत्मविश्वास से परिपूर्ण न हो सकें। बच्चों में मनोबल बढ़ेगा तो वह विपरीत परिस्थितियों का डटकर विरोध कर सकेंगे।

इस पुस्तक में कविताओं के माध्यम से लेखिका ने बड़ी कुशलता से अपनी बात बच्चों और उनके पालकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

दूसरा खंड" हमारी भावनाएँ" है। इसमें रंगों के द्वारा चेहरे के भाव ख़ुशी /दुःख/गुस्सा /भय इत्यादि दर्शाया गया है। यह सच भी है बच्चे के चेहरे की भावभंगिमा उसके भीतर के मनोभावों को व्यक्त कर देती है।एक कुशल शिक्षक अथवा माता पिता बच्चे के मनोभावों को ताड़कर उसके भीतर की उथल पुथल को जानकर उसका निवारण भी कर लेते हैं। निडर बच्चा अपने मन की बात बताने में नहीं झिझकेगा। लेखिका ने बाल गीतों के माध्यम से इसी बात को मनोरंजक बना दिया है। बच्चे गायेंगे भी हुए अपनी व्यथा भी बताएँगे। आजकल चूँकि पढ़ाई का एक माध्यम अंग्रेजी भी है तो लेखिका ने गीत अंग्रेजी में भी लिखकर अपनी अभिव्यक्ति दी है।

सुन रे गुड्डा सुन री गुड्डी, सुन रे मुन्ने, सुन री मुन्नी जैसे सम्बोधन किताब के कथन को रोचक बना देते हैं। कैसा लगा, अच्छा लगा, जैसे मीठे शब्द पाठक को भाव विभोर कर देते हैं। पढ़ाई की पढ़ाई और मनोरंजन का मनोरंजन और बड़ी सरल शिक्षा भी। अंग्रेजी में भी How are you feeling? dear child अथवा, If you are happy, clap your hands.

यह तो गाने में खजाने मिलने जैसी बात हो गई। खेल-खेल में बच्चों के भीतर की बात बाहर निकलवा लेना और उन्हें निर्भय बनाने में लेखिका सफल होती दिखती है।

तीसरे खंड में शारीरिक अंगों और निजी अंगों के बारे जानकारी दी है। चूँकि यह एक संवेदन शील और गोपनीय विषय है लेखिका ने बड़े सरल और चतुराई पूर्ण तरीके से इस बात को बच्चों /पलकों /शिक्षकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है। निजी अंगों  पर किसी भी तरह का कटाक्ष /हमला /स्पर्श इस पर बच्चों को बड़ी सरलता से समझाइश दी गई है। बच्चों के माता पिता को यह किताब पढ़कर बच्चों को समझाने का प्रयास करना चाहिए। लेखिका ने, निडर होकर बिना झिझक के ऐसी किसी भी गतिविधि की जानकारी बच्चों द्वारा अपने पालकों अथवा शिक्षक को देने की नसीहत दी है। इसी तथ्य को आगे बढ़ाते हुए चौथे खंड में अच्छे बुरे का भेद समझाया है। निजी अंगों को छूने या देखने का प्रयास बुरा स्पर्श माना जाता है। ऐसी किसी भी चेष्टा का तुरंत विरोध होना चाहिए। अगर ऐसा कोई करता है तो उसे तुरंत 'न' कहना चाहिए उसे वहाँ से चले जाने को कहना चाहिए और जोर से चिल्लाकर यह बात सबको या माता पिता अथवा शिक्षक को बताना चाहिए। "ना" "जा""बता" का सूत्र, जैसा लेखिका ने बताया है, अपनी सुरक्षा के लिए कारगर उपाय होगा।

"प्रिवेंशन इस बेटर देन क्योर" यह अंग्रेजी की एक सूक्ति है मतलब "इलाज से अच्छा है कि बीमार ही न हुआ जाये।" उत्पीड़न के बाद हाथ पैर मारने, कानून के झमले में पड़ने से अच्छा है की उत्पीड़न से बचा जाये।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
बच्चों के साथ स्नेह/ प्रेम/ दुलार करना प्रकृति प्रदत्त गुण है इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इसमें बदनीयती को कोई जगह नहीं है। बदनीयती ही एक जघन्य अपराध है। बदकिस्मती से हमारा समाज नैतिक विघटन की पराकाष्ठा को पार करता दिखाई दे रहा है। मनोवृतियों का यह प्रदूषण आज के विकृत होते समाज को डसता जा रहा है और अब तो सगे सम्बन्धियों, नातेदारों पर से भी  विश्वास हट रहा है ऐसे में नीतिनियंताओं /शिक्षकों /माता पिताओं यह अपेक्षा होगी कि बच्चों को अधिक से अधिक सावधान किया जाये। इस तरह की किताबें अधिक से अधिक बच्चों और उनके माता पिता तक पहुँचायी जाएँ। शिक्षक भी सतर्क रहें। मोबाईल /नेट संस्कृति ने जो विकृत मानसिकताओं के पहाड़ खड़े किये हैं उन्हें खोदकर फेकना होगा।

पाँचवें और अंतिम खंड में लेखिका ने बच्चों को अपनी सुरक्षा करने के टिप्स दिए हैं। चॉकलेट टाफी बिस्कुट के लालच से बच्चे बचें। किसी बड़े की गोदी में बैठना भी हानिकारक हो सकता है। बच्चे अकेले न खेलें, झुण्ड में एक साथ रहने पर कोई शिकारी हमला करने, फुसलाने के पहले कई बार सोचेगा। अगर कोई कहता है कि यह बात किसी से मत बताना तो वह बात बच्चों को जरूर अपने मम्मी पापा या टीचर को बताना चाहिए। यही सब लेखिका ने अपने विचारों में दर्शाया है।

विपरीत परिस्थितियों में बच्चे को मोबाईल /फोन द्वारा पुलिस /चाइल्ड लाइन पर सूचना देने के लिए समझाना चाहिए।

अखबारों /टी वी के चित्र पटल /अनुभव से उपजी अनुभूति ने शायद लेखिका को यह पुस्तक लिखने को प्रेरित किया उन्हें साधुवाद। यह पुस्तक निश्चित ही बच्चों के साथ होती ज्यादतियों की रोकथाम की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी ऐसा मेरा विश्वास है।

2 comments :

  1. A book which will not offend a child while teaching about his/her own safety.
    I wish a safer world for my kids.

    ReplyDelete
  2. This is a book which does not offend a child in learing about his / her own safety.
    Wishing a safer world for my kids.

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।