समय के फेर में जीवन की दिशा तलाशती कविताएँ: ‘नए इलाके में’

श्रवण कुमार

शोधार्थी (पीएच.डी), हिन्दी विभाग/हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद-500046
चलभाष: +91 946 680 3101
ईमेल: sharvankr86@gmail.com

जीवन की सहजता खत्म हो रही है। बनावटी चीजों के प्रति लोगों का लगाव बढ़ता जा रहा है। हर कोई बस जीवन की इस आपाधापी में आगे निकलना चाहता है। आपसी प्रेम, आत्मीयता घटती जा रही है। लोगों की और उनके आवास की या उनके यादगार वातावरण की पहचान खोती जा रही है। स्वार्थ केन्द्रित लोगों के पास दूसरों के लिए समय ही नहीं है। आज की चीज़ आने वाले कल में पुरानी पड़ जाती है। कुछ भी स्थाई नहीं बचा है। ‘नए इलाके में’ की कविताएँ एक आईना है जो बता रहा है कि आज हमारे चेहरे कितने पुराने पड़ गए हैं। इन चेहरों को गौर से देखो और महसूस करो।

प्रस्तुत संग्रह (नए इलाके में) में 1990 से लेकर 1995 के दौर की कविताएँ हैं जिनमें कवि अरुण कमल ने स्मृतियों में उपजी संवेदना को वाणी देने का काम किया है। स्मृति भी ऐसी जो साथ छोड़ रही है। कवि की मदद नहीं कर पा रही है, पुराने इलाके को पहचानने में, क्योंकि निरन्तर चारों तरफ नए का ढाँचा खड़ा होता जा रहा है। रोज कुछ न कुछ नया बन रहा है जिससे की अच्छा खासा व्यक्ति भी धोखा खा जाता है-

यहाँ रोज कुछ बन रहा है/रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं/एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया

संग्रह की शीर्षक कविता ‘नए इलाके में’, यह वो समय’, ‘हाट’ आदि कविताएँ उसी खोज की ओर संकेत करती हैं जिसे कवि भूल रहा है। आज कविता जितनी निजी है उतनी ही सार्वजनिक। कविता को इस समय गहरे अर्थों में अपने और वक्त के प्रति जवाबदेह होना है। अरुण कमल का यह कविता संग्रह इस बात का गवाह है कि कविता अपने समय में होकर भी समय के पार जाती है। यह अतीत में गुम नहीं होती। यहाँ जीवन को देखने की नई दृष्टि मिलती है। यहाँ गहरा नैतिक बोध दिखाई पड़ता है। कुछ भी पहले से तय नहीं है। अनजान रास्तों की खोज करती ये कविताएँ अपने समय का सच खोज रही हैं। व्यक्ति के सामने कैसे-कैसे नैतिक प्रश्न आज आकर सामने खड़े हो गये हैं जो वह इतना सोच रहा है। आज से पहले वह इतने असमंजस में शायद ही पहले कभी रहा हो। उसके सामने ऐसी परिस्थितियों ने घेरा डाला है कि वह सवाल पूछने पर मजबूर हो गया है। पहले से कहीं अधिक धर्मांध होते आज हमारे समय में वह नैतिक अनैतिक को लेकर कितने ‘नैतिक प्रश्न’ करने लगा है-
लेकिन आज बरसात की इस शाम को/फुटपाथ पर पहली बार उसे ठिठकते हिचकते देखा/हाथ में ग्राम भुट्टा पकड़े अंगीठी पर आँखे गड़ाए वह बोला--लगता है/मसान के कोयले पर पका है/खाना ठीक रहेगा?

नए समय के यथार्थ की पहचान कवि यहाँ व्यक्ति के मन में उठे प्रश्नों से कर रहा है लेकिन उसके सामने एक विकल्प भी है और वह उसे ‘अपवाद’ कविता के रूप में देखना चाहता है--

जब सब थू-थू कर रहे हों/जब मौत के बाद भी फांसी की मांग हो
तब मैं उठूँगा और कहूँगा/खुदा के बन्दों, उस हैवान में एक
अच्छाई भी थी,/वो यह कि लोग एक साथ सोये/उसने कभी मसहरी नहीं बाँधी

इस नए इलाके में विचरते हुए ऐसा नहीं है कि कवि केवल खो ही रहा है बल्कि वह घोषणा भी कर रहा है कि इन इलाकों के निर्माताओं की राष्ट्र निर्माण में जो नींद हराम हो रही है वह किस काम की? देश के नीति-नियंता ही जब विकास की अंधी दौड़ में अपनी नींद खो चुके हैं तो आम नागरिक से क्या अपेक्षा की जा सकती है? इसलिए कवि यहाँ घोषणा करता है कि-

सो मैं भारत का एक नागरिक/एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ कि नींद
मुझे राष्ट्र के सर्वोच्च पद से ज्यादा प्यारी है।

इस प्रकार संग्रह की कविताओं में कई विषयों की कविताएँ हैं जिनमें आम व्यक्ति की पीड़ा के प्रति सहानुभूति भी है और आज के खोते जा रहे जीवन मूल्यों के प्रति एक आह भी। विकास की तेज गति की चाल में अंधे होते जा रहे हमारे शासक-गण की उदासीनता भी जो देखते हुए भी न देखने का नाटक रच रही है। ‘जैसे’ कविता शीर्षक में सारी स्थिति बयाँ हैं-

इस तेज, बहुत तेज चलती पृथ्वी के अंधड़ में/जैसे मैं बहुत सारी आवाजें नहीं सुन रहा हूँ
वैसे ही तो होंगे वे लोग भी/जो सुन नहीं पाते गोली चलने की आवाज ताबड़तोड़
और पूछते हैं-कहाँ है पृथ्वी पर चीख?

इस प्रकार पहले के संग्रहों की तरह इस संग्रह में भी जीवन के विभिन्न पक्षों पर गहरी जाँच पड़ताल के बाद दृष्टि डाली गयी है। एक ऐसी जाँच पड़ताल जो इस निर्मम होती सभ्यता पर चोट करती चलती है। शताब्दी के अवसान पर प्रकाशित इस काव्य संग्रह में ये कविताएँ अपने समय की संवेदनाओं से सीधी मुठभेड़ करती हैं। ब्रेख्त ने भी कहा है ‘यथार्थ बदलता है तो उसे अभिव्यक्त करने के तरीके भी बदलते हैं।’ इसलिए यहाँ कवि ने भी अपने समय और समाज के यथार्थ पर सही उंगली रखी है--

धोखा दे जाते हैं पुराने निशान/खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर/और जमीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बाएँ मुड़ना था मुझे

यह वह समय है जहाँ सब कुछ तेजी से बदल रहा है। समाज, राष्ट्र और विश्व स्तर पर गाँव से लेकर शहर तक रोज कुछ न कुछ बन और बिगड़ रहा है। लोगों की मनोवृतियाँ और मनोदशाएँ बहुत तेजी से बदल रहीं हैं। विकास की अंधी दौड़ की गति बहुत तेज हो रही है। जिसमें वास्तविक विकास तो कहीं है ही नहीं। इन कविताओं में जीवन की नई आंच, नई ऊष्मा, नई गतिविधि, नैतिक बोध के साथ जीवन-मृत्यु, प्रकृति प्रेम आदि अछूते प्रसंगों के दर्शन होते हैं। लोक जीवन भी इन कविताओं में नई पौध की तरह फूट रहा है। कवि जीवन की सार्थकता को परहित से जोड़ता है और उसे फूटी हुई सुराही के माध्यम से व्यक्त करता है। यहाँ लोक संस्कृति और मूल्यों की पहचान दिखाई देती है--

फूटने के बाद भी मिट्टी की सुराही/जाड़े में बोरसी बन जाती है/वैसे ही मैं भी तो काम आ सकता हूँ/अन्न उगा न सकूँ तो क्या/सूखते धान के पास बैठा कौआ तो हांकूँगा

यहाँ अरुण कमल की सारी पीड़ा वर्तमान समाज में व्यक्ति की संवेदनहीनता और मूल्यों के विघटन को लेकर है, कि ये दोनों किस प्रकार बदलते जा रहे हैं। कवि ऐसे गंभीर विषयों को भी बहुत ही सहज ढंग से सहज भाषा में व्यक्त करता है। ‘बात’ शीर्षक कविता में यही स्थिति बड़ी सहजता से व्यक्त हुई है। एक समय था जब सफ़र या सामूहिक जगह पर खाने-पीने की चींजों को लेकर हम अकेले खाने पर बहुत ही हीनता और हिचक महसूस करते थे कि बिना खाए ही पोटली घर वापस ले आते थे जबकि आज स्थिति यह है कि हमें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। केवल अपने बारे में ही व्यक्ति की सोच केन्द्रित होती जा रही है। उसके मूल्य और मर्यादाओं का अपघटन होता जा रहा है, उसे दूसरों के हित की मानों चिंता ही नहीं है, वह केवल अपनी ही खुशियों का जश्न मना रहा है--

बीसियों मरे उस मोटर दुर्घटना में/जो बचे वे भी जैसे तैसे
एक मैं ही बचा साबुत/और मैंने लोगों को दारू पिलाई इस मौज में -
इसमें आखिर ऐसी क्या बात है?

कवि का यहाँ जीवन अनुभूतियों और समय को देखने का अंदाज अलग है। ‘शेष’ कविता में एक-एक कर पुरानी चींजे हमारे जीवन से किस प्रकार विलुप्त हो रही हैं उसी अनुभूति को कवि यहाँ व्यक्त कर रहा है। साथ ही ‘लोक कथा’ और ‘ऐसे में’ शीर्षक कविताओं में क्रमश: डाकुओं के आतंक से भयावह जिंदगी और आतंकवाद के कारण असुरक्षित जीवन का तथा ‘जागरण’ शीर्षक कविता में बर्बाद होती गाँव की संस्कृति का चित्रण मिलता है। संग्रह की अन्य कविताएँ भी कवि के विविध अनुभवों पर आधारित हैं। इनमें कवि की गहन संवेदनाएँ दिखाई देती हैं तो कई कविताओं में जीवन के हल्के-फुल्के अनुभवों का भी स्पर्श है। कवि ‘चार दिन’ शीर्षक कविता में अपने समय को लेकर चिंतित है। उसे समाज के हाशिये पर पड़े, लेमनचूस बेचने वाली बेवा, मतीन, रोजी रोटी कमाने वाले सच्चे इंसानों की चिंता है जो साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिए जाते हैं और इस तरह की घटनाओं पर फिर राजनीति की रोटियां इसी तरह पकती है--

इस समाज की नीव में है बलि हिंसा/हिंसा की इतनी पोशाकें हैं इतने तमाशे/जो शासक हैं हिंसा का मुँह/कभी इधर मोड़ देंगे कभी उधर/हर एक की नजर में बाकी सब दुश्मन होंगे/हरेक के जीवन में कभी न कभी आएगा वह दिन/जब उसे लगेगा उसी पर है सारी चोट

इन कविताओं में अनेक बार हमारे समय की विडंबनाओं को व्यक्त किया गया है। क्रूर विसंगतियों से भरा यह समय कवि की पैनी निगाह से नहीं बच पाया है। इस समय की जो संकीर्ण सनक है, हिंसा का जो वर्चस्व है, सब ओर हो रही हत्याएँ और लूटपाट की जो भयावह स्थिति है वह कवि की नजर से होकर गुजरी है। मध्यवर्गीय मानसिकता से कवि यहाँ भलीभांति परिचित रहा है। यहाँ कवि हाशिये के वर्ग की समस्याओं की काव्यात्मक अभिव्यक्ति करते हुए मूल्य बदलाव की सूचनाएँ दे रहा है। जनवादी चेतना के कारण कविता का प्रभाव यहाँ अपने उभार पर है। जीवन की अनवरत यात्रा में संसार की परिवर्तनशीलता का परिचय देती ये कविताएँ अपने समय की गूंज साबित हुई हैं। समसामयिक राजनैतिक, सामाजिक उथल-पुथल के बावजूद अपने घर गाँव, खेत-खलिहान, पेड़-पौधे, हाट-बाज़ार, पशु-पक्षी की कथा-व्यथा रचती ये कविताएँ पूरे फलक के साथ यहाँ मौजूद हैं। सभी स्थितियों की जीवंतता यहाँ बनी हुई है। जीवन के गहरे अन्तरविरोध तो हैं ही,मनुष्य के आपसी रिश्तों की खोज, मानवीय चिंताएँ, मूल्य बचाए रखने की बेचैनी भी कहीं अधिक दिखाई पड़ रही है।

साहित्य की सबसे संवेदनशील विधा का नाम कविता है। आज मनुष्य की बाहरी दुनिया के साथ-साथ उसकी आन्तरिक दुनिया में भी काफी बदलाव आ रहा है। इस कठिन समय में चुनौतियों से जूझने को देखना और दिखलाना भी साहित्य का दायित्व है। इन्ही चुनौतियों को लिए ये कविताएँ हमें सचेत करती हैं। समकालीन जीवन में लगातार भरते जा रहे त्रास और असुरक्षा के भाव को बहुत ही सशक्त रूप में उपस्थित करती हैं। सही मायने में देखा जाये तो सरलता के सौंदर्यशास्त्र को गढ़ती ये कविताएँ हमारे यथार्थ की जटिल स्थिति को पकड़ने में पूर्णतः सक्षम हैं। ‘नए इलाके में’ की इन कविताओं का दायरा काफी व्यापक है। कवि यहाँ कविता की भावात्मक संवेदना को बचाए रखने के प्रति सजग दिखाई पड़ता है। ये कविताएँ निश्चित रूप से जिंदगी के रोजमर्रा के जीवन के विभिन्न रूपों अनुभूतियों को संवेदनात्मक रूप से पकड़ती हैं।

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