आओ हिंदी सीखें - भाग 8

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com


विराम चिह्न: अर्थ एवं प्रयोग

विराम चिह्न में आए विराम शब्द का शाब्दिक अर्थ है- विश्राम, रुकना, ठहरना तथा चिह्न का अर्थ है- संकेत या प्रतीक। अर्थात् यह कहा जा सकता है कि जब हम अपने विचारों को मौखिक या लिखित भाषा के माध्यम से संप्रेषित करते समय कभी कुछ समय के लिए रुकते तो कभी द्रुत गति से आगे बढ़ जाते हैं। यह रुकना या ठहरना ही विराम कहलाता है। छंद शास्त्र में इसे 'यति' शब्द से अभिहीत किया जाता है। इस विराम या ठहरने के समय को प्रकट करने वाले चिह्न या संकेतों को विराम चिह्न कहा जाता हैं। दूसरे शब्दों में वे शब्द जो बोलते और पढ़ते समय रुकने का संकेत देते हैं, विराम चिह्न कहलाते हैं।


विराम चिह्नों का महत्त्व-
                  लेखक को लिखने तथा पाठक को पढ़ने के लिए लेखक के भावों एवं विचारों की सुस्पष्ट एवं सम्यक् अभिव्यक्ति तथा वाक्यों के निर्माण संरचना के लिए इन चिह्नों का प्रयोग अति आवश्यक होता है। इनके सही प्रयोग से वाक्य से निसृत भाव यथानुकूल होता है  तथा गलत प्रयोग से अर्थ का अनर्थ हो जाता है। गलत प्रयोग से लेखक व  पाठक के मध्य साधारणीकरण की प्रक्रिया खत्म हो जाती है। इनके सही प्रयोग से पाठक संबंधित पाठ के भावों में डूबने लगता है।

 
इनका प्रयोग; किया जाए,तो कहाँ किया जाए? यह महत्वपूर्ण है। इनके दूषित प्रयोग से अर्थ अलग निकलेगा। अतः आवश्यक यह  है कि इनका समुचित अध्ययन किया जाए। ऐसे अनेक अवसर आते हैंजब इनके अभाव में अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरणार्थ - 'जाओ मत बैठो।' यदि इस वाक्य में विराम चिह्न का प्रयोग नहीं किया जाता, तो अर्थ पूर्णतया स्पष्ट नहीं होता। इस वाक्य में विराम चिह्न  'जाओ' के पश्चात लगाएँ, तो लिखा जाएगा - 'जाओ, मत बैठो।या इसे 'जाओ मत, बैठो।लिखा जाए तो दोनों के अर्थ भिन्न होंगे। इनका यह भी है कि जब कोई अधिक लंबा वाक्य लिखा जाता है, तब वाक्य का सही अर्थ प्रकट करने में  सहायक होते हैं।

विराम चिह्न, बलाघात के अर्थ को स्पष्ट करने में सहायक होते हैं। जैसे, 'मालिक ने नौकर को, कोड़े से मारा।अब इस वाक्य में कोड़े पर विशेष जोर आ जाता है। बलाघात के कारण यह वाक्य मालिक की निर्दयता को सूचित करने वाला बन जाता है। साथ ही  विराम चिह्नों के प्रयोग से हमें यह समझने में आसानी हो जाती है कि विशेषण का संबंध वाक्य में किस शब्द से है। जैसे- 'जर्मनी की 60 मील लंबी विश्व में सर्वोत्कृष्ट रक्षा पंक्ति।इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट तब होगा जब लंबी के बाद अल्प विराम लगेगा। बिना इसके यह भ्रम हो सकता है कि '60 मील लंबीकहीं विश्व का विशेषण पद तो नहीं है। 

हिंदी में विराम चिह्न पूरी तरह से पश्चिम की देन है। हिंदी भाषा की जननी, संस्कृत भाषा की प्रकृति ही ऐसी है कि  उसमें अन्य विराम चिह्नों की आवश्यकता ही नहीं होती। हिंदी का स्वरूप और गठन संस्कृत से भिन्न  होने के कारण विराम चिह्नों के प्रयोग की आवश्यकता बढ़ गई है। इसके सही प्रयोग से भाषा में संप्रेषणीयता जितनी बढ़ जाती है, गलत प्रयोग से संप्रेषणीयता उतनी ही घट जाती है।

विराम चिह्न: प्रमुख भेद

विराम चिह्न का नाम       तथा       प्रयुक्त चिह्न का संकेत

1.
पूर्ण विराम                       
2. अल्प विराम                       ,
3. अर्द्ध विराम                       ;
4. योजक चिह्न (Hyphen)      -
5. विस्मयादिबोधक या संबोधन चिह्न     !
6. संबद्धता चिह्न (Desh)       _
7. उपविराम (Colon)            :
8. प्रश्नवाचक चिह्न                 ?     
9. उद्धरण चिह्न                    ' ' " "   
10. कोष्ठक                         (   ) , {  }, [  ] 
11. निर्देशक चिह्न              /
12. तुल्यतासूचक / समानता सूचक      =
13. हंसपद / त्रुटिपूर्ण चिह्न        ^
14. लाघव चिह्न / संक्षेप सूचक (Abbreviation)   
15. तारक / पाद टिप्पणी चिह्न  (Foot Note)   + / * /
16. पुनरुक्ति बोधक (Detto)                    „ „
17. लोप निर्देशक / वर्जन चिह्न               × × ×   .....    ....
18. समाप्ति सूचक                ■■■     ◆◆◆    ●●●   × - × - ×

कतिपय विराम चिह्न: अर्थ एवं प्रयुक्ति

पहले भी लिखा जा चुका कि विराम चिह्न संस्कृत की प्रकृति नहीं है। यह प्रकृति अंग्रेजी की है। अंग्रेजी से हिंदी में आए कतिपय विराम चिह्नों का अर्थ एवं भाषा में उनके प्रयोग के नियम निम्नांकित हैं-

1.
पूर्ण विराम - (।)
           अंग्रेजी में इसे फुल स्टॉप (.) कहा जाता है। देवनागरी लिपि की प्रकृति को देखते हुए इसके लिए खड़ी लकीर का ही प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग वाक्य की समाप्ति पर होता है। लेकिन, क्योंकि, परंतु, फिर भी, यद्यपि आदि अव्ययों से पूर्व पूर्ण विराम का प्रयोग अशुद्ध है। इसका प्रयोग निम्न स्थितियों में किया जाता है-
            1. वाक्य की समाप्ति पर; जैसे- प्रातिभ अच्छा लड़का है।
            2. काव्य में अर्द्धाली के पूर्ण होने पर; जैसे- सियाराममय सब जग जानी।
            3. मुक्त छंदों में आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग मध्य या अंत में, कहीं भी किया जाता है।

2.
अल्पविराम (,)
               यह पूर्ण विराम चिह्न का विपरीत विराम-चिह्न है। अंग्रेजी में इसे 'कॉमा' कहते हैं। पूर्ण विराम का प्रयोग वाक्य के अंत में होता है, वहीं इसका प्रयोग वाक्य के मध्य होता है। जब वाक्य में क्षणभर ठहरने का समय आता है तब वहाँ अल्पविराम चिह्न का प्रयोग होता है। अल्पविराम का प्रयोग निम्नलिखित दशाओं में किया जाता है-
    1. संबोधन सूचक शब्दों के बाद- बेटा, तुम यहीं ठहरो।
    2. समानाधिकरण शब्दों के बीच। समानाधिकरण का अर्थ है- जब एक ही वाक्य में एक ही बात दो बार कही जाए। जैसे- मैं, घनश्याम, शपथपूर्वक बयान करता हूँ। यहाँ 'मैं' और घनश्याम दोनों का एक अर्थ है। अतः दोनों के पश्चात् अल्पविराम लगेगा। अन्य उदाहरण- जनक की पुत्री सीता, राम की पत्नी थी।
    3. जब एक या एकाधिक शब्दों के बीच समुच्चयबोधक अव्यय न हो। जैसे- सव्यंशी ने केले, आम, अँगूर और अनार खाये।               अन्य उदाहरण- वह गोरा, स्वस्थ, सुंदर, मिलनसार और योग्य लड़का है।
    4. कई नामों के साथ- कृष्ण, श्रवण, पूरणचंद और सतीश घनिष्ठ मित्र हैं।
    5. संख्या अंकों के पश्चात्- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9
    6. छंदों में यति स्थलों पर- पोथी पढ़ -पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
    7. क्रिया विशेषण वाक्यांशों के साथ- सैनिक अपने आप को तैयार कर, युद्ध क्षेत्र में उतर पड़े।
    8. युग्म शब्दों के बाद- पाप-पुण्य, सुख-दुख, राग-द्वेष तथा ज्ञान-अज्ञान।
    9. जब किन्हीं दो भावों को मगर, लेकिन, पर, परंतु, किंतु, तो भी, फिर भी आदि शब्दों से जोड़ा जाता है, तब अल्पविराम का प्रयोग अपेक्षित है। जैसे- 
           1. मैं जाऊँगा, किंतु आज नहीं।
           2. वह आज उपस्थित नहीं होगा, क्योंकि उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है।
    10. उद्धरण चिह्न से पहले अल्पविराम का प्रयोग होता है। जैसे- राम ने कहा, 'वह ऐसा नहीं कर सकता।'
    11. क्रिया विशेषण वाक्यांशों के साथ। जैसे- उसने, गंभीर चिंतन के पश्चात्, यह काम किया।
    12. दिनांक लिखते समय महीने और सन् के बीच अल्पविराम का प्रयोग किया जाए। जैसे - 15 जून, 1977 । इस बारे में एक साधारण सा नियम है कि जहाँ भी एक शब्द भावपूर्ण हो जाता है, वहीं अल्प विराम का प्रयोग किया जाता है। जैसे- 15 जून, 1977, सोमवार।
    13. एक ही वाक्य में अनेक उपवाक्यों के बीच अल्पविराम का प्रयोग किया जाना चाहिए। जैसे -
           1. वह चोरी करता है, मैं जानता हूँ।
           2. वह घड़ी, जो तुमने मुझे दी थी, टूट गई।
           3. वह सुंदर स्थान, जो आप देख रहे हैं, गौतम बुद्ध का निर्वाण स्थल है।
    14. पत्र, प्रार्थनापत्र में संबोधन शब्द के पश्चात् अल्पविराम का प्रयोग किया जाना चाहिए। जैसे - सेवा में, श्रीमान् महोदय, प्रिय भाई, पूजनीय पिताजी, आदि।
    15. जब किसी  बात पर विशेष जोर (बलाघात) देना होता है, तब उस शब्द के पहले अल्प विराम का प्रयोग किया जाता है। जैसे - मैं भर्ती होऊँगा, अवश्य होऊँगा।

उपर्युक्त स्थितियों में अल्पविराम का प्रयोग किया जाना अपेक्षित है। इनके अतिरिक्त कभी-कभी अनावश्यक प्रयोग भी देखने को मिलता है। नीचे कुछ वाक्य दिए जा रहे हैं, जहाँ अल्पविराम चिह्न  लगाने की आवश्यकता नहीं। जैसे-
    1. भारत, अमेरिका से आगे है।
    2. राजेश, संदीप को बहुत चाहता है।
    3. उसने कहा, कि वे अवश्य चलेंगे।
    4. विद्यार्थी, हिंसा में लिप्त न हों।

उपर्युक्त वाक्यों में अल्पविराम का प्रयोग आवश्यकतानुसार रूप से किया गया है। इसके लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि अल्पविराम का प्रयोग तभी होगा जब दो शब्दों के बीच समुच्चयबोधक शब्द का अर्थ निकले। राजेश संदीप को बहुत चाहता है। इस वाक्य में यदि राजेश और संदीप के बीच अल्पविराम लगाया जाएगा, तब उसका अर्थ होगा, राजेश और संदीप को बहुत चाहता है।

3.
अर्द्धविराम (;)
अंग्रेजी में इसे सेमीकोलन (Semi Colon) कहा जाता है। इसका प्रयोग वहाँ किया जाता है, जहाँ उच्चारण के समय अल्पविराम से कुछ अधिक, किंतु पूर्णविराम से कुछ कम रुकना होता है। दूसरे शब्दों में जब किसी वाक्य का एक दूसरे से संबंध हो किंतु बात अधूरी हो, वहाँ वाक्य के अंत में अर्धविराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। अर्द्ध विराम का प्रयोग किस स्थिति (दशा) में होता है, देखिए -
    1. लंबे वाक्यों में अर्थ की स्पष्टता के लिए - विद्या से विनय; विनय से योग्यता; योग्यता से धन; धन से धर्म तथा धर्म से सुख मिलता है।
    2. संयुक्त वाक्यों के प्रधान वाक्यों में परस्पर संबंध न हो, तो इनके बीच; जैसे - वह फिर आएगा; सबको परेशान करेगा; किसी का भी कहना नहीं मानेगा।
    3. एक प्रधान वाक्य (उपवाक्य) पर आश्रित अनेक उपवाक्यों के बीच अर्द्ध विराम का प्रयोग होता है -
         1. सूर्योदय हो गया; अंधकार मिट गया; पक्षी चहचहाने लगे; हवा मंथर गति से  बहने लगी और मैं भी गंतव्य की ओर बढ़ गया।
         2. जब तक हम गरीब हैंबलहीन हैदूसरे के आश्रित रहने वाले हैंतब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता।
    4. जब एक ही वाक्य में कई वर्गों की बात की जाती है तब प्रत्येक पद के बाद अर्द्धविराम का प्रयोग होता है।
         1. शरीर पर पहनने के लिए पैंट, कोट और कमीज; पैर में पहनने के जूते, चप्पल और सैंडिल; नहाने-धोने की सामग्री तथा लेखन सामग्री।
        2. केंद्रीय हिंदी संस्थान के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं -
              अ. हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की सुविधा प्रदान करना;
              ब. भाषा-शिक्षण की आधुनिक तकनीकों का विकास करना;
              स. हिंदी भाषा के क्षेत्र में अनुसंधान करना;
              द. विभिन्न क्षेत्रों के विस्तार कार्यक्रम आयोजित करना।

4.
योजक-चिह्न (Hyphen)  -
                 इसे योगसूचक या समास चिह्न भी कहा जाता है। इसे मध्यवर्ती नाम से भी अभिहीत किया जा सकता है। इसका चिह्न (-) है। इसका प्रयोग उस स्थान पर किया जाता है जहाँ दो या दो से अधिक शब्दों का समास हो। योजक चिह्न के प्रयोग स्थल हैं -
    1. जब द्वंद्व समास वाले शब्द आएँ; उनके बीच में; जैसे - माँ-बाप, दिन-रात, भाई-बहिन आदि।
    2. कर्मधारय समास में भी प्रयोग किया जाता है; जैसे - चरण-कमल, संसार-सागर, मुख-चंद्र आदि।
    3. समानार्थी शब्दों के बीच; जैसे - खाना-पीना, हँसी-मजाक, चिट्ठी-पत्री आदि।
    4. अनुकरणवाची निरर्थक शब्दों के मध्य; जैसे - चाल-ढाल, ठीक-ठाक, पानी-वानी आदि।
    5  पुनरुक्त शब्दों के बीच; जैसे - चलते-चलते, खाते-खाते, दौड़ते-दौड़ते, जाते-जाते, रोते-रोते आदि।
    6. पंक्ति (वाक्य) की समाप्ति पर किसी शब्द के अपूर्ण रह जाने पर भी इसी चिह्न का प्रयोग किया जाता है और उसी शब्द का शेषांश दूसरी पंक्ति के आरंभ में आता है; जैसे - हिंदी साहित्य एक प्रकार से समस्त भार-
तीय संस्कृति के मूलभूत सत्यों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
    7. संबंधबोधक शब्दों के मध्य, जहाँ का, के, की का भाव हो; जैसे - जीवन-मूल, नैतिक-मूल्य, विश्व-संस्कृति आदि।
    8. निश्चित अथवा अनिश्चित संख्यावाचक तथा परिमाणवाचक शब्दों के बीच; जैसे- दो-चार, बहुत-कुछ, चार-पाँच आदि।
    9. एक साथ दो क्रियाओं का प्रयोग हो; जैसे –
लिखना-पढ़ना, उठना-बैठना, गाना-बजाना, चलना-फिरना आदि।
    10. विपरीतार्थक द्वंद्व सामासिक पदों के बीच; जैसे - राजा-प्रजा, धरती-आकाश, लाभ-हानि आदि।

5.
प्रश्नवाचक चिह्न (?)
     इसके नाम से ही स्पष्ट है कि वाक्य में प्रश्न  का भाव निहित हो, तो इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'इंट्रोगेटिव साइन' कहते हैं। जैसे - 
      1. आप कहाँ जा रहे हैं?
   2. आपका नाम क्या है?
      3. आप सभा में किस विषय पर बोलेंगे?
      4. आपने खाना क्यों नहीं खाया?

   
निम्न स्थितियों में इसका प्रयोग होता है -
    1. जिस वाक्य में संदेह की स्थिति का बोध हो, उसके अंत में यह चिह्न आता है; जैसे - 
                       1. तुम यहाँ आ पाओगे?
                       2. आप भारत के नहीं हैं?
    2. व्यंग्य, व्यंजना पूर्ण वाक्य के अंत में यह चिह्न आता है; जैसे - 
       1. हाय, यह क्या हो गया?
       2. भाई! तुम्हारे ही जलवे हैं?
       3. हाय, क्या खूब लगते हो?

6.
विस्मयादिबोधक चिह्न (!)
         इसे आश्चर्यसूचक चिह्न भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे 'साइन ऑफ एक्स्क्लेमेशन' कहते हैं। इस चिह्न का प्रयोग हर्ष, घृणा, क्षोभ, आश्चर्य, दुःख तथा संबोधन आदि भावों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। यह भी एक प्रकार का पूर्ण विराम ही है। इस चिह्न का उपयोग निम्नलिखित स्थानों पर किया जाता है -
   1. आश्चर्य सूचक शब्दों के बाद, इसका प्रयोग किया जाता है -
                       1. अरे! वह मर गया?
                       2. अरे! तुम फेल हो गए!
                       3. अरे! तुम इतनी जल्दी आ गये।

   2.
संबोधन के पश्चात् - जैसे - घनश्याम! जरा इधर आना ।
   3. हर्ष सूचक शब्द और वाक्य के बाद; जैसे - वाह! आपने तो कमाल कर दिया!
   4. क्षोभसूचक शब्द या वाक्यों के अंत में; जैसे - अरे! वह नहीं रहा!
                             ओफ! तुम इतने गिरे हुए हो!
   5. घृणासूचक शब्द या वाक्य के अंत में; जैसे - छी-छी! यहाँ तो ऐसी गंदगी है!
   6. आदेशसूचक भाव को व्यक्त करने के लिए; जैसे - यहाँ से तुम तुरंत चले जाओ!
   7. भावाभिव्यक्ति की तीव्रता के लिए; जैसे - सुन लो! मेरी आह से तुम सब भस्म हो जाओगे!
   8. सामान्यतः चिह्नों का प्रयोग एक साथ एकाधिक बार नहीं किया जाता है परंतु अपवाद स्वरूप, भावों की तीव्रता के लिए एकाधिक विस्मय चिह्न भी प्रयुक्त हो जाते हैं; जैसे - 
       1. विश्व में प्रलय! सर्वनाश!! महाविनाश!!!
       2. अरे! वह न रहा! शोक!! महाशोक!!!
   9. शुभकामनाओं, आशीर्वाद, प्रार्थना के लिए; जैसे -
                     1.आप यशस्वी हों! 
                     2. ईश्वर  तुम्हारा कल्याण करे!

7.
संबद्धता चिह्न या डैश (-)
            इस चिह्न का प्रयोग दो या अधिक वाक्यों, उपवाक्यों को जोड़ने के लिए  किया  जाता है। जैसे - 
                  1 शैक्षिक प्रक्रिया के तीन अंग हैं - विद्यार्थी, शिक्षक एवं पाठ्यक्रम।
                  2. भाषा की तीन इकाइयाँ होती हैं - वर्ण, शब्द तथा वाक्य।

किसी कथन को लिखते समय भी इसका प्रयोग होता है । जैसे - कार्ल मार्क्स ने ठीक ही तो कहा था - धर्म जनता के लिए अफीम है।

8.
विवरण चिह्न या उपविराम ( : , :- )
               इन्हें अंग्रेजी में क्रमशः कोलन एण्ड डैश तथा कोलन  कहा जाता है। इनके विकल्प रूप में संबद्धता चिह्न का प्रयोग मिलता है। जैसे - 
               क्रिया के दो भेद हैं: सकर्मक, अकर्मक।
               विचारणीय बात है कि: छात्र ने अनुशासनहीनता दिखाई।

 
कोलन को हिंदी में न्यूनविराम  तथा उपविराम नाम दिया जाता है। इसके प्रयोग में सावधानी आवश्यक हैक्योंकि इसका चिह्न  विसर्ग (:)  की तरह लगता है (यद्यपि यूनिकोड में इसे विसर्ग से भिन्न रखा गया है)। जैसे - 
  कमलेश्वर: व्यक्तित्व और कृतित्व
  हिंदी भाषा: दशा, दिशा और भविष्य
  हिंदी शिक्षण: नये भविष्य की तलाश

मूलतः अंग्रेजी के इस चिह्न का प्रयोग हिंदी में भी अब खूब होने लगा है।

9.
अवतरण/उद्धरण चिह्न ( '   '  तथा "   " )
      अंग्रेजी में इन्हें 'इनवर्टेड कॉमा' कहते हैं। जब किसी शब्द, पद या वाक्यांश तथा वाक्य विशेष को रेखांकित करना हो तो एकल तथा युग्मक उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जब किसी व्यक्ति, ग्रंथ, रचना  को रेखांकित करना हो तो 'एकल' उद्धरण चिह्न का प्रयोग होता हैजैसे - 
    1. 'रामचरितमानस' धार्मिक पुस्तक है।
    2. 'निराला' हिंदी के श्रेष्ठ कवि हैं।
    3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' प्रयोगवादी कवि हैं।

 
किसी पुस्तक, लेखसमाचार-पत्रनिबंध आदि शीर्षक तथा किसी उपनाम को भी एकल उद्धरण चिह्न में अंकित किया जाता है।

 
जब किसी रचनाकार की रचना से कोई अंश यथावत उद्धृत करना हो, तो 'युग्मक' उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे -
       1.ऋग्वेद का कथन है - "यत्र नार्यस्तु पूजन्ते रमयन्ते तत्र देवता।"
       2. उसने कहा - "मोहमाया के भ्रम में मत पड़ो।"

10.
कोष्ठक चिह्न - (   ),  {   },   [   ]
                                 इसे अंग्रेजी में 'ब्रैकेट' कहते हैं। लिखते समय जब किसी शब्द विशेष का भाव स्पष्ट न हो तो उसे अच्छी तरह स्पष्ट करने के लिए उसके संभावित पद या समानार्थी शब्द को कोष्टक में लिखकर समझाने का प्रयत्न किया जाता है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि कठिन शब्दार्थ को समझाने के लिए समभावी पर्याय शब्दों का प्रयोग कोष्ठक के माध्यम से ही किया जाता है। जैसे - आज कॉरपोरेशन (निगम) में साधारण बैठक थी।

नाटक में अभिनय को प्रभावशाली बनाने के लिए नाटककार इसके माध्यम से रंग - संकेतों का प्रयोग करता है। जैसे -
            1. मोहन (हँसते हुए) अच्छा जाइए।
            2. कालिदास (मुस्कराते हुए): कहो, इधर कैसे निकल आए।

गणित में कोष्ठक तीन हैं परंतु हिंदी में अर्थात् भाषा में केवल लघु कोष्ठक (  ) का ही प्रयोग किया जाता है। मझले { } तथा दीर्घ [  ] कोष्ठक गणित के सवालों को हल करने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

11.
निर्देशक चिह्न (/)
              इस चिह्न का प्रयोग सामान्यतः क्रमिक परिवर्तन या रूपांतर के भाव को प्रकट करने के लिए किया जाता है। इसे तीर की तरह () या लंबी लकीर (一) चिह्न से संकेतित किया जाता है। यह आकार में  योजक चिह्न से थोड़ा लंबा( 一) होता है। इसका प्रयोग निम्नांकित अवस्थाओं में होता है -
1. कथोपकथन/संवाद/वार्तालाप में पात्र-नाम के पश्चात् -
               मुकेशーकहिए कैसे हैं ?
               घनश्याम 一 अच्छा हूँ।
2. किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा कहे गए कथन को उद्धृत करने और उद्धरण चिह्न से पूर्व -
          सुभाष चंद्र बोस ने कहा था 一 "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।"
 3.किसी वाक्य, वाक्यांश या पद की व्याख्या करने के लिए -
     आपको परीक्षा पास करनी हैー परिश्रम, लग्न तथा ईमानदारी से। 
4  किसी कथन, अवतरण को लिखकर उसके समक्ष कथनकार का नाम लिखने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है-
              'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो कोई' 一  मीराबाई                                         
                                             
12. समानता सूचक चिह्न ( = )
                      इसे तुल्यताबोधक, समताबोधक तथा बराबरीबोधक नाम भी दिया जा सकता है। जब किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति से की जाए तब यह चिह्न प्रयुक्त होता है। जैसे -          क्षिति = पृथ्वी
                  पवन = हवा
                  नेत्र = आँख
                  8 × 3 = 24 आदि।

1
3. तारक/ पाद-टिप्पणी चिह्न ( * , + )
                  अंग्रेजी में से 'फुटनोट' चिह्न भी कहा जाता है। जब किसी शब्द या वाक्य का विश्लेषण, व्याख्या, संदर्भ बताना हो, तो उस शब्द, शब्दांश या वाक्य के ऊपर यह चिह्न लगाकर उसी पृष्ठ के नीचे पुनः यह चिह्न लगाकर उपर्युक्त शब्द का संदर्भ, व्याख्या लिखी जाती है। जैसे - प्रातिभ* पुस्तक पढ़ रहा है। पृष्ठ के नीचे तारक चिह्न  लगाकरउसे विश्लेषण किया जाता है। जैसे - *प्रातिभ व्यक्तिवाचक संज्ञा है।

1
4. हंसपद/त्रुटिपूरक/त्रुटिविराम चिह ( ^ )
                        अंग्रेजी में इसे Error indicator कहा जाता है। लिखते समय जब शीघ्रता या भूलवश कोई शब्द या वाक्यांश छूट जाए, तो छूटे हुए स्थान के पास यह चिह्न लगाकर ऊपर छूटे हुए अक्षर, शब्द या वाक्यांश लिख दिया जाता है। जैसे -
  1. मुझे आगरा जाना है। हंसपद का प्रयोग करते हुए इसे ऐसे लिखेंगे-          मुझे ^आज आगरा जाना है।
   2. भारतरत्न सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। हंसपद का प्रयोग करते हुए इसे ऐसे लिखेंगे - भारतरत्न ^देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

1
5. लोप निर्देशक/वर्जन चिह ( × × × /----/ ...)
                      अंग्रेजी में इसे Elemination कहते हैं। जब वाक्य में कोई अंश छोड़ दिया जाता है या लुप्त करना हो अथवा वह अंश लिखने योग्य न हो; उसे केवल पाठकों पर छोड़ दिया जाए, तो वहाँ इस चिह्न का प्रयोग होता है। प्रमुख  स्थितियाँ हैं -

    1.
काव्य पंक्तियों को लुप्त करने के लिए। जैसे -
                मंगल भवन अमंगल हारीद्रबहु सुदसरथ अजिर बिहारी।
                           ×××          ×××          ×××           ×××
     2. वाक्य में किसी शब्द को छुपाने के लिए। जैसे - 
                1 देश का नेतृत्व आज ... है।
                2. मैं नतीजा भोग रहा हूँ, कहीं आप ...।
     3. रिक्त स्थानों की पूर्ति करवाने के लिए या  रिक्त स्थान दिखाने  के लिए। जैसे - राजस्थान  में ... जिले हैं।

1
6. पुनरुक्तिबोधक ( „    „ )
               अंग्रेजी में इसे 'डिटो' कहा जाता है। जब उपर्युक्त किसी बात या शब्द को पुनः लिखना हो तो उसके ठीक नीचे इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे - 
                   जलज = कमल
                                      सरोज =    „  „
                                      राजीव =   „   „

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7. लाघव चिह्न ( ० )
            इसे संक्षेपसूचक भी कहते हैं। किसी विस्तृत शब्द या पद के संक्षिप्त रूप के पश्चात् इसका प्रयोग किया जाता है। जैसे -
       1 . पदनाम आदि में - डॉक्टर = डॉ०
       2. डिग्रियों  में  -  एम० ए०, बी० ए०, एम फिल्पी-एचडी
       3. अन्य प्रयोग - पंडित = पं०, राजकीय = राज०, कुमारी = कु०, विश्वविद्यालय- वि० वि० आदि।
आजकल शून्य बिंदु सूचक संकेत () की जगह बिंदु (.) का प्रयोग भी सामान्य है, यथा - पं. नेहरू, डॉ. लोहिया आदि

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8. समाप्तिसूचक (-०-/-×-/०००/■■■/×××/●●●)
              किसी ग्रंथकहानी, अध्यायलेख, निबंध आदि की समाप्ति पर यह चिह्न प्रयुक्त होता है। प्रतीकात्मक रूप में इसके लिए ह ती-चार रूप काम में लेते हैं; जैसे-  
          -०-  या -×- या ००० या  ■■■ या ××× या ●●● आदि।

विराम चिह्नों के उपर्युक्त वर्णन, विश्लेषण एवं प्रयोग के स्थलों के फलस्वरूप हिंदी भाषा के पठन-पाठन अध्ययन-अध्यापन आदि संबंधी त्रुटियाँ स्वत: ही हल हो जाती हैं। इनके अध्ययन या कहें कि ज्ञान से भाषा प्रयोग में परिष्कार आता है। अशुद्धियों की लंबी शृंखला समाप्त हो जाती है। हिंदीभाषी व्यक्ति के लिए इनके ज्ञान और समुचित प्रयोग की अनिवार्यता है।

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