धनंजय वैरागी कृत ‘नमक का पुतला सागर में’: एक अवलोकन

अन्जु शर्मा

हिन्दी विभाग, एस. एस. डी. पी. सी. पी.जी. कॉलेज रूड़की (हरिद्वार)
चलभाष: +91 987 074 2216; ईमेल: anjuvats631@gmail.com

‘नमक का पुतला सागर में’ बंगला के ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी,  साहित्यकार,  अभिनेता और निर्देषक धनंजय वैरागी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘नुनेर पुतुल सागरे’ का हिन्दी रूपान्तरण है। कथा साहितय के क्षेत्र में वह प्रयोगधर्मी रचनाकार के तौर पर स्थापित हैं। ‘नुनेर पुतुल सागरे’,  ‘एक मुठो आकाष’,  ‘रजनीगंधा’,  ‘एक पेयाला कॉफि’,  ‘सैनिक’,  ‘पुड़ेल जा पोड़े ना’ जैसी कृतियों द्वारा उन्हे साहित्य जगत में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। उन्होंने आकाशवाणी कलकत्ता से प्रसारित होने वाले कई नाटकों का निर्देषन भी किया है। प्रस्तुत उपन्यास में वैरागी जी ने कलकत्ता नगर को केन्द्र में रखकर वहाँ की जीवन शैली व उससे जुड़े विविध पहलुओं - संक्रमण काल की सभ्यता,  परिवर्तित मानव मूल्यों का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। उपन्यास को पढ़ते हुए पाठकों को लगता है कि मानो उनका संसार ही बदल गया है, महानगरीय अभिशाप की काली छाया पूरे परिवेष में व्याप्त है जिसमें साधारण आदमी को साँस लेने में भी कठिनाई हो रही है और वह ताजी हवा के लिए व्याकुल हो रहा है।
हमारा समाज वर्तमान में अन्याय,  अत्याचार पाखण्ड,  कालाबजारी,  छल, दोमुँहापन अवसरवाद आदि विसंगतियों से घिरा हुआ है। कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। अतः रचनाकार,  कृतिकार,  कलाकार ने स्वयं को भीतर बाहर से आहत अनुभव किया परिणामस्वरूप वह व्यंग्यषील हो उठा। जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनके प्रस्तुत उपन्यास में दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने अपनी कृति के प्रमुख पात्र अनादिप्रसाद के कथनों से समाज के संत्रास, शोषण और अत्याचार,  खोखलेपन आदि को उद्घाटित करने का अथक प्रयास किया है।

उपन्यास का कथानायक लोकप्रिय लेखक अनादिप्रसाद है जो कि अभावों की वैतरणी पार करके साहित्यिक जगत में सम्मान के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के उपरान्त भी सन्तुष्ट नहीं है। अपनी पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर नींद से घबराकर जाग उठता है मानो वह मौत की नींद से जागा हो। और वह स्वयं को अस्तित्व और अनस्तित्व की बालू भरी भीत पर टिका पाता है। ‘‘ मनुष्य का षाष्वत प्रश्न ‘मैं कौन हूँ’ उसे बार-बार बेधता है। वास्तविक अनादिप्रसाद कौन है? - वह जो  कि कागज़ पर स्याही से लकीरें खींच कर सच और झूठ को मिलाता है और लोगों को मनपसंद उपन्यास लिखता है या कि जो विवेक से प्रेरित हो कर समाज के अन्यायों के विरूद्ध लोहा लेने के लिए प्रस्तुत रहता है?’’1

सत्य के अन्वेषण के लिए वह सीपी का खोल त्यागकर संसार से परिचित होने को उत्सुक है वह कहता है कि, ‘‘ सीपी का खोल त्याग कर बाहर आना पड़ेगा। वीरान द्वीप की तरह एकांकी जीवन जिन्दा रहने में कविता का शायद अस्तित्व हो,  अभिजात्य की भावना भी रह सकती है लेकिन जीवन का सत्य नहीं मिल सकता है। वास्तविकता से साक्षात्कार करने के लिए मकान की दीवारों को तोड़ना होगा। इतने दिनों से हम ने मन के गली-कूचों में जितनी दीवारें खड़ी की हैं, सभी को ढहाना पड़ेगा। बहत्तर मिलिमीटर परदे की तरह दृष्टि की व्यापकता बढ़ानी पड़ेगी। संकोच नहीं,  प्रसार की जरूरत है। बन्धन नहीं, मुक्ति की जरूरत है। गोष्ठी नहीं,  जनता की जरूरत है।“2

उसे अपना जीवन व्यर्थ जान पड़ता है जिसे वह बिना किसी कारण के बस जिये जा रहा है। वह स्वयं से प्रयत्न करता है कि, ‘‘जीवित रहने का अर्थ समझ में नहीं आ रहा है। - सिर्फ यही कि खाना-पहनना -सोना और हँसना-रोना! उस दुनिया की खोज करना चाहता हूँ जो कि कठोर वास्तविक है। मंजिल पर पहुँचने के बावजूद जिसका पता नहीं चलता। सिर्फ खोज करता जा रहा हूँ और खोज करता जा रहा हूँ...’’3

खोज के उपरांत यद्यपि उसे सबकुछ मान-सम्मान,  धन-दौलत मिल जाता है किन्तु मन को संतोष नहीं मिल पाता । वह कहता है कि,  ‘‘जो दार्शनिक जीवन और मृत्यु के सन्तुलन का मूल्य खोज रहा है,  जो वैज्ञानिक विश्व के रहस्य की कुंजी खोज रहा है,  वे सब के सब उस किस्म के चिरंतन पागल हैं- जो पारस की खोज में असंख्य पत्थर के टुकड़े चुनते रहते हैं,  अगर पारस मिल जाये तो भी ध्यान नहीं देते,  खोजते रहने के आनन्द में निमग्न होकर पारस को फेंक देते हैं और फिर नये सिरे से पत्थर के टुकड़े चुनते लगते हैं।’’4

प्रकाषक के दबाव डालने पर भी वह दूसरों को सुख देने व अपने साथ-साथ प्रकाषकों की जेबों को भरने के लिए साहित्य में कृत्रिमता की मिलावट अस्वीकार कर देता है, उसका मन उसे ऐसा करने के लिए मना कर देता है वह कहता है कि, ‘‘तेल और घी में मिलावट रहने से हम लोग आपत्ति करते हैं,  दवा में मिलावट रहने से हम लोग षोर-गुल मचाते हैं लेकिन हम लोग जान-सुनकर साहित्य में कृत्रिमता की मिलावट कर रहे हैं। इस के खिलाफ कौन आन्दोलन करेगा,  बता सकते हैं ?’’5

उपन्यास में गुण्डों के द्वारा की गई लूट-खसोट में एक पान वाले की हत्या कर दी जाती है। किन्तु वहाँ मौजूद भीड़ मूक दर्षक बन कर सब देखती रहती है। जिस पर अनादिप्रसाद क्रौधित होकर कहता है कि, ‘‘तब उनके जिन्दा रहने से क्या फायदा है ? जो जनता क्लीव है,  जो नपुंसक है,  जो सिर्फ आलोचना भर कर सकती है लेकिन जीवन के आमने -सामने खड़ी नहीं हो सकती उसे जिन्दा रहने क्या हक है ? इसके बाद भी उस में यह अहम् कि हम बंगाली हैं,  हम मनुष्य हैं तो हमें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। हम झूठे हैं,  हम वहषी हैं। जहाँ संयत रहने की जरूरत है वहाँ हम हजारों तरह के नारे लगाते हैं,  जुलूस निकालते हैं और जिन्दाबाद की आवाज लगा कर लोगों के कान के पर्दें फाड़ते हैं। लेकिन सत्य का दामन पकड़ने की हम में हिम्मत नहीं है। हम लोग नये युग के मनुष्य को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। हमें सजा मिलना चाहिए।’’6

वहाँ उपस्थित सभी लोग अनादिप्रसाद का वह रूप देख कर आश्चर्यचकित हो जाते है। क्योंकि अनादि का ऐसा रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। थरथराती आवाज में अनादि सभी को धिक्कारते हुए कहता है कि, ‘‘आदमी जब साहस खो देता है और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलन्द नहीं कर सकता है तो उसे आदमी नहीं कहना चाहिए। इस बीस साल के दरमियान हम ने इन्सानियत खो दी है। अगर हम बाघ या सिंह होते तो भी हमें भरोसा रहता और हम समझते कि हम में पराक्रम है,  किन्तु हम गीदड़ हो गये हैं,  देह में ताकत नहीं है,  सिर्फ अक्ल से हम बाजी मात करना चाहते हैं!’’7

वह देश की एकता के प्रति चिन्ता प्रकट करता है क्योंकि उसे लगता है कि राष्ट्रीय एकता पर संकट का साया मडरा रहा है और जिसके जिम्मेदार हमारे देश की जनता ही है,  ‘‘अपने देश का हमने नहीं पहचाना। देश किसका है,  कौन इसकी फिक्र करता है,  इसी लिए सुविधावादी नेतागण देश को लेकर फाटकेबाजी का खेल खेल रहे हैं। अँग्रेज चले गये और जाते-जाते आजादी का दस्तावेज हमें देते गये, यह देश मानो पंचायती जायदाद है। कौन कितना हथिया सकता है,  इसी कि कोशिशें चल रही हैं।  दिन-दिन प्रान्तीयता सिर उठा रही है और बीस बरसों से इस के लिए ईंधन जुटाया जा रहा है। जिस धर्म ने इस देश की एकता को इतने दिनों से सुरक्षित रखा था उस धर्म-निरपेक्षता की नीति की बलिवेदी पर चढ़ा कर हम ने मिटा दिया। हिन्दुस्तान के चारों कोनो में चार धाम हैं। सर्वत्र एकान्न वेदियाँ हैं। भक्त लोग जब परिक्रमा करने जाते थे तो सारे देश की परिक्रमा करते थे। एक जगह से जल ला कर दूसरे जगह में डालते थे। उन का एक मात्र यही परिचय था कि वे भक्त थे। कौन किस प्रान्त का रहने वाला है,  इस के लिए लोग माथापच्ची नहीं करते थे। कौन क्या भाषा बोलता है,  इस पर झगड़ा नहीं करते थे। लेकिन आज भाषा का षडयन्त्र रच कर सती की देह की तरह इस देश को भी टुकड़ों में बाँट दिया है। केवल विभेद और विच्छेद है। एकता कहाँ है ?’’8

सरकार के पतन के साथ ही सारे शहर में अशांतिपूर्ण माहौल हो जाता है। अफवाहों के चलते हर जगह दंगे-फसाद होने लगते हैं। पहले ट्राम बंद हुए, फिर बस का भी चलना बंद हो गया और पत्थरबाजी के चलते टैक्सी भी चलनी बंद हो जाती हैं। मन की जिज्ञासा अनादिप्रसाद को घर में नहीं रहने देती और पत्नी के रोकने पर भी वह सड़क पर उतर आता है। वह देखता है कि कहीं  लाइट पोस्ट को तोड़कर बड़े रास्ते पर सुला दिया गया है तो कहीं कुछ लड़के किसी ठेले वाले का ठेला जबरन छीन रहे हैं । तभी वह देखता है कि दंगे का हिस्सा न बनने वाले दुकानदारों की दुकानों में आग लगाई जा रही है। यह देख अनादिप्रसाद स्वयं को रोक नहीं पाता,  उस के पूरे शरीर में जैसे हजार पावर की बिजली खेल रही हो वह अपनी दोनों बाहो को पसार कर कहता है कि, ‘‘मैं यह अन्याय नहीं होने दूँगा। पहले तुम लोग मुझे मार डालो।’’9

परन्तु दंगा करने वालों पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अपितु वह अनादिप्रसाद को चोटिल कर घायल कर देते हैं। ‘‘लेकिन आश्चर्य की बात है कि अनादिप्रसाद जिन लागों को दौड़ कर बचाने आया था,  उन में से कोई भी उस की इस घोर दुर्दशा की हालत में सहायता करने के लिए आगे नहीं बढ़ कर नहीं आया । भीष्म और द्रोण की तरह उन लोगों ने चुप्पी ओढ़ ली।

दर्द टीस और शर्म से अनादिप्रसाद कठोर राजपथ पर सो गया। पशुओं के अत्याचार से रक्त से लथपथ हो कर अन्तिम साँस लेने के पूर्व अनादि ने गहरी व्यथा के साथ यह अनुभव प्राप्त किया कि कुरूक्षेत्र के गृह-कलह के परिणाम से यह समाज अपने पूँजीभूत पापों से मुक्त नहीं हो सकेगा। हम लोगों ने जिस यदुवंश की रचना की है,  वह शायद अन्ततः नष्ट-विनष्ट हो कर ही रहेगा। यह भी क्या अष्टावक्र मुनि के अभिशाप के जैसा ही कोई अभिशाप है।’’10

और अनादि की निर्मम हत्या के साथ ही उपन्यास का अन्त हो जाता है। उपन्यास की अन्तिम पंक्तियों में अनादि की मृत्यु पर शोक प्रकट किया गया है-‘‘लेकिन हाय,  जिस प्रश्न से टकरा कर जीवन का खोजी अनादिप्रसाद इस दुनिया से विदा हो गया,  वह प्रश्न अनिर्णीत ही रह जायेगा- इसी तरह नमक का पुतला सागर में विलीन हो जायेगा।’’11

अन्त में हम निष्कर्ष रूप में कह सकते है कि उपन्यास को माध्यम बनाकर लेखक वर्तमान में फैली हुई कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया है। ‘‘मार्गदर्शन का दायित्व संभालने वाले भ्रष्टाचारी नेता,  गरम नारों की मषाल पर अपनी जबान जलाने वाले उद्देष्यहीन युवक,  काले बाजार के बहीखातों को मनुष्य के रक्त से अंकित करने वाले व्यापारी,  दिग्भ्रमित तथा अभावग्रस्त नारियों की खुली अनैतिक सौदेबाजी गुंडों की लूट-खसोट,  मध्यवर्ग की निष्क्रियता और ऐसी ही अनेक-अनेक विसंगतियाँ उपन्यासकार की तटस्थ दृष्टि और कलात्मक शैली के सामंजस्य द्वारा अक्षरशः जीवन्त बन गयी हैं।’’12 यह कहना कदापि अतिशयोक्ति न होगा कि प्रस्तुत उपन्यास सत्य के अन्वेषण और उससे साक्षात्कार की एक अविस्मरणीय कथा है,  जोकि साहित्य जगत को उपन्यासकार की अमूल्य देन है।

सन्दर्भ ग्रंथ सूची :-

1. धनंजय वैरागी,  नमक का पुतला सागर में,  भारतीय ज्ञानपीठ,  18 इंस्टीट्यूशनल एरिया,  लोधीरोड,  नई दिल्ली-110003 तृतीय संस्करण - 1989,  पृ0-26
2. वही पृ0-27
3. वही पृ0-02
4. वही पृ0-18
5. वही पृ0-22
6. वही पृ0-335
7. वही पृ0-335-336
8. वही पृ0-336
9. वही पृ0-341
10. वही पृ0-342
11. वही पृ0-342
12. वही आवरण पृष्ठ से

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